Friday, August 16, 2019

CHAPTER 2.3. बुद्धि के बहानासाइटिस के इलाज के तीन तरीके

        


         बुद्धि के बहानासाइटिस के इलाज के तीन तरीके

बुद्धि के बहानासाइटिस के इलाज के तीन आसान तरीके हैं :

          1. अपनी खुद की बुद्धि को कभी कम न आँके और दूसरों की बुद्धि को कभी ज़रूरत से ज्यादा न आँकें। अपनी सेवाओं को सस्ते में न बेचें। अपने अच्छे बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करें। अपने गुणों को खोजें। याद रखें, महत्व इस बात का नहीं है कि आपमें कितनी बुद्धि है। महत्व तो इस बात का है कि आप अपने दिमाग़ का किस तरह इस्तेमाल करते हैं। इस बात पर सिर न धुनें कि आपका आई क्यू कम है, बल्कि अपनी मानसिकता को सकारात्मक करें।

        2. अपने आपको बार-बार याद दिलाएँ, “मेरी बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है मेरा नज़रिया।” नौकरी पर और घर पर सकारात्मक नज़रिए का अभ्यास करें। काम टालने के तरीके खोजने के बजाय काम करने के तरीके खोजें। अपने आपमें “मैं जीत रहा हूँ" का रवैया विकसित करें। अपनी बुद्धि का रचनात्मक और सकारात्मक प्रयोग करें। अपनी बुद्धि का प्रयोग इस तरह करें कि आप जीत सकें। अपनी  बुद्धि का दुरुपयोग अपनी असफलता के अच्छे बहाने खोजने में न करें।

         3. याद रखें कि तथ्यों को रटने से ज्यादा महत्वपूर्ण और बहुमूल्य है सोचने की योग्यता। अपने दिमाग को रचनात्मक बनाएँ और नए-नए विचार आने दें। काम करने के नए और बेहतर तरीके खोजते रहें। खुद से पूछे, “क्या मैं अपनी मानसिक क्षमता का उपयोग इतिहास रचने में कर रहा हूँ या इतिहास रटने में?" -

        4. “कोई फायदा नहीं। मेरी उम्र ज़्यादा (या कम) है।" उम्र का बहानासाइटिस असफलता की एक ऐसी बीमारी है जिसमें दोष उम्र के मत्थे मढ़ दिया जाता है। इसके दो आसानी से पहचाने जाने वाले रुप हैं: 'मेरी उम्र ज़्यादा है' का रूप और 'मेरी उम्र अभी बहुत कम है' का ब्रांड। 

        आपने हर उम्र के सैकड़ों लोगों को अपनी असफलताओं के बारे में इस तरह की बातें करते सुना होगा : “इस काम में सफल होने के लिए मेरी उम्र बहुत ज़्यादा (या बहुत कम) है। अपनी उम्र के कारण ही मैं वह नहीं कर सकता जो मैं करना चाहता हूँ या जो करने में मैं सक्षम हूँ।"

        यह आश्चर्यजनक है परंतु बहुत कम लोग ऐसा महसूस करते हैं कि उनकी उम्र किसी काम के लिए “बिलकुल सही" है। इस बहाने ने हज़ारों लोगों के लिए सच्चे अवसर के दरवाजे बंद कर दिए हैं। वे सोचते हैं कि उनकी उम्र ही ग़लत है, इसलिए वे कोशिश करने की जहमत भी नहीं उठाते।

         उम्र के बहानासाइटिस का सबसे लोकप्रिय रूप है “मेरी उम्र ज्यादा है।" यह बीमारी बहुत सूक्ष्म तरीके से फैलाई जाती है। टीवी के सीरियलों में दिखाया जाता है कि जब कंपनी के विलय के कारण किसी एक्जीक्यूटिव की नौकरी छूट जाती है, तो वह बेरोज़गार हो जाता है। उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिल पाती, क्योंकि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। मिस्टर एक्जीक्यूटिव महीनों तक नौकरी की तलाश करते हैं, परंतू उन्हें नौकरी नहीं मिलती और इस दौरान वे कुछ समय तक आत्महत्या के विकल्प पर विचार करते हैं और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
कि अब खुद को रिटायर समझ लेने में ही समझदारी है।

      “चालीस के बाद आपकी जिंदगी में मुश्किलें क्यों बढ़ जाती हैं," यह विषय नाटकों और पत्रिकाओं के लेखों में लोकप्रिय है, इसलिए नहीं क्योंकि इसमें सच्चे तथ्य हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि बहाना ढूँढ़ने वाले बहुत से लोग इसी तरह के नाटक देखना चाहते हैं और इसी तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं।

उम्र के बहानासाइटिस का इलाज क्या है

उम्र के बहानासाइटिस का इलाज किया जा सकता है। कुछ साल पहले जब मैंने एक सेल्स ट्रेनिंग प्रोग्राम का संचालन किया था, तो मैंने एक अच्छे सीरम की खोज की थी जो इस बीमारी का इलाज तो करता ही था, साथ ही यह भी सुनिश्चित करता था कि यह बीमारी आपको कभी न हो।

        इस प्रोग्राम में सेसिल नाम का एक प्रशिक्षु था। चालीस वर्षीय सेसिल निर्माता का प्रतिनिधि बनना चाहता था, परंतु सोचता था कि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। उसने कहा, "मुझे शुरू से सब कुछ करना पडेगा। और अब मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? अब मैं चालीस बरस का हो गया हूँ।"

        मैंने “ज्यादा उम्र की समस्या" पर सेसिल के साथ कई बार बात की। मैंने परानी दवा का इस्तेमाल किया, 'आपकी उम्र उतनी ही होती है. जितना आप समझते हैं।' परंतु मैंने पाया कि उसका मर्ज़ इस दवा से ठीक नहीं हो रहा है। (ज़्यादातर लोग इसके जवाब में कहते हैं, “परंत
मैं अपने आपको बूढ़ा समझता हूँ!")


       अंततः, मैंने एक ऐसा तरीक़ा खोज लिया जो जादू की तरह काम कर गया। एक दिन मैंने सेसिल से कहा, "ससिल, मुझे यह बताओ कि किसी आदमी की रचनात्मक उम्र कब शुरू होती है ?" |


        उसने एक-दो सेकंड तक सोचने के बाद जवाब दिया, "लगभग 20 साल की उम्र में।"

       “अच्छा," मैंने कहा, “और अब मुझे यह बताओ कि किसी आदमी की रचनात्मक उम्र कब ख़त्म होती है?"

         सेसिल ने जवाब दिया, “मुझे लगता है कि अगर वह तंदुरुस्त है और अपने काम को पसंद करता है तो कोई आदमी 70 साल की उम्र तक रचनात्मक कार्य कर सकता है।"

          "ठीक है," मैंने कहा, “बहुत से लोग 70 साल के बाद भी बहुत से रचनात्मक कार्य करते हैं, परंतु मैं आपसे सहमत हो जाता हूँ कि किसी आदमी के रचनात्मक कार्य करने की उम्र 20 से 70 साल के बीच होती है। और इस दौरान उसके पास 50 साल यानी कि आधी सदी होती है। "सेसिल," मैंने कहा, "आप अभी चालीस साल के हैं। आपकी रचनात्मक ज़िंदगी कितनी ख़त्म हो चुकी है ?"

        “बीस साल," उसने जवाब दिया।


        “और आपकी रचनात्मक ज़िंदगी अभी कितनी बाक़ी है ?" |


        "तीस साल," उसने जवाब दिया।

        "दूसरे शब्दों में, सेसिल, आपने अभी आधा रास्ता भी तय नहीं किया है। आपने अभी अपने रचनात्मक वर्षों का सिर्फ 40 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा किया है।"

         मैंने सेसिल की तरफ़ देखा और यह महसूस किया कि यह बात उसके दिल को छू गई थी। उसकी उम्र का बहानासाइटिस तत्काल दूर हो गया। सेसिल ने देखा कि उसके सामने अभी बहुत से अवसरपूर्ण वर्ष मौजूद हैं। अभी तक वह सोचता था, “मैं तो अब बूढ़ा हो चला हूँ," परंतु अब वह सोचने लगा, "मैं अब भी युवा हूँ।" सेसिल ने अब महसूस किया कि हमारी उम्र कितनी है, इस बात का कोई खास महत्व नहीं होता। दरअसल, उम्र के बारे में हमारा नज़रिया ही हमारे लिए वरदान या शाप बन जाता है।

         उम्र के बहानासाइटिस का इलाज करने से आपके लिए अवसरों के वे बंद दरवाज़े खुल जाएंगे जिन पर इस बीमारी की वजह से ताला लगा हुआ था। मेरे एक रिश्तेदार ने अलग-अलग तरह के काम करने में अपने कई साल बर्बाद किए- जैसे सेल्समैनशिप, अपना बिज़नेस करना. बैंको काम करना- परंतु वह यह तय नहीं कर पाया कि वह क्या करना चाहता था या उसे कौन सा काम पसंद था। आखिरकार, वह इस नतीजे पर पहुँचा कि वह पादरी बनना चाहता था। परंतु जब उसने इस बारे में सोचा तो उसने पाया कि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। अब वह 45 वर्ष का था. उसके तीन बच्चे थे और उसके पास पैसा भी ज़्यादा नहीं था।

        परंतु सौभाग्य से उसने अपनी पूरी ताक़त जुटाई और खुद से कहा. "चाहे मेरी उम्र पैंतालीस साल हो या पैंसठ साल, मैं पादरी बनकर
दिखाऊँगा।"

          उसके पास आस्था का भंडार था, और इसके सिवा कुछ नहीं था। उसने विस्कॉन्सन में 5 वर्षीय धर्मशास्त्र प्रशिक्षण कार्यक्रम में अपना नाम लिखवा लिया। पाँच साल बाद वह पादरी बन गया और इलिनॉय के चर्च में अपने लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब हुआ।

          बूढ़ा ? बिलकुल नहीं। अभी तो उसके सामने 20 वर्ष की रचनात्मक ज़िंदगी बाक़ी थी। मैं इस आदमी से हाल ही में मिला था और उसने मुझे बताया, “अगर मैंने 45 वर्ष की उम्र में इतना बड़ा फैसला नहीं किया होताbतो मेरी बाकी ज़िंदगी दुःख भरी होती। जबकि अभी मैं अपने आपको उतना ही युवा समझता हूँ जितना कि मैं 25 वर्ष पहले था।"

           और उसकी उम्र कम लग भी रही थी। जब आप उम्र के बहानासाइटिस को हरा देते हैं, तो इसका स्वाभाविक परिणाम यह होता है कि आपमें युवावस्था का आशावाद आ जाता है और आप युवा दिखने भी लगते हैं। जब आप उम्र की सीमाओं के अपने डर को जीत लेते हैं तो आप अपनी जिंदगी में कुछ साल तो जोड़ ही लेते हैं, अपनी सफलता में भी कुछ साल जोड़ लेते हैं।

             यूनिवर्सिटी के मेरे एक पुराने सहयोगी ने मुझे ऐसा दिलचस्प तरीका बताया जिससे उम्र के बहानासाइटिस को हराया जा सकता था। बिल ने हार्वर्ड से बीस के दशक में ग्रैजुएशन किया था। 24 साल तक स्टॉक ब्रोकर रहने के बाद बिल ने यह फैसला किया कि वह कॉलेज प्रोफ़ेसर बनेगा। बिल के दोस्तों ने उसे चेतावनी दी कि यह बहुत मेहनत का काम है और उससे इस उम्र में उतनी मेहनत नहीं होगी। परंतु बिल ने अपने लक्ष्य को हासिल करने का पक्का इरादा कर लिया था और उसने 51 वर्ष की उम्र में यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय में दाखिला लिया। 55 वर्ष की उम्र में उसे डिग्री मिली। आज बिल एक बढ़िया आर्टस कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ़
इकॉनोमिक्स का चेयरमैन है। वह सुखी भी है। वह मुस्कराते हुए कहता है, “अभी तो मेरी जिंदगी के एक तिहाई बेहतरीन साल बाक़ी हैंl"

          ज़्यादा उम्र का बहाना असफलता देने वाली बीमारी है। इसे हराएँ, वरना यह आपको हरा देगी।

            कोई आदमी ज़्यादा छोटा कब होता है ? “मेरी उम्र अभी बहुत कम है" भी उम्र के बहानासाइटिस का एक ऐसा प्रकार है जिसने कई लोगों का भविष्य चौपट कर दिया है। लगभग एक साल पहले जेरी नाम का 23 वर्षीय युवक मेरे पास एक समस्या लेकर आया। जेरी सर्विस में एक पैराट्रपर था और इसके बाद वह कॉलेज गया था। कॉलेज जाते-जाते भी जेरी ने अपने पत्नी और बच्चों की खातिर एक बड़ी ट्रांसफ़र-एंड-स्टोरेज कंपनी के लिए सेल्समैन का काम किया। उसने बहुत बेहतरीन काम किया। कॉलेज में भी और कंपनी में भी।

            परंतु आज जेरी चिंतित था। “डॉ. श्वार्ट्ज़," उसने कहा, “मेरी एक समस्या है। मेरी कंपनी ने मुझे सेल्स मैनेजर बनाने का फैसला किया है। इससे मैं आठ सेल्समैनों का सुपरवाइज़र बन जाऊँगा।"

          मैंने कहा, "बधाइयाँ, यह तो बहुत बढ़िया बात है। फिर तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो?"

           उसने जवाब दिया, “मुझे जिन आठ लोगों का सुपरवाइज़र बनाया गया है. वे सभी मुझसे सात साल से लेकर इक्कीस साल तक बड़े हैं। मुझेऐसे में क्या करना चाहिए? क्या मैं यह काम ठीक से कर सकता हूँ?"

          "जेरी," मैंने कहा, "तुम्हारी कंपनी का जनरल मैनेजर तो यही समझता है कि तुम यह काम ठीक से कर पाओगे वरना वह तुम्हें सुपरवाइज़र बनाता ही क्यों। सिर्फ तीन बातें याद रखो और हर चीज़ ठीक हो जाएगी। पहली बात तो यह कि उम्र पर ध्यान ही मत दो। खेत में कोई बच्चा तभी आदमी माना जाता है जब वह यह साबित कर देता है कि वह आदमी के बराबर काम कर सकता है। उसकी उम्र से इसका कोई लेना-देना नहीं होता। और यही तुम्हें भी साबित करना होगा। जब तुम यह साबित कर दोगे कि तुम सेल्स मैनेजर के काम को अच्छी तरह से कर सकते हो, तो तुम अपने आप उतने बड़े हो जाओगे।

          “दूसरी बात, अपने 'प्रमोशन' पर कभी इतराने की कोशिश मत करना। सेल्समैनों के प्रति सम्मान दिखाना। उनसे सलाह लेना। उन्हें यह महसूस कराना कि वे एक टीम के कप्तान के साथ काम कर रहे हैं, किसी तानाशाह के साथ नहीं। अगर तुम ऐसा करोगे, तो वे लोग तुम्हारे
साथ काम करेंगे, न कि तुम्हारे विरुद्ध।

          "तीसरी बात, इस बात की आदत डाल लो कि तुमसे ज्यादा उम्र वाले लोग तुम्हारे अधीन काम करें। हर क्षेत्र का लीडर जल्दी ही यह जान लेता है कि उसकी उम्र अपने कई अधीनस्थों से कम है। इसलिए इस बात की आदत डाल लो। यह आगे आने वाले सालों में तुम्हारे काफ़ी काम आएगी, जब तुम्हें और भी बड़े अवसर मिलेंगे।

          "और याद रखो, जेरी, तुम्हारी उम्र तुम्हारी सफलता की राह में कभी बाधा नहीं बनेगी, जब तक कि तुम खुद उसे बाधा न बनाओ।"

        आज जेरी का काम बढ़िया चल रहा है। उसे ट्रांसपोर्टेशन बिज़नेस पसंद है और कुछ ही सालों में वह अपनी खुद की कंपनी शुरू करने की योजना बना रहा है।

          कम उम्र तभी बाधा बनती है, जब आप खुद ऐसा सोचते हैं। आप अक्सर सुनते होंगे कि कई कामों में "काफ़ी" शारीरिक परिपक्वता की जरूरत होती है जैसे सिक्युरिटीज़ या बीमा बेचने में। किसी निवेशक का विश्वास जीतने के लिए या तो आपके बाल सफ़ेद होने चाहिए या फिर आपके सिर पर बाल ही नहीं होने चाहिए- ऐसा सोचना सरासर मर्खता है। असली महत्व तो इस बात का है कि आप अपना काम कितनी अच्छी तरह से करते हैं। अगर आप अपने काम पर पकड़ रखते हैं, लोगों को समझते हैं तो आप पर्याप्त परिपक्व हैं। उम्र का योग्यता से कोई सीधा संबंध नहीं होता जब तक कि आप खुद को यह यकीन न दिला दें कि उम्र और केवल उम्र ही आपको सफलता या असफलता दिला सकती है।

           कई युवा लोग यह महसूस करते हैं कि वे अपनी कम उम्र के कारण जिंदगी की दौड़ में पीछे हैं। हो सकता है कि किसी ऑफ़िस में कोई असुरक्षित आदमी या वह आदमी जिसे अपनी नौकरी छूटने का डर हो, आपके आगे बढ़ने की राह में रोड़े डाले। और हो सकता है कि वह आपकी उम्र का और आपके अनुभव की कमी का ज़िक्र भी करे।

           परंतु आपको ऐसे असुरक्षित लोगों की बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। कंपनी के मालिक, कंपनी के मैनेजर ऐसा नहीं सोचेंगे। वे आपको उतनी ज़िम्मेदारी देंगे, जितनी कि आप निभा सकें। यह साबित करें कि आपमें योग्यता है, सकारात्मक रवैया है और आपकी कम । उम्र एक लाभ के रूप में गिनी जाएगी।

         संक्षेप में, उम्र के बहानासाइटिस के इलाज यह हैं :

         1. अपनी वर्तमान उम्र के बारे में सकारात्मक सोच रखें। यह सोचें, "मैं अभी भी युवा हूँ;" यह न सोचें, “मैं अब बूढ़ा हो चुका हूँ।" नए लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश करते रहें। ऐसा करेंगे तो आपमें मानसिक उत्साह आ जाएगा और आप अधिक युवा भी दिखने लगेंगे।

         2. हिसाब लगाएँ कि आपके पास कितना रचनात्मक समय बचा है। याद रखें, तीस साल के आदमी के पास अपने जीवन का 80 प्रतिशत रचनात्मक समय शेष है। और 50 साल के आदमी के पास अब भी 40 प्रतिशत समय है- शायद सर्वश्रेष्ठ समय तो अभी आना शेष है। ज़्यादातर लोग जितना सोचते हैं, ज़िंदगी दरअसल उससे लंबी होती है!

        3. भविष्य में वह काम करें जो आप सचमुच करना चाहते हों। जब आप अपने दिमाग को नकारात्मक कर लेते हैं और सोचते हैं कि अब तो समय निकल चुका है, तभी आपके हाथ से समय सचमुच निकलता है। यह सोचना छोड़ दें, "मुझे यह काम सालों पहले शुरू कर देना चाहिए था।" यह असफलता की सोच है। इसके बजाय यह सोचें, “मैं अब शुरू करने जा रहा हूँ, मेरे सर्वश्रेष्ठ वर्ष अभी बाक़ी हैं।" सफल लोग इसी तरीके से सोचते हैं।

         4. "परंतु मेरा मामला अलग है। मेरी तो किस्मत ही खराब है।" हाल ही में, मैंने सड़क दुर्घटनाओं के बारे में एक ट्रैफ़िक इंजीनियर की बातें सुनीं। उसका कहना था कि हर साल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 40,000 लोग मर जाते हैं। उसकी चर्चा का मुख्य बिंदु यह था कि शायद ही कभी कोई सच्ची दुर्घटना होती हो। हम जिसे दुर्घटना मानते हैं, वह दरअसल किसी मानवीय या मशीनी गड़बड़ी का परिणाम होती है।

         यह ट्रैफिक विशेषज्ञ जो बात कह रहा था, उसका मूल भाव दार्शनिक और चिंतक हमें सदियों से सिखाते आ रहे हैं: हर चीज़ का कोई न कोई कारण होता है। कोई भी चीज़ बिना कारण के नहीं होती। आज बाहर जो मौसम है, वह भी दुर्घटनावश नहीं है। वह किन्हीं विशेष
कारणों से वैसा है। और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इंसान के मामले इस नियम का अपवाद है।

          परंतु शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रता हो जब हम किसी को अपनी "बदकिस्मती" को दोष देते न सुनते हों। और वह दुर्लभ दिन ही होगा जब आप किसी दूसरे आदमी की सफलता के बारे में उसकी “अच्छी" किस्मत की दुहाई न सुनें।

          मैं आपको एक उदाहरण से समझाना चाहता हूँ कि लोग किस तरह क्रिस्मत के बहानासाइटिस से पीड़ित होते हैं। मैंने तीन युवा जूनियर एक्जीक्यूटिब्ज के साथ हाल ही में लंच लिया। उस दिन चर्चा का मुख्य बिंदु था जॉज सी. का प्रमोशन। कल तक जॉर्ज इन्हीं लोगों की तरह जूनियर एक्जीक्यूटिव था। आज उसे प्रमोशन मिल गया था।

          जॉर्ज को प्रमोशन क्यों मिला? इन तीनों लोगों ने इस मुद्दे का पोस्टमार्टम किया और बहुत से कारण खोज निकाले : अच्छी किस्मत, मक्खनपॉलिश, प्रेशर, और जॉर्ज की पत्नी का सोर्स, यानी सच्चाई को छोड़कर हर बात कही गई। सच्चाई यह थी कि जॉर्ज इस प्रमोशन के लिए सबसे ज़्यादा योग्य था। वह अपने काम को बेहतर तरीके से कर रहा था। वह ज्यादा मेहनत से काम कर रहा था। वह अधिक प्रभावी और कार्यकुशल व्यक्ति था।

           मैं यह भी जानता था कि उस कंपनी के सीनियर ऑफिसर्स ने काफ़ी सोच-विचार किया था कि इन चारों में से किसे प्रमोशन मिले। मेरे इन तीन निराश दोस्तों को यह समझना चाहिए था कि कंपनी के सीनियर ऑफिसर्स जब प्रमोशन देते हैं, तो वे चारों नाम लिखकर टोपी में से किसी एक का नाम नहीं निकालते हैं।

           मैं मशीन के पुर्जे बनाने वाली कंपनी के सेल्स एक्जीक्यूटिव से किस्मत केबहानासाइटिस के बारे में बातें कर रहा था। वह समस्या को सनकर रोमांचित हो गया और उसने मुझे अपने जीवन का एक किस्सा नाका सुनाया।

          "मैंने इसका यह नाम तो पहले कभी नहीं सुना,” उसका कहना था, "परंतु हर सेल्समैन इस गंभीर समस्या से जूझता है। कल ही हमारी कंपनी में जो घटना हुई, उससे आपको एक बढ़िया उदाहरण मिल जाएगा।

          "हमारा एक सेल्समैन चार बजे मशीन के पुों का एक बड़ा ऑर्डर लेकर आया। ऑर्डर 112,000 डॉलर का था। दूसरा सेल्समैन उस वक्त वहीं ऑफ़िस में खड़ा हुआ था। इस सेल्समैन का माल इतना कम बिकता था कि वह कंपनी पर बोझ बनता जा रहा था। जब जॉन ने अच्छी ख़बर सुनाई तो उसने ईर्ष्या भरी बधाइयाँ तो दी, परंतु साथ में यह भी कहा, 'जॉन, एक बार फिर तुम्हारी किस्मत अच्छी रही!' ।

           "देखने वाली बात यह है कि यह कमज़ोर सेल्समैन यह मानने को तैयार ही नहीं था कि जॉन के बड़े ऑर्डर से किस्मत का कोई लेना-देना नहीं था। जॉन उस ग्राहक पर कई महीनों से मेहनत कर रहा था। उसने वहाँ आधा दर्जन लोगों से लंबी और बार-बार चर्चाएँ की थीं। जॉन रातों को योजनाएँ बनाया करता था कि वह किस तरह यह ऑर्डर हासिल कर सकता था। फिर उसने हमारे इंजीनियरों के साथ बैठकर उस यंत्र के शुरुआती डिज़ाइन बनवाए। जॉन खुशकिस्मत नहीं था; जब तक कि आप सुनियोजित काम करने के तरीके को किस्मत का नाम न दें।"

            अगर किस्मत के सहारे हम जनरल मोटर्स को एक बार फिर से गठित करें। अगर किस्मत ही यह तय करे कि कौन आदमी मैनेजर बनेगा और कौन चपरासी. तो इस देश का हर बिज़नेस चौपट हो जाएगा। एक मिनट के लिए कल्पना करें कि जनरल मोटर्स को हम किस्मत के सहारे पूरी तरह पुनर्गठित करें। इस काम के लिए हम एक बक्से में सभी कर्मचारियों के नाम की पर्ची डाल दें। पर्ची उठाने पर जिसके नाम की पहली पर्ची खुलेगी, उसे हम प्रेसिडेन्ट बना देंगे, दूसरे नाम वाले को वाइस प्रेसिडेन्ट और इसी क्रम से हम नीचे की तरफ़ आते जाएँगे।

          यह मूर्खतापूर्ण लगता है, नहीं क्या? परंतु किस्मत जब काम करती है, तो इसी तरह से करती है।

          जो लोग किसी भी व्यवसाय में चोटी पर पहुँचते हैं, चाहे वह बिज़नेस मैनेजमेंट हो, सेल्समैनशिप हो, कानून, इंजीनियरिंग, अभिनय या और कोई क्षेत्र हो, वे इसलिए चोटी पर पहुँचते हैं, क्योंकि उनका नज़रिया उत्कृष्ट होता है और वे साथ में कड़ी मेहनत भी करते हैं।

           क़िस्मत के बहानासाइटिस को दो तरीक़ों से जीतें

           1. कारण और परिणाम के नियम को स्वीकार करें। जब आपको लगे कि कोई आदमी "खुशकिस्मत" है तो ज़रा गौर से देखें। तब आपको यह दिखेगा कि जिसे आप पहली नज़र में अच्छी किस्मत समझे थे, दरअसल वह तैयारी, योजना और सफलता के नज़रिए का परिणाम है। इसी तरह किसी आदमी की "बदकिस्मती" को भी गौर से देखें। आपको उसके पीछे भी कुछ कारण मिलेंगे। मिस्टर सफल को जब झटका लगता है, तो वे उससे कुछ सीखते हैं और उससे लाभ उठाते हैं। परंतु जब मिस्टर असफल हारते हैं, तो वे अपनी असफलता से कुछ नहीं सीखते और बहाने बनाते रहते हैं।

            2. कभी भी दिवास्वप्न न देखें। अपनी मानसिक ऊर्जा को ऐसे सपने देखने में ज़ाया न करें जिसमें बिना मेहनत के सफलता हासिल की जा सकती हो। हम किस्मत के सहारे सफल नहीं होते। सफलता उन चीज़ों को करने से आती है और उन सिद्धांतों में पारंगत होने से मिलती है जो सफल में सहायक होते हैं। प्रमोशन, जीत, जीवन की अच्छी चीज़ों में किस्मत का सहारा न लें। किस्मत से ये चीजें नहीं मिला करतीं। इसके बजाय, आप अपने आपमें ऐसे गुण विकसित करें कि आप सचमुच एक विजेता बन जाएँ।

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Monday, August 12, 2019

CHAPTER 2.2. सेहत के बहानासाइटिस से बचने के चार तरीके



सेहत के बहानासाइटिस से बचने के चार तरीके

सेहत के बहानासाइटिस से बचाव के सर्वश्रेष्ठ वैक्सीन के चार डोज़ हैं :

      1. अपनी सेहत के बारे में बात न करें। आप किसी बीमारी के बारे में जितनी ज्यादा बात करेंगे, चाहे वह साधारण सी सर्दी ही क्यों न हो, वह बीमारी उतनी ही बिगड़ती जाएगी। बुरी सेहत के बारे में बातें करना काँटों को खाद-पानी देने की तरह है। इसके अलावा, अपनी सेहत के बारे में बातें करते रहना एक बुरी आदत है। इससे लोग बोर हो जाते हैं। इससे आपको आत्म-केंद्रित और बुढ़िया की तरह बातें करने वाला समझा जा सकता है। सफलता की चाह रखने वाले आदमी अपनी “बुरी” सेहत के बारे में चिंता नहीं करता। अपनी बीमारी का रोना रोने से आपको थोड़ी सहानुभूति तो मिल सकती है (और मैं सकती शब्द पर ज़ोर देना चाहूँगा), परंतु जो आदमी हमेशा शिकायत करता रहता है, उसे कभी किसी का सम्मान, आदर या वफ़ादारी नहीं मिल सकते।

         2. अपनी सेहत के बारे में फालतू की चिंता करना छोड़ दें। डॉ. वॉल्टर अल्वरेज़ विश्वप्रसिद्ध मेयो क्लीनिक में एमेरिटस कन्सल्टेंट हैं। उन्होंने हाल ही में लिखा है, “मैं हमेशा फ़िजूल की चिंता करने वाले लोगों को ऐसा न करने की सलाह देता हूँ। उदाहरण के तौर पर, मैंने एक आदमी को देखा जिसे इस बात का पूरा विश्वास था कि उसका ‘गाल ब्लैडर' खराब है, हालाँकि आठ बार अलग-अलग क्लीनिकों में एक्स-रे। कराने पर भी उसका गाल ब्लैडर पूरी तरह सही दिख रहा था और डॉक्टरों का कहना था कि यह सिर्फ उसके मन का वहम है और दरअसल उसे कोई बीमारी नहीं है। मैंने उससे विनती की कि वह अब तो मेहरबानी करके अपने गाल ब्लैडर का एक्स-रे कराना छोड़ दे। मैंने सेहत का जरूरत  से ज्यादा ध्यान रखने वाले सैकड़ों लोगों को बार-बार जबरन ई भी कराते देखा है और मैंने उनसे भी यही विनती की है कि वे अपनी बीमारी के बारे में फालतू की चिंता करना छोड़ दें।

      3. आपकी सेहत जैसी भी हो, आपको उसके लिए कृतज्ञ होना चाहिए। एक पुरानी कहावत है, “मैं अपने फटे हुए जूतों को लेकर दुःखी हो रहा था, परंतु जब मैंने बिना पैरों वाले आदमी को देखा तो मुझे ऊपर वाले से कोई शिकायत नहीं रही, इसके बजाय मैं कृतज्ञ हो चला।” इस बात पर शिकायत करने के बजाय कि आपकी सेहत में क्या “अच्छा नहीं है, आपको इस बारे में खुश और कृतज्ञ होना चाहिए कि आपकी सेहत में क्या ‘अच्छा है। अगर आप कृतज्ञ होंगे तो आप कई असली
बीमारियों से भी बचे रहेंगे।

       4. अपने आपको यह अक्सर याद दिलाएँ “जंग लगने से बेहतर है घिस जाना।” आपको जीवन मिला है आनंद लेने के लिए। इसे बर्बाद न करें। जिंदगी जीने के बजाय अगर आप चिंता करते रहेंगे, तो आप जल्दी ही किसी अस्पताल में भर्ती नज़र आएँगे।

2.      “परंतु मेरे पास सफल लोगों जितनी बुद्धि नहीं है।” बुद्धि का बहानासाइटिस या “मेरे पास उतनी बुद्धि नहीं है” बहुत लोकप्रिय बहाना है। वास्तव में यह इतना आम है कि यह हमारे आस-पास के तक़रीबन 95 प्रतिशत लोगों में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है। बहानासाइटिस के बाक़ी रूपों में तो व्यक्ति बढ़-चढ़कर बातें करता है, परंतु इस क़िस्म के बहानासाइटिस यानी बुद्धि के बहानासाइटिस में व्यक्ति चुपचाप दुःखी होता रहता है। ज्यादातर लोग दूसरों के सामने यह मानने को तैयार नहीं होते कि उनमें पर्याप्त बुद्धि या समझ नहीं है। परंतु, वे अंदर से यह बात महसूस करते हैं।

         जब बुद्धि की बात आती है, तो हममें से ज्यादातर लोग दो तरह की मूलभूत गलतियाँ करते हैं :

          1. हम अपनी बुद्धि को कम आँकते हैं, और

          2. हम दूसरे व्यक्ति की बुद्धि को ज्यादा आँकते हैं।

        इन गलतियों के कारण लोग काफ़ी नुक़सान में रहते हैं। वे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने में असफल रहते हैं, क्योंकिउ“बुद्धि की ज़रूरत होती है। परंतु तभी वहाँ एक ऐसा व्यक्ति आता है जो बुद्धि के बारे में ज़रा भी विचार नहीं करता और उसे वह काम मिल जाता है।

             दरअसल महत्व इस बात का नहीं है कि आपमें कितनी बुद्धि है। बल्कि इस बात का है कि जो आपके पास है आप उसका किस तरह उपयोग करते हैं। आपकी बुद्धि की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह चिंतन या वह नज़रिया जो आपकी बुद्धि को दिशा दिखा रहा है। मुझे
इस बात को दोहराने दें, क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है : आपकी बुद्धि की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह चिंतन या वह नज़रिया जो आपकी बुद्धि को दिशा दिखा रहा है।

देश के मशहूर डॉक्टर एडवर्ड टेलर से एक बार किसी ने यह सवाल पूछा, “क्या कोई भी बच्चा वैज्ञानिक बन सकता है ?” टेलर ने जवाबदि  “वैज्ञानिक बनने के लिए तूफ़ानी दिमाग की ज़रूरत नहीं होती, न ही चमत्कारी याददाश्त की ज़रूरत होती है, न ही यह ज़रूरी है कि बच्चा स्कूल में बहुत अच्छे नंबरों से पास हो। वैज्ञानिक बनने के लिए केवल यह ज़रूरी है कि बच्चे की विज्ञान में काफ़ी रुचि हो। उसकी यह रुचि जितनी ज्यादा होगी, वह उतना ही बड़ा वैज्ञानिक बन सकता है।”

           तो रुचि या उत्साह विज्ञान में 
महत्वपूर्ण होते हैं!

         अगर 100 आई क्यू वाले किसी व्यक्ति का रवैया सकारात्मक, आशावादी और सहयोगात्मक है, तो वह उस व्यक्ति से ज्यादा पैसा, सफलता और सम्मान हासिल करेगा, जिसका आई क्यू तो 120 है, परंतु उसका रवैया नकारात्मक, निराशावादी और असहयोगात्मक है।

किसी काम में जुटे रहिए जब तक कि वह पूरा न हो जाए- यही असली पते की बात है। आलसी बुद्धि किस काम की ? अक्सर जुटे रहने वाला व्यक्ति उस बुद्धिमान और प्रतिभाशाली व्यक्ति से ज्यादा सफल होता है जो कोई काम पूरा नहीं करता है।

जुटे रहने की क्षमता ही योग्यता का 95 प्रतिशत हिस्सा है।

        पिछले साल मैं अपने कॉलेज के एक पुराने दोस्त चक से 10 साल बाद मिला। चक बहुत ही प्रतिभाशाली छात्र था और उसने ऑनर्स केसा ग्रेजुएशन किया था। जब मैं उससे आख़िरी बार मिला था, तो उसका लक्ष्य था पश्चिमी नेब्रास्का में अपना बिज़नेस खड़ा करना।

         मैंने चक से पूछा कि आखिरकार उसने किस तरह का बिज़नेस खड़ा किया है।

          उसका जवाब था, “मैं कोई बिज़नेस खड़ा नहीं कर पाया। पाँच साल पहले मैं तुम्हें यह नहीं बताता, एक साल पहले भी नहीं, परंतु अब
मैं इस बारे में बात करने के लिए तैयार हैं।” 

“अब जब मैं अपने कॉलेज के दिनों की याद करता हूँ, तो मुझे यह महसूस होता है कि मैं हर योजना की खामियाँ ढूँढने में माहिर था। मैं यह बता सकता था कि कोई बिज़नेस क्यों चौपट हो जाएगा, कोई योजना क्यों असफल हो जाएगी, राह में कितनी मुश्किलें आएंगी : 'आपके पास बहुत सारी पूँजी होनी चाहिए, 'यह सुनिश्चित कर लें कि बिज़नेस साइकल सही हो,' जो सामान हम बनाएँगे, क्या उसकी बहुत माँग है?' ‘क्या स्थानीय उद्योग स्थिर और स्थाई हैं ?'- और इसी तरह के एक हज़ार एक सवाल जिनके जवाब ढूंढे बिना कोई बिज़नेस शुरू करना खतरनाक हो सकता था।

मुझे सबसे ज्यादा कष्ट इस बात से होता है कि मेरे वे दोस्त जिनमें ज्यादा बुद्धि नहीं थी, या वे लोग जो कभी कॉलेज गए ही नहीं थे, उन्होंने अच्छे-खासे बिज़नेस खड़े कर लिए हैं। जबकि मैं वहीं का वहीं हैं, उनकी कंपनियों का ऑडिट करता फिर रहा हूँ। कोई बिज़नेस क्यों असफल हो सकता है. इसके बारे में सोचते रहने के बजाय काश मैंने यह सोचा होता। कि कोई बिज़नेस किस तरह सफल हो सकता है! अगर मैंने सकारात्मक चिंतन किया होता तो मेरी जिंदगी ज्यादा सुखद होती।"

         चक की बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण था उसका सोचने का नज़रिया, जिसने चक की बुद्धि को गलत राह दिखाई। कई प्रतिभाशाली लोग क्यों असफल होते हैं ? पिछले कई सालों से मैं एक ऐसे आदमी के संपर्क में हैं जो बेहद प्रतिभाशाली है, जिसमें बुद्धि की कोई कमी नहीं है और उसका नाम है फी बेटा काप्पा। इतनी बुद्धि होने के बावजूद वह बहुत असफल है। उसकी नौकरी भी सामान्य है (वह ज़िम्मेदारियों से घबराता है)। उसने कभी शादी नहीं की (वह मानता है। कि ज्यादातर शादियों का अंत तलाक़ में होता है)। उसके बहुत कम दोस्त हैं (लोगों से बातें करना उसे बोरिंग लगता है)। उसने किसी तरह की जायदाद नहीं खरीदी है (इस डर से कि कहीं वह अपना पैसा न गंवा दे)। यह आदमी अपनी बद्धि का इस्तेमाल करके यह सिद्ध कर देता है कि चीजें क्यों असफल होंगी। इसके बजाय उसे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके यह सिद्ध करना चाहिए कि सफल किस तरह हुआ जाए।'

        जैसा मैंने कहा उसके पास बुद्धि की कमी नहीं है, सिर्फ उसके सोचने का नज़रिया गलत है। और इसी कारण यह प्रतिभाशाली आदमी समाज को बहुत कम योगदान दे पाया है और उसने कोई रचनात्मक कार्य नहीं किया है। अगर वह अपना नज़रिया बदल ले, तो वह बड़े-बड़े काम कर सकता है। उसमें अद्भुत सफलता दिलाने वाला दिमाग़ तो है, परंतु उसका नज़रिया उतना ताक़तवर नहीं है।

मैं एक और ऐसे ही आदमी को जानता हूँ जो न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. करने के बाद सेना में भर्ती हुआ। उसने सेना में तीन साल किस तरह बिताए ? स्टाफ़ ऑफ़िसर के रूप में नहीं। न ही स्टाफ़ स्पेशलिस्ट के रूप में। इसके बजाय, वह तीन साल तक सेना का ट्रक चलाता रहा। क्यों ? क्योंकि उसके मन में अपने साथी सिपाहियों के प्रति नकारात्मक विचार भरे हुए थे (“मैं उनसे श्रेष्ठ हूँ”), सेना के नियम-क़ायदों से वह चिढता था (“सारे नियम बकवास और मूर्खतापूर्ण हैं”), अनुशासन को वह पसंद नहीं करता था (“यह दूसरों पर लागू होता होगा, मुझ पर नहीं होगा”), यानी कि हर चीज़ के बारे में उसका नज़रिया नकारात्मक था, जिसमें वह खुद भी शामिल था (“मैं कैसा मूर्ख था जो इस झमेले में आ फँसा और अब यहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ पा रहा हैं")।

         ऐसे आदमी का आदर कौन करता ? उसका सारा ज्ञान उसके दिमाग के गोदाम में भरा रहा और वहीं दफ़न होकर रह गया। उसके
नकारात्मक विचारों ने उसे निठल्ला बना दिया था।

            याद रखें, आपकी बुद्धि की मात्रा से ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह चिंतन या वह नज़रिया जो आपकी बुद्धि को दिशा दिखा रहा है। पीएच. डी. की डिग्री भी इस मूलभूत सफलता के सिद्धांत के सामने हार जाती है।

         कई साल पहले मैं अपने करीबी दोस्त फिल के ऑफ़िस में बैठा था। फिल एक बड़ी एडवर्टाइजिंग एजेंसी में ऑफ़िसर था। फिल अपनी एजेंसी के मार्केटिंग रिसर्च का निदेशक था और उसका काम ज़ोरदार चल रहा था।

            क्या फिल बहुत “दिमाग वाला था ? बिलकुल नहीं। फिल को रिसर्च तकनीक का ज़रा भी ज्ञान नहीं था। उसे सांख्यिकी की बिलकुल
समझ नहीं थी। वह कॉलेज प्रैजुएट भी नहीं था (हालाँकि उसके सभी मातहत कर्मचारी कॉलेज ग्रेजुएट थे)। और फिल यह दावा भी नहीं
करता था कि उसे रिसर्च के तकनीकी पहलू का ज्ञान है। तो फिर फिल में ऐसी क्या बात थी कि उसे साल भर में 30,000 डॉलर मिलते थे,
जबकि उसके मातहतों को सिर्फ 10,000 डॉलर ही मिलते थे ? 

          फिल “इंसानों” का इंजीनियर था। फिल 100 प्रतिशत सकारात्मक था। जब लोगों का उत्साह ठंडा पड़ जाता था, तो फिल उन्हें प्रेरित कर सकता था। फिल उत्साही था। वह उत्साह पैदा कर सकता था। फिल में लोगों की समझ थी और इसलिए वह सचमुच जानता था कि उनसे कैसे काम लिया जा सकता है और इससे भी बड़ी बात यह कि वह उन लोगों को पसंद करता था।

           कंपनी ने फिल को उन कर्मचारियों से तीन गुना ज्यादा बहुमूल्य समझा जिनमें उससे ज्यादा आई क्यू या दिमाग़ था। और निश्चित रूप से फिल में बुद्धि तो कम थी, परंतु उसके सोचने के तरीके या नज़रिए ने उसे कंपनी के लिए इतना मूल्यवान बना दिया था।

       कॉलेज में दाखिल होने वाले 100 में से सिर्फ 50 प्रतिशत ही पैजएट हो पाएँगे। मैं यह जानकर हैरान हुआ इसलिए मैंने एक बड़ी
यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर ऑफ़ एडमीशन से इसका कारण पूछा।

         उसने कहा, “इसका कारण कम बुद्धि नहीं है। अगर उनमें पर्याप्त योग्यता नहीं होती, तो हम उन्हें दाख़िला ही नहीं देते। और सवाल पैसे
का भी नहीं है। आजकल जो भी अपने कॉलेज की फ़ीस के लिए काम करने को तैयार है, उसके लिए काम की कोई कमी नहीं है। असली कारण है नज़रिया या रवैया। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि कितने सारे नौजवान सिर्फ इसलिए कॉलेज छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें प्रोफेसर पसंद नहीं होते, या उन्हें अपने विषय में मज़ा नहीं आता या उन्हें पसंदीदा साथी नहीं मिलते।”

नकारात्मक नज़रिए के कारण ही कई जूनियर एक्जीक्यूटिव्ज़ ऊँचे पदों पर नहीं पहुँच पाते। ऐसे हज़ारों युवा एक्ज़ीक्यूटिव्ज़ हैं जिनमें पर्याप्त बुद्धि तो है, परंतु उनका रवैया नकारात्मक, चिड़चिड़ा, निराशावादी और अपमानजनक है। जैसा एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बताया, “ऐसा दुर्लभ ही है कि हम किसी युवा ऑफ़िसर को दिमाग़ या बुद्धि की कमी के कारण प्रमोशन नहीं देते। लगभग हमेशा इसका कारण होता है उसका रवैया या नज़रिया।"

         मुझे एक बीमा कंपनी ने एक रिसर्च करने को कहा। वे यह जानना चाहते थे कि उनके चोटी के 25 प्रतिशत एजेंट 75 प्रतिशत बीमा करने में सफल क्यों हो रहे हैं, जबकि सबसे नीचे के 25 प्रतिशत एजेंट कुल बीमे का सिर्फ 5 प्रतिशत ही क्यों कर पा रहे हैं। इसका कारण क्या था ?

         हज़ारों फ़ाइलों को गौर से देखा गया। इस रिसर्च में एक बात उभरकर आई कि सबसे चोटी के और सबसे निचले बीमा एजेंटों की बुद्धि में कोई ख़ास अंतर नहीं था। उनकी सफलता में अंतर का कारण उनकी शिक्षा का अंतर भी नहीं था। बेहद सफल और बहुत असफल लोगों में जो सबसे बड़ा अंतर पाया गया, वह था उनके रवैए या नज़रिए का चोटी के बीमा एजेंट चिंता कम करते थे, ज्यादा उत्साही थे, लोगों को सचमुच पसंद करते थे।

        हम अपनी बुद्धि की मात्रा को तो बदल नहीं सकते, परंतु हम उस तरीके को तो बदल ही सकते हैं जिससे हम अपनी बुद्धि का इस्तेमाल
करते हैं।

          ज्ञान ही शक्ति है- अगर आप इसका रचनात्मक प्रयोग करें। बुद्धि के बहानासाइटिस से जुड़ी हुई एक गलत धारणा यह है कि ज्ञान ही शक्ति है। परंतु यह बात पूरी तरह सही नहीं है, यह केवल आधी सही है। ज्ञान केवल संभावित शक्ति है। ज्ञान शक्ति तभी बनता है जब इसका उपयोग किया जाता है और सिर्फ तभी, जब यह उपयोग सकारात्मक या रचनात्मक हो।

         एक बार महान वैज्ञानिक आइंस्टीन से किसी ने पूछा कि एक मील में कितने फुट होते हैं। आइंस्टीन ने जवाब दिया, “मुझे नहीं मालूम। मैं अपने दिमाग़ में ऐसी जानकारी क्यों भरूं जो मैं किसी भी किताब से दो मिनट में हासिल कर सकता हूँ?"

    आइंस्टीन ने हमें एक बड़ा सबक़ सिखाया है। उनका मानना था कि हमें अपने दिमाग को तथ्यों या जानकारी का गोदाम बनाने से बचना चाहिए और इसके बजाय यह ज्यादा महत्वपूर्ण था कि हम अपने दिमाग से सही तरीके से सोचें।

         एक बार हेनरी फ़ोर्ड ने शिकागो ट्रिब्यून पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया। कारण यह था कि उस अखबार ने फ़ोर्ड को अज्ञानी कह दिया था। फ़ोर्ड ने उनसे यह “सिद्ध करने को कहा।

     ट्रिब्यून ने फ़ोर्ड से दर्जनों सवाल पूछे, जैसे “बेनेडिक्ट अर्नाल्ड कौन थे ?”, “क्रांति का युद्ध कब लड़ा गया था ?” इत्यादि। और फ़ोर्ड ज्यादातर सवालों के जवाब नहीं दे पाए, क्योंकि उनकी औपचारिक शिक्षा कम हुई थी।

     आखिरकार फ़ोर्ड काफ़ी परेशान होकर गुस्से से बोले, “मैं इन सवालों के जवाब तो नहीं जानता, परंतु मैं पाँच मिनट में ऐसे आदमी को ढूँढ़ सकता हूँ जो इन सारे सवालों के जवाब जानता हो।” 

    हेनरी फ़ोर्ड ने फालतू की जानकारी हासिल करने में कभी रुचि नहीं ली। उन्हें वह बात मालूम थी जो हर सफल एक्ज़ीक्यूटिव जानता है : दिमाग को तथ्यों का गैरेज मत बनाओ, यह जानकारी रखो कि जानकारी कहाँ से हासिल हो सकती है।

     तथ्यों के आदमी का मोल क्या है ? मैंने एक दोस्त के साथ एक बहुत रोचक शाम गुज़ारी। मेरा दोस्त एक नई परंतु तेज़ी से बढ़ रही कंपनी का प्रेसिडेन्ट है। टीवी पर एक लोकप्रिय क्विज़ कार्यक्रम आ रहा था। जिस आदमी से सवाल पूछे जा रहे थे, वह पिछले कुछ सप्ताहों से लगातार आ रहा था। वह सभी तरह के सवालों के जवाब दे सकता था, चाहे उनमें से कुछ सवाल कितने ही मूर्खतापूर्ण क्यों न हों।

         जब उस आदमी ने एक बहुत मुश्किल सवाल का जवाब दिया जिसका संबंध अर्जेन्टीना के किसी पहाड़ से था, तो मेरे दोस्त ने मुझसे
कहा, “तुम्हें क्या लगता है कि मैं इस आदमी को कितने डॉलर की नौकरी दूंगा?"

"कितने की?", मैंने पूछा।

      "300 डॉलर से एक सेंट भी ज्यादा नहीं- प्रति सप्ताह नहीं, प्रति माह भी नहीं, बल्कि जीवन भर। मैंने उसके ज्ञान की थाह ले ली है। यह 'विशेषज्ञ' सोच नहीं सकता। वह केवल रट सकता है, याद कर सकता है। वह एक इंसानी एन्साइक्लोपीडिया है और मैं समझता हूँ कि मैं 300 डॉलर में एक अच्छा एन्साइक्लोपीडिया ख़रीद सकता हूँ। वास्तव में, शायद यह क़ीमत भी उसके लिए ज़्यादा होगी। इस आदमी को जितना पता है, उसका १० प्रतिशत हिस्सा तो मुझे 2 डॉलर की जनरल नॉलेज की किताब में ही मिल जाएगा।

“मैं अपने आस-पास ऐसे लोगों को चाहता हूँ जो समस्याएँ सुलझा सकें, जिनके पास विचार हों। जो सपने देख सकें और फिर उन सपनों को साकार कर सकें। जिस आदमी में विचार हैं वह मेरे साथ पैसे कमा सकता है, जिसके पास सिर्फ़ तथ्य हैं, वह मेरे साथ पैसे नहीं कमा पाएगा।"

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Friday, August 2, 2019

CHAPTER 2.1 बहानासाइटिस का इलाज कराएँ

            

              बहानासाइटिस का इलाज कराएँ

              यह असफलता की बीमारी है।

      चूं  कि सफलता का संबंध लोगों से है, इसलिए सफल होने के लिए यह ज़रूरी है कि आप लोगों को अच्छी तरह से समझ लें। अगर आप लोगों को ध्यान से देखेंगे तो आप उनसे यह सीख सकते हैं कि ज़िंदगी में सफल कैसे हुआ जा सकता है। और यह सीखने के बाद आप उसे अपने जीवन में उतार भी सकते हैं। अभी हाल, बिना देरी के।

           लोगों का अध्ययन गहराई से करें और जब आप ऐसा करेंगे तो आप देखेंगे कि असफल लोगों को दिमाग की एक भयानक बीमारी होती है। हम इस बीमारी को अपेंडिसाइटिस की तर्ज पर बहानासाइटिस (excusitis) का नाम दे सकते हैं। हर असफल व्यक्ति में यह बीमारी बहुत विकसित अवस्था में पाई जाती है। और ज्यादातर “आम” आदमियों में यह बीमारी थोड़ी-बहुत तो होती ही है।

        आप पाएँगे कि बहानासाइटिस की बीमारी सफल और असफल व्यक्तियों के बीच का सबसे बड़ा अंतर होती है। सफलता की सीढ़ियों पर बिना रुके चढ़ने वाला व्यक्ति बहानासाइटिस का रोगी नहीं होता, जबकि असफलता की ढलान पर लगातार फिसलने वाला व्यक्ति बहानासाइटिस से गंभीर रूप से पीड़ित होता है। अपने आस-पास के लोगों को देखने पर आप पाएँगे कि जो व्यक्ति जितना सफल होता है, वह उतने ही कम बहाने बनाता है।

          परंतु जो व्यक्ति कहीं नहीं पहुंच पाता और उसके पास कहीं पहुंचने की कोई योजना भी नहीं होती, उसके पास बहाने थोक में मौजूद रहते हैं। असफल लोग फ़ौरन से बता देते हैं कि उन्होंने अमुक काम क्यों नहीं किया, या वे उसे क्यों नहीं करते, या वे उसे क्यों नहीं कर सकते, या यह कि वे असफल क्यों हैं।

        सफल लोगों की जिंदगी का अध्ययन करें और आप उन सबमें एक वात पाएंगे असफल लोग जो बहाने बनाते हैं, सफल व्यक्ति भी वही वहाने बना सकता है, परंतु वह बहाने नहीं बनाता।।

        में जितने भी बेहद सफल बिज़नेसमैनों, मिलिट्री ऑफ़िसरों, सेल्समैनों, प्रोफेशनल व्यक्तियों या किसी भी क्षेत्र के अग्रणी लोगों से मिला हैं या जिनके बारे में मैंने सुना है, उनके सामने बहानों की कोई कमी नहीं थी। रूज़वेल्ट अपने बेजान पैरों का बहाना बना सकते थे; टूमैन “शिक्षा की कमी" का बहाना बना सकते थे, कैनेडी यह कह सकते थे "प्रेसिडेन्ट बनते वक्त मेरी उम्र कम थी;" जॉनसन और आइज़नहॉवर हार्ट अटैक के बहाने के पीछे छुप सकते थे।

         किसी भी बीमारी की तरह बहानासाइटिस का अगर वक्त पर सही इलाज नहीं किया जाए तो हालत बिगड़ सकती है। विचारों की इस बीमारी का शिकार व्यक्ति इस तरह से सोचता है : “मेरी हालत उतनी अच्छी नहीं है, जितनी कि होनी चाहिए। अब मैं लोगों के सामने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए कौन सा बहाना बना सकता हूँ? बुरी सेहत ? शिक्षा का अभाव ? ज़्यादा उम्र ? कम उम्र ? वदक़िस्मती ? व्यक्तिगत विपत्तियाँ ? बुरी पत्नी ? माँ-बाप की गलत परवरिश ?”


     असफलता की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति जब किसी अच्छे बहाने को चुन लेता है, तो फिर वह इसे कसकर जकड़ लेता है। फिर वह इस बहाने के सहारे लोगों को और खुद को यह समझाता है कि वह जीवन में आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा है।


             और हर बार जब यह बीमार व्यक्ति बहाना बनाता है, तो वह बहाना उसके अवचेतन में और गहराई तक चला जाता है। जब हम उनमें दोहराव की खाद डालते हैं तो विचार, चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक,


ज्यादा तेज़ी से फलने-फूलने लगते हैं। शुरुआत में तो बहानासाइटिस का रोगी जानता है कि उसका बहाना कमोबेश झूठ है। परंतु वह जितनीज्या बार अपने बहाने को दोहराता है, उतना ही उसे लगने लगता है। कि यही सच है और यही उसकी असफलता का असली कारण है।


सफलता की राह में अपने चिंतन को सही दिशा में ले जाने के लिए। सबसे पहले तो आपको यह क़दम उठाना पड़ेगा कि आप बहानासाइटिस से बचाव के लिए वैक्सीन लगवा लें। यह इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि बहानासाइटिस एक ऐसी बीमारी है, जो इंसान को ज़िंदगी भर सफल नहीं होने देती।


बहानासाइटिस की बीमारी कई तरह की होती है, परंतु मोटे तौर पर यह चार प्रकार की होती है : सेहत का बहानासाइटिस, बुद्धि का बहानासाइटिस, उम्र का बहानासाइटिस और क़िस्मत का बहानासाइटिस। आइए हम देखें कि इन सबसे खुद को किस तरह बचा सकते हैं :


    बहानासाइटिस के चार सबसे लोकप्रिय रूप


1.)  “मैं क्या करूं, मेरी तबियत ही ठीक नहीं रहती।” यह सेहत का बहानासाइटिस है। परंतु सेहत का बहानासाइटिस भी कई तरह का होता है। कई लोग बिना किसी बीमारी के उल्लेख के यूँ ही कहते हैं, “मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही है। जबकि कई लोग अपनी बीमारी का नाम ज़ोर देकर अंडरलाइन करते हैं और फिर विस्तार से आपको बताते हैं। कि उनके साथ क्या गड़बड़ है।।

            “बुरी” सेहत को लेकर हज़ार बहाने बनाए जा सकते हैं, और उनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि अपनी बीमारी के कारण ही आदमी वह नहीं कर पा रहा है जो वह करना चाहता है, अपनी बीमारी के कारण ही वह बड़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ नहीं ले पा रहा है, इसी कारण वह ज्यादा पैसा नहीं कमा पा रहा है, इसी कारण वह सफल नहीं हो पा रहा है।

लाखों-करोड़ों लोग सेहत के बहानासाइटिस से पीड़ित रहते हैं। परंतु क्या ज़्यादातर मामलों में यह सिर्फ बहाना नहीं होता? ज़रा एक पल के लिए सोचें कि बेहद सफल लोग भी अपनी सेहत का रोना रो सकते थे, परंतु उन्होंने तो ऐसा कभी नहीं किया।

      मेरे डॉक्टर मित्र मुझे बताते हैं कि इस दुनिया में कोई पूरी तरह स्वस्थ नहीं होता है। हर एक के साथ कोई न कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या होती है। कई लोग कुछ हद तक या काफ़ी हद तक सेहत के बहानासाइटिस के सामने घुटने टेक देते हैं, जबकि सफलता चाहने वाले लोग ऐसा नहीं करते।

      मेरे साथ एक ही दिन में दो घटनाएँ हुईं जिनसे मुझे यह सीखने को मिला कि अपनी सेहत के बारे में सही और गलत नज़रिया क्या होता है। क्लीवलैंड में मेरे भाषण के बाद 30 साल का एक आदमी मुझसे अकेले में मिला। उसने कहा कि उसे भाषण तो बहुत बढ़िया लगा, परंतु उसने यह भी कहा, “पर मुझे नहीं लगता कि आपके विचारों से मुझे कोई फ़ायदा हो सकता है।”

        उसने बताया, “मुझे हृदयरोग है और मुझे खुद का ध्यान रखना पड़ता है। इसके बाद उसने मुझे यह भी बताया कि वह चार डॉक्टरों के पास जा चुका है, परंतु डॉक्टर उसके दिल में कोई बीमारी नहीं ढूंढ़ सके। उसने मुझसे पूछा कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए।


          मैंने जवाब दिया, “मैं हृदयरोग के बारे में तो ज्यादा नहीं जानता, परंतु एक आम आदमी के रूप में मैं आपको यह बता सकता हूँ कि इन परिस्थितियों में मैं क्या करता। पहली बात तो यह, कि मैं सबसे अच्छे हृदयरोग चिकित्सक के पास जाता और उसकी राय को अंतिम मान लेता। आपने पहले ही चार डॉक्टरों से चेकअप करवा लिया है और उन्हें आपके दिल में कोई खराबी नज़र नहीं आई। तो अब पाँचवें डॉक्टर का फैसला आपको मान लेना चाहिए। हो सकता है कि आपके हृदय में कोई रोग न । हो, और यह सिर्फ आपके मन का वहम हो। परंतु अगर आप इसकी चिंता करेंगे तो एक न एक दिन आपको सचमुच हृदयरोग हो जाएगा। अगर आप बीमारी के बारे में सोचते रहेंगे, उसे खोजते रहेंगे, उसकी चिंता करते। रहेंगे तो अक्सर आप इसी वजह से बीमार पड़ जाएँगे।


       मैं आपको दूसरी सलाह यह देना चाहता हूँ कि आप डॉक्टर शिंड्लर की महान पुस्तक हाऊ टु लिव 365 डेज़ ए इयर पढ़े। डॉ. शिंड्लर इस पुस्तक में बताते हैं कि अस्पताल में जो मरीज़ भर्ती होते हैं उनमें से तीन चौथाई लोगों को दरअसल कोई शारीरिक बीमारी होती ही नहीं है। उनकी बीमारी का असली कारण मानसिक या भावनात्मक होता है। ज़रा सोचिए, हमारे देश के तीन चौथाई लोग सिर्फ इसलिए अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुए हैं क्योंकि वे अपनी भावनाओं को क़ाबू में नहीं रख पाए। डॉ. शिंडूलर की पुस्तक पढ़े और इसके बाद ‘भावनाओं को मैनेज' करना सीखें।


           “तीसरी बात यह कि मैं तब तक ज़िंदादिल बने रहने का निश्चय करूंगा जब तक कि मैं मर ही न जाऊँ। फिर मैंने इस परेशान आदमी को वही सलाह दी, जो मेरे वकील दोस्त ने मुझे कई साल पहले दी थी। वकील दोस्त को टी.बी. था, परंतु इसके बाद भी वह वकालत करता रहा, अपने परिवार का मुखिया बना रहा, और जीवन का पूरा आनंद लेता रहा। अभी मेरे उस वकील दोस्त की उम्र 78 वर्ष है। उसने अपनी फिलॉसफी बताई : 'मैं तब तक जिंदादिल रहूँगा जब तक कि मैं मर न जाऊँ। मैं जिंदगी और मौत को लेकर फालतू चिंता नहीं करूंगा। जब तक मैं इस धरती पर हूँ तब तक मैं ज़िंदा हूँ। तो मैं अधूरी जिंदगी क्यों जिऊँ ? मौत के बारे में चिंता करने में व्यक्ति जितना समय बर्बाद करता है, उतने समय तक वह वास्तव में मुर्दा ही होता है।”


          मुझे इस बिंदु पर चर्चा ख़त्म करनी पड़ी, क्योंकि मुझे डेट्रॉयट जाने वाला हवाई जहाज़ पकड़ना था। हवाई जहाज़ में दूसरा अजीबोगरीब परंतु सुखद अनुभव हुआ। जब हवाई जहाज़ आसमान में पहुँच गया तो मझे टिक-टिक की आवाज़ सुनाई दी। हैरानी से मैंने अपने पड़ोस में बैठे आदमी की तरफ़ देखा, जिसके पास से वह आवाज़ आ रही थी।


       वह मेरी तरफ़ देखकर मुस्कराया और उसने मुझसे कहा, “डरिए नहीं, मेरे पास कोई बम नहीं है। यह तो मेरा दिल धड़क रहा है।"


   मुझे यह सुनकर हैरानी हुई, इसलिए उसने मुझे पूरी कहानी सुनाई।


      सिर्फ 21 दिन पहले ही उसका ऑपरेशन हुआ था, जिसमें उसके दिल में एक प्लास्टिक वॉल्व फ़िट किया गया था। उसने बताया कि टिकटिक की आवाज़ कई महीनों तक आती रहेगी, जब तक कि नकली वॉल्व पर नया ऊतक नहीं उग आता। मैंने उससे पूछा कि अब वह क्या करने वाला है।


     अरे,” उसने कहा, “मेरी बहुत सी योजनाएँ हैं। मिनेसोटा पहुँचकर में वकालत पढ़ने वाला हूँ। शायद मुझे किसी दिन सरकारी नौकरी भी मिल जाए। डॉक्टरों ने मुझसे कहा है कि मुझे पहले कुछ महीनों तक सावधानी रखनी पड़ेगी, परंतु कुछ महीनों के बाद मेरा दिल बिलकुल ब्रांड न्यू हो जाएगा।”


       तो ये रहे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बारे में दो अलग-अलग नज़रिए। पहला आदमी तो यह जानता भी नहीं था कि उसे कोई बीमारी थी भी या नहीं। इसके बावजूद, वह चिंतित था, परेशान था, हार के रास्ते पर जा रहा था और आगे नहीं बढ़ने के बहाने बना रहा था। दूसरे
आदमी का हाल ही में बहुत बड़ा ऑपरेशन हुआ था, फिर भी वह कुछ नया करने के लिए उत्सुक था, आशावादी था। अपनी सेहत के बारे में दोनों की सोच में कितना बड़ा फ़र्क था!


              सेहत के बहानासाइटिस का मुझे व्यक्तिगत अनुभव भी है। मुझे डायबिटीज़ है। जब मुझे यह बीमारी हुई (कोई 5000 इंजेक्शन पहले), तो डॉक्टर ने मुझे यह हिदायत दी थी, “डायबिटीज़ एक शारीरिक बीमारी है, परंतु अगर इसके बारे में आपका नज़रिया नकारात्मक रहेगा तो आपबहुत परेशान रहेंगे और आपकी बीमारी भी बढ़ सकती है। अगर आप इसके बारे में चिंता करते रहेंगे, तो आपकी जिंदगी नर्क बन सकती है।”


       डायबिटीज़ होने के बाद मैं बहुत से डायबिटीज़ के मरीज़ों के संपर्क में आया। मैं आपको बता दें कि इस बीमारी के बारे में लोगों के कितने विरोधाभासी विचार होते हैं। एक आदमी को यह बीमारी शुरुआती अवस्था में है और वह इसे लेकर बहुत परेशान रहता है। ज़रा सा मौसम बदलता है तो वह घबरा जाता है, मूर्खतापूर्ण रूप से अपने आपको लबादे में छुपा लेता है। उसे इनफेक्शन से इतना डर लगता है, कि वह सर्दी-खाँसी वाले आदमी को देखते ही दूर भाग जाता है। वह डरता है। कि कहीं वह ज्यादा मेहनत न कर ले, इसलिए वह कभी कुछ करता ही नहीं है। उसका ज्यादातर समय और मानसिक ऊर्जा इसी चिंता में बर्बाद होते हैं कि उसके साथ क्या-क्या बुरा हो सकता है। वह दूसरे लोगों को अपनी भयानक बीमारी की सच्ची-झूठी दास्तान सुना-सुनाकर बोर रहता है। दरअसल उसकी असली बीमारी डायबिटीज़ नहीं है। वह तो  सेहत के बहानासाइटिस से पीड़ित है। वह बीमारी को असफलता के बहाने की तरह इस्तेमाल कर रहा है। किसलिए? क्योंकि वह लोगों की सहानुभूति हासिल करना चाहता है।


        दूसरी तरफ़ एक बड़ी प्रकाशन फ़र्म का डिवीज़न मैनेजर है, जो डायबिटीज़ का गंभीर रोगी है। वह ऊपर वाले मरीज़ से 30 गुना ज्यादा इन्सुलिन लेता है। परंतु वह बीमारों की तरह नहीं जीता है। उसे अपने काम में मज़ा आता है और वह जिंदगी का पूरा आनंद लेता है। एक दिन उसने मुझसे कहा, "देखा जाए तो डायबिटीज़ एक समस्या तो है, पर दाढ़ी बनाना भी तो एक समस्या है। और मैं इस बारे में चिंता कर-कर के सचमुच बीमार नहीं पड़ना चाहता। जब मैं इन्सुलिन के इंजेक्शन लेता हूँ। तो मैं अपनी बीमारी को नहीं कोसता हैं, बल्कि उस आदमी को दुआएँ। देता हूँ जिसने इन्सुलिन की खोज की है।"


        मेरा एक बहुत अच्छा दोस्त 1945 में जब युद्ध से लौटा, तो उसका एक हाथ कटा हुआ था। इसके बावजूद जॉन हमेशा मुस्कराता रहता था, हमेशा दूसरों की मदद करता रहता था। मैं जितने भी आशावादी लोगों को जानता हूँ, जॉन उन सबसे ज्यादा आशावादी था। एक दिन मैंने उससे उसके कटे हुए हाथ के बारे में लंबी चर्चा की।


उसने कहा, “मेरा सिर्फ एक हाथ नहीं है। यह सही बात है, कि दो हाथ हमेशा एक हाथ से अच्छे होते हैं। परंतु पूरे शरीर को बचाने के लिए अगर एक हाथ काटना पड़े, तो यह महँगा सौदा नहीं है। और फिर, मेरी जीवनशक्ति तो अब भी 100 प्रतिशत बची हुई है। मैं इसके लिए कृतज्ञ हूँ।"


        मेरा एक और विकलांग दोस्त एक बेहतरीन गोल्फ़र है। एक दिन मैंने उससे पूछा कि वह सिर्फ एक हाथ से इतना अच्छा कैसे खेल सकता हैं, जबकि दोनों हाथों से खेलने वाले ज्यादातर गोल्फ़र उसके जितना अच्छा नहीं खेल पाते हैं। उसने मेरी बात का ज़ोरदार जवाब दिया, “यह मेरा अनुभव रहा है कि सही रवैया और एक बाँह वाला आदमी, गलत रवैए और दोनों बाँह वाले आदमी को हमेशा हरा सकता है।” सही रवैया और एक बाँह वाला आदमी, गलत रवैए और दोनों बाँह वाले आदमी को हमेशा हरा सकता है। इस बारे में कुछ देर सोचें। यह न सिर्फ गोल्फ़ के मैदान पर सच है, बल्कि यह जिंदगी के हर क्षेत्र में सच है।।

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Monday, July 1, 2019

CHAPTER 1.3 विश्वास करें कि आप       सफल हो सकते हैं और आप हो जाएँगे

    

        विश्वास की शक्ति को किस तरह विकसित करें

विश्वास की शक्ति को प्राप्त करने और विश्वास को दृढ़ बनाने के लिए तीन उपाय किए जा सकते हैं :

         1.   सफलता की बात सोचें, असफलता की बात न सोचें। नौकरी में, घर में, असफलता की जगह सफलता के बारे में सोचें। जब आपके सामने कोई कठिन परिस्थिति आए, तो सोचे "मैं जीत जाऊँगा, यह न सोचें "शायद मैं हार जाऊँगा।" जब आप किसी से प्रतियोगिता करें, तो सोचें, "मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ", यह न सोचें “मैं उसके जितना योग्य नहीं हूँ।” जब अवसर नज़र आए, तो सोचें “मैं यह कर सकता हूँ," यह न सोचे “मैं इसे नहीं कर सकता।" अपनी चिंतन प्रक्रिया पर इस विचार को हावी हो जाने दें, “मैं सफल होकर दिखाऊँगा।” सफलता के बारे में सोचने से आपका दिमाग़ ऐसी योजना बना लेता है जिससे आपको सफलता मिलती है। असफलता के बारे में सोचने से इसका ठीक उल्टा होता है असफलता के बारे में चिंतन करने से आपका दिमाग ऐसे विचार सोचता है, जिन से आपको असफलता हाथ लगती है।


           2. अपने आपको बार-बार याद दिलाएँ कि आप जितना समझते हैं, आप उससे कहीं बेहतर हैं। सफल लोग सुपरमैन नहीं होते। सफलता के लिए सुपर-इन्टेलेक्ट का होना ज़रूरी नहीं है। न ही सफलता के लिए किसी जादुई शक्ति या रहस्यमयी तत्व की आवश्यकता होती है। और सफलता का भाग्य से भी कोई संबंध नहीं होता। सफल लोग साधारण लोग ही होते हैं, पर ऐसे लोग होते हैं जिन्हें अपने आप पर विश्वास है, अपनी क्षमताओं पर विश्वास है और जो मानते हैं कि वे सफल हो सकते हैं। कभी भी, हाँ, कभी भी, खुद को सस्ते में न बेचें।

           3. बड़ी सोच में विश्वास करें। आपकी सफलता का आकार कितना बड़ा होगा, यह आपके विश्वास के आकार से तय होगा। अगर आपके लक्ष्य छोटे होंगे, तो आपकी उपलब्धियाँ भी छोटी होंगी। अगर आपके लक्ष्य बड़े होंगे, तो आपकी सफलता भी बड़ी होगी। एक बात कभी न भूलें! बड़े विचार और बड़ी योजनाएँ अक्सर छोटे विचारों और छोटी योजनाओं से आसान होते हैं। 

जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी के चेयरमैन राल्फ जे. कॉर्डिनर ने लीडरशिप कॉन्फ्रेंस में कहा था, "... जो भी लीडर बनना चाहता है, उसे स्वयं के और स्वयं की कंपनी के विकास की योजना बना लेनी चाहिए और इसका दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए। कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति के विकास का आदेश नहीं दे सकता ... कोई व्यक्ति दौड़ में आगे रहेगा या पीछे रह जाएगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी तैयारी कैसी है। यह ऐसी चीज़ है जिस में समय लगता है, मेहनत लगती है और इस में त्याग की आवश्यकता होती है। आपके लिए यह कोई दूसरा नहीं कर सकता।”


          मिस्टर कॉर्डिनर की सलाह में दम है और यह व्यावहारिक है। इस पर चलें। जो लोग बिज़नेस मैनेजमेंट, सेल्स लाइन, इंजीनियरिंग, धार्मिक संस्थाओं, लेखन, अभिनय और दूसरे क्षेत्रों में चोटी पर पहुँचते हैं वे निष्ठा और लगन के साथ आत्म-विकास की योजना पर चलकर ही वहाँ पहुँच पाए हैं।


किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम में - और यही इस पुस्तक का लक्ष्य भी है - तीन बातें होनी चाहिए। इसमें सामग्री होनी चाहिए - यानी क्या किया जाए। दूसरी बात यह कि इसमें तरीक़ा होना चाहिए - यानी कैसे किया जाए। और तीसरी बात यह कि इसे एसिड टेस्ट में खरा उतरना चाहिए - यानी कि इससे परिणाम मिलना चाहिए।


          क्या किया जाए, इस बारे में सफलता का आपका व्यक्तिगत प्रशिक्षण कार्यक्रम सफल लोगों के रवैए और तकनीकों के अध्ययन से संबंधित है। वे किस तरह स्वयं को सफल बनाते हैं ? वे किस तरह बाधाओं का सामना करते हैं और उन्हें पार करते हैं? वे किस तरह दूसरों का सम्मान प्राप्त करते हैं ? कौन सी चीज़ है जो उन्हें साधारण लोगों से अलग करती है ? सफल लोग किस तरह सोचते हैं ?


      आत्म-विकास कैसे किया जाए, वाला हिस्सा आपकी कार्ययोजना बनाएगा। यह हर अध्याय में मिलेगा। इससे काम को दिशा मिलती है। इस पर अमल करें और इसके परिणामों को स्वयं महसूस करें।


       और इस पुस्तक में इस प्रशिक्षण के सबसे महत्वपूर्ण भाग यानी कि परिणामों पर भी ध्यान दिया गया है। यहाँ पर जो कार्यक्रम दिया जा रहा है, अगर आप उसे अमल में लाते हैं तो आपको ऐसी सफलता मिलेगी और इतने बड़े पैमाने पर मिलेगी जिसकी आपने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी। सफलता के आपके व्यक्तिगत प्रशिक्षण कार्यक्रम में आपको कई लाभ होंगे- आपका परिवार आपका ज्यादा सम्मान करने लगेगा, आपके मित्र और आपके सहयोगी आपकी प्रशंसा करने लगेंगे, आप अधिक उपयोगी होंगे, आपके पास प्रतिष्ठा होगी, लोकप्रियता होगी, ज्यादा तनख़्वाह होगी और आप बेहतर जीवनशैली का आनंद ले पाएँगे।


            अपने को सिखाने का ज़िम्मा आप ही का है। कोई दूसरा व्यक्ति आपके सिर पर खड़ा रहकर आपको यह नहीं बताएगा कि आपको क्या करना है और कैसे करना है। यह पुस्तक आपको रास्ता दिखाएगी, परंतु आप और केवल आप ही स्वयं को समझ सकते हैं। केवल आप ही स्वयं को यह आदेश दे सकते हैं कि आप इस पुस्तक में दिए गए सिद्धांतों पर चलेंगे। केवल आप ही अपनी प्रगति का मूल्यांकन कर सकते हैं। जब आप अपने रास्ते से थोड़ा सा भटक जाएँ, तो केवल आप ही अपनी ग़लती सुधारकर सही रास्ते पर आ सकते हैं। सौ बात की एक बात, आपको ही स्वयं को इस योग्य बनाना है कि आप बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त कर सकें।


          आपके पास पहले से ही एक ऐसी प्रयोगशाला है जिसमें आप काम करते हैं और अध्ययन करते हैं। आपकी प्रयोगशाला आपके आस-पास ही है। आपकी प्रयोगशाला में इंसान रहते हैं। इस प्रयोगशाला में मानवीय कार्यों के हर तरह के उदाहरण हैं। अगर आप अपनी इस प्रयोगशाला में स्वयं को वैज्ञानिक समझ लें तो आप बहुत कुछ सीख सकते हैं। और इससे भी बड़ी बात यह कि यहाँ आपको कुछ ख़रीदना नहीं पड़ता। इसका कोई किराया नहीं देना पड़ता। यहाँ किसी तरह की फ़ीस नहीं लगती। आप इस प्रयोगशाला का उपयोग मुफ्त में कर सकते हैं।


          अपनी प्रयोगशाला के डायरेक्टर के रूप में, आपको वही करना होगा जो हर वैज्ञानिक करता है- आपको अवलोकन और प्रयोग करना होगा।


          क्या आपको इस बात से हैरानी नहीं होती कि हमारे चारों तरफ़ जिंदगी भर इतने सारे लोग रहते हैं, फिर भी ज्यादातर लोग यह नहीं जान पाते कि इंसान के व्यवहार के पीछे क्या कारण होते हैं ? ज्यादातर लोग यह जानते ही नहीं कि अवलोकन कैसे किया जाता है। इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य आपको यह सिखाना भी है कि आप अवलोकन कैसे करें, इंसान के कामों के पीछे छुपे कारणों को किस तरह समझें। आप स्वयं से यह सवाल पूछ सकते हैं, “ऐसा क्यों है कि जॉन इतना सफल है, जबकि टॉम सिर्फ दिन काट रहा है ?” “कुछ लोगों के इतने सारे दोस्त क्यों होते हैं, जबकि कई लोगों के बहुत कम दोस्त क्यों होते हैं ?” “लोग एक व्यक्ति की कही बातों पर विश्वास क्यों कर लेते हैं, जबकि वे किसी दूसरे व्यक्ति की कही हुई उसी बात पर विश्वास क्यों नहीं   करते ?”


       एक बार आप प्रशिक्षित हो जाएँ, तो आपको केवल अवलोकन करने की आसान प्रक्रिया से ही बहुमूल्य सबक़ सीखने को मिलेंगे।


       यहाँ दो विशेष सुझाव दिए गए हैं, जिनके माध्यम से आप अवलोकन की कला सीख सकते हैं। आप अपने आस-पास के दो सबसे सफल और सबसे असफल लोगों को अध्ययन के लिए चुनें। फिर, जैसे-जैसे आप यह पुस्तक पढ़ते जाएँ, यह देखें कि आपका सफल मित्र किस तरह सफलता के इन सिद्धांतों पर चलता है। यह भी देखें कि इस तरह के दोनों लोगों के अध्ययन से आप स्वयं इस पुस्तक में दिए गए सिद्धांतों की सच्चाई को परख सकेंगे।


       दूसरे व्यक्ति के साथ किसी भी तरह के संपर्क में आपको सफलता के सिद्धांत आज़माने का मौक़ा मिलता है। आपका लक्ष्य यह होना चाहिए कि आप सफलता की कार्ययोजना बनाने की आदत डाल लें। हम जितना ज़्यादा अभ्यास करेंगे, हम उतनी ही जल्दी सफल होंगे।



       हममें से ज्यादातर लोगों के ऐसे दोस्त होते हैं जिन्हें गार्डनिंग का शौक होता है। और हम सब ने इस तरह की बातें सुनी हैं, “पौधों को बढ़ते हुए। देखना कितना रोमांचक होता है। किस तरह खाद-पानी से वे तेज़ी से बढ़ते। हैं। पिछले सप्ताह वे जितने बड़े थे, आज वे उस से कितने ज्यादा बड़े हो गए हैं।”



        निश्चित रूप से, जब आदमी सावधानी से प्रकृति के साथ समन्वय कर लेता है तो इसके परिणाम रोमांचक होते हैं। परंतु अगर आप सावधानी से विचार-मैनेजमेंट कार्यक्रम पर चलेंगे, तो इसके परिणाम उससे दस गुना अधिक रोमांचक होंगे। यह देखना सुखद होगा कि आप हर महीने, हर दिन ज्यादा आत्मविश्वासी, ज़्यादा प्रभावशाली, ज्यादा सफल बनते जाएँ। जीवन में कोई दूसरी चीज़ आपको इतनी संतुष्टि नहीं दे सकती, जितना यह जानना कि आप सफलता और उपलब्धि की सही राह पर चल रहे हैं। और इस राह पर चलने के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आप अपनी क्षमताओं का अधिकतम लाभ उठाएँ।

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Sunday, June 23, 2019

CHAPTER 1.2    विश्वास करें कि आप       सफल हो सकते हैं और आप हो जाएँगे

       कुछ ही समय बाद हम एक रेस्तराँ में बैठे हुए थे।

     मेरा एक व्यक्तिगत अनुभव है,” उसने शुरू किया, “जो आपकी इस शाम की चर्चा से संबंधित था, जिसमें आपने कहा था कि आप किस तरह अपने दिमाग को अपना सहयोगी बनाएँ, न कि अपना विरोधी  मैंने आज तक यह किसी को नहीं बताया है कि मैंने किस तरह अपने आपको औसत लोगों की दुनिया से ऊपर उठाया है, परंतु मैं आपको यह बताना चाहता हूँ।”

          "और मैं यह सुनना चाहूँगा,” मैंने कहा।

      " आज से पाँच साल पहले मैं भी औरों की ही तरह था- मेरी जिंदगी घिसट भर रही थी। मेरी कमाई औसत थी। परंतु यह आदर्श नहीं थी। हमारा घर बहुत छोटा था और हमारे पास अपनी मनचाही चीज़ों को खरीदने के लिए पैसे नहीं रहते थे। मेरी पत्नी, भगवान उसका भला करे, इस बात की शिकायत नहीं करती थी, परंतु उसके चेहरे पर यह साफ़ लिखा हुआ था कि उसने भाग्य के सामने हार मान ली है और वह सचमुच खुश नहीं है। अपने अंदर मैं बहुत असंतुष्ट महसूस कर रहा था। जब मैंने देखा कि मैं किस तरह अपनी अच्छी पत्नी और दो बच्चों को आदर्श जीवनशैली नहीं दे पा रहा हूँ, तो मुझे अंदर से बहुत चोट पहुँची।"

     "परंतु आज सब कुछ बदल गया है," मेरे दोस्त ने कहा। आज हम दो एकड़ के प्लॉट पर बने अपने सुंदर नए घर में रहते हैं, जो यह से दो सौ मील दूर है। आज हमें इस बात की चिंता नहीं है कि हम अपने बच्चों को अच्छे कॉलेज में भेज पाएँगे या नहीं। आज मेरी पत्नी जब ना कपड़े खरीदती है तो उसे यह नहीं लगता, जैसे उसने कोई गनाहरू दिया है। अगली गर्मियों में हम लोग एक महीने की छुट्टियाँ मनाने यो जा रहे हैं। हम सचमुच जिंदगी का आनंद ले रहे हैं।”

             "ऐसा कैसे हुआ?” मैंने पूछा।

          उसका जवाब था, “आपने आज रात एक बात कही थी, अपने विश्वास की शक्ति का दोहन करें।' मैंने वही किया और परिणाम आपके सामने है। पाँच साल पहले मैंने डेट्रॉइट की एक टूल-एंड डाई कंपनी के बारे में सुना। हम उस वक्त क्लीवलैंड में रह रहे थे। मैंने फैसला किया कि कोशिश करने में हर्ज़ ही क्या है, शायद यहाँ थोड़ी ज्यादा तनख्वाह मिल जाए। मैं यहाँ रविवार की शाम को ही आ गया, जबकि इंटरव्यू सोमवार को था।

        “डिनर के बाद मैं अपने होटल के कमरे में बैठा हुआ था और न जाने क्यों, मैं खुद को कोसने लगा, ‘आखिर क्यों,' मैंने खुद से पूछा, ‘आख़िर क्यों, मैं एक असफल आदमी की तरह मिडिल क्लास के दलदल में फंसा हुआ हैं ? आखिर क्यों थोड़ी ज्यादा तनख्वाह के लिए मैं यह नौकरी हासिल करने की कोशिश कर रहा हूँ ?'

     "मैं आज तक यह नहीं जान पाया कि मैंने ऐसा क्यों किया, परंतु इसके बाद मैंने होटल का नोटपैड लिया। नोटपैड में मैंने अपने से ज्यादा सफल पाँच लोगों के नाम लिखे, जिन्हें मैं वर्षों से जानता था और जिनकी आमदनी और नौकरी मुझसे काफ़ी बेहतर थीं। दो तो मेरे पुराने पड़ोसी थे जो अब एक पॉश कॉलोनी में रहते थे। दो लोगों के लिए मैं पहले काम किया करता था और एक मेरा रिश्तेदार था।

     “इसके बाद मैंने खुद से पूछा कि मेरे इन पाँच दोस्तों में ऐसा क्या था जो मुझमें नहीं था। मैंने अपनी और उनकी बुद्धि की तुलना की और ईमानदारी से विश्लेषण करने पर यह पाया कि जहाँ तक बुद्धि का सवाल था, वे मुझसे बेहतर नहीं थे। न ही वे मुझसे शिक्षा, चरित्र या व्यक्तिगत आदतों में बेहतर थे।

      " आख़िरकार मैं सफलता के एक ऐसे गुण पर आया, जिसके बारे में काफ़ी चर्चा होती है। पहल करना। मुझे यह मानने में काफ़ी दिक्क़त हुई, पर इसे मानने के सिवा कोई चारा नहीं था। इस मामले में मेरा रिकॉर्ड उनकी तुलना में काफ़ी नीचे था।

       “यह सब सोचते-सोचते सुबह के 4 बज गए, परंतु मेरा दिमाग बिलकुल स्पष्ट सोच रहा था। जीवन में पहली बार मैं अपनी कमज़ोरी को देख पाया था। मैंने पाया कि इसी चीज़ के कारण मैं जीवन में इतना पीछे रह गया था। मैंने हमेशा सहारे के लिए अपने साथ एक छोटी छड़ी रखी थी। मैं अपने अंदर जितनी गहराई तक गया, मैंने पाया कि मैं इसलिए पहल नहीं करता था, क्योंकि मुझे अंदर से यह विश्वास नहीं था कि मैं ऐसा कर सकता था, कि मैं सचमुच इस क़ाबिल हूँ।

         “पूरी रात मैं यही सोचता रहा कि आत्मविश्वास की कमी के कारण ही मैंने अपने मस्तिष्क को अपना विरोधी बना लिया था। मैंने पाया कि मैं खुद को यही बताता था कि मैं आगे क्यों नहीं बढ़ सकता, जबकि मुझे खुद को यह बताना चाहिए था कि मुझे आगे क्यों बढ़ना चाहिए। मैं अपने आपको सस्ते में बेच रहा था। अपनी नज़रों में गिरा होने के कारण ही मैं लोगों की नज़रों में भी गिरा हुआ था। यह मेरी हर बात में स्पष्ट रूप से दिख रहा था। तभी मुझे यह समझ में आया कि जब तक मैं खुद में विश्वास नहीं करूंगा, तब तक कोई दूसरा भी मुझ पर विश्वास नहीं करेगा।

      “उसी समय मैंने फैसला किया, ‘अब सेकंड क्लास की जिंदगी खत्म। आगे से मैं खुद को सस्ते में नहीं बेचूंगा।'

        “अगली सुबह भी मुझ में वही आत्मविश्वास था। नौकरी के उस इंटरव्यू में मेरे विश्वास का पहला इम्तहान हुआ। इंटरव्यू के लिए अपने घर से चलते समय मैंने सोचा था कि मैं हिम्मत करके अपनी वर्तमान नौकरी से 750 या 1000 डॉलर ज्यादा माँग लँगा। परंतु अब, जब मैं जान गया था कि मैं एक योग्य आदमी था, मैंने 3500 डॉलर ज्यादा माँगे। और यह मुझे मिले भी। मैं खुद को महंगे दाम में इसलिए वेच पाया. क्योंकि एक रात तक चले लंबे आत्म-विश्लेषण के बाद में यह जान गया। था कि मुझ में ऐसे गुण हैं जिन्हें महंगे दामों पर बेचा जा सकता है।

       "दो साल में ही मैंने अपनी प्रतिष्ठा एक सफल बिज़नेसमैन के रूप में बना ली। सभी जान गए कि यह आदमी बिज़नेस ला सकता है। फिर मंदी का दौर आया। इस दौर में मैं और भी ज्यादा मूल्यवान बन गया। क्योंकि मुझ में अपनी इंडस्ट्री में सबसे अच्छा बिज़नेस हासिल करने की काबिलियत थी। कंपनी का पुनर्गठन हुआ और मुझे बहुत ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी और इसके अलावा मुझे कंपनी के काफ़ी सारे शेयर भी मिले।”

      अपने आपमें विश्वास करें और आपके साथ अच्छी घटनाएँ होने लगेंगी।

आपका दिमाग “विचारों की फैक्टरी" है। यह एक व्यस्त फैक्टरी है, जो एक दिन में अनगिनत विचारों का उत्पादन करती है।

           आपके विचारों की इस फैक्टरी में उत्पादन के इन्चार्ज दो फ़ोरमैन हैं, जिनमें से एक को हम मिस्टर विजय और दूसरे को मिस्टर पराजय का नाम देंगे। मिस्टर विजय सकारात्मक विचारों के निर्माण के इन्चार्ज हैं। उनकी विशेषज्ञता इस तरह के कारण देने में है कि आप क्यों सफल हो सकते हैं, आपमें इस काम की काबिलियत क्यों है, और आप इसमें क्यों सफल होंगे।

         दूसरा फ़ोरमैन मिस्टर पराजय नकारात्मक, कमतरी के विचारों को उत्पादन करता है। यह फ़ोरमैन इस तरह के कारण ढूँढने में महारत रखता है कि आप कोई काम क्यों नहीं कर सकते, कि आप क्यों कमज़ोर हैं, कि आप क्यों अक्षम हैं। उसकी विशेषज्ञता इस तरह के
विचारों की श्रृंखला ढूँढ़ने में है कि “आप क्यों असफल हो जाएँगे ?”

          मिस्टर विजय और मिस्टर पराजय दोनों ही बेहद आज्ञाकारी होते हैं। वे तत्काल आपकी बात पर ध्यान देते हैं। आपको दोनों में से किसी भी फ़ोरमैन को मानसिक रूप से संकेत भर देना होता है। अगर संकेत सकारात्मक होता है तो मिस्टर विजय आगे आ जाएँगे और काम में जुट जाएँगे। इसी तरह नकारात्मक संकेत देखते ही मिस्टर पराजय सक्रिय हो जाएँगे।

        दोनों फ़ोरमैन आपके लिए किस तरह काम करते हैं, इसे स्वयंआज़माकर देखें। अपने आपसे कहें, “आज तो बड़ा ही बुरा दिन है।”इससे मिस्टर पराजय हरकत में आ जाएँगे और वे आपको सही साबित करने के लिए कुछ तथ्यों का उत्पादन कर देंगे। वे आपको यह सुझाव देंगे कि मौसम ज्यादा गर्म या ज्यादा ठंडा है, आज बिज़नेस बुरा रहेगा,बिक्री कम होगी, दूसरे लोग चिड़चिड़े रहेंगे, आप बीमार पड़ सकते हैं, आपकी पत्नी आज बात का बतंगड़ बना देगी। मिस्टर पराजय बेहद सक्षम होते हैं। वे कुछ ही मिनटों में आपको पूरी तरह विश्वास दिला देते हैं कि आज का दिन सचमुच बहुत बुरा है। और आपका दिन सचमुच बुरा साबित होता है।

          परंतु अपने आपसे कहें, “आज कितना बढ़िया दिन है।" और तत्काल मिस्टर विजय सक्रिय हो जाते हैं। वे आपको बताते हैं, “आज शानदार दिन है। खुशगवार मौसम है। कितना सुखद जीवन है। आज आप जो भी काम करेंगे बढ़िया करेंगे और आप उसमें निश्चित रूप से
सफल होंगे।” और आपका वह दिन सचमुच बहुत अच्छा गुज़रता है।

       इसी तरह से मिस्टर पराजय आपको यह बताते हैं कि आप मिस्टरस्मिथ को माल क्यों नहीं बेच सकते, जबकि मिस्टर विजय आपको बताते हैं कि आप मिस्टर स्मिथ को माल किस तरह बेच सकते हैं। मिस्टर पराजय आपको यह विश्वास दिलाते हैं कि आप असफल हो जाएँगे, जबकि मिस्टर विजय आपको यह विश्वास दिलाते हैं कि आप क्यों सफल होंगे। मिस्टर पराजय टॉम को नापसंद करने के कई कारण गिना देंगे, जबकि मिस्टर विजय टॉम को पसंद करने के कई कारण गिना देंगे।

         आप इन दोनों फ़ोरमैनों में से जिसे ज़्यादा काम देंगे, वह उतना ही ताक़तवर बनता जाएगा। अगर मिस्टर पराजय को ज्यादा काम दिया जाएगा तो वह अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ा लेगा और आपके दिमाग़ की ज्यादा जगह पर क़ब्ज़ा कर लेगा। एक दिन ऐसा आएगा जब वह आपके दिमाग के विचारों का पूरा उत्पादन अपने हाथ में ले लेगा और इसके बाद आपकी मानसिकता पूरी तरह नकारात्मक हो जाएगी।

       समझदारी इसी में है कि आप मिस्टर पराजय को तत्काल नौकरी से निकाल दें। आपको उनकी ज़रूरत नहीं है। आपको उनकी इस सलाह की ज़रूरत नहीं है कि आप कोई काम क्यों नहीं कर सकते, कि आप क्यों अक्षम हैं, और आप क्यों असफल होंगे इत्यादि। जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं, वहाँ तक आपको पहुँचाने में मिस्टर पराजय आपकी कोई मदद नहीं कर सकते, इसलिए मिस्टर पराजय को आप धक्के मारकर अपने दिमाग की फैक्टरी से बाहर निकाल दें।

       पूरे समय मिस्टर विजय से ही काम लें। जब भी आपके दिमाग में कोई विचार आए तो मिस्टर विजय को ही वह काम सौंपे। वह आपको बताएँगे कि आप किस तरह सफल हो सकते हैं।

       अगले चौबीस घंटों में अमेरिका में 11,500 नए ग्राहक आ जाएँगे।

          जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। अगले दस सालों में 3.5 करोड़ लोगों की वृद्धि का अनुमान है। इसका मतलब है पाँच बड़े शहरों की वर्तमान जनसंख्या : न्यूयॉर्क, शिकागो, लॉस एंजेलिस, डेट्रॉइट और फिलाडेल्फिया कल्पना करें!

         नए उद्योग, नए वैज्ञानिक आविष्कार, बढ़ते हुए बाज़ार- हर तरफ़ अवसर ही अवसर हैं। यह अच्छी खबर है। जिंदा रहने के लिए यह
अद्भुत समय है।

          हर क्षेत्र में ऐसे अवसर विखरे हैं जहाँ चोटी के लोगों की रिकॉर्ड माँग है- उन लोगों की जिनमें दूसरों को प्रभावित करने की अधिकतम योग्यता है, जो दूसरों का मार्गदर्शन कर सकते हैं, जो उनके लीडर बनकर उनकी सेवा कर सकते हैं। और जो लोग ऐसे लीडर बनेंगे, वे सभी आज वयस्क हैं या वयस्क बनने वाले हैं। उनमें से एक आप भी हो सकते हैं।

आर्थिक व्यवस्था में उछाल का यह मतलब नहीं है कि आप व्यक्तिगत रूप से सफल हो ही जाएँगे। देखा जाए तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उछाल हमेशा ही रहा है। परंतु इसके बाद भी लाखों-करोड़ों लोग संघर्ष ही करते रहते हैं और सफल नहीं हो पाते। ज्यादातर लोग औसत जिंदगी के दलदल में ही फंसे रहते हैं और पिछले दो दशकों से लगातार चल रहे रिकॉर्ड अवसर का लाभ नहीं उठा पाते। और आगे आने वाले अच्छे समय में भी ज्यादातर लोग चिंता ही करते रहेंगे, डरते ही रहेंगे, जिंदगी भर खुद को अयोग्य मानते हुए घिसटते ही रहेंगे, और वह काम नहीं कर पाएँगे जो वे करना चाहते हैं। इसका परिणाम यह होगा कि उन्हें उनके काम के बदले में कम तनख्वाह ही मिलेगी, उनकी खुशी छोटी खुशी ही होगी।

         जो लोग अवसर का भरपूर लाभ उठाते हैं (और यहाँ मैं यह कहना चाहता हूँ कि आप भी उन लोगों में से एक हो सकते हैं, क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो आप इस पुस्तक को पढ़ने के बजाय क़िस्मत के भरोसे ही वैठे होते), वे ऐसे समझदार लोग होंगे जो यह सीख लेंगे कि बड़ी सोच के सहारे खुद को सफलता के रास्ते पर किस तरह ले जाया जा सकता है।

          अंदर चले जाएँ। सफलता का दरवाज़ा आज पहले की तुलना में ज्यादा खुला हुआ है। यह ठान लें कि आप भी सफल लोगों के समूह में शामिल होना चाहते हैं, आप भी अपनी मनचाही चीज़ हासिल करना चाहते है।

        सफलता की तरफ़ यह आपका पहला कदम होगा। यह एक मूलभूत क़दम है। इस क़दम को उठाए बिना काम नहीं चलेगा। क़दम एक- खुद में विश्वास करें, विश्वास करें कि आप सफल हो सकते हैं।

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Thursday, June 13, 2019

CHAPTER 1.1: विश्वास करें कि आप सफल हो सकते हैं और आप हो जाएँगे


                   विश्वास करें कि आप
      सफल हो सकते हैं और आप हो जाएँगे

सफलता यानी बहुत सी अद्भुत और अच्छी चीजें। सफलता का मतलब है अमीरी- शानदार घर, मज़ेदार छुट्टियाँ, यात्रा, नई चीजें, आर्थिक सुरक्षा, अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा खुशहाली देना । सफलता का मतलब है प्रशंसा का पात्र बनना, लीडर बनना, अपने बिज़नेस और सामाजिक जीवन में सम्मान पाना।स सफलताका मतलब है। आज़ादी- चिंताओं, डर, कुंठाओं और असफलता से आज़ादी। सफलता का मतलब है आत्म-सम्मान, जिंदगी का असली सुख और जीवन में संतुष्टि, जो लोग आप पर निर्भर हैं उनके लिए अधिक से अधिक करनेकी  क्षमता।

सफलता का मतलब है जीतना।

सफलता - उपलब्धि - मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है!

    हर इंसान सफलता चाहता है। हर इंसान चाहता है कि उसे जिंदगी का हर सुख मिले। कोई भी घिसट-घिसटकर औसत ज़िंदगी नहीं जीना चाहता। कोई भी सेकंड क्लास नहीं दिखना चाहता या इस तरह का जीवन नहीं गुज़ारना चाहता।

सफल जीवन का व्यावहारिक रास्ता हमें बाइबल की उस पंक्ति में दिखाया गया है जिसके अनुसार आस्था से पहाड़ हिलाए जा सकते हैं।

          विश्वास करें, सचमुच विश्वास करें कि आप पहाड़ हिला सकते हैं और आप वाक़ई ऐसा कर सकते हैं। अधिकतर लोगों को यह विश्वास ही नहीं होता कि उनमें पहाड़ हिलाने की क्षमता है। इसका परिणाम यह होता है कि वे ऐसा कभी नहीं कर पाते।

        किसी मौके पर आपने शायद किसी को यह कहते सुना होगा, “यह सोचना बकवास है कि आप किसी पहाड़ को यह कहकर हिला सकते हैं,‘पहाड़, मेरे रास्ते से हट जाओ।' यह असंभव है।"

           जो लोग इस तरह से सोचते हैं उन्होंने आस्था और इच्छा के बीच के अंतर को ठीक से नहीं समझा है। यह सच है कि केवल इच्छा करने भर से आप पहाड़ को नहीं हटा सकते। केवल इच्छा करने भर से आप एक्ज़ीक्यूटिव नहीं बन जाते। केवल इच्छा करने भर से आप पाँच बेडरूम और तीन बाथ वाले घर के मालिक नहीं बन जाते या आप अमीर नहीं बन जाते। केवल इच्छा करने भर से आप लीडर नहीं बन जाते।

     परंतु अगर आपमें विश्वास हो, तो आप पहाड़ को हिला सकते हैं। अगर आपको अपनी सफलता का विश्वास हो, तो इस विश्वास के सहारे आप सफलता हासिल कर सकते हैं।

       विश्वास की शक्ति के बारे में कुछ भी जादुई या रहस्यमय नहीं है।

       विश्वास इस तरह काम करता है। “मुझे विश्वास है कि मैं यह कर सकता हूँ” वाला रवैया हमें वह शक्ति, योग्यता और ऊर्जा देता है जिसके सहारे हम वह काम कर पाते हैं। जब आपको यक़ीन होता है कि आप कोई काम कर सकते हैं, तो आपको अपने आप पता चल जाता है कि इसे कैसे किया जा सकता है।

         हर दिन देश भर में युवा लोग नई नौकरियाँ शुरू कर रहे हैं। ये सभी युवक-युवतियाँ “चाहते हैं कि किसी दिन वे सफलता की चोटी पर पहुँचे और सफल बनें। परंतु इनमें से ज्यादातर लोगों को यह विश्वास नहीं है कि वे कभी चोटी पर पहुँच पाएँगे। और इसी कारण वे चोटी पर
नहीं पहुँच पाते। अगर आप यह मान लेते हैं कि चोटी पर पहुँचना असंभव है, तो आप उन सीढ़ियों को नहीं ढूंढ पाएँगे जिनके सहारे आप चोटी पर पहुँच सकते हैं। ऐसे लोग जिंदगी भर “औसत व्यक्तियों की तरह ही व्यवहार करते हैं।

     परंतु इनमें से कुछ युवक-युवतियों को विश्वास होगा कि वे सफल हो सकते हैं। वे अपने काम के प्रति “मैं चोटी पर पहुँचकर दिखाऊँगा” वाला रवैया रखते हैं। और चूंकि उनमें ज़बर्दस्त विश्वास होता है इसलिए वे चोटी पर पहुँच जाते हैं। यह जानते हुए कि वे भी सफल हो सकते हैं - और ऐसा असंभव नहीं है - यह लोग अपने वरिष्ठ एक्ज़ीक्यूटिज़ के व्यवहार को ध्यान से देखते हैं। वे सीखते हैं कि सफल लोग किस तरह समस्याओं को सुलझाते हैं और निर्णय लेते हैं। वे सफल लोगों के रवैए को ध्यान से देखते हैं।

      जिस आदमी को विश्वास होता है कि वह काम कर लेगा, उसे हमेशा उस काम को करने का तरीक़ा सूझ जाता है।

           मेरी एक परिचित महिला ने दो साल पहले यह फैसला किया कि वह मोबाइल होम बेचने की सेल्स एजेंसी बनाएगी। उसे कई लोगों ने सलाह दी कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह ऐसा नहीं कर पाएगी।

    उस महिला के पास पूँजी के नाम पर सिर्फ 3000 डॉलर थे और उसे बताया गया कि इस काम को शुरू करने के लिए इससे कई गुना ज़्यादा पूँजी की ज़रूरत होती है।

      उसे समझाया गया, “इसमें प्रतियोगिता बहुत है। और इसके अलावा, आपको मोबाइल होम्स बेचने का कोई अनुभव भी नहीं है। आपको बिज़नेस चलाने का अनुभव भी नहीं है।”

     परंतु इस युवा महिला को अपनी क्षमताओं पर विश्वास था। उसे विश्वास था कि वह सफल होगी। वह मानती थी कि उसके पास पूँजी नहीं थी, कि बिज़नेस में सचमुच बहुत प्रतियोगिता थी, और यह कि उसके पास अनुभव नहीं था।

         “परंतु,” उसने कहा, “मुझे यह साफ़ दिख रहा है कि मोबाइल होम उद्योग तेज़ी से फैलने जा रहा है। इसके अलावा, मैंने अपने इस बिज़नेस में प्रतियोगिता का अध्ययन कर लिया है। मैं जानती हूँ कि मैं इस बिज़नेस को इस शहर में सबसे अच्छे तरीके से कर सकती हूँ। मैं जानती हैं कि मुझसे थोड़ी-बहुत गलतियाँ तो होंगी, परंतु मैं चोटी पर तेज़ी से पहुँचना चाहती हूँ।"

        और वह पहुँच गई। उसे पूँजी जुटाने में कोई खास समस्या नहीं आई। इस बिज़नेस में सफलता के उसके दृढ़ विश्वास को देखकर दो निवेशकों ने उसके व्यवसाय में निवेश करने का जोखिम लिया। और संपूर्ण आस्था के सहारे उसने ‘असंभव' को कर दिखाया- उसने बिना
पैसा दिए एक ट्रेलर निर्माता से माल एडवांस ले लिया।

       पिछले साल उसने 1,000,000 डॉलर से ज्यादा क़ीमत के ट्रेलरबे 

       “अगले साल," उसका कहना है, “मुझे उम्मीद है कि मैं 2,०००,००० डॉलर का आँकड़ा पार कर जाऊँगी।”

       विश्वास, दृढ़ विश्वास, मस्तिष्क को प्रेरित करता है कि वह लक्ष्य को प्राप्त करने के तरीके, साधन और उपाय खोजे। और अगर आप यक़ीन कर लें कि आप सफल हो सकते हैं, तो इससे दूसरे भी आप पर विश्वास करने लगते हैं।

ज्यादातर लोग विश्वास की शक्ति में भरोसा नहीं करते। परंतु कई  लोग करते हैं, जैसे अमेरिका के सक्सेसफुल विले में रहने वाले नागरिक। कुछ सप्ताह पहले मेरे एक दोस्त ने जो स्टेट हाइवे डिपार्टमेंट में अधिकारी है मुझे एक “पहाड़ हिलाने वाला अनुभव बताया।

पिछले महीने," मेरे दोस्त ने बताया, “हमारे विभाग ने कई इंजीनियरिंग कंपनियों को टेंडर नोटिस दिए। हमें अपने हाइवे बनाने के लिए किसी फ़र्म से आठ पुलों की डिज़ाइन बनवानी थी। पुलों की लागत 5,000,000 डॉलर थी। जिस भी इंजीनियरिंग फ़र्म को चुना जाता, उसे डिज़ाइनिंग के काम के लिए 4 प्रतिशत का कमीशन दिया जाना प्रस्तावित था, यानी 200,000 डॉलर।

          “मैंने इस बारे में 21 डिज़ाइनिंग फ़र्स से बात की। सबसे बड़ी चार फ़र्मों ने तो तत्काल प्रस्ताव भेज दिए। बाक़ी 17 कंपनियाँ छोटी थीं, जिनमें केवल 3 से 7 इंजीनियर ही थे। प्रोजेक्ट इतना बड़ा था कि इनमें से 16 तो इसके बड़े आकार को देखकर ही घबरा गईं। उन्होंने इतने बड़े प्रोजेक्ट को देखा, अपने सिर को हिलाया और इस तरह की बात कही,

‘यह हमारे लिए बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है। काश हम इसे कर पाते, परंतु कोशिश करने से कोई फायदा नहीं।'

        “परंतु इनमें से एक छोटी फर्म ने, जिसके पास केवल तीन इंजीनियर थे, प्रोजेक्ट का अध्ययन किया और कहा, 'हम इसे कर सकते हैं। हम एक प्रस्ताव तो भिजवा ही देते हैं।' उन्होंने प्रस्ताव भिजवाया, और उन्हें वह काम मिल गया।”

     जिन्हें यक़ीन होता है कि वे पहाड़ हिला सकते हैं, वे ऐसा कर पाते हैं। जिन्हें यकीन होता है कि वे पहाड़ नहीं हिला सकते, वे ऐसा नहीं कर पाते। विश्वास से ही ऐसा करने की शक्ति मिलती है। 

          दरअसल, आज के आधुनिक दौर में विश्वास के दम पर पहाड़ हिलाने से भी ज्यादा बड़ी चीजें करना संभव है। आज के अंतरिक्ष अन्वेषण कार्यक्रम का सबसे मूलभूत तत्व यह है कि अंतरिक्ष को जीता जा सकता है। मनुष्य अंतरिक्ष में यात्रा कर सकता है, इस दृढ़ विश्वास के बिना हमारे वैज्ञानिकों में वह साहस, उत्साह, और रुचि पैदा नहीं हो पाती जिससे उन्हें आगे बढ़ने का हौसला मिलता। यह विश्वास कि कैंसर का इलाज किया जा सकता है, हमें इस बात के लिए प्रेरित करता है कि हम इसके उपचार को खोजें और अंततः ऐसा उपचार हम खोज ही लेंगे। अभी यह चर्चा चल रही है कि इंग्लिश चैनल के नीचे एक टनल बनाई जाए और इंग्लैंड को महाद्वीप से जोड़ दिया जाए। यह टनल बन पाएगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसे बनाने वाले लोगों के पास ऐसा कर पाने का विश्वास है या नहीं।

         प्रबल विश्वास ही वह शक्ति है जो महान पुस्तकों, नाटकों, वैज्ञानिक खोजों के पीछे होती है। सफलता में विश्वास ही हर सफल बिज़नेस, चर्च और राजनीतिक संगठन के पीछे होता है। सफलता में विश्वास ही वह मूलभूत, अनिवार्य तत्व है जो हर सफल व्यक्ति में पाया जाता है।

      विश्वास करें, सचमुच विश्वास करें, कि आप सफल हो सकते हैं। और आप हो जाएँगे।

बरसों तक मैंने ऐसे कई लोगों से बात की है जो अपने बिज़नेस या दुसरे करियर में असफल हो गए थे। मैंने असफलता के बहुत से कारण

और बहुत से बहाने सुने हैं। असफलता के बारे में हुई इन चर्चाओं में हमें एक महत्वपूर्ण जानकारी मिली। असफल आदमी के मुँह से इस तरह की कोई न कोई बात ज़रूर सुनने में आई, “सच कहूँ तो, मुझे लग ही नहीं रहा था कि हम सफल हो पाएँगे” या “मैंने काम शुरू किया उसके पहले ही मुझे इसकी सफलता पर शक हो रहा था” या “दरअसल जब यह असफल हुआ तो मुझे ज़रा भी हैरानी नहीं हुई।”

     “ठीक है मैं कोशिश करके-देखता हूँ-पर-मुझे नहीं लगता-कि-यह-होगा” वाले रवैए की वजह से ही आदमी असफल होता है।

       अविश्वास नकारात्मक शक्ति है। जब मस्तिष्क किसी बात पर अविश्वास करता है या किसी बात पर संदेह करता है तो मस्तिष्क ऐसे कारणों” को खोज लेता है जिससे उस अविश्वास को बल मिले। ज़्यादातर असफलताओं के लिए ज़िम्मेदार हैं : शंका, अविश्वास, असफल होने की अवचेतन इच्छा व सफल होने की सच्ची इच्छा न होना।

शंका करें और असफल हो जाएँ।

जीत के बारे में सोचें और सफल हो जाएँ।

      एक युवा कहानीकार अपनी लेखन महत्वाकांक्षाओं को लेकर मुझसे हाल में मिली। चर्चा उसके क्षेत्र के एक महान लेखक के बारे में होने लगी।

       ओह,” उसने कहा, “मिस्टर एक्स असाधारण लेखक हैं, परंतु मैं उनके जितनी सफल नहीं हो सकती।”

          उसके रवैए से मुझे बहुत निराशा हुई, क्योंकि मैं उस मिस्टर एक्स को जानता हूँ। उनमें न तो असाधारण बुद्धि है, न ही असाधारण प्रेरणा है, न ही वे किसी और बात में सुपर हैं, उनमें केवल एक ही बात असाधारण है और वह है उनका असाधारण आत्मविश्वास। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि वे सर्वश्रेष्ठ लेखक हैं और इसीलिए वे सर्वश्रेष्ठ लिखते हैं।

       लीडर का सम्मान करना अच्छी बात है। उससे सीखें। उसे ध्यान से देखें। उसका अध्ययन करें। परंतु उसकी पूजा न करें। यह विश्वास करें कि आप उससे आगे निकल सकते हैं। यह विश्वास करें कि आप उससे ऊपर जा सकते हैं। जिन लोगों का रवैया सेकंड क्लास होता है वे सेकंड क्लास काम ही कर पाते हैं।

इसे इस तरह से देखें। विश्वास ही वह थर्मोस्टेट है जो हमारी उपलब्धियों को नियमित करता है। उस व्यक्ति का अध्ययन करें जो औसत ज़िंदगी के जाल में उलझा हुआ है। उसे विश्वास है कि वह अयोग्य है, इसीलिए उसे अयोग्य समझा जाता है। वह मानता है कि वह बड़े काम नहीं कर सकता और इसीलिए वह उन्हें नहीं कर पाता। वह मानता है कि वह महत्वपूर्ण नहीं है, इसलिए जो भी वह करता है वह काम महत्वहीन बन जाता है। समय के साथ-साथ आत्मविश्वास का अभाव उसकी बातों, चाल-ढाल और कामों में दिखने लगता है। जब तक कि वह अपने थर्मोस्टेट को फिर से संतुलित नहीं करेगा, तब तक वह सिकुड़ता रहेगा, बौना होता जाएगा और अपनी नज़रों में छोटा होता जाएगा। और चूंकिदूसरे हममें वही देखते हैं जो हम अपने आपमें देखते हैं इसलिए वह अपने आस-पास के लोगों की नज़रों में भी छोटा होता जाएगा।

अब उस व्यक्ति की तरफ़ देखें जो आगे बढ़ रहा है। उसे विश्वास है कि वह योग्य है और इसलिए बाक़ी लोग भी उसे योग्य समझते हैं। उसे विश्वास है कि वह बड़े, कठिन काम कर सकता है और इसलिए वह इन्हें कर लेता है। जो भी वह करता है, जिस तरह भी वह लोगों से बात करता है, उसका चरित्र, उसके विचार, उसका दृष्टिकोण; सभी बातों में यह झलकता है कि “यह व्यक्ति प्रोफेशनल है। यह एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है।”

       कोई भी व्यक्ति वैसा ही होता है, जैसे उसके विचार होते हैं। बड़ी बातों में यक़ीन करें। अपने थर्मोस्टेट को आगे की तरफ़ सेट करें। अपने सफलता के अभियान की शुरुआत इस सच्चे, संजीदा विश्वास से करें कि आप सफल हो सकते हैं। अगर आपको यक़ीन है कि आप महान बन सकते हैं तो आप सचमुच महान बन जाएँगे।

       कई साल पहले मैं डेट्रॉइट में एक बिज़नेसमेन समूह को संबोधित कर रहा था। चर्चा के बाद एक व्यक्ति मेरे पास आया और उसने अपना परिचय देने के बाद कहा, “मुझे आपकी बातें पसंद आई। क्या आप मुझे कुछ मिनट का समय दे सकते हैं? मैं आपके साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव पर चर्चा करना चाहता हूँ।” ।

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