Sunday, September 22, 2019

CHAPTER. 7.2 अपने माहौल को सुधारें : फ़र्स्ट क्लास बनें




      याद रखें- जो लोग आपको बताते हैं कि इसे किया नहीं जा सकता, वे उपलब्धियों के मामले में हमेशा असफल लोग होते हैं, हमेशा औसत लोग होते हैं। इन लोगों के विचार ज़हर की तरह होते हैं।

       जो लोग आपको यह समझाना और विश्वास दिलाना चाहते हैं कि आप यह नहीं कर सकते, आपको उन लोगों के ख़िलाफ़ अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम कर लेना चाहिए। नकारात्मक सलाह को केवल चुनौती के रूप में स्वीकार करें और आप उस काम को करके दिखा दें।

       इस बारे में बेहद सावधान रहें- नकारात्मक सोच वाले लोगों को अपनी सफलता की योजना बदलने का मौक़ा न दें। नकारात्मक लोग हर जगह होते हैं और उन्हें दूसरों का बना-बनाया खेल बिगाड़ने में बड़ा मज़ा आता है। 

       कॉलेज में मैं दो सेमिस्टर में डब्ल्यू. डब्ल्यू. के साथ था। वह एक अच्छा दोस्त था, जो आपको कभी-कभार ज़रूरत पड़ने पर थोड़ा-बहुत क़र्ज़ दे दिया करता था या दूसरे तरीकों से भी मदद कर दिया करता था। इन अच्छी आदतों के बावजूद, डब्ल्यू. डब्ल्यू. ज़िंदगी के प्रति निराशावादी और कटु था, उसे अपना भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नज़र आता था, उसे सफल होने का कोई मौका नहीं दिखता था। उसकी मानसिकता पूरी तरह नकारात्मक थी।

       उस समय मैं अखबार की एक कॉलमिस्ट का दीवाना हुआ करता था। यह कॉलमिस्ट आशावादी थी, सकारात्मक रवैए वाली थी, और मानती थी कि ज़िंदगी में अवसरों की कोई कमी नहीं है। जब भी डब्ल्यू. डब्ल्यू. मुझे इस कॉलमिस्ट के लेख पढ़ते हुए देखता था या जब भी चर्चा में उसका नाम आता था, तो वह कहता था, “भगवान के लिए, डेव। मुख्य पृष्ठ पढ़ो। वहीं तुम्हें ज़िंदगी की सच्चाई नज़र आएगी। तुम्हें पता होना चाहिए कि यह आशावादी कॉलमिस्ट कमज़ोर लोगों के दिमाग को बहला-फुसलाकर अपने पैसे कमा रही है।"

        जब भी हमारी चर्चा ज़िंदगी में सफलता हासिल करने के बारे में हुआ करती थी, तो डब्ल्यू. डब्ल्यू. पैसा कमाने का अपना फॉर्मूला बताता था। उसके शब्दों में फ़ॉर्मूला था- “डेव, पैसा कमाने के आजकल तीन रास्ते हैं। पहला, अमीर औरत से शादी कर लो। दूसरा, अच्छे, साफ़-सुथरे ढंग से, कानूनी तरीके से धोखा दो। तीसरा तरीक़ा यह कि सही लोगों से जान-पहचान कर लो, जिनकी अच्छी पकड़ हो।"

        डब्ल्यू. डब्ल्यू. हमेशा अपने फॉर्मूले को सही साबित करने के लिए ढेरों उदाहरण दिया करता था। मुख्य पृष्ठ पर छपी ख़बरों का हवाला देते। हुए वह बताता था कि हज़ारों लेबर लीडर्स में से एक लीडर ने अपनी यूनियन के पैसे का गबन किया और रफू-चक्कर हो गया। वह उस दुर्लभ खबर की तलाश भी किया करता था कि किस तरह एक फल बेचने वाले ने करोड़पति लड़की से शादी कर ली। और वह एक ऐसे आदमी को जानता था जिसका परिचित एक बड़े आदमी का परिचित था और इस कारण उसे एक बड़ा मौक़ा हाथ लग गया और वह अमीर बन गया।

        डब्ल्यू. डब्ल्यू. मुझसे कई साल बड़ा था और उसे इंजीनियरिंग की कक्षाओं में अच्छे नंबर मिला करते थे। मैं उसे बड़े भाई की तरह मानता था। मैं इस बात के बहुत करीब आ गया था कि अपने मूलभूत विश्वासों पर उसकी विचारधारा को हावी हो जाने दूँ और अपनी सकारात्मक
विचारधारा को उसकी नकारात्मक विचारधारा से प्रभावित हो जाने दूँ।

        सौभाग्य से, एक शाम डब्ल्यू. डब्ल्यू. से लंबी चर्चा के बाद मैंने खुद को सँभाला। मुझे यह एहसास हुआ कि मैं असफलता की आवाज़ सुन रहा था। मुझे यह लगा कि डब्ल्यू. डब्ल्यू. मुझे नहीं समझा रहा है, बल्कि अपने आप को तसल्ली दे रहा है कि उसकी सोच सही है। इसके बाद मैं डब्ल्यू. डब्ल्यू. को एक नए अंदाज़ में देखने लगा, जैसे कोई वैज्ञानिक प्रयोग करते समय किसी चूहे को देखता है। उसकी बातों को मानने के बजाय मैंने। उसका अध्ययन शुरू किया। मैं यह समझने की कोशिश कर रहा था कि उसकी ऐसी विचारधारा क्यों थी और उसकी यह नकारात्मक सोच उसे। कहाँ ले जाएगी। मैंने अपने नकारात्मक दोस्त को एक व्यक्तिगत प्रयोग में बदल लिया।

        मैं डब्ल्यू. डब्ल्यू. से 11 साल से नहीं मिला। परंतु मेरा एक दोस्त। उससे कुछ महीने पहले ही मिला था। डब्ल्यू. डब्ल्यू. वॉशिंगटन में एक कम तनख्वाह वाला ड्राफ्ट्समैन है। मैंने अपने मित्र से पूछा कि क्या डब्ल्यू. डब्ल्यू. में कोई बदलाव आया है।

         "नहीं, अगर कोई बदलाव आया है, तो सिर्फ यही कि वह पहले से ज़्यादा नकारात्मक हो गया है। वह ज़िंदगी में बहुत सारी कठिनाइयाँ झेल रहा है। उसके चार बच्चे हैं और उसकी कम तनख्वाह में उनका ठीक से गुजारा नहीं हो पाता। डब्ल्यू. डब्ल्यू. में इतना दिमाग है कि वह इससे पाँच गुना ज्यादा कमा सकता है परंतु उसे यह नहीं मालूम कि इस दिमाग़ का किस तरह उपयोग किया जाए।"

          नकारात्मक लोग हर जगह होते हैं। कुछ नकारात्मक लोग, जैसा मेरा दोस्त डब्ल्यू. डब्ल्यू. था, दिल के साफ़ होते हैं और आपका भला करना चाहते हैं। परंतु कई नकारात्मक लोग आपसे जलते हैं। चूँकि वे खुद ज़िंदगी की दौड़ में पीछे रह गए हैं, इसलिए वे आपको भी गिराना चाहते हैं। वे खुद को अयोग्य समझते हैं, इसलिए वे आपको भी अपनी तरह अयोग्य, औसत बनाना चाहते हैं।

         बेहद सावधान रहें। नकारात्मक लोगों का अध्ययन करें। उन्हें अपनी सफलता की योजना नष्ट न करने दें।

       एक युवा कर्मचारी ने मुझे बताया कि उसने अपना डिपार्टमेंट बदल लिया है। उसने कहा, "हमारे डिपार्टमेंट का एक आदमी सुबह-शाम हमारी कंपनी की बुराई किया करता था। चाहे मैनेजमेंट कुछ भी करे, वह उसमें बुराई ढूँढ़ ही लेता था। वह सुपरवाइज़र से लेकर मालिक तक हर एक के बारे में नकारात्मक सोच रखता था और नकारात्मक बातें कहता था। हम जो माल बेचते थे, वह उसकी नज़र में घटिया था। हमारी हर नीति में कोई न कोई ख़ामी थी। जहाँ तक उसका ख्याल था, हमारी कंपनी की हर चीज़ में, हर व्यक्ति में कहीं न कहीं, कोई न कोई गड़बड़ी थी।

          "हर सुबह जब मैं काम पर आता था तो उसकी जली-कटी बातें सुनकर में तनावग्रस्त हो जाया करता था और शाम को जब मैं घर जाता था, उसके पहले भी वह कर्मचारी 45 मिनट तक इस बात पर भाषण देता था कि उस दिन हमारे साथ क्या-क्या ग़लत हुआ, वह दिन क्यों खराब गुज़रा। मैं बहुत निरुत्साहित, निराश होकर घर लौटता था। आखिरकार, मैंने फैसला किया कि मैं दूसरे डिपार्टमेंट में चला जाऊँ। इससे बहुत ज्यादा फ़र्क पड़ा क्योंकि अब में ऐसे लोगों के साथ हूँ जो दोनों पहलुओं पर विचार कर सकते हैं।"

         उस युवक ने अपना माहोल बदल लिया। उसने सही काम किया है ना?

           इस बारे में कोई गलतफ़हमी न पालें। आपको आपके संगी-साथियों के आधार पर पहचाना जाता है। एक जैसे लोग एक साथ रहते हैं। सभी कर्मचारी एक-से नहीं होते। कुछ नकारात्मक होते हैं, कुछ सकारात्मक। कुछ इसलिए काम करते हैं क्योंकि काम करना उनकी “मजबूरी" है। कछ इसलिए काम करते हैं क्योंकि वे महत्वाकांक्षी हैं और आगे बढ़ना चाहते हैं। कुछ सहयोगी बॉस की हर बात या उसके हर काम की बुराई करते हैं; कुछ दूसरे सहयोगी ज़्यादा निष्पक्ष दृष्टि से सोचते हैं और यह महसस करते हैं कि अच्छे लीडर बनने से पहले उन्हें अच्छा अनुयाई बनना चाहिए।

          हम किस तरह सोचते हैं, यह हमारे समूह से तय होता है। सनिश्चित कर लें कि आप ऐसे समूह में हों जो सही सोचता है।

       आपके काम के माहौल में कई बाधाएँ आएँगी। हर समूह में ऐसे लोग होंगे जिन्हें अपनी अयोग्यता का एहसास होगा और वे आपकी राह में बाधा बनकर खड़े हो जाएँगे और आपको प्रगति नहीं करने देंगे। कई महत्वाकांक्षी लोगों की हँसी उड़ाई जाती है, उन्हें धमकाया तक जाता है और सिर्फ इसलिए क्योंकि वे लोग ज़्यादा सफल होते हैं और ज्यादा काम करते हैं। हम इस बात को ठीक से समझ लें। कुछ लोग ईर्ष्या की वजह से आपको नीचा दिखाना चाहते हैं और वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि आप सफलता की सीढ़ी पर ऊपर की तरफ़ चढ़ना चाहते हैं।

         यह फ़ैक्टरियों में अक्सर होता है जहाँ साथी कर्मचारी ऐसे व्यक्ति से चिढ़ते हैं जो उत्पादन बढ़ाना चाहता है। यह मिलिट्री में भी होता है जहाँ नकारात्मक लोगों का समूह उस युवा सिपाही की हँसी उडाता है और उसका अपमान करता है जो ऑफ़िसर्स स्कूल में जाना चाहता है।

       यह बिज़नेस में भी होता है, जब ज़िंदगी की दौड़ में पीछे रह जाने वाले लोग आगे निकलने वाले लोगों का रास्ता रोकने की कोशिश करते हैं। आपने यह हाईस्कूल में भी बार-बार देखा होगा कि कुछ आवारा लड़के उस सहपाठी का मज़ाक उड़ाते हैं जो अच्छी तरह पढ़ता है और अच्छे नंबर लाता है। कई बार तो उस प्रतिभाशाली विद्यार्थी का तब तक मज़ाक़ उड़ाया जाता है जब तक कि वह इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाता कि प्रतिभाशाली होने में समझदारी नहीं है।

       अपने आस-पास के ऐसी नकारात्मक सोच वालों को नज़रअंदाज़ कर दें।

       अक्सर आपसे इस तरह की जो बातें कही जाती हैं, उनका उद्देश्य आपको नीचा दिखाना नहीं होता। वे तो केवल बोलने वाले की असफलता और निराशा को उजागर करती हैं।

         नकारात्मक सोच वाले लोगों को इस बात की छूट न दें कि वे आपको भी अपने स्तर तक नीचे ले आएँ। उनकी बातों को उसी तरह से फिसल जाने दें जैसे बतख की पीठ से पानी फिसला करता है। इस तरह के लोगों से जुड़ें जो सकारात्मक सोचते हैं, जो प्रगतिशील सोच रखते हैं। उनके साथ ऊपर की तरफ़ बढ़ें।

          आप भी ऐसा कर सकते हैं, बशर्ते कि आपकी सोच सही हो!

      परंतु एक सावधानी रखें- ये देखें कि आपको सलाह देने वाला कौन है। ज़्यादातर संगठनों में आपको बहुत से ऐसे लोग मिल जाएँगे जो आपको “फोकट की सलाह" देंगे। वे रुचि लेकर आपको सफलता के गुर या नुस्खे या फ़ॉर्मूले बताना चाहेंगे। एक बार मैंने इसी तरह के फोकटिया सलाहकार को एक प्रतिभाशाली नए कर्मचारी को सलाह देते हुए सुना। सलाहकार कह रहा था, “यहाँ काम करने का तरीक़ा यही है कि आप हर काम से बचें। अगर उन्हें पता चल गया कि आपमें प्रतिभा है, तो वे आप पर काम लादते चले जाएंगे। ख़ास तौर पर मिस्टर ज़ेड. (डिपार्टमेंट के मैनेजर) से जितना बने दूर रहना। अगर उन्हें पता चल गया कि आपके पास कम काम है तो वे आपको गले तक काम में डुबो देंगे...।"

       यह फोकटिया सलाहकार 30 साल से उस कंपनी में काम कर रहा है और उसे आज तक प्रमोशन नहीं मिला है। उस व्यक्ति के लिए यह कितना अच्छा सलाहकार हो सकता है जो अभी नया-नया काम शुरू कर रहा है और बिज़नेस में ऊपर की तरफ़ प्रगति करना चाहता है!

जो जानते हैं, उन्हीं से सलाह लेने का नियम बनाएँ। बहुत से लोग यह सोचते हैं कि सफल लोगों से मिलना आसान नहीं होता। यह बात गलत है। सच तो यह है कि इनसे मिलना मुश्किल नहीं होता। देखने में यह आता है कि जो व्यक्ति जितना ज़्यादा सफल होगा, वह उतना ही विनम्र होता है और दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता है। चूंकि ऐसे लोग अपने काम और सफलता में सचमुच रुचि लेते हैं इसलिए वे यह देखना चाहते हैं कि हर काम सफलतापूर्वक हो और जब वे रिटायर हों तो उनका उत्तराधिकारी इतना क़ाबिल हो कि वह हर काम सफलतापूर्वक कर सके। उन लोगों से मिलना मुश्किल होता है जो “भविष्य में बड़ा बनने के सपने देखने वाले लोग" होते हैं।

         एक एक्जीक्यूटिव ने जिसे एक घंटे के 40 डॉलर मिला करते थे इस बात को स्पष्ट किया - “मैं एक व्यस्त महिला हूँ, परंतु मेरे ऑफ़िस के दरवाज़े पर 'डू नॉट डिस्टर्ब' का बोर्ड नहीं लगा रहता। लोगों को सलाह देना मेरा मुख्य काम है। हम अपनी कंपनी के हर व्यक्ति को प्रशिक्षण देते हैं। परंतु अगर किसी को व्यक्तिगत परामर्श या “सलाह" की ज़रूरत हो, तो उसे बस कहने भर की देर है।

        “मैं अपने यहाँ आने वाले की हर समस्या सुनने के लिए तैयार हूँ, चाहे वह समस्या कंपनी से संबंधित हो या व्यक्तिगत। वह व्यक्ति जो अपनी नौकरी के बारे में ज़्यादा जानना चाहता है और काम करने के ज़्यादा अच्छे तरीके सीखना चाहता है, उसकी मदद करना मुझे सबसे अच्छा लगता है।

         "परंतु,” उसका कहना था, “मुझे ऐसे फालत लोगों को सलाह देने में समय बर्बाद करना पसंद नहीं है जो गंभीरता से सलाह नहीं ले रहे हों।"

            जब आपके पास सवाल हों, तो फ़र्स्ट क्लास बनें। असफल व्यक्ति से सलाह लेना उसी तरह की बात है जैसे नीमहकीम से कैंसर का इलाज पूछना।

         आजकल कई एक्जीक्यूटिव किसी महत्वपूर्ण पद पर किसी को नौकरी देत समय उसकी पत्नी का इंटरव्यू भी लेते हैं। एक सेल्स एक्जीक्यूटिव ने मुझ बताया, “मैं यह सुनिश्चित कर लेता हूँ कि हमारे संभावित सेल्समैन का परिवार उसे सहयोग करता हो। सेल्समैन की नौकरी में यात्रा करनी पड़ता है, काम के घंटे अनियमित होते हैं और भी इसी तरह की कई दिक्क़तें होती हैं। ऐसी परिस्थिति में ऐसा सहयोगी परिवार होना चाहिए जो सेल्समैन की राह में दिक्क़तें खड़ी न करे।"

        आज लोग इस बात को समझ चुके हैं कि छुट्टी के दिन में जो होता है और शाम को 6 बजे से सुबह 9 बजे तक जो होता है उससे किसी इंसान के काम पर फ़र्क पड़ता है, उससे इस बात पर फ़र्क पड़ता है कि वह इंसान सुबह 9 बजे से शाम को 6 बजे तक किस तरह काम करेगा। जिसकी नौकरी के बाहर की ज़िंदगी रचनात्मक है वह उस व्यक्ति से ज़्यादा सफल होगा जिसकी घरेलू ज़िंदगी बोझिल और नीरस है।

          हम पारंपरिक तरीके से दो साथी कर्मचारियों जॉन और मिल्टन को देखें कि वे अपना वीकएंड किस तरह गुज़ारते हैं। और इसके क्या परिणाम होते हैं।

        जॉन वीकएंड में अपनी मनोवैज्ञानिक खुराक इस तरह लेता है। आम तौर पर एक शाम वह अपने चुनिंदा, दिलचस्प दोस्तों के साथ गुज़ारता है। दूसरी शाम को वे लोग घूमने जाते हैं - शायद कोई फ़िल्म देखते हैं, किसी सामुदायिक कार्यक्रम में जाते हैं या किसी दोस्त के घर जाते हैं। जॉन शनिवार की सुबह ब्वॉय स्काउट वर्क में लगाता है। शनिवार की दोपहर को वह घर के छोटे-मोटे काम निबटाता है। अक्सर वह किसी ख़ास प्रोजेक्ट पर काम करता है। अभी वह पिछवाड़े एक आँगन बना रहा है। रविवार को जॉन अपने परिवार के साथ कुछ ख़ास करता है। हाल ही में एक रविवार को वे लोग पहाड़ पर चढ़ने गए। दूसरे रविवार को वे संग्रहालय घूमने गए। कभी-कभार वे आस-पास देहात में पिकनिक मनाने चले जाते हैं क्योंकि जॉन भविष्य में देहात में ज़मीन-जायदाद खरीदना चाहता है।

        रविवार की शाम शांति से गुज़रती है। जॉन आम तौर पर कोई पुस्तक पढ़ता है या फिर समाचार सुनता है।

        जॉन के वीकएंड व्यस्त और सुनियोजित रहते हैं। कई तरह की रोचक गतिविधियों के कारण बोरियत का सवाल ही नहीं उठता। जॉन को काफ़ी मनोवैज्ञानिक ऊर्जा मिल जाती है।

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Friday, September 20, 2019

CHAPTER. 7.1 अपने माहौल को सुधारें : फ़र्स्ट क्लास बनें

                  अपने माहौल को सुधारें :
                        फ़र्स्ट क्लास बनें

     आपका दिमाग एक अद्भुत मशीन है। जब आपका दिमाग एक तरीके से काम करता है, तो यह आपको असाधारण सफलता के रास्ते पर आगे ले जा सकता है। परंतु वही दिमाग जब दूसरे तरीके से काम करता है तो यह आपको पूरी तरह असफल करा सकता है।

           मस्तिष्क पूरी सृष्टि में सबसे नाजुक, सबसे संवेदनशील यंत्र है। आइए देखें कि मस्तिष्क में जो विचार आते हैं वे क्यों आते हैं।

           करोड़ों लोग अपने खान-पान का ध्यान रखते हैं। अमेरिका को कैलोरी गिनने वालों का देश कहा जाता है। हम विटामिन, मिनरल और दूसरे भोज्य पूरकों पर करोड़ों डॉलर खर्च करते हैं और हम सब जानते हैं कि हम ऐसा क्यों करते हैं। पोषण पर हुए शोध से हमने यह जाना है।
कि शरीर को हम जो आहार देते हैं, उसका शरीर पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है। शारीरिक स्टैमिना, बीमारी से बचाव, शरीर का आकार, यहाँ तक कि हम कितना लंबा जिएंगे - इन सबका संबंध हमारे खान-पान से होता है।

          शरीर वैसा ही बनता है जैसा भोजन शरीर को खिलाया जाता है। इसी तरह दिमाग वैसा ही बनता है जैसा भोजन दिमाग को खिलाया जाता है। दिमाग का भोजन पैकैटों या डिब्बों में नहीं आता और आप इसे किसी स्टार में नहीं खरीद सकते। आपका माहौल ही आपका दिमागी भोजन है- और इसमें वे अनगिनत चीजें आ जाती हैं जिनसे आपका चेतन और। अवचेतन विचार प्रभावित होता है। हम किस तरह का दिमागी भोजन करते हैं इससे हमारी आदतें, रवैए और व्यक्तित्व निर्धारित होते हैं। हममें से हर एक को कोई न कोई खास क्षमता विरासत में मिली है, जिसका विकास हम कर सकते हैं। परंतु हम उस क्षमता को कितना और किस तरह विकसित कर पाते हैं, यह हमारे दिमागी भोजन पर निर्भर करता है।

          मस्तिष्क पर माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता है जिस तरह कि शरीर पर भोजन का पड़ता है।

         आपने कभी सोचा कि अगर आप अमेरिका की जगह किसी दूसरे देश में पैदा हुए होते तो आप किस तरह के इंसान होते? आपको कौन सा खाना पसंद होता? आप कैसे कपड़े पहनना पसंद करते? आपको कौन से मनोरंजन ज्यादा अच्छे लगते? आप किस तरह की नौकरी कर रहे होते? आपका धर्म कौन सा होता?

         आप इन सभी सवालों के जवाब नहीं दे सकते। परंतु एक बात तो तय है, कि अगर आप किसी दूसरे देश में बड़े हुए होते तो आप एक बिलकुल ही अलग तरह के इंसान होते। क्यों? क्योंकि आप एक अलग माहौल में रह रहे होते और आप उससे निश्चित रूप से प्रभावित हुए।
होते। जैसा कहा जाता है, कोई भी इंसान अपने आस-पास के माहौल का प्रॉडक्ट होता है।

          इसे ध्यान से समझ लें। माहौल हमें आकार देता है, हमें सोचने का तरीका देता है। आप एक भी ऐसी आदत नहीं गिना सकते जो आपने दूसरों से न सीखी हो। छोटी-छोटी चीजें जैसे आपकी चाल, खाँसने का तरीक़ा, कप पकड़ने का अंदाज़; आपका संगीत, साहित्य, मनोरंजन, कपड़ों का शौक़ - सभी हमारे माहौल की देन हैं।

          इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आपकी सोच का आकार, आपके लक्ष्य की ऊँचाई, आपका रवैया और आपका समूचा व्यक्तित्व आपके माहौल द्वारा तय किया जाता है।

          अगर आप नकारात्मक लोगों के साथ ज्यादा समय तक रहेंगे तो आपकी सोच नकारात्मक हो जाएगी, छोटे लोगों के साथ निकट संपर्क रहने पर आपमें छोटी आदतें आ जाएँगी। दूसरी ओर, बड़े विचारों वाले लोगों के साथ रहने पर आपकी सोच का स्तर भी ऊँचा हो जाएगा। महत्वाकांक्षी लोगों के निकट संपर्क में रहने पर आपमें भी महत्वांकाक्षा आ जाएगी।

         विशेषज्ञ सहमत हैं कि आप आज जिस तरह के इंसान हैं, आज आपका व्यक्तित्व, या महत्वाकांक्षा, या स्टेटस जैसा भी है, यह आपके मनोवैज्ञानिक माहौल के कारण है। और विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आप आज से एक, पाँच, दस या बीस साल बाद क्या बनेंगे यह भी पूरी तरह आपके भविष्य के माहौल पर निर्भर करता है।

         आप महीनों और सालों तक बदलते रहेंगे। हम इतना तो जानते ही हैं। परंतु आप किस तरह बदलेंगे यह आपके भावी माहौल पर निर्भर करता है, उस दिमागी भोजन पर निर्भर करता है जो आप अपने आपको खिलाएँगे। आइए देखते हैं कि हम संतुष्टि और समृद्धि के लिए अपने भावी माहौल को किस तरह अपने मनमाफ़िक बना सकते हैं।

          पहला कदम - सफलता के लिए खुद को ढालें। ऊँचे स्तर की सफलता की राह में सबसे पहली बाधा यह भावना है कि महान सफलता हमारी पहुँच के बाहर है। यह रवैया कई, ढेर सारी दमनकारी शक्तियों से उपजता है जो हमारी सोच को औसत स्तर का बनाए रखती हैं।

          इन दमनकारी शक्तियों को समझने के लिए हमें अपने बचपन की तरफ़ नज़र डालनी होगी। बचपन में हम सभी के लक्ष्य काफ़ी ऊँचे हुआ करते हैं। बहुत छोटी उम्र में ही हम अनजान को जीतने की योजनाएँ बनाते हैं, लीडर बनने की, ऊँचे महत्व के पद हासिल करने की, रोमांचक काम करने की, अमीर और प्रसिद्ध बनने की - संक्षेप में, हम चाहते हैं। कि हम पहले नंबर पर हों, सबसे बड़े और सबसे श्रेष्ठ बन जाएँ। और अपने अज्ञान में हम साफ़ रास्ता देख सकते हैं कि हम इन लक्ष्यों को हासिल कर लेंगे।

          परंतु होता क्या है ? इसके पहले कि हम उस उम्र में आएँ जब हम अपने महान लक्ष्यों की तरफ़ आगे कदम बढ़ा सकें, बहुत सी दमनकारी शक्तियाँ हम पर हावी हो जाती हैं।

          हर तरफ़ से हम सुनते हैं, “सपने देखना मूर्खता है," और यह कि हमारे विचार “अव्यावहारिक, मूर्खतापूर्ण, नादानी भरे या बकवास” हैं, कि “सफल होने के लिए आपके पास ढेर सारा पैसा होना चाहिए,” कि "आप सफल तभी हो सकते हैं जब या तो आपकी किस्मत अच्छी हो या फिर आपके बहुत से महत्वपूर्ण दोस्त हों," या आप अभी "ज्यादा बूढ़े" या "ज़्यादा युवा” हैं।

       “आप-आगे नहीं बढ़-सकते-इसलिए-कोशिश-करने-से-कोई-फ़ायदा- नहीं" वाला प्रचार आपके दिमाग पर बमबारी करके उसे ध्वस्त कर देता है और इसका परिणाम यह होता है कि ज्यादातर लोगों को तीन समूहों में बाँटा जा सकता है:

        पहला समूह। जिन्होंने पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं : ज़्यादातर लोग अंदर से यह मान चुके हैं कि उनके पास आवश्यक योग्यता नहीं है। असली सफलता, असली उपलब्धि दूसरों के लिए है जो किसी मायने में आपसे ज़्यादा भाग्यवान या तक़दीर वाले हैं। आप ऐसे लोगों को आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि वे काफ़ी देर तक आपको यह समझाते हैं कि वे अपने जीवन से क्यों संतुष्ट हैं और वे सचमुच कितने “खुश" हैं।

         एक बहुत बुद्धिमान व्यक्ति है जिसकी उम्र 32 साल है। उसने अपने आपको एक सुरक्षित परंतु औसत नौकरी के पिंजरे में कैद कर लिया है, और कुछ समय पहले उसने मुझे घंटों तक यह समझाया कि वह अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट है। उसने तर्क दिए, बड़े-बड़े और बड़े अच्छे तर्क दिए, परंतु वह जानता था कि यह हक़ीक़त नहीं है। दरअसल वह चाहता तो यह था कि उसे भी चुनौतीपूर्ण स्थितियाँ मिलें, जिनका सफलतापूर्वक सामना करके वह आगे बढ़ सके और अपनी क्षमताओं को विकसित कर सके। परंतु “दमनकारी शक्तियों की बहुतायत" के कारण उसे इस बात का विश्वास हो चला था कि वह बड़े काम करने के काबिल नहीं है।

         यह समूह वास्तव में उस नौकरी बदलने वाले समूह का ठीक उल्टा है जो अपनी हर नौकरी से असंतुष्ट रहता है और लगातार नौकरियाँ बदलता रहता है। अपने आपको किसी खोल में बंद कर लेना, जिसे एक ऐसी क़ब्र कहा गया है जिसके दोनों सिरे खुले हैं, भी उतना ही बुरा हो सकता है जितना कि बिना लक्ष्य के इधर-उधर भटकना, यह आशा करना कि अवसर कहीं से आकर आपसे टकरा जाएगा।

         दूसरा समूह। वे लोग जिन्होंने आंशिक रूप से समर्पण किया है : दूसरा परंतु कुछ छोटा समूह वयस्क जीवन में जब प्रवेश करता है तो उसे सफलता की काफ़ी आशा होती है। ऐसे लोग अपने आपको तैयार करते हैं। वे मेहनत करते हैं। वे योजना बनाते हैं। परंतु, एक या दो दशक बाद, उनकी प्रेरणा की आग ज़माने की नकारात्मक हवाओं से बुझने लगती है, ऊँचे पदों के लिए प्रतियोगिता करने का उनका उत्साह ठंडा पड़ने लगता है। यह समूह तब फ़ैसला करता है कि महान सफलता उनकी पहुँच के बाहर है।

          वे यह तर्क देते हैं, "हम औसत व्यक्ति से ज़्यादा कमा रहे हैं और हम औसत व्यक्ति से बेहतर जिंदगी गुज़ार रहे हैं। हम हमेशा कोल्हू के बैल की तरह क्यों जुते रहें ?"

          वास्तव में, इस समूह ने भी अपने भीतर कुछ डर बिठा लिए हैं- असफलता का डर, सामाजिक निंदा का डर, असुरक्षा का डर, जो है उसे खो देने का डर। यह लोग संतुष्ट नहीं होते क्योंकि अंदर से वे जानते हैं कि उन्होंने समर्पण कर दिया है। इस समूह में कई प्रतिभाशाली, बुद्धिमान लोग होते हैं जो ज़िंदगी की राह में सिर्फ इसलिए घिसटते हुए चलते हैं क्योंकि वे खड़े होकर दौड़ने से डरते हैं।

        तीसरा समह। वे लोग जिन्होंने कभी समर्पण नहीं किया - यह समूह, जिसमें शायद दो या तीन प्रतिशत लोग ही आते होंगे, अपने दिमाग में निराशा को कभी हावी नहीं होने देता। ऐसा व्यक्ति दमनकारी शक्तियों के सामने समर्पण नहीं करता। वह घुटनों के बल चलने में विश्वास नहीं करता। इसके बजाय, यह लोग सफलता की साँस लेते हैं, सफलता का जीवन जीते हैं। यह समूह सबसे सुखी होता है क्योंकि इसकी उपलब्धियाँ सबसे ज्यादा होती हैं। ये लोग चोटी के सेल्समैन, एक्जीक्यूटिव, और हर क्षेत्र के लीडर बन जाते हैं। इन्हें अपना जीवन रोमांचक, प्रेरक, बहुमूल्य और महत्वपूर्ण लगता है। यह लोग हर नए दिन का स्वागत करते हैं, दूसरे लोगों के साथ उत्साह से मिलते हैं और हर दिन का पूरी तरह आनंद उठाते हैं।

         हम ईमानदारी से सोचें। हम सभी तीसरे समूह में होना पसंद करेंगे। ऐसे समूह में जिसे हर साल ज्यादा बड़ी सफलताएँ मिलती जाती हैं. ऐसे समूह में जहाँ बड़े काम होते हैं और उनके बड़े परिणाम मिलते हैं।

        इस समूह में आने - और बने रहने - के लिए हमें अपने माहौल के दमनकारी प्रभावों से जूझना होगा। अगर आप यह जानना चाहें कि आपको पहले और दूसरे समूहों के लोग किस तरह पीछे खींचते हैं, तो आप इस उदाहरण का अध्ययन करें।

        मान लीजिए आप अपने “औसत” दोस्तों से पूरी गंभीरता से यह कहें, "किसी न किसी दिन मैं इस कंपनी का वाइस-प्रेसिडेंट बनकर दिखाऊँगा।"

         यह सुनकर उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? आपके दोस्त शायद यह सोचेंगे कि आप मज़ाक़ कर रहे हैं। और अगर उन्हें यक़ीन हो जाए कि आप गंभीर हैं, तो शायद वे यह कहेंगे, “नादान आदमी, तुम्हें अभी ज़िंदगी में बहुत कुछ सीखना है।"

        आपकी पीठ पीछे वे तो यहाँ तक कहेंगे कि आपके दिमाग के पेंच ढीले हो गए हैं या आपका दिमाग खिसक गया है।

         अब हम यह मान लें कि आप अपनी कंपनी के प्रेसिडेंट से यही बात इतनी ही गंभीरता से कहते हैं। उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? चाहे जो हो, एक बात तो पक्की है : वह हँसेगा नहीं। वह आपकी तरफ़ गौर से देखेगा और खुद से पूछेगा, “क्या यह आदमी गंभीर है ?"

       परंतु वह, मैं एक बार फिर दोहरा दूं, हँसेगा नहीं।

        क्योंकि बड़े लोग बड़े विचारों पर हँसा नहीं करते।

         या मान लें आप औसत लोगों से यह कहें कि आपकी योजना 50,000 डॉलर का घर ख़रीदने की है, तो वे आप पर हँस सकते है क्योंकि उन्हें लगेगा कि यह असंभव है। परंतु आप अगर यह योजना। किसी ऐसे व्यक्ति को बताएँ जो 50,000 डॉलर के घर में रह रहा हो,
तो उसे आश्चर्य नहीं होगा। वह जानता है कि यह असंभव नहीं है, क्या वह ऐसा कर चुका है।

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CHAPTER 6.3 हर दिन अपना उत्साह बढ़ाएँ

                हर दिन अपना उत्साह बढ़ाएँ



महीने पहले एक ऑटोमोबाइल सेल्समैन ने मुझे सफलता दिलाने वाली तकनीक के बारे में बताया। यह तकनीक बहुत बढ़िया थी। इसे पढ़ें।

        "हमारे काम का एक बड़ा हिस्सा है टेलीफ़ोन करना," सेल्समैन ने बताया, "जिसमें हम दो घंटे तक अपने संभावित ग्राहकों को फ़ोन करकेbडिमांस्ट्रेशन के लिए अपॉइंटमेंट लेते हैं। जब मैंने तीन साल पहले कार बेचना शुरू किया, तो मुझे यहीं पर सबसे ज़्यादा मुश्किल आती थी। मै संकोची और डरा हुआ रहता था और मैं जानता था कि मेरी आवाज़ फ़ोन पर कैसी सुनाई देती होगी। सामने वाले आदमी के लिए यह बोलना स्वाभाविक ही होता था, 'सॉरी, मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है' और इसके बाद वह फ़ोन काट देता था।

         "हर सोमवार की सुबह हमारे सेल्स मैनेजर एक सेल्स मीटिंग में थे। यह मीटिंग बहुत प्रेरणादायक हुआ करती थी और इससे मुझे काफी प्रेरणा मिलती थी। और इसका परिणाम यह होता था कि सोमवार को मैं सप्ताह के किसी और दिन के मुक़ाबले ज्यादा डिमांस्ट्रेशन हासिल करने में कामयाब हो जाता था। परंतु समस्या यह थी कि सोमवार की मेरी प्रेरणा मंगलवार तक ख़त्म हो जाती थी और बाक़ी हफ्ते मेरा प्रदर्शन एक बार फिर निराशाजनक हुआ करता था।

          "तभी मेरे दिमाग में एक विचार आया। अगर मेरा सेल्स मैनेजर मुझे प्रेरित कर सकता था, तो मैं अपने आपको प्रेरित क्यों नहीं कर सकता? क्यों न मैं फ़ोन कॉल करने के पहले अपने आपको एक प्रेरक भाषण दूँ। उस दिन मैंने फैसला किया कि मैं कोशिश करके देखूगा। बिना किसी को बताए मैं खाली मैदान में गया और एक ख़ाली कार में बैठ गया। वहाँ कुछ देर बैठकर मैंने खुद से बातें कीं। मैंने अपने आपको बताया, “मैं एक अच्छा कार सेल्समैन हूँ और मैं सर्वश्रेष्ठ सेल्समैन बनने जा रहा हूँ। मैं अच्छी कारें बेचता हूँ और मेरा धंधा अच्छा चल रहा है। जिन लोगों को मैं फ़ोन कर रहा हूँ उन्हें इन कारों की ज़रूरत है और मैं इन्हें बेचने जा रहा हूँ।'

         "शुरुआत से ही यह आत्म-प्रेरक तकनीक सफल हुई। मुझे इतना अच्छा लगा कि मुझे फ़ोन करने में ज़रा भी हिचक नहीं हुई। मैं फ़ोन करने के लिए उत्सुक होने लगा। मैं आजकल खाली प्लॉट में खाली कार में बैठकर खुद को प्रेरणा नहीं देता हूँ, परंतु मैं अब भी इस तकनीक का प्रयोग करता हूँ। किसी भी नंबर को डायल करने से पहले मैं अपने आपको यह याद दिलाता हूँ कि मैं एक बेहतरीन सेल्समैन हूँ और मैं सफल होने जा रहा हूँ। और मुझे सफलता मिलती है।"

       यह बहुत शानदार विचार है, नहीं क्या? सफलता की चोटी पर पहुँचने के लिए आपको यह अनुभव करना होगा कि आप सफलता की चोटी पर हैं। अपने आपसे प्रेरक चर्चा करें और यह जानें कि ऐसा करने से आप कितने बड़े और विश्वासपूर्ण बन सकते हैं।

        हाल ही में, मैंने एक ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किया। इसमें हर यक्ति को दस मिनट तक “लीडर बनने" के विषय पर बोलना था। एक ट्रेनी ने बहुत बुरा प्रदर्शन किया। उसके घुटने काँप रहे थे और उसके हाथ थरथरा रहे थे। वह भूल गया कि वह क्या कहने वाला था। पाँच या छह मिनट तक इधर-उधर की बात करने के बाद, वह पूरी तरह असफल होकर बैठ गया।

          सत्र के बाद, मैंने उससे सिर्फ इतना कहा कि वह अगले सत्र की शुरुआत के पंद्रह मिनट पहले वहाँ आ जाए।

          वह वादे के मुताबिक अगले सत्र के पंद्रह मिनट पहले वहाँ आ गया। हम दोनों पिछली रात के उसके बुरे अनुभव के बारे में बात करने लगे। मैंने उससे पूछा कि भाषण देने के पाँच मिनट पहले उसके दिमाग़ में किस तरह के विचार आ रहे थे।

          “मैं बहुत डरा हुआ था। मैं जानता था कि मैं दूसरों के सामने खुद को मूर्ख साबित कर दूंगा। मैं जानता था कि मैं फ्लॉप होने वाला हूँ। मैं यह सोचता जा रहा था, 'लीडर बनने के बारे में मैं क्या बोल सकता हूँ?' मैंने यह याद करने की कोशिश की कि मैं क्या बोलने वाला हूँ परंतु मुझे असफल होने के अलावा और कोई बात सूझ ही नहीं रही थी।"

          “यही तो," मैंने बीच में कहा, “यही तो आपकी समस्या की जड़ है। बोलने के पहले ही आपने अपने आपको हरा दिया। आपने खुद को विश्वास दिला दिया कि आप असफल होने वाले हैं। फिर इसमें हैरत की क्या बात है कि आप असफल हो गए? साहस बढ़ाने के बजाय आपने डर बढ़ाने का विकल्प चुना।

          "अब इस शाम का सत्र शुरू होने में सिर्फ चार मिनट का समय बचा है," मैंने उससे कहा। "मैं चाहता हूँ कि अब आप यह करें। अगले कुछ मिनट तक अपने आपसे प्रेरणा भरी बातें करें। हॉल के बाहर उस खाली कमरे में चले जाएँ और खद से कहें, 'मैं बहुत अच्छा भाषण देने जा रहा हूँ। मैं अपनी बात सच्चे दिल से कहूँगा और लोग पूरा मन लगाकर सुनेंगे।' इन शब्दों को लगातार दोहराते रहें, और पूरे विश्वास से ऐसा करें। फिर आप हॉल में आएँ और अपना भाषण देना शुरू कर दें।"

        काश कि आप वहाँ होते और दोनों भाषणों के अंतर को सुन सकते। उस छोटी-सी, खद की दी गई प्रेरणादायक चर्चा का असर यह   हुआ कि वह बहुत बढ़िया भाषण देने में कामयाब हुआ।

        संदेश - प्रेरणादायक आत्म-प्रशंसा का अभ्यास करें। आत्म-निंदा के शब्दों से खुद को छोटा न बनाएँ।

         आप जैसा सोचते हैं, आप वैसे ही होते हैं। अपने बारे में बड़ी बातें सोचें और आप सचमुच बड़े बन जाएँगे।

"खुद को खुद के हाथों बेचने" का विज्ञापन बनाएँ। एक मिनट के लिए अमेरिका के बेहद लोकप्रिय ब्रांड कोका कोला के बारे में सोचें। हर दिन आपकी आँख या कान में कई बार “कोक" दिखाई या सुनाई दे जाता है। जो लोग कोका कोला बनाते हैं वे आपको लगातार “कोक" बेचते हैं और इसके पीछे एक कारण होता है। अगर वे आपको लगातार “कोक" नहीं बेचेंगे तो हो सकता है कि “कोक" में आपकी रुचि कम हो जाए और एक दिन यह पूरी तरह ख़त्म हो जाए। इससे उनकी बिक्री घट जाएगी।

         परंतु कोका कोला कंपनी ऐसा नहीं होने देती। वे आपको बहुत बार “कोक" बेचते हैं, बार-बार बेचते हैं।

          हर दिन हम लोग ऐसे आधे-जिंदा-आधे-मुर्दा लोगों को देखते हैं जिन्होंने खुद को खुद के हाथों नहीं बेचा है। उनमें अपने सबसे महत्वपूर्ण सामान यानी खुद के लिए कोई आत्म-सम्मान नहीं है। ये लोग नीरस हैं। खुद को छोटा समझते हैं। उन्हें लगता है उनकी कोई हस्ती नहीं है और चूँकि उन्हें ऐसा लगता है, इसलिए सचमुच ऐसा ही होता है।

         आधे-ज़िंदा-आधे-मुर्दा आदमी को इस बात की ज़रूरत है कि वह खुद को खुद के हाथों बेच दे। उसे यह महसूस करना होगा कि वह एक फ़र्स्ट क्लास आदमी है। उसे खुद पर सच्चा, पूरा विश्वास करना ही होगा।

          टॉम स्टैली एक युवक है जो तेज़ी से सफलता के रास्ते पर जा रहा है। टॉम दिन में तीन बार खुद को खुद के हाथों बेचता है। और वह ऐसा "टॉम स्टैली के 60 सेकंड के विज्ञापन" के माध्यम से करता है। वह अपन विज्ञापन को हमेशा अपने पर्स में अपने साथ रखता है। इस विज्ञापन म उसने क्या लिखा है:

           टॉम स्टैली से मिलें- एक महत्वपूर्ण, सचमुच महत्वपूर्ण व्यक्ति। टॉम, आप एक बड़े चिंतक हैं, इसलिए आप बड़ा सोचें। हर चीज़ के बारे में बड़ा सोचें। आपमें बढ़िया काम करने की बहत योग्यता है इसलिए हमेशा बढ़िया काम करें।


       टॉम, आप सुख, प्रगति और अमीरी में विश्वास करते हैं।

          इसलिए : सिर्फ सुख के बारे में बात करें,

                        सिर्फ प्रगति के बारे में बात करें,

                        सिर्फ अमीरी के बारे में बात करें।

आपमें बहुत क्षमताएँ हैं, टॉम, आपमें बहुत क्षमताएँ हैं। इसलिए आप अपनी क्षमताओं का उपयोग अपनी नौकरी में करें। आपको कोई चीज़ सफल होने से रोक नहीं सकती, टॉम, कोई भी चीज़।

         टॉम, आप उत्साही हैं। अपने उत्साह को सबके सामने दिखने दें।

         आप अच्छे दिखते हैं, टॉम, और आप अच्छा अनुभव करते हैं। ऐसे ही बने रहें।

         टॉम स्टैली, आप कल बहुत बढ़िया आदमी थे और आप आज उससे भी बढ़िया आदमी बनकर दिखाएँगे। अब ऐसा करके दिखाएँ, टॉम। आगे बढ़ें।

        टॉम मानता है कि इस विज्ञापन की मदद से ही वह इतना सफल और महत्वपूर्ण बन पाया। "खुद को खुद के हाथों बेचने से पहले मैं सोचा करता था कि मैं हर एक की तुलना में हीन हूँ, छोटा हूँ। अब मैं महसूस करता हूँ कि मेरे पास सफल होने के सारे गुण हैं और मैं सफल हो रहा हूँ। और मैं हमेशा सफल होता रहूँगा।"

        आप अपना "खुद के हाथों खुद को बेचने का विज्ञापन" कैसे बनाएँ? पहले तो अपने गुणों को चुनें, आपमें कौन सी योग्यताएँ और काबिलियत हैं ? खुद से पुछे, "मुझमें क्या ख़ास बात है?" अपने बारे में वर्णन करते समय ज़रा भी संकोच न करें।

इन गुणों को एक काग़ज़ पर अपने शब्दों में लिख लें। फिर अपने बारे में विज्ञापन लिखें। टॉम स्टैली के विज्ञापन को एक बार फिर पढ़ें। यह देखें कि वह किस तरह टॉम से बात करता है। अपने आपसे बात करें। बिलकुल स्पष्ट रहें। जब आप विज्ञापन तैयार करें तो किसी और के बारे में न सोचें, खुद के बारे में सोचें।

          तीसरी बात, आप दिन में कम से कम एक बार इस विज्ञापन को अकेले में ज़ोर से पढ़ें। शीशे के सामने पढ़ने से ज़्यादा फ़ायदा होगा। इसे पढ़ते समय शारीरिक गतिविधियों की भी मदद लें। अपने विज्ञापन को दृढ़ निश्चय के साथ पढ़ें। इसे पढ़ते समय अपने शरीर में रक्त का प्रवाह तेज़ हो जाने दें। इसे जोश के साथ पढ़ें।

          चौथी बात, आप अपने विज्ञापन को हर दिन चुपचाप कई बार पढ़ें। जब भी आपको किसी परिस्थिति में साहस की ज़रूरत हो, इसे पढ़ें। जब भी आप खुद को निराश या असफल पाएँ, इसे पढ़ें। अपने विज्ञापन को हमेशा अपने पास रखें - और इसका प्रयोग करें।

           एक बात और। बहुत से लोग, शायद ज़्यादातर लोग, सफलता की इस तकनीक को पढ़कर "हँस” सकते हैं। इसलिए क्योंकि ये लोग यह मानने को तैयार नहीं होते कि विचारों को नियंत्रित करके सफलता पाई जा सकती है। परंतु, मेहरबानी करके, औसत व्यक्तियों के फैसले को न मानें। आप औसत व्यक्ति नहीं हैं। अगर आपको “खुद के हाथों खुद को बेचने" के सिद्धांत के बारे में कोई शंका है तो अपनी पहचान के सबसे सफल व्यक्ति से सलाह लें कि वह इस बारे में क्या सोचता है। उससे पूछे, और फिर खुद के हाथों खुद को बेचना शुरू करें।

  अपनी सोच को विकसित करें। महत्वपूर्ण लोगों की तरह सोचें।

अपनी सोच को विकसित करने का मतलब है अपने कार्यों को विकसित करना और इसी से सफलता मिलती है। यहाँ आपको एक आसान तरीका बताया जा रहा है जिसकी मदद से आप महत्वपर्ण लोगों की तरह सचि पाएँगे। नीचे दिए गए फॉर्म को मार्गदर्शक की तरह प्रयुक्त करें।

     अपने दिमाग में यह सवाल जमकर बिठा लें, 'क्या महत्वपूर्ण व्यक्ति इसी तरीके से काम करता है? बड़े, ज़्यादा सफल बनने के लिए इस सवाल का उपयोग करें।

       संक्षेप में, याद रखें:

1. महत्वपूर्ण दिखें; इससे आपको महत्वपूर्ण सोचने में मदद मिलती है। आपकी वेशभूषा आपसे कुछ कहती है। सुनिश्चित कर लें कि यह आपके आत्मविश्वास और हौसले को बढ़ाए। आपकी वेशभूषा सामने वाले से भी कुछ कहती है। सुनिश्चित कर लें कि यह सबसे कहे, “यह
रहा एक महत्वपूर्ण व्यक्ति - बुद्धिमान, अमीर और भरोसेमंद।"

2. यह सोचें कि आपका काम महत्वपूर्ण है। इस तरीके से सोचें और आपको ऐसे मानसिक संकेत मिलने लगेंगे कि आप अपने काम को किस तरह बेहतर ढंग से कर सकते हैं। सोचें कि आपका काम महत्वपूर्ण है और आपके अधीनस्थ भी सोचने लगेंगे कि उनका काम महत्वपूर्ण है।

3. हर दिन कई बार अपने आपसे प्रेरणादायक बातें करें। “खद के हाथों खुद को बेचने” का विज्ञापन बनाएँ। हर मौके पर खुद को याद दिलाएँ कि आप एक फ़र्स्ट-क्लास इंसान हैं।

4. ज़िंदगी की हर परिस्थिति में खुद से पूछे, “क्या महत्वपूर्ण व्यक्ति इसी तरह से सोचते हैं ?" फिर जवाब के हिसाब से काम करें।


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Thursday, September 19, 2019

CHAPTER 6.2. जैसा सोचेंगे, वैसा बनेंगे




           आपकी वेशभूषा की तरह, आपकी अपने काम के बारे में सोच भी के सपीरियर, सहयोगियों, अधीनस्थों से कुछ कहती है - दरअसल, संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति से कुछ न कुछ कहती है।

           कुछ महीनों पहले मैंने एक दोस्त के साथ कुछ घंटे का समय बिताया । मेरा यह मित्र एक अप्लायंस निर्माता के यहाँ पर्सनेल डायरेक्टर (Parsonnel director) है। हमने “आदमी बनाने" के बारे में बात की। उसने अपना “पर्सनेल ऑडिट सिस्टम" मुझे समझाया और कहा कि उसने इससे बहुत सीखा है।

          "हमारे यहाँ 800 लोगों का गैर-उत्पादक स्टाफ़ है। हमारे पर्सनेल ऑडिट सिस्टम में मैं अपने एक सहयोगी के साथ हर छह महीने में अपने हर कर्मचारी का इंटरव्यू लेता हूँ। हमारा लक्ष्य सीधा-सा है। हम जानना चाहते हैं कि हम उसके काम में उसकी क्या मदद कर सकते हैं। हम सोचते हैं कि यह एक अच्छी परंपरा है क्योंकि हमारे यहाँ काम करने वाला हर व्यक्ति हमारे लिए महत्वपूर्ण है, वरना वह हमारे यहाँ काम नहीं कर रहा होता।

          “हम कर्मचारियों से सीधे सवाल नहीं पूछते हैं। इसके बजाय हम उन्हें प्रोत्साहित करते हैं कि वे जो कहना चाहते हों, कहें। हम उनके सच्चे विचार सुनना चाहते हैं। हर इंटरव्यू के बाद हम उनके काम के बारे में उनके रवैए का मूल्यांकन कई बिंदुओं पर करते हैं।

            “मैंने इससे यह सीखा,” उसने आगे कहा, "हमारे कर्मचारी ए ग्रुप या बी ग्रुप में से किसी एक ग्रुप में फ़िट होते हैं और उनके किसी ग्रुप में फ़िट होने का आधार होता है अपने काम के बारे में उनका रवैया। “बी ग्रुप के लोग मुख्य तौर पर सुरक्षा, कंपनी की रिटायरमेंट योजनाओं, मेडिकल लीव की नीतियों, छुट्टी के समय, बीमा योजना में सुधार और ओवरटाइम के बारे में बात करते हैं। वे यह जानना चाहते है कि जिस तरह उन्हें पिछले मार्च में ओवरटाइम दिया गया था, क्या इस बार भी मार्च में उन्हें ओवरटाइम दिया जाएगा। वे अपनी नौकरी की मुश्किलों के बारे में भी काफ़ी बातें करते हैं। वे हमें विस्तार से बताते है कि उन्हें अपने साथी-कर्मचारियों की कौन सी बातें या आदतें पसंद नही हैं। कुल मिलाकर, बी ग्रुप के लोग - और इस ग्रुप में हमारे  गैर-उत्पादक स्टाफ के लगभग 80 प्रतिशत कर्मचारी आते हैं-अपनी नौकरियों को आवश्यक बुराई समझते हैं।

           “अपनी नौकरी के बारे में ए ग्रुप के व्यक्ति का नजरिया बिलकुल अलग होता है। वह अपने भविष्य के बारे में चिंतित होता है। सुझाव देता है कि वह किस तरह अपने काम को और बेहतर तर कर सकता है। वह हमसे किसी और बात की उम्मीद नहीं करता हमसे सिर्फ अवसर चाहता है। ए ग्रुप के लोग बड़े पैमाने पर सोचते है। वे बिज़नेस सुधारने के सुझाव देते हैं। वे मेरे ऑफ़िस में होने वाले इंटर को रचनात्मक और लाभदायक समझते हैं। जबकि बी ग्रुप के लोग मानते हैं कि इंटरव्यू या हमारा पर्सनेल ऑडिट सिस्टम एक ब्रेनवॉशिंग अभियान है और इससे जैसे-तैसे छुटकारा पाकर वे खुश होते हैं।

           "किसी के रवैए का उसकी सफलता से क्या संबंध है, यह देखने का तरीका हमारे पास है। कर्मचारियों को प्रमोशन देना, उनकी तनख्वाह बढ़ाना और बाकी खास लाभ देने की जितनी भी सिफ़ारिशें होती हैं, वे सब मेरे पास आती हैं। हमेशा यही देखने में आया है कि लाभ देने की सिफारिशें ए ग्रुप के लोगों के लिए की जाती हैं। और हमेशा यही देखने में आया है कि जितनी भी समस्याएँ होती हैं, वे बी ग्रप के लोगों की तरफ से आती हैं।

            "मेरे काम में सबसे बड़ी चुनौती यह है," उसने कहा, "कि बी ग्रुप के लोगों को किस तरह प्रेरित किया जाए और उनकी किस तरह मदद। की जाए कि वे बी ग्रुप से ए ग्रुप में आ जाएँ। यह आसान नहीं है क्योंकि । जब तक व्यक्ति खुद अपनी नौकरी को महत्वपूर्ण नहीं समझे और अपन । काम के बारे में सकारात्मक विचार नहीं रखे, तब तक उसकी कोई मदद। नहीं की जा सकती।"

          यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आप अपने बारे में जता सोचते हैं, आप वैसे ही होते हैं। आपकी विचार शक्ति आपको बता बना देती है। यह सोचें कि आप कमज़ोर हैं, यह सोचें कि आपम कम है, यह सोचें कि आप असफल हो जाएँगे, यह सोचें कि क्लास है- इस तरीके से सोचें और आप निश्चित रूप से असफल जिंदगी जीने के लिए विवश हो जाएंगे।

         परंतु इसके बजाय यह सोचें, मैं महत्वपूर्ण हूँ। मुझमें योग्यता है। मैं फर्स्ट-क्लास कर्मचारी हूँ। मेरा काम महत्वपूर्ण है। इस तरीके से सोचें और आप सफलता की चोटी पर पहुँच पाएँगे।

        जीतने का सीधा-सा तरीक़ा यह जानना है कि आप अपने बारे में सकारात्मक सोचकर अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। दूसरे लोग आपकी योग्यता का अनुमान आपके कामों से लगाते हैं। और आपके काम आपके विचारों से नियंत्रित होते हैं।

        आप जो सोचते हैं आप वही होते हैं।

       सुपरवाइज़र के पहलू से देखें और अपने आपसे पूछे कि आप किस व्यक्ति को प्रमोशन देंगे या किस व्यक्ति की तनख्वाह बढ़ाने की सिफ़ारिश करेंगे:

       1. उस सेक्रेटरी की, जो अपने बॉस के ऑफ़िस में न रहने पर मैग्ज़ीन पढ़ती है या उस सेक्रेटरी की जो इसी समय में अपने बॉस के छोटे-मोटे काम कर देती है ताकि वापस लौटने पर वह अपना काम बेहतर ढंग से कर सके?

       2. उस कर्मचारी को जो कहता है, “कोई परवाह नहीं, मुझे हमेशा दूसरी नौकरी मिल सकती है। अगर उन्हें मेरे काम का तरीक़ा पसंद नहीं आता, तो मैं यह काम छोड़ सकता हूँ।" या उस कर्मचारी को जो आलोचना को रचनात्मक रूप से लेता है और ज़्यादा अच्छा काम करने
का गंभीर प्रयास करता है?

        3. उस सेल्समैन को जो ग्राहक को बताता है, “अरे, मैं तो वही करता हूँ जो मुझसे करने के लिए कहा जाता है। उन्होंने कहा बाहर जाओ और देखो कि आपको कुछ चाहिए तो नहीं।" या उस सेल्समैन को जो कहता है, “मिस्टर ब्राउन, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?"

       4. उस फोरमैन को, जो किसी कर्मचारी से कहता है, "सच बात कहूँ, तो मैं अपने काम को ज़्यादा पसंद नहीं करता। ऊपर के लोग मेरी नाक में दम किए रहते हैं। आधे से ज्यादा समय तो मैं यह समझ ही नहीं पाता कि बॉस क्या बोल रहे है," या उस सुपरवाइज़र को जो कहता 
"किसी भी काम में कोई न कोई गड़बड़ बात तो होती ही है। परंत है आपको आश्वस्त कर दूँ। ऊपर के लोग काफ़ी समझदार हैं। वे हमारी समस्याएँ समझते हैं और हमारा भला चाहते हैं।"

       क्या इससे आपको यह पता नहीं चल जाता कि कई लोग सारी जिंदगी एक ही स्तर पर क्यों बने रहते हैं? उनकी सोच, और केवल उनकी सोच, ही उन्हें वहाँ बनाए रखती है।

        एक एड्वर्टाइज़िंग एक्जीक्यूटिव ने मुझे एक बार बताया कि किस तरह उसकी एजेंसी अपने नए, अनुभवहीन लोगों को अनौपचारिक प्रशिक्षण देती है।

        "कंपनी की नीति यह है," उसने कहा, "कि हम किसी भी नए युवक को शुरुआती सर्वश्रेष्ठ प्रशिक्षण दें। आम तौर पर यह युवक कॉलेज ग्रैजुएट होता है और हम शुरू में इसे मेल ब्वॉय का काम सौंपते हैं। हम ऐसा इसलिए नहीं करते क्योंकि हमें एक ऑफ़िस से दूसरे ऑफ़िस में डाक पहुँचाने के लिए किसी कॉलेज ग्रैजुएट की ज़रूरत होती है। हमारा लक्ष्य यह होता है कि इस नए युवक को हमारी एजेंसी के सभी तरह के कामों का अनुभव हो जाए। जब वह यह काम अच्छी तरह से सीख लेता है तो हम उसे नया काम देते हैं।

           "कभी-कभार यह होता है कि जब हम उस नए युवक को बताते हैं कि उसे शुरुआत में डाक लाना और ले जाना है तो उसे लगता है कि डाकिए का काम करना छोटा और महत्वहीन है। जब ऐसा होता है, तो हम समझ जाते हैं कि हमने गलत व्यक्ति चन लिया है। अगर उसमें यह देखने की दूरदृष्टि नहीं है कि मेल ब्वॉय का काम सीखना ज़रूरी है, कि यह महत्वपूर्ण कार्यों की दिशा में पहला व्यावहारिक क़दम है, तो हमारा एजेंसी में उसका कोई भविष्य नहीं है।"

      याद रखें, एक्जीक्यूटिब्ज़ जब इस सवाल का जवाब सोचते है, उस स्तर पर वह व्यक्ति क्या करेगा? तो इसके पहले वे इस सवाल का जवाब ढूँढ़ते हैं, अभी वह जो काम कर रहा है, वह कैसा कर रहा हैं।

यहाँ पर एक तर्क दिया जा रहा है, जो दमदार, सीधा-सा और  आसान है। आगे पढ़ने से पहले इसे कम से कम पाँच बार पढ़ें :

वह व्यक्ति जो सोचता है कि उसका काम महत्वपूर्ण है

उसे मानसिक संकेत मिलते हैं कि वह बेहतर काम कैसे कर सकता है।

और बेहतर काम का मतलब होता है

ज्यादा प्रमोशन, ज़्यादा तनख्वाह, ज़्यादा प्रतिष्ठा, ज़्यादा सुख।

         हम सभी ने देखा होगा कि बच्चे किस तरह जल्दी से अपने माता-पिता के रवैए, आदतें, डर और रुचियों को सीख लेते हैं। चाहे भोजन की रुचि हो, व्यवहार के तरीके हों, धार्मिक और राजनीतिक विचार हों, या किसी और तरह का व्यवहार हो, बच्चा आम तौर पर अपने माँ-बाप की सोच का जीता-जागता प्रतिबिंब होता है; वह नक़ल करके सीखता है।

        और यही वयस्कों के साथ भी होता है। लोग जिंदगी भर दूसरों की नक़ल करते रहते हैं। वे अपने लीडर्स और सुपरवाइज़र्स की नक़ल करते हैं; उनके विचारों और कार्यों पर इन लोगों का बहुत प्रभाव पड़ता है। आप इसे आसानी से परख सकते हैं। अपने किसी दोस्त और उसके बॉस का अध्ययन करें और यह देखें कि दोनों की सोच और कार्यों में कितनी समानता है।

        आपका दोस्त इन क्षेत्रों में अपने बॉस की नक़ल कर सकता है : भाषा और शब्दों का चयन, सिगरेट पीने का तरीक़ा, चेहरे के कुछ भाव और आदतें, कपड़ों का चुनाव और कार का चयन। इसके अलावा और भी बहुत सारे क्षेत्रों में समानता दिखाई दे सकती है।

      
          नक़ल की शक्ति को देखने का एक और तरीक़ा कर्मचारियों के रवैए और “बॉस" के रवैए की तुलना करना है। अगर बॉस नर्वस,तनावग्रस्त, चिंतित होगा तो उसके क़रीबी सहयोगी भी इसी तरह के होंगे। परंतु जब मिस्टर बॉस सफल महसूस करते हैं, अच्छा महसूस करते हैं तो उनके कर्मचारी भी सफल और अच्छा महसूस करते हैं।

        इससे हमें यह शिक्षा मिलती है : हम अपने काम के बारे में जिस तरह सोचते हैं, उससे यह तय होता है कि हमारे अधीनस्थ अपने काम के बारे में किस तरह सोचेंगे।

      हमारे अधीनस्थों का काम के बारे में जो रवैया होता है, वह काम के बारे में हमारे अपने रवैए का प्रतिबिंब होता है। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि हमारे अच्छे-बुरे रवैए का असर हमारे अधीनस्थों के  रवैया पर पड़ता है, जिस तरह कि किसी बच्चे पर अपने माँ-बाप के रवैए का असर पड़ता है।

      सफल लोगों के सिर्फ एक गुण पर ध्यान केंद्रित करें- उत्साह। कभी आपने देखा कि डिपार्टमेंट के उत्साही सेल्समैन ने आपको, यानी ग्राहक को, किसी सामान के बारे में ज्यादा रोमांचित कर दिया हो। या कभी आपने गौर किया कि किसी उत्साही धर्मोपदेशक या वक्ता ने अपने श्रोताओं को उत्साही और सजग बना दिया ? अगर आपमें उत्साह होगा. तो आपके आस-पास के लोगों में भी उत्साह होगा।

      परंतु आप अपने भीतर उत्साह किस तरह भर सकते हैं। मूलभूत कदम आसान है- उत्साहपूर्वक सोचें। हमेशा आशावादी, प्रगतिशील विचार रखें, “यह बहुत बढ़िया काम है और मैं यह काम कर सकता हूँ।"

        आप जो सोचते हैं, आप वही होते हैं। उत्साह के बारे में सोचें और आप उत्साही बन जाएँगे। अपने अधीनस्थों से अच्छी क्वालिटी का काम करवाने के लिए आपको उस काम के बारे में उत्साही होना पड़ेगा। दूसर। भी आपके उत्साह को देखकर उत्साहित हो जाएंगे और आपका काम बढ़िया ढंग से हो जाएगा।

         परंतु, अगर आप नकारात्मक रूप से अपनी कंपनी को खर्च सप्लाई, समय और दूसरे छोटे-छोटे तरीकों से "धोखा" देते हैं, तो आप अपने अधीनस्थों से क्या उम्मीद कर सकते हैं? अगर आप देर सजा आएंगे और जल्दी चले जाएँगे तो आप अपने “कर्मचारियो उम्मीद रखेंगे?

        हमें अपने काम के बारे में सही रवैया इसलिए भी रखना चाहिए ताकि हमारे अधीनस्थ अपने काम के बारे में सही रवैया रख सके। हमार सुपीरियर हमारे काम की क्वालिटी और क्वांटिटी का मूल्यांकन करते समय उसी काम का मूल्यांकन करते हैं, जो हमारे अधीनस्थों ने किया है।

       इसे इस तरह से देखें - आप किसे डिवीज़न सेल्स मैनेजर का प्रमोशन देंगे - उस ब्रांच सेल्स मैनेजर को जिसके सेल्समैन बढ़िया काम कर रहे हैं या उस ब्रांच सेल्स मैनेजर को जिसके सेल्समैन केवल औसत प्रदर्शन कर रहे हैं? या आप किसे प्रॉडक्शन मैनेजर के पद पर प्रमोशन देंगे - उस सुपरवाइज़र को जो अपने उत्पादन के लक्ष्य को पूरा कर लेता है, या उस सुपरवाइज़र को जिसका डिपार्टमेंट लक्ष्य से काफ़ी पीछे रहता है ?

         यहाँ दो सुझाव दिए जा रहे हैं जिनकी मदद से आप दूसरों से अच्छा और ज़्यादा काम करवा सकते हैं :

      1. हमेशा अपने काम के बारे में सकारात्मक रवैया रखें ताकि आपके अधीनस्थ भी “सीख लें" कि काम के बारे में इस तरह से सोचना चाहिए ।

        
      2. जब आप हर दिन काम पर जाएँ, तो खुद से पूछे, “क्या मैं ऐसा हूँ जिससे सामने वाला कुछ सीख ले सके? क्या मेरी आदतें ऐसी हैं जो मैं अपने अधीनस्थों में देखना चाहूँगा?"

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Wednesday, September 18, 2019

CHAPTER 6.1 जैसा सोचेंगे, वैसा बनेंगे

                जैसा सोचेंगे, वैसा बनेंगे



ज्या दातर लोगों का व्यवहार उलझन भरा होता है। क्या आपने कभी सोचा कि कोई सेल्समैन एक ग्राहक को इज्जत क्यों देता है जबकि वह दूसरे ग्राहक को नज़रअंदाज़ कर देता है ? कोई आदमी एक महिला के लिए दरवाज़ा क्यों खोल देता है, जबकि दूसरी महिला के लिए नहीं खोलता? कोई कर्मचारी एक सुपीरियर के आदेशों का फटाफट पालन क्यों करता है, जबकि दूसरे सुपीरियर के आदेशों का पालन मन मारकर करता है ? या हम किसी आदमी की बात ध्यान से क्यों सुनते हैं, जबकि दूसरे आदमी की बात अनसुनी कर देते हैं ?

      अपने चारों तरफ़ देखें। आप देखेंगे कि कई लोगों को "हे, मैक" या “और, यार" कहकर बुलाया जाता है, जबकि कई लोगों से महत्वपूर्ण “यस, सर" कहा जाता है। देखिए। आप पाएंगे कि कुछ लोगों को एहमियत, वफ़ादारी और तारीफ़ मिलती है जबकि बाकी लोगों को ये सब चीजें नहीं मिलती।

        और क़रीब से देखने पर आप पाएंगे कि जिन लोगों को सबसे ज़्यादा सम्मान मिलता है वे सबसे ज्यादा सफल भी होते हैं।

        इसका कारण क्या है ? एक शब्द में इसका जवाब दिया जाए तो इसका कारण है : सोच। सोच के कारण ही ऐसा होता है। दूसरे लोग मम वही देखते हैं, जो हम अपने आपमें देखते हैं। हमें उसी तरह का व्यवहार मिलता है जिसके काबिल हम खुद को समझते हैं।

       सोच के कारण ही सारा फ़र्क पड़ता है। वह आदमी जो खुद को हीन समझता है, चाहे उसकी योग्यताएँ कितनी ही क्यों न हों, वह हीन ही बना रहेगा। आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही काम करते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने आपको हीन समझता है, तो वह उसी तरीके से काम करेगा। चार वह अपनी हीनता छुपाने का कितना भी प्रयास करे, यह मूलभूत भावना लंबे समय तक छपी नहीं रह सकती। जो व्यक्ति यह महसूस करता है। कि वह महत्वपूर्ण नहीं है, वह सचमुच महत्वपूर्ण नहीं होता।

       दूसरी तरफ़, जो व्यक्ति यह समझता है कि वह कोई काम कर सकता है, वह सचमुच उस काम को कर लेगा।

      महत्वपूर्ण बनने के लिए यह सोचना ज़रूरी है कि हम महत्वपूर्ण हैं। सचमुच ऐसा सोचें। तभी दूसरे लोग भी हमारे बारे में ऐसा सोचेंगे। यहाँ पर मैं एक बार फिर तर्क देना चाहता हूँ:

      आप क्या सोचते हैं, इससे तय होता है कि आप कैसा काम करते हैं।

        आप क्या करते हैं इससे तय होता है

        दूसरे आपके साथ कैसा व्यवहार करते हैं।

     सफलता के आपके व्यक्तिगत कार्यक्रम के दूसरे पहलुओं की तरह ही सम्मान पाना मूलभूत रूप से बहुत आसान है। दूसरे लोगों का सम्मान पाने के लिए आपको सबसे पहले तो यह सोचना होगा कि आप उस सम्मान के काबिल हैं। और आप अपने आपको जितने सम्मान के क़ाबिल समझेंगे, दूसरे लोग आपको उतना ही सम्मान देंगे। इस सिद्धांत को आज़माकर देख लें। क्या आपके दिल में किसी गरीब और असफल आदमी के लिए सम्मान होता है ? बिलकुल नहीं। क्यों? क्योंकि वह ग़रीब और असफल आदमी खुद का सम्मान नहीं करता। वह आत्म-सम्मान के अभाव में अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहा है।

      आत्म-सम्मान हमारे हर काम में साफ़ दिख जाता है। इसलिए हम इस तरफ़ ध्यान देना होगा कि हम किस तरह अपना आत्म-सम्मान बढ़ा सकते हैं और दूसरों से सम्मान हासिल कर सकते हैं।

      महत्वपूर्ण दिखें- इससे खुद को महत्वपूर्ण समझने में मदद मिलती है। नियम : याद रखें कि आपका व्यक्तित्व बोलता है। आप कैसे दिखते हैं, इससे आपकी छवि बनती है। सुनिश्चित कर लें कि आपके बाहरी व्यक्तित्व से आपके बारे में सकारात्मक छवि ही बने। घर से चलते समय सुनिश्चित कर लें कि आप वैसे ही दिख रहे हैं जैसे आप दिखना चाहते हैं।

       एक बहुत ही बढ़िया विज्ञापन छपा था, “सही कपड़े पहनें। इसके बिना काम नहीं चलेगा!" यह विज्ञापन अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ मेन्स एंड बॉयज़ वेअर ने प्रायोजित किया था। इस विज्ञापन को हर ऑफिस, रेस्ट रूम, बेडरूम, और स्कूलरूम में लगाकर रखना चाहिए। एक और विज्ञापन में एक पुलिस वाला बोलता है :

      आप किसी बच्चे के हावभाव से समझ लेते हैं कि यह बच्चा बदमाश है। यह ठीक नहीं है, परंतु ऐसा ही होता है - लोग किसी बच्चे को उसके कपड़ों से पहचानते हैं। और एक बार आप किसी बच्चे के बारे में राय बना लेते हैं, तो फिर उस राय को बदलना उस बच्चे के प्रति अपने रवैए को बदलना बहुत मुश्किल होता है। अपने बच्चे को देखें। उसे उसके टीचर की नज़र से देखें, आपके पड़ोसी की नज़र से देखें। उसका जो हुलिया है, वह जो कपड़े पहनता है, क्या उससे उसकी ग़लत छवि बन रही है? क्या आपको यह पक्का विश्वास है कि वह सही दिखता है, सही कपड़े पहनता है और हर जगह सही व्यवहार करता है?

      यह विज्ञापन बच्चों के बारे में था। परंतु इसे वयस्कों पर भी लाग किया जा सकता है। आप शब्दों में थोड़ा सा हेर-फेर कर लें और पडोसियों की जगह सहयोगी कर लें, टीचर की जगह सुपीरियर कर लें और उसे की जगह अपने आपको कर लें। अब यह वाक्य इस तरह का हो गया : अपने आपको अपने सुपीरियर की नज़रों से देखें, अपने सहयोगियों की नज़र से देखें।

      साफ़-सुथरा दिखने में बहुत कम ख़र्च होता है। इस स्लोगन को शब्दशः लें। इससे यह सीख लें : सही कपड़े पहनें; इससे हमेशा फ़ायदा होता है। याद रखें - महत्वपूर्ण दिखें क्योंकि इससे महत्वपूर्ण सोचने में मदद मिलती है।

        कपड़ों का इस्तेमाल आत्मविश्वास बढ़ाने के साधन के रूप में करें। हमारे मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर परीक्षा के एक दिन पहले हमें सलाह दिया करते थे, “इस महत्वपूर्ण परीक्षा के लिए अच्छे कपड़े पहनना। नई टाई पहनकर आना। अपने सूट को अच्छे से प्रेस कर लेना। अपने जूते चमकालेना। अच्छे दिखना क्योंकि तुम्हें परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करना है।"

        प्रोफ़ेसर का मनोविज्ञान बिलकुल सही था। इस बारे में कोई ग़लतफ़हमी न पालें। आपके बाहरी रूप-रंग या हुलिए से आपके मानसिक हुलिए पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आप बाहर से कैसे दिखते हैं, यह इस बात को प्रभावित करता है कि आप किस तरह सोचते हैं या आप अंदर से कैसा महसूस करते हैं।

       सभी बच्चे “हैट स्टेज" से गुज़रते हैं। इसका मतलब है कि वे जिस पात्र का अभिनय करना चाहते हैं, वे उसका हैट पहनकर उसकी नक़ल करते हैं। मुझे अपने पुत्र डेवी के साथ हुई हैट की एक घटना हमेशा याद रहेगी। एक दिन वह अड़ गया कि उसे लोन रेंजर ही बनना है परंतु उसके पास लोन रेंजर का हैट नहीं था।

      मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि वह दूसरा हैट पहनकर लोन रेंजर बन जाए। परंतु उसने आपत्ति की, “पर, डैड, मैं बिना लोन रेंजर हैट पहने लोन रेंजर की तरह नहीं सोच पाऊँगा।"

    मैंने आख़िरकार हार मान ली और उसे उसका मनचाहा हैट ख़रीदकर दे दिया। और हैट पहनने के बाद वह सचमुच लोन रेंजर बन गया।

     मैं इस घटना को अक्सर याद कर लेता हूँ क्योंकि इससे पता चलता है कि हमारे बाहरी व्यक्तित्व का हमारी सोच पर क्या प्रभाव होता है। जिसने भी सेना में नौकरी की है, वह जानता है कि जब कोई आदमा सिपाही की यूनिफॉर्म में होता है, तभी वह सिपाही की तरह महसूस कर पाता है, तभी वह सिपाही की तरह सोच पाता है। जब कोई महिला पाटा की ड्रेस पहन लेती है, तभी वह पार्टी में जाने की इच्छुक होती है।

      इसी तरह से, अगर कोई एक्जीक्यूटिव वाले कपड़े पहन ले, तो वह एक्जीक्यूटिव की तरह दिखने लगता है, उसकी तरह सोचने लगता है। एक सेल्समैन ने मुझे यह बात इस तरह समझाई, “मैं तब तक समृद्ध अनभव नहीं कर सकता - और मुझे यह अनुभव करना ही होता है। क्योंकि इसके बिना में बड़ी सेल नहीं कर सकता - जब तक कि मुझे यह विश्वास न हो कि मैं उस तरह का दिखता हूँ।"

     आपकी वेशभूषा आपसे कुछ कहती है; परंतु यह दूसरों से भी कुछ कहती है। इसी के आधार पर तय होता है कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं। सिद्धांत में यह सुनना अच्छा लगता है कि लोगों को आदमी की बुद्धि देखनी चाहिए, कपड़े नहीं। परंतु इससे धोखा न खाएँ। लोग आपके बाहरी व्यक्तित्व के हिसाब से आपका मूल्यांकन करते हैं। आपका बाहरी व्यक्तित्व ही लोगों के मूल्यांकन का पहला आधार होता है। और पहली छाप हमेशा के लिए हो जाती है, चाहे बाद में कुछ भी हो।

       एक दिन सुपरमार्केट में मैंने एक टेबल पर अंगूर रखे देखे जिन पर कीमत डली थी एक पौंड 15 सेंट। दूसरी टेबल पर भी बिलकुल वैसे ही अंगूर रखे थे, परंतु उन्हें पॉलीथीन के बैग में पैक किया हुआ था और उन पर कीमत लिखी हुई थी 2 पौंड 35 सेंट। 

       मैंने वज़न करने वाले युवक से पूछा, “इन दोनों तरह के अंगूरों में क्या फ़र्क है?"

      "दोनों में फर्क है", उसने जवाब दिया, “पॉलीथीन के कवर का। पॉलीपैक वाले अंगूर साधारण अंगूरों से दो गुना ज़्यादा बिकते हैं। क्योंकि वे ज़्यादा आकर्षक दिखते हैं।"

       अगली बार जब आप खुद को बेचने जाएँ, तो अंगूरों के उदाहरण को ध्यान में रखें। अच्छी “पैकिंग" हो, तो आप अपने आपको ज्यादाअच्छी तरह से बेच पाएँगे- और ज़्यादा कीमत में भी।

    इससे हमें यह शिक्षा मिलती है- आपकी पैकिंग जितनी अच्छी होगी, आपको जनता उतना ही पसंद करेगी।

      कल आप उन लोगों को देखें जिन्हें रेस्तराँ, बसों, भीड़ भरी लॉबियों, स्टोर्स और ऑफ़िस में सबसे ज़्यादा सम्मान मिलता है। लोग सामने वाले आदमी पर एक नज़र डालते हैं, अवचेतन में उसका मूल्यांक करते हैं और उसके साथ उसी तरह का व्यवहार करते हैं।

     हम किसी आदमी की तरफ़ देखते हैं और “और, यार" वा व्यवहार करते हैं। हम दूसरे आदमी की तरफ़ देखते हैं और “यस, सर, वाला व्यवहार करते हैं।

    हाँ, आदमी का बाहरी आवरण बोलता है। अच्छी वेशभूषा वाले व्यक्ति की सकारात्मक छाप पड़ती है। इससे लोगों तक यह संदेश पहुँचता है, “यह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है - बुद्धिमान, अमीर और भरोसेमंद। इस व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए, इसकी तारीफ़ की चाहिए और इस पर भरोसा करना चाहिए। यह खुद का सम्मान करता है और मैं भी उसका सम्मान करूँगा।"

    फटेहाल या गंदे कपड़े पहने व्यक्ति की लोगों पर नकारात्मक छाप ऐसे कपड़ों से यह संदेश पहुँचता है, “यह रहा एक असफल व्यक्ति - लापरवाह, अयोग्य, महत्वहीन। वह सिर्फ एक औसत आदमी है। उसकी तरफ़ कोई विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए। उसे धक्के खाने की आदत होगी।"

      जब मैं अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस बात पर जोर देता हूँ कि “अपने पहनावे का सम्मान करो" तो मुझसे हमेशा यही सवाल पूछा जाता है, “मैं आपकी बात से सहमत हूँ। पहनावा महत्वपूर्ण है। परंतु मैं इतने महँगे कपड़े कैसे पहन पाऊँगा जिन्हें पहनकर मुझमें आत्मविश्वास जाग जाए और दूसरे मेरा सम्मान करने लगें?"

     यह सवाल कई लोगों को परेशान करता है। इसने मुझे भी काफ़ी समय तक परेशान किया था। परंतु इसका जवाब दरअसल बहुत हा आसान है - दुगुनी क़ीमत दो और आधी संख्या खरीदो। इस सूत्र को दिमाग में अच्छी तरह बिठा लें। फिर इस पर अमल करें। हैट, सूट, जूत, मोज़े, कोट- जो भी कपड़े आप पहनें, इसी हिसाब से पहनें। जहाँ तक दिखने का सवाल है, क्वालिटी ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है, क्वांटिटी कम महत्वपूर्ण होती है। जब आप इस सिद्धांत पर अमल करेंगे तो पाएंगे कि न सिर्फ़ इससे आपकी नज़रों में आपका सम्मान बढ़ेगा, बल्कि दूसरे लागो की नजरों में भी आपका सम्मान कई गुना बढ़ जाएगा। और आप पाएंगे कि ज्यादा महँगे कपड़े पहनने के बाद भी आप फायदे में रहे क्योंकि :

1. आपके कपड़े ज़्यादा समय तक चलेंगे क्योंकि वे सस्ते कपड़ों से ज्यादा टिकाऊ होते हैं, और जब तक वे चलेंगे, तब तक उनकी “क्वालिटी" बनी रहेगी।

2. जो आप खरीदेंगे, वह ज़्यादा समय तक फैशन में बना रहेगा। अच्छे कपड़े हमेशा फैशन में बने रहते हैं।

3. आपको अच्छी सलाह मिलेगी। जो दुकानदार 200 डॉलर का सूट बेचता है वह 100 डॉलर का सूट बेचने वाले दुकानदार के बजाय “सही कपड़ा चुनने” में आपकी ज़्यादा मदद करेगा।

याद रखें : आपकी वेशभूषा आपसे कुछ कहती है और यह दूसरों से भी कुछ कहती है। सुनिश्चित कर लें कि वह सबसे यही कहे, “यह रहा एक व्यक्ति जो अपना सम्मान करता है। यह व्यक्ति महत्वपूर्ण है। इसके साथ ऐसा व्यवहार करो जैसा महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ किया जाता है।"

      आपको दूसरों के लिए अपने पहनावे पर ध्यान देना चाहिए, और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको खुद के लिए ऐसा करना चाहिए- अपने सबसे अच्छे स्वरूप में सबके सामने खुद को पेश करना चाहिए।

      आप अपने बारे में जो सोचते हैं, वही आप होते हैं। अगर आपके पहनावे से आपको लगता है कि आप हीन हैं, तो आप वाकई हीन होते हैं। अगर आपको लगता है कि आप छोटे हैं, तो आप सचमुच छोटे बन जाते हैं। सर्वश्रेष्ठ दिखने की कोशिश करें तभी आप खुद को सर्वश्रेष्ठ समझेंगे और सर्वश्रेष्ठ काम कर पाएंगे।

यह सोचें कि काम महत्वपूर्ण है। काम के बारे में तीन ईंट उठाने वालों की यह कहानी अक्सर सुनाई जाती है। यह बहुत बढ़िया कहानी है,।इसलिए इसे एक बार और सुनने में कोई हर्ज़ नहीं।

     जब यह सवाल पूछा गया, “तुम क्या कर रहे हो?" तो पहले ईंट जमाने वाले ने कहा, “ईंट जमा रहा हूँ।" दूसरे ने जवाब दिया, “प्रति 9.3 डॉलर कमा रहा हूँ।" और तीसरे ने जवाब दिया, “मैं ? मैं तो दनि का सबसे महान गिरजाघर बना रहा हूँ।

      यह कहानी हमें यह नहीं बताती कि बाद में इन तीन ईंट वालों की ज़िंदगी में क्या हुआ, परंतु आपको क्या लगता है क्या हुआ होगा? शायद पहले दोनों ईंट वाले ज़िंदगी भर वही काम करते रहे होंगे - ईंट ढोरे और ईंट जमाने का। उनमें भविष्य की दृष्टि नहीं थी। वे अपने काम का सम्मान नहीं करते थे। उन्हें कोई चीज़ पीछे से धकेलकर महान सफलता की तरफ़ नहीं ले जा रही थी।

   परंतु आप शर्त लगा सकते हैं कि तीसरा कारीगर जिसने यह कहा था कि वह महान गिरजाघर बना रहा था, उसने हमेशा ईंटें नहीं उठाई होंगी। शायद वह फ़ोरमैन बन गया होगा या शायद एक कॉन्ट्रैक्टर या शायद एक आर्किटेक्ट। वह आगे की तरफ़ गया होगा, ऊपर की तरफ़ बढ़ा होगा। क्यों? क्योंकि इंसान की सोच ही उसकी प्रगति का आधार है। तीसरे नंबर का कारीगर ऊँचा सोच सकता था, उसके विचार ऊँचे थे और उसे अपने काम के महत्व का एहसास था।

    काम के बारे में आपकी क्या सोच है, उससे आपके बारे में बहुत कुछ पता चलता है और यह भी पता चलता है कि आपमें ज्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी उठाने की क्षमता है या नहीं।

      मेरा दोस्त नियुक्तियाँ देने वाली एक फ़र्म चलाता है। उसने मुझसे हाल ही में कहा, “हम किसी की नौकरी के आवेदन में इस बात पर ख़ास ध्यान देते हैं कि वर्तमान नौकरी के बारे में किसी कर्मचारी की राय क्या है। जब हम देखते हैं कि उसकी नज़र में उसका वर्तमान काम महत्वपूर्ण है, तो हम पर इसका हमेशा अच्छा प्रभाव पड़ता है।

    “क्यों? सिर्फ इसलिए क्योंकि अगर आवेदक की नज़र में उसका  वर्तमान काम महत्वपूर्ण है, तो उसकी नज़र में उसका अगला कामना महत्वपूर्ण होगा। हमने यह पाया है कि जो आदमी अपने काम का जितना सम्मान करता है, वह अपने काम को उतनी ही अच्छी तरह से करता है। दोनों में बड़ा गहरा संबंध होता है।"

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Friday, September 13, 2019

CHAPTER 5.3. क्या आपको नहीं लगता कि ऐसा करने से आपको फायदा होगा


क्या आपको नहीं लगता कि ऐसा करने से आपको फायदा होगा? दो क़दम की इस तकनीक को देखें:



1. ज़्यादा काम करने के अवसर को उत्साहपूर्वक स्वीकार करें। नईज़िम्मेदारी के लिए आपसे पूछा जा रहा है, इससे यह साबित होता है कि आपके बॉस को आपकी क्षमता पर भरोसा है। अपनी नौकरी में ज़्यादा ज़िम्मेदारी लेने से आप बाक़ी लोगों से अलग दिखते हैं और इससे पता चलता है कि आप उनसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। जब आपके पड़ोसी आपसे किसी मामले में पहल करने को कहें, तो उनकी बात मान लें। इससे आपको समाज में लीडर बनने में मदद मिलती है।

2. इसके बाद, इस बात पर ध्यान केंद्रित करें, “मैं इस काम को किस तरह और ज़्यादा कर सकता हूँ?" आपको इस सवाल के रचनात्मक जवाब मिल जाएँगे। कुछ जवाब इस तरह के होंगे कि आप अपने वर्तमान काम को योजनाबद्ध तरीके से करें या अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों का शॉर्टकट ढूँढ़े या महत्वहीन कामों को करना पूरी तरह छोड़ दें। परंतु, मैं इस बात को दोहराना चाहता हूँ, ज़्यादा काम करने के रास्ते आपको मिल ही जाएँगे।

          मैंने अपने जीवन में इस अवधारणा को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है - अगर आप कोई काम करवाना चाहते हैं, तो इसे किसी व्यस्त आदमी को दे दें। मैं महत्वपूर्ण काम ऐसे आदमियों को नहीं देता जिनके पास बहुत सा खाली समय है। मैंने दुःखद अनुभव से सीखा है कि वह आदमी जिसक पास बहुत फुरसत होती है, वह कभी अच्छा काम नहीं कर पाता।

       में जितने भी सफल, योग्य व्यक्तियों को जानता हूँ वे सभी बेहद व्यस्त हैं। जब मैं उनके साथ कोई प्रोजेक्ट शुरू करता हूँ, तो मैं जानता हूँ कि यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरा हो जाएगा।

मैंने दर्जनों उदाहरण देखे हैं कि मैं किसी व्यस्त आदमी से समय पर  काम करवा सकता है। परंतु जिन लोगों के पास 'दुनिया भर का समय है मैं उनसे समय पर काम नहीं करवा पाया हैं। ऐसे लोगों के साथ काम करने का मेरा अनुभव निराशाजनक ही रहा है।

         प्रगतिशील बिज़नेस मैनेजमेंट लगातार पछता है, “हम किस तरह अपने आउटपुट को, अपने उत्पादन को बढ़ा सकते हैं?" आप खुद से क्यों नहीं पूछते, "में किस तरह अपने आउटपुट को, अपने उत्पादन को बढा सकता हूँ?" आपका दिमाग़ अपने आप ऐसे रचनात्मक उपाय बता देगा कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।

          सभी तरह के सैकड़ों लोगों के इंटरव्यू लेने के बाद मैंने यह खोज की है : जो आदमी जितना बड़ा होता है, वह आपको बोलने का उतना ही ज़्यादा मौक़ा देता है; जो आदमी जितना छोटा होता है, वह आपके सामने उतना ही ज़्यादा बोलता है।

         बड़े लोग लगातार सुनते हैं।

          छोटे लोग लगातार बोलते हैं।

         यह भी नोट करें : हर क्षेत्र में चोटी के लीडर्स सलाह सुनने में ज़्यादा समय लगाते हैं, सलाह देने में कम समय लगाते हैं। जब कोई लीडर निर्णय लेता है तो वह पूछता है, “आप इस बारे में क्या सोचते हैं ?" “आपका सुझाव क्या है ?” “आप इन परिस्थितियों में क्या करते ?" “आपको यह कैसा लगता है ?"

          इसे इस तरीके से देखें : लीडर निर्णय लेने वाली एक इंसानी मशीन है। किसी भी चीज़ के उत्पादन के लिए कच्चे माल की ज़रूरत होती है। रचनात्मक निर्णय के उत्पादन के लिए दूसरों के विचार और सुझाव ही कच्चा माल होते हैं। इस बात की उम्मीद न करें कि दूसरे लोग आपको रेडीमेड समाधान सझा देंगे। उनसे सलाह लेने का और उनके सुझाव सुनने का यह उद्देश्य नहीं होता। दूसरे लोगों के विचार सुनने से आपके दिमाग में नए विचार आते हैं जिनसे साबित होता है कि आपका दिमाग ज्यादा रचनात्मक हो चुका है।

          हाल ही में मैंने एक एक्जीक्यूटिव मैनेजमेंट सेमिनार में एक स्टाफ़ इन्स्ट्रक्टर के रूप में भाग लिया। सेमिनार बारह सत्रों का था। हर सत्र में एक एक्जीक्यूटिव आकर 15 मिनट का लेक्चर देता था, "मैंने अपनी ज़िंदगी की सबसे महत्वपूर्ण मैनेजमेंट समस्या को किस तरह सुलझाया ?"

          नवें सत्र में एक एक्जीक्यूटिव ऐसा आया, जो एक बड़ी मिल्क प्रोसेसिंग कंपनी में वाइस-प्रेसिडेन्ट था। इस एक्जीक्यूटिव का लेक्चर ज़रा हटकर था। यह बताने के बजाय कि उसने अपनी समस्या को किस तरह सुलझाया, उसने अपने लेक्चर का टॉपिक रखा “ज़रूरत है : मेरी सबसे बड़ी मैनेजमेंट समस्या को सुलझाने के लिए मदद की।” उसने अपनी समस्या को बताया और फिर हम लोगों से इसे सुलझाने के संबंध में विचार माँगे। उसे बहुत सारे विचार दिए गए और उसने उन सभी विचारों को एक स्टेनोग्राफ़र से लिखवा लिया।

          बाद में मैंने इस व्यक्ति से चर्चा की और उसकी अद्भुत तकनीक पर उसे बधाई दी। उसका कहना था, “इस समूह में बहुत से बुद्धिमान लोग हैं। मैंने यही सोचा कि क्यों न उनकी बुद्धिमत्ता का लाभ उठाया जाए। इस बात की काफ़ी संभावना है कि किसी ने उस सत्र के दौरान ऐसा कुछ कहा हो जिससे मुझे समस्या सुलझाने में मदद मिले।"

          यह ध्यान रखें : एक्जीक्यूटिव ने समस्या बताने के बाद लोगों की बातें सुनीं। इस तरह उसे निर्णय पर पहुँचने के लिए कच्चा माल मिल गया और उसे यह लाभ भी हुआ कि जनता को उसके लेक्चर में मज़ा आ गया क्योंकि इसमें उन्हें सक्रिय होने का, अपना योगदान देने का मौका मिल गया।

        सफल बिज़नेस कंपनियाँ ग्राहकों के सर्वेक्षण में काफ़ी रकम खर्च करती हैं। वे लोगों से किसी सामान के स्वाद, क्वालिटी, आकार और सजावट के बारे में कई तरह के सवाल पछती हैं। लोगों की राय जानने से उन्हें यह तय करने में मदद मिलती है कि इस सामान को ज्यादा बेचन योग्य किस तरह बनाया जा सकता है। इससे निर्माता यह भी जान जाता है कि वह किस तरह के विज्ञापन दे, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उस सामान खरीदें। सफल उत्पादों को विकसित करने का तरीका यह । आप जितने विचार जान सकें, जानने की कोशिश करें। सामान वाले लोगों की राय जानें और फिर उस सामान को बेचने का कोई ऐसा तरीक़ा खोजें जिससे वह सामान ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को भा जाए।

          एक ऑफ़िस में मैंने एक पोस्टर लगा देखा जिस पर लिखा था, "जॉन ब्राउन को कोई सामान बेचने के लिए आपको चीज़ों को जॉन ब्राउन की नज़रों से देखना होगा।” और जॉन ब्राउन की नज़रों से चीज़ों को देखने के लिए आपको जॉन ब्राउन की बातों को सुनना होगा।

         आपके कान आपके दिमाग के वॉल्व हैं। वे आपके दिमाग में कच्चा माल डालते हैं जिसे आप रचनात्मक ऊर्जा में बदल सकते हैं। हम बोलने से कुछ नया नहीं सीखते। परंतु हम पूछने और सुनने से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

         पूछने और सुनने के माध्यम से अपनी रचनात्मकता को बढ़ाने के लिए इस तीन-स्तरीय कार्यक्रम को आज़माएँ :

        1. दूसरे लोगों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। व्यक्तिगत चर्चा में या समूह बैठकों में लोगों से ऐसे आग्रह करें, “मुझे अपना अनुभव बताएँ...” या “आपको क्या लगता है इस बारे में क्या किया जाना चाहिए...?” “आपको क्या लगता है सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है ?" दूसरे लोगों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करें और इससे आपको दो फ़ायदे होंगे : आपका दिमाग़ उस कच्चे माल को सोख लेगा जिसे आप रचनात्मक विचार में बदल सकते हैं। इसके अलावा आपके बहुत सारे दोस्त भी बन जाएँगे। अगर आप लोगों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं तो दोस्त बनाने का इससे बढ़िया कोई दूसरा तरीक़ा हो ही नहीं सकता।

         2. अपने विचारों को दूसरों के सामने सवालों के रूप में रखें। दूसरे लोगों को मौक़ा दें कि वे आपके विचारों को बेहतर शक्ल दें। आप-इस-बारे-में-क्या-सोचते हैं की शैली में सुझाव दें। हठधर्मी न बनें। किसी नए विचार को इस तरह प्रस्तुत न करें जैसे यह सीधा आसमान ल से आया हो। पहले थोड़ा-सा अनौपचारिक शोध कर लें। देखें कि इस विचार के बारे में आपके साथियों की क्या प्रतिक्रिया है। अगर आप ऐसा करते हैं, तो यक़ीनन आपका विचार पहले से बेहतर हो जाएगा।

        3. सामने वाला जो कह रहा है, उसे ध्यान से सुनें। सुनने का मतलब यही नहीं होता कि आप अपना मुँह बंद रखें। सुनने का मतलब है कि जो कहा जा रहा है, आपका पूरा ध्यान उसी तरफ है। ज्यादातर लोग सुनने के बजाय सुनने का नाटक करते हैं। वे सामने वाले की बात खत्म
होने का इंतज़ार करते हैं, ताकि वे अपनी बात कहना शुरू कर सकें। सामने वाले की बात पूरे ध्यान से सुनें। उसका मूल्यांकन करें। इसी तरह आप अपने दिमाग के लिए कच्चा माल इकट्ठा कर सकते हैं।

         अधिकांश प्रसिद्ध विश्वविद्यालय सीनियर बिज़नेस एक्जीक्यूटिब्ज़ के लिए एडवांस्ड मैनेजमेंट ट्रेनिंग प्रोग्राम्स आयोजित कर रहे हैं। प्रायोजकों के अनुसार इन कार्यक्रमों का लक्ष्य इन एक्जीक्यूटिव्ज़ को रेडीमेड फॉर्मूले देना नहीं, बल्कि नए विचारों के आदान-प्रदान का अवसर देना है। यहाँ एक्जीक्यटिब्ज कॉलेज के हॉस्टल में एक साथ रहते हैं, जिससे उनमें आपसी विचार-विमर्श ज़्यादा अच्छी तरह होता है। संक्षेप में, एक्जीक्यूटिब्ज़ को इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि उन्हें नए विचार करने की प्रेरणा मिलती है।

          एक साल पहले मैंने अटलांटा के सेल्स मैनेजमेंट स्कूल में एक सप्ताह में दो सत्र आयोजित किए जिन्हें नेशनल सेल्स एक्जीक्यटिज़ इन्क ने प्रायोजित किया था। कुछ सप्ताह बाद में एक सेल्समैन मित्र से मिला जिसके मैनेजर ने उस प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया था

          "स्कूल में आपने हमारे सेल्स मैनेजर को बहुत सारी बातें सिखा दी हैं कि कंपनी को बेहतर तरीके से कैसे चलाया जा सकता है।" मेरे युवा मित्र ने कहा। उत्सुकतावश, मैंने उससे पूछा कि वह विस्तार से बताए कि उसे अपने मैनेजर में क्या बदलाव दिखे। मेरे मित्र ने कई बातें गिना दीं- कंपन्सेशन प्लान में सुधार, महीने में एक बार की जगह दो बार सेल्स मीटिंग्स, नए बिज़नेस कार्ड्स और स्टेशनरी, सेल्स टेरिटरी का पुनर्गठन- और मज़े की बात यह थी कि प्रशिक्षण कार्यक्रम में इनमें से किसी का भी सीधे उल्लेख नहीं किया गया था। सेल्स मैनेजर को डिब्बाबंद तकनीक नहीं दी गई थीं। इसके बजाय, उसने कुछ ज़्यादा बहुमूल्य सीखा, यह सीखा कि दूसरों के विचारों से वह किस तरह अपने विचार उत्प्रेरित कर सकता है ताकि उसे और उसकी कंपनी को फायदा हो।

             पेंट निर्माता के यहाँ काम करने वाले एक युवा अकाउंटेंट ने मुझ बताया कि दूसरों के विचारों को सुनने के कारण उसे एक बार बहुत सफलता मिली थी।

           “मैंने रियल एस्टेट में कभी ज़्यादा रुचि नहीं ली," उसने मुझे बताया। “मैं कई सालों से प्रोफेशनल अकाउंटेंट हूँ और मैं अपने काम से काम रखता हूँ। एक दिन एक रिएल्टर मित्र ने मुझे शहर के रियल एस्टेट समूहों के साथ लंच के लिए बुलाया।

           "उस दिन का वक्ता एक वृद्ध आदमी था जिसने शहर को बढ़ते हुए देखा था। उसकी चर्चा का विषय था, 'अगले बीस साल।' उसने यह भविष्यवाणी की कि कुछ ही समय में शहर इतना फैल जाएगा कि वह आस-पास की कृषि भूमि को भी अपने में समेट लेगा। उसने यह भी भविष्यवाणी की कि 2 से 5 एकड़ के जेन्टलमैन-साइज़ के फार्म हाउस की रिकॉर्डतोड़ माँग होने वाली है। ऐसे फ़ार्म हाउस, जिनमें बिज़नेसमैन या प्रोफेशनल व्यक्ति स्विमिंग पूल बनवा सकें, घोड़े रख सकें, बगीचा लगा सकें और दूसरी ऐसी ही शौकिया चीजें बनवा सकें।

           "इस आदमी की बातें सुनकर मुझे प्रेरणा मिली। उसने जिस तरह के फार्म हाउस का ज़िक्र किया था, में भी उसी तरह का फ़ार्म हाउस तलाश रहा था। अगले कुछ दिनों तक मैंने अपने कई दोस्तों से पूछा कि किसी दिन 5 एकड़ की एस्टेट के मालिक बनने के बारे में उनका क्या विचार है। हर एक को यह विचार बहुत पसंद आया।

           “मैं इस बारे में लगातार सोचता रहा और खुद से यह सवाल पूछता रहा कि मैं इस विचार को किस तरह फ़ायदेमंद बिज़नेस में बदल सकता हूँ। फिर एक दिन जब मैं नौकरी पर जा रहा था, तो अचानक मेरे दिमाग़ में जवाब कौंध गया। क्यों न एक फ़ार्म ख़रीदा जाए और इसे छोटे एस्टेट में बाँट दिया जाए? इस तरह मुझे ज़मीन सस्ते भाव में मिल सकती थी और मैं एस्टेट को महँगे दामों में बेच सकता था।

           “शहर से बाईस मील दूर मुझे 50 एकड़ का फ़ार्म 8,500 डॉलर में मिल गया। मैंने उसे खरीद लिया और ख़रीदते समय केवल एक तिहाई नक़द दिया और बाक़ी रक़म की क़िस्तें बाँध लीं।"

            "फिर जहाँ पेड़ नहीं थे, वहाँ मैंने चीड़ के वृक्ष रोप दिए। मैंने ऐसा किया क्योंकि मुझे किसी रियल एस्टेट बिज़नेस के आदमी ने यह बताया था, 'लोग आजकल पेड़ पसंद करते हैं, बहुत सारे पेड़ हों तो और भी अच्छी बात है।'

      "मैं अपने संभावित ग्राहकों को यह दिखाना चाहता था कि आज से कुछ साल बाद उनके एस्टेट में ढेर सारे चीड़ के सुंदर वृक्ष लगे होंगे।

        "फिर मैंने एक सर्वेयर को बुलाकर उस 50 एकड़ के फ़ार्म को 5 एकड़ के दस फार्म हाउस में बाँट दिया।

         “अब मैं फ़ार्म हाउस बेचने के लिए तैयार था। मैंने शहर में कई यवा एक्जीक्यूटिज़ के नाम-पते लिए और छोटे पैमाने पर सबको सीधे चिट्ठियाँ लिखीं। मैंने बताया कि किस तरह सिर्फ 3,000 डॉलर में, जिसमें शहर में एक छोटा-सा प्लॉट ही मिल पाएगा, वे शहर से थोड़ी-सी दूर पर एस्टेट खरीद सकते हैं। मैंने उन्हें मनोरंजन और स्वास्थ्यप्रद जीवन की संभावना के बारे में भी बताया।

          "छह हफ्तों में ही, केवल शाम को और सप्ताहांत में काम करके, मैंने सभी 10 फ़ार्म हाउस बेच दिए। कुल आमदनी हुई 30,000 डॉलर। कुल ख़र्च, जिसमें ज़मीन, विज्ञापन, सर्वेइंग और क़ानूनी ख़र्च शामिल था- 10,400 डॉलर। और लाभ 19,600 डॉलर।

           "मुझे इतना फ़ायदा इसलिए हुआ क्योंकि मैंने दूसरे समझदार लोगों के विचारों से लाभ उठाया। अगर मैं रियल एस्टेट के लोगों के साथ लंच में नहीं जाता, क्योंकि वे मेरे व्यवसाय से जुड़े लोग नहीं थे, तो मेरे दिमाग़ में मुनाफ़ा कमाने की यह सफल योजना आ ही नहीं सकती थी।"

         मानसिक उत्प्रेरण हासिल करने के कई तरीके होते हैं, परंतु यहाँ पर दो तरीके दिए जा रहे हैं जिन्हें आप अपने जीवन में उतार सकते हैं।

पहला तरीक़ा यह है कि आप कम से कम एक ऐसे प्रोफेशनल समूह से जुड़ें, जो आपके व्यवसाय से संबंधित हो। सफलता की चाह रखन वाले लोगों के साथ मिले-जुलें, उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करें। कितनी बार हम किसी को यह कहते सुनते हैं, “आज मीटिंग में मुझे यह। बढ़िया विचार मिला,” या “कल की मीटिंग में मैंने यह सोचा..." याद रख, वह दिमाग जो केवल अपने ही बनाए हुए भोजन पर जिंदा रहता है, जल्दा ही कुपोषण का शिकार हो जाता है, कमज़ोर हो जाता है और रचनात्मक, प्रगतिशील विचारों को विचारों को सोचने में असमर्थ हो जाता है। दूसरों के विचारों से प्रेरित होना आपके मस्तिष्क के लिए उत्तम आहार साबित होता है।

           दूसरी बात, अपने व्यवसाय के बाहर के कम से कम किसी एक समूह अपने व्यवसाय के बाहर के लोगों से मिलने से आपकी सोच व्यापक है और आप बड़ी तस्वीर देख पाते हैं। आप यह जानकर हैरान होंगे आपके व्यवसाय के बाहर के लोगों से नियमित रूप से मिलने से आपकी नौकरी पर भी सकारात्मक असर होता है।

           विचार आपकी सोच के फल हैं। परंतु उनका दोहन करना पड़ता है और तभी उनका मूल्य होता है।

           हर साल बलूत का पेड़ इतने फल गिराता है कि अगर सभी बीज उग जाएँ तो एक अच्छा-खासा जंगल तैयार हो जाए। परंतु इन बीजों में से शायद एक या दो बीज ही उग पाते हैं। ज्यादातर बीज गिलहरियाँ खा जाती हैं और पेड़ के नीचे की ज़मीन इतनी सख़्त होती है कि बचे हुए बीज उस पर उग ही नहीं पाते।

           ऐसा ही विचारों के साथ होता है। केवल कुछ ही विचारों के फल मिल पाते हैं। विचार बहुत जल्दी नष्ट होने वाले बीज हैं। अगर हम रखवाली न करें, तो गिलहरियाँ (नकारात्मक रूप से सोचने वाले लोग) हमारे ज्यादातर विचारों को नष्ट कर देंगी। विचार जब पैदा होते हैं, तभी
से उनकी खास देखभाल करनी होती है। और तब तक करनी होती है जब तक कि वे बड़े न हो जाए और उनमें फल न लगने लगें। अपने विचारों के दोहन के लिए और उन्हें विकसित करने के लिए इन तीन तरीकों का प्रयोग करें :

1. विचारों को बच निकलने का मौक़ा न दें। उन्हें लिख लें। हर दिन आपके दिमाग में बहुत से अच्छे विचार आते हैं, परंतु वे जल्दी ही मर जाते हैं क्योंकि आपने उन्हें कागज़ पर नहीं लिखा है और आप कुछ समय बाद उन्हें भूल जाते हैं। नए विचारों की पहरेदारी के लिए याददाश्त एक कमज़ोर चौकीदार है। अपने पास नोटबुक या डायरी रखें। जब भी आपके दिमाग में कोई अच्छा विचार आए, उसे लिख लें। यात्रा करने का शाकान मेरा एक दोस्त अपने साथ एक डायरी रखता है जिस पर वह अपने विचार तत्काल लिख लेता है। रचनात्मक मस्तिष्क वाले मनुष्य जानते हैं कि अच्छा विचार कभी भी, कहीं भी आ सकता है। विचारों को निकल भागने का मौक़ा न दें; अन्यथा आप अपने विचार के फल नष्ट कर लेंगे। उन्हें बाँधकर रखें।

           2. इसके बाद, अपने विचारों का अवलोकन करें। इन विचारों को एक फ़ाइल में लगा लें। यह फ़ाइल बड़ी हो सकती है या फिर छोटी फ़ाइल से भी काम चल सकता है। परंतु फ़ाइल ज़रूर बनाएँ और इसके बाद आप अपने विचारों का नियमित रूप से विश्लेषण करें। जब आप इन विचारों का अवलोकन करेंगे तो आपको कुछ विचार बेकार या महत्वहीन लगेंगे। उन्हें बाहर निकाल दें। परंतु जब तक आपको कोई विचार दमदार लगता है, उसे अंदर ही रहने दें।

         3. अपने विचार को विकसित करें। इसे फलने-फूलने दें। इसके बारे में सोचते रहें। इस विचार को इससे संबद्ध विचारों के साथ बाँध दें। अपने विचार से संबंधित सामग्री पढ़ते रहें। सभी पहलुओं की जाँच कर लें। फिर जब समय आए, तो काम में जुट जाएँ और अपनी नौकरी, अपने भविष्य को सुधारने के लिए इसका उपयोग करें।

         जब किसी आर्किटेक्ट के मन में नई इमारत का विचार आता है, तो वह एक शुरुआती ड्राइंग बनाता है। जब एड्वर्टाइज़िंग के किसी रचनात्मक व्यक्ति के दिमाग़ में नए टीवी विज्ञापन का विचार आता है तो वह इसे स्टोरीबोर्ड फॉर्म में लिख लेता है और ऐसी ड्रॉइंग बना लेता है जिनसे यह पता चलता है कि पूरा होने के बाद यह विचार किस तरह दिखेगा। विचारों वाले लेखक पहला ड्राफ्ट तैयार करते हैं।

            नोट : अपने विचार को काग़ज़ पर आकार दें। यह दो कारणों से ज़रूरी है। जब विचार निश्चित आकार ले लेता है, तो आप इसका पूरी तरह अध्ययन कर सकते हैं, इसकी कमियाँ देख सकते हैं, इसे बेहतर बनाने के लिए प्रयास कर सकते हैं। इसके अलावा, विचार किसी आर । को “बेचे" जाने होते हैं - ग्राहक, कर्मचारियों, बॉस, दोस्तों, साथी क्लब के सदस्यों, निवेशकों इत्यादि को। कोई न कोई तो होना चाहिए जो आपका विचार ख़रीदे, अन्यथा आपके विचार का कोई मूल्य नहीं है।

          एक बार दो जीवन बीमा सेल्समैन मुझसे मिले। दोनों ही मेरा बीमा करना चाहते थे। दोनों ने ही मुझसे वादा किया कि वे नई बीमा पॉलिसी के साथ मेरे पास आएँगे, जिसमें कुछ बदलाव किए गए थे। पहला सेल्समैन आया और उसने मुझे मुँहज़बानी योजना बता दी। जो मैं चाहता था. उसने मुझे शब्दों के माध्यम से समझा दिया। परंतु मैं उसकी बात पूरी तरह से समझ नहीं पाया। उसने टैक्स, ऑप्शन्स, सोशल सिक्युरिटी और बीमा योजना के सारे तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डाली, परंतु मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा और अंततः मुझे उसे मना करना पड़ा।

            दूसरे सेल्समैन ने एक अलग शैली का इस्तेमाल किया। उसने अपनी अनुशंसाओं को चार्ट के माध्यम से लिखकर प्रस्तुत किया। सारे डीटेल्स डायग्राम में दिए गए थे। मुझे उसका प्रस्ताव आसानी से समझ में आ गया क्योंकि मैं उसे साफ़ देख सकता था। मैंने उससे बीमा करवा लिया।

       अपने विचारों को बेचे जाने वाले रूप में तैयार करें। मौखिक विचार के बजाय लिखित विचार या डायग्राम के रूप में प्रस्तुत विचार को बेचना कई गुना ज्यादा आसान होता है।

  संक्षेप में, इन उपायों का प्रयोग करें और रचनात्मक तरीके से सोचें

         1. विश्वास करें कि काम किया जा सकता है। जब आप यह विश्वास करते हैं कि आप कोई काम कर सकते हैं, तो आपका दिमाग़ उसे करने के तरीके ढूँढ ही लेगा। इसका कोई रास्ता है, यह सोचने भर से रास्ता निकालना आसान हो जाता है।

          अपनी सोचने और बोलने की शब्दावलियों से “असंभव", "यह काम नहीं करेगा,” “मैं यह नहीं कर सकता,” “कोशिश करने से कोई फ़ायदा नहीं" जैसे वाक्य निकाल दें।

           2. परंपरा को अपने दिमाग को कमज़ोर न बनाने दें। नए विचारों को स्वीकार करें। प्रयोगशील बनें। नई शैलियों को आज़माएँ। अपने हर काम में प्रगतिशील रहें।

          3. अपने आपसे हर रोज़ पूछे, “मैं इसे किस तरह बेहतर तरीके से कर सकता हूँ?" आत्म-सुधार की कोई सीमा नहीं है। जब आप खुद से पूछते हैं, “मैं किस तरह बेहतर कर सकता हूँ" तो अच्छे जवाब अपने आप उभरकर सामने आएँगे। कोशिश करें और देखें।

         4. खुद से पूछे, “मैं यह काम और ज्यादा किस तरह कर सकता हूँ ?" काम करने की क्षमता एक मानसिक अवस्था है। जब आप खुद से यह सवाल पूछेगे तो आपके दिमाग में अच्छे शॉर्टकट अपने आप आ जाएँगे। बिज़नेस में सफलता का संयोग है : अपने काम को लगातार बेहतर तरीके से करते रहें (अपने काम की क्वालिटी सुधारें) और आप जितना पहले करते थे, उससे ज़्यादा करें (अपने काम की क्वांटिटी बढ़ाएँ)।

           5. पूछने और सुनने की आदत डालें। पूछे और सुनें और आपको सही निर्णय पर पहुँचने के लिए कच्चा माल मिल जाएगा। याद रखें : बड़े लोग लगातार सुनते हैं; छोटे लोग लगातार बोलते हैं।

           6. अपने मस्तिष्क को व्यापक बनाएँ। दूसरों के विचारों से प्रेरणा लें। ऐसे लोगों के साथ उठे-बैठें जिनसे आपको नए विचार, काम करने के नए तरीके सीखने को मिल सकते हों। अलग-अलग व्यवसायों और सामाजिक रुचियों वाले लोगों से मिलें।

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