Wednesday, October 9, 2019

CHAPTER 12.2 लक्ष्य बनाएं, सफल बने, इक्छा के सामने समर्पण करने का कोई उम्र नही होती।

और इच्छा के सामने समर्पण करने की कोई उम्र नहीं होती।

     ज़्यादातर सचमुच सफल लोग सप्ताह में 40 घंटे से भी ज्यादा समय तक काम करते हैं। परंतु आपने कभी नहीं सुना होगा कि उन्होंने ज़्यादा काम की शिकायत की हो। सफल लोगों का ध्यान लक्ष्य पर लगा होता है और इसी से उन्हें ऊर्जा मिलती है।

      इससे हमें यह शिक्षा मिलती है : जब आप एक इच्छित लक्ष्य बना लेते हैं और उस लक्ष्य की तरफ़ बढ़ने का संकल्प करते हैं तो आपकी ऊर्जा बढ़कर कई गुना हो जाती है। कई लोग, करोड़ों लोग, अपना लक्ष्य बनाकर और उस लक्ष्य को हासिल करने में जीजान से जुटकर नई ऊर्जा हासिल कर सकते हैं। लक्ष्यों से बोरियत दूर होती है। लक्ष्यों से कई लंबी बीमारियाँ भी दूर हो जाती हैं।

      हम लक्ष्यों की शक्ति में थोड़ा गहराई तक जाएँ। जब आप अपनी इच्छाओं के आगे समर्पण करते हैं, जब आप अपने दिमाग पर लक्ष्य को हावी हो जाने देते हैं, तो आप में शारीरिक शक्ति, ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है जिसके सहारे आप उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।
परंतु आपको कुछ और भी मिलता है जो उतना ही बहुमूल्य है। आपको “स्वचालित या ऑटोमैटिक योजना" मिलती है जो आपको सीधे लक्ष्य तक ले जाती है।

      गहराई से तय किए गए लक्ष्य के साथ सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि यह आपको अपने तक पहुँचने की राह पर बनाए रखता है। इसमें कोई रहस्य नहीं है। दरअसल होता यह है। जब आप अपने लक्ष्य के आगे समर्पण कर देते हैं, तो लक्ष्य आपके अवचेतन मस्तिष्क में जाकर बैठ जाता है। आपका अवचेतन मस्तिष्क हमेशा संतुलन में रहता है। हो सकता है कि आपका चेतन मस्तिष्क संतुलन में न हो। आपका चेतन
मस्तिष्क तभी संतुलन में रहता है जब यह वही करता है जो आपका अवचेतन मस्तिष्क सोच रहा है। अवचेतन मस्तिष्क के पूरे सहयोग के बिना कोई भी व्यक्ति झिझकेगा, दुविधा में होगा, अनिर्णय की स्थिति में होगा। अब जबकिआपका लक्ष्य आपके अवचेतन मस्तिष्क में गहरे बैठ गया है तो आप अपने आप सही तरीके से काम करने लगते हैं। चेतन मस्तिष्क अब स्पष्ट, सीधा चिंतन कर सकता है।

      मैं आपको दो काल्पनिक व्यक्तियों का उदाहरण देकर इस बात को समझाना चाहता हूँ। शायद इनमें आपको अपने आस-पास के कई लोगों की झलक दिखाई दे। हम इन्हें टॉम और जैक का नाम देंगे। यह दोनों बाक़ी सभी बातों में लगभग समान हैं, दोनों में एक ही चीज़ का अंतर है। टॉम का एक निश्चित लक्ष्य है। जैक का नहीं है। टॉम जानता है कि वह क्या बनना चाहता है। वह दस साल बाद खुद को कॉरपोरेशन के वाइस प्रेसिडेंट की कुर्सी पर बैठा देख रहा है।

         चूंकि टॉम ने अपने लक्ष्य के आगे समर्पण कर दिया है, इसलिए उसके अवचेतन मस्तिष्क से उसका लक्ष्य उसे संकेत करता है, “यह करो", या “यह मत करो, इससे तुम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाओगे।" लक्ष्य लगातार बोलता रहता है, “मैं ही वह इमेज हूँ जिसे तुम्हें हक़ीक़त बनाना है। तुम्हें मुझे हक़ीक़त बनाने के लिए यह करना चाहिए।"

         टॉम के पास लक्ष्य था, इसलिए वह इधर-उधर की बातों में नहीं उलझा। लक्ष्य ने उसे सारे कामों में सही रास्ता दिखाया। जब टॉम कोर्ड सूट ख़रीदता था, तो उसका लक्ष्य उसे बताता था कि उसे कौन सा सूट चुनना चाहिए। लक्ष्य ही टॉम को बताता था कि उसे अगली नौकरी किस तरह की चुनना चाहिए, बिज़नेस मीटिंग में क्या कहना चाहिए, विवाद की स्थिति में क्या करना चाहिए, क्या पढ़ना चाहिए और किस तरह के सिद्धांतों पर चलना चाहिए। अगर टॉम अपने लक्ष्य से ज़रा सा भी इधर-उधर भटकता था तो उसके अवचेतन मस्तिष्क में फ़िट स्वचालित यंत्र सक्रिय हो जाता था और उसे चेतावनी दे देता था कि वह भटक गया है और उसे बताता था कि सही राह पर आने के लिए उसे क्या कदम उठाने होंगे।

          टॉम के लक्ष्य ने उसे अपनी नौकरी के वातावरण के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया था।

       दूसरी तरफ़, जैक के पास कोई लक्ष्य नहीं था, इसलिए उसके पास मार्गदर्शन देने वाले स्वचालित यंत्र का अभाव था। वह जल्दी ही दुविधा में पड़ जाता था। उसके काम बिना नीतियों के होते थे। वह हिचकता था, कभी इधर कभी उधर जाता था, यह सोचता था कि उसे इस हालत में क्या करना चाहिए। चूंकि उसके पास लक्ष्य को हासिल करने की लगन नहीं थी, इसलिए जैक औसत ज़िंदगी की आसान राह पर लड़खड़ाता हुआ चल रहा था।

         क्या मैं आपसे ऊपर लिखे खंड को दुबारा पढ़ने का आग्रह कर सकता हूँ? ऐसा अभी करें। इस अवधारणा को अपने दिमाग में बैठ जाने दें। बेहद सफल लोगों के जीवन का अध्ययन करें। यह देखें कि उन सभी ने अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण कर दिया था। देखें कि किस तरह किसी बेहद सफल व्यक्ति की ज़िंदगी उसके लक्ष्य के चारों तरफ़ घूमती है।

        लक्ष्य के सामने समर्पण करें। सचमुच समर्पण करें। उसे अपने दिमाग पर हावी हो जाने दें और तब लक्ष्य आपको वह स्वचालित मार्गदर्शन प्रदान करेगा जो आपको लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होगा। 

       हम लोगों के साथ अक्सर होता है कि किसी शनिवार की सुबह जब हम सोकर उठते हैं तो हमारे पास कोई योजना नहीं होती, हम नहीं जानते कि हमें उस दिन क्या करना है। इस तरह के दिनों में हम लगभग कुछ हासिल नहीं कर पाते। हम दिन को यूँ ही गुज़ार देते हैं, और जब दिन ख़त्म हो जाता है तो खुश होते हैं। परंतु जब हम किसी दिन को योजना के साथ शुरू करते हैं, तो हमारे काम फटाफट हो जाते हैं।

      यह आम अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक़ सिखाता है : किसी काम में सफलता हासिल करने के लिए, हमें उस काम की योजना बनाना चाहिए।

       द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले वैज्ञानिकों को परमाणु की प्रबल शक्ति का आभास था। परंतु वे यह नहीं जानते थे कि परमाणु को किस तरह विखंडित किया जाए ताकि इसकी प्रबल शक्ति का विस्फोट हो। जब अमेरिका युद्ध में उतरा, तो भविष्यदर्शी वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का
संभावित शक्ति को देखा। तत्काल एक योजना बनी जिसका सिर्फ एक लक्ष्य था: परमाणु बम बनाना। बाक़ी सब इतिहास है। कुछ ही सालों में लगन और मेहनत रंग लाई। परमाणु बम गिराए गए और युद्ध ख़त्म हो गया। परंतु अगर लक्ष्य हासिल करने की योजना नहीं बनी होती तो परमाणु को विखंडित करने की प्रक्रिया शायद इतनी जल्दी नहीं हो पाती। शायद इसमें एक दशक या इससे भी ज़्यादा का विलंब हुआ होता।

       अगर आपको काम करना है, तो उसके लक्ष्य बना लें।

       हमारे उत्पादन का भट्टा ही बैठ जाएगा, अगर हम उत्पादन के टारगेट न बनाएँ। सभी कंपनियों के अफ़सर टारगेट डेट और उत्पादन की संख्या का लक्ष्य बनाते हैं। सेल्समैन तभी ज्यादा सामान बेच पाते हैं जब उन्हें निश्चित संख्या में माल बेचने का लक्ष्य दिया जाता है। प्रोफ़ेसर जानते हैं कि विद्यार्थी तभी अपने टर्म पेपर लिख पाते हैं जब उसके लिए डेडलाइन तय कर दी जाती है।

       तो अगर आप सफलता की तरफ़ आगे बढ़ना चाहते हैं तो लक्ष्य तय करें : डेडलाइन बनाएँ, किस तारीख़ तक आप लक्ष्य हासिल करेंगे यह तय करें। अपने आप यह तय करें कि आप इतने समय में इतना हासिल करेंगे। आप केवल उतना ही हासिल कर सकते हैं, जितना हासिल करने की आपने योजना बनाई है।

        ट्यूलेन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के डॉक्टर जॉर्ज ई. बर्क मानवीय दीर्घजीविता के विशेषज्ञ हैं। उनके अनुसार कई चीज़ों से यह तय होता है कि आप कितने समय तक जिएँगे : वज़न, आनुवंशिकता, खान-पान, मानसिक तनाव, व्यक्तिगत आदतें। परंतु डॉ. बर्क कहते हैं, “जल्दी मरने का सबसे आसान तरीका है रिटायर हो जाना और कुछ न करना। हर इंसान को जिंदा रहने के लिए जीवन में रुचि लेना चाहिए।"

         हममें से हर एक के पास विकल्प है। रिटायरमेंट हमारे लिए शुरुआत भी हो सकता है और अंत भी। “कुछ मत करो, बस खाओ, सोओ और दिन काटो" का रवैया रिटायरमेंट का “खुद को तेज़ी से ज़हर दे दो” वाला रास्ता है। जो लोग रिटायरमेंट को सक्रिय जीवन का अंत मानते हैं, उनमें से ज्यादातर लोगों के जीवन का अंत भी इसके तत्काल बाद हो जाता है। चूँकि अब जीवन का कोई लक्ष्य नहीं बचा है, जीने का कोई कारण नहीं बचा है, इसलिए ज़िंदगी खत्म हो जाती है।

          दूसरी तरफ़ रिटायर होने काबुद्धिमत्तापूर्ण रवैया है, "मैं अब नए सिरे से शुरुआत करूँगा।" मेरे बहुत अच्छे दोस्त ल्यू गॉर्डन ने रिटायर होने के इसी तरीके को चुना। ल्यू कुछ साल पहले अटलांटा के सबसे बड़े बैंक के वाइस प्रेसिडेंट के रूप में रिटायर हुए थे। परंतु उन्होंने अपने रिटायरमेंट के दिन को अपनी नई जिंदगी की शुरुआत माना था। उन्होंने खुद को बिज़नेस सलाहकार के रूप में स्थापित किया। और उनकी प्रगति आश्चर्यजनक है।

         अब वे साठ से सत्तर के बीच हैं, वे ढेर सारे ग्राहकों को सेवाएँ देते हैं और वक्ता के रूप में उनकी देश भर में माँग है। उनकी एक योजना ‘पी सिग्मा एप्सीलॉन' नामक संस्था बनाने की थी जो प्रोफेशनल सेल्समैन और सेल्स एक्जीक्यूटिब्ज़ की संस्था हो। हर बार जब मैं देखता हूँ ल्यू की उम्र मुझे पहले से कम दिखती है। अभी भी अपनी आत्मा में वे 30 साल के जवान हैं। मैं ऐसे बहुत कम लोगों को जानता हूँ जो इतनी उम्र में जीवन से सुख की इतनी फ़सल काट रहे हैं जितना कि यह वरिष्ठ नागरिक, जिसने रिटायरमेंट को जीवन का अंत नहीं माना।

         और ल्यू गॉर्डन की तरह के लोग बोरिंग बुड्ढे नहीं होते हैं, जो सिर्फ अपने दुःखों की दास्तान ही सुनाते रहें।

        लक्ष्य, प्रबल लक्ष्य, किसी व्यक्ति को जिंदा रख सकते हैं, चाहे उसकी शारीरिक स्थिति कैसी भी हो। मिसेज़ डी. मेरे कॉलेज के एक मित्र की माँ थीं। उन्हें तभी कैंसर हो गया था जब उनका पुत्र केवल दो साल का था। इतना ही नहीं, बीमारी का पता चलने से तीन महीने पहले ही उनके पति की मृत्यु हो गई थी। उनके डॉक्टरों ने उन्हें कोई दिलासा नहीं दिया। परंतु मिसेज़ डी. ने हार नहीं मानी। उनका संकल्प था कि वे अपने दो साल के बच्चे को सफलतापूर्वक कॉलेज की पढ़ाई पूरी करवाएँगी। अपने पति द्वारा छोड़ी गई छोटी सी किराने की दुकान चलाकर उन्होंने पढाई के लिए। पैसे जुटाना शुरू किए। उनके बहुत से ऑपरेशन हुए। हर बार डॉक्टर यहा कहते थे, “बस कुछ महीने और।"

        कैंसर तो कभी खत्म नहीं हुआ। परंत "कुछ महीने" खिंचते चले गए। और 20 साल बन गए। उन्होंने अपने बच्चे को सफलतापूर्वक कॉलेज की पढ़ाई खत्म करते और डिग्री लेते देखा। इसके छह हफ्ते बाद वे चल बसीं।

        लक्ष्य, प्रबल लालसा, में इतनी शक्ति थी कि वे मौत से दो दशक तक लड़ती रहीं।

        लंबे जीवन के लिए लक्ष्यों का प्रयोग करें। दुनिया की कोई भी दवा - और आपका डॉक्टर भी यह मानेगा - जीवन को बढ़ाने में इतनी सक्षम नहीं होती, जितनी कि कुछ करने की इच्छा होती है।

वह व्यक्ति जो अधिकतम सफलता हासिल करने के लिए कृतसंकल्प है, यह सिद्धांत सीख जाता है कि प्रगति एक समय में एक क़दम चलने का नाम है। एक-एक ईंट लगाकर ही घर बनता है। फुटबॉल के खेल में भी एक-एक मैच करके ही विश्वकप जीता जाता है। कोई डिपार्टमेंट स्टोर एक-एक नए ग्राहक से ही बढ़ता है। हर महान सफलता छोटी-छोटी सफलताओं की श्रृंखला होती है।

        एरिक सेवारीड जाने-माने लेखक हैं। उन्होंने रीडर्स डाइजेस्ट (अप्रैल 1957) में लिखा है कि उन्होंने जो सबसे बढ़िया सलाह सीखी है, वह है “अगले मील" का सिद्धांत। यहाँ पर उनके लेख का कुछ हिस्सा दिया जा "द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, मुझे और कई दूसरे लोगों को क्षतिग्रस्त हवाई जहाज़ से पैराशूट से छलाँग लगाकर बर्मा-भारत की सीमा के पहाड़ी जंगलों में कूदना पड़ा। इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी कि अगले कुछ सप्ताहों तक हमारे बचाव के लिए कोई टीम वहाँ पहुँचती। और तब हमने भारत की तरफ़ एक दर्दनाक, लंबी यात्रा शुरू की। हमें 140 मील का फ़ासला तय करना था। बीच में पहाड़ थे, अगस्त की गर्मी थी और मानसून की बारिश थी।

       "सफर के पहले ही घंटे में मेरे जूते में एक कील एक फुट गहरी धंस गई। शाम तक मेरे दोनों पैरों में सिक्कों के आकार के छाले हो गए। क्या मैं 140 मील तक लड़खड़ाते हुए चल सकता था? क्या दूसरे लोग इतनी दूर चल पाएँगे, जबकि उनमें से कई की हालत तो मुझसे भी बदतर थी? हम लोगों को यह विश्वास था कि हम ऐसा नहीं कर सकते। परंतु हम अगली चोटी तक तो पहँच ही सकते थे, हम रात गुज़ारने के लिए अगले गाँव तक तो पहुँच ही सकते थे। और हमारा लक्ष्य एक दिन में बस इतना ही करना तो था...।

      “जब मैंने नौकरी छोडी और ढाई लाख शब्दों की एक पुस्तक लिखने का फैसला किया तो मैंने पूरी योजना के बारे में एक साथ नहीं सोचा। अगर मैंने ऐसा किया होता तो मैं वह महत्वाकांक्षी पुस्तक कभी पूरी नहीं कर पाया होता। मैंने केवल अगले पैरेग्राफ़ के बारे में विचार किया, अगले पेज के बारे में नहीं, और अगले अध्याय के बारे में तो बिलकुल भी नहीं। इस तरह, पिछले छह महीनों से मैंने कुछ नहीं किया, केवल एक पैरेग्राफ़ के बाद दूसरा पैरेग्राफ़ लिखता रहा और पुस्तक 'अपने आप तैयार' हो गई।

       “वर्षों पहले. मैंने हर रोज़ लिखने और ब्रॉडकास्टिंग का काम अपने हाथ में लिया जो आज 2000 पांडुलिपियों से ज़्यादा हो चुका है। अगर तब किसी ने मुझसे एक साथ '2000 पांडुलिपियों को लिखने' का कॉन्ट्रैक्ट साइन कराया होता, तो मैं इतने बड़े काम को करने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर देता। परंतु मुझे सिर्फ एक पांडुलिपि लिखने के लिए कहा गया, इसके बाद फिर एक, और मैंने हमेशा यही किया है।"

        “अगले मील" का सिद्धांत एरिक सेवारीड के लिए काम कर गया और यह आपके लिए भी काम करेगा।

       क़दम-दर-क़दम का तरीक़ा किसी भी लक्ष्य को हासिल करने का इकलौता बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़ा है। धूम्रपान छोड़ने का सर्वश्रेष्ठ फ़ॉर्मूला जिसने मेरे कई दोस्तों की सिगरेट छुड़वा दी है, वह अगले घंटे का फ़ॉर्मूला है। अंतिम लक्ष्य तक पहली ही बार में पहुंचने के बजाय यानी कभी धूम्रपान न करने का संकल्प ले लेना उतना कारगर नहीं होता, जितना कि अगले घंटे सिगरेट न पीने का संकल्प। जब घंटा ख़त्म होता है, तो धूम्रपान करने वाला अपने संकल्प को एक और घंटे के लिए बढ़ा देता है। फिर, जब इच्छा कम होती जाती है, तो इस समय को दो घंटे रखा जा सकता है, और इसके बाद एक दिन। अंततः लक्ष्य हासिल हो जाता है। वह व्यक्ति जो एकदम इस आदत को छोड़ना चाहता है वह इसलिए असफल होता है। क्योंकि इसमें असहनीय मनोवैज्ञानिक वेदना होती है। सिगरेट के बिना एक  घंटे रहना आसान है। सिगरेट के बिना जिंदगी भर रहना कठिन है।

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