Sunday, September 1, 2019

CHAPTER. 3.3. लगातार यही सवाल पूछता रहता है, 'क्या में पकड़ा जाऊँगा? क्या में पकड़ा जाऊँगा?'



लगातार यही सवाल पूछता रहता है, 'क्या में पकड़ा जाऊँगा? क्या में पकड़ा जाऊँगा?'

           "पॉल," मैंने आगे कहा, "तुम्हें परीक्षा में अच्छे नंबर' की इतनी ज़्यादा चाह थी कि तुमने वह किया जो तुम्हारी नज़रों में गलत जीवन में बहुत सारे मौके आएँगे जब 'सफलता हासिल करने के लिए तुम्हारे सामने गलत काम करने का प्रलोभन मौजूद होगा। उदाहरण तौर पर, किसी दिन आप इतनी बुरी तरह कोई सामान बेचना चाहेंगे कि आप अपने ग्राहक को जान-बूझकर गलत जानकारी देकर उसे खरीदने के लिए मजबूर कर देंगे। और ऐसा करने से आपको सफलता मिल सकती है। परंतु इससे होता यह है। आपका अपराधबोध आप पर हावी हो जाएगा और अगली बार जब आप अपने ग्राहक को देखेंगे तो आप परेशान हो जाएँगे, तनाव में आ जाएंगे। आप सोचने लगेंगे, 'क्या उसे पता चल गया है कि मैंने उसे धोखा दिया था ?' आपकी प्रस्तुति इसलिए प्रभावी नहीं होगी क्योंकि आप पूरे मन से प्रस्तुति नहीं दे पाएंगे। इस बात की संभावना है कि आप इसके बाद उसी ग्राहक को दूसरी, तीसरी, चौथी और कई बार सामान बेचने का अवसर गँवा देंगे। लंबे समय में इस तरह की ग़लत सेल्स तकनीकें आपकी अंतरात्मा को तो चोट पहुँचाएँगी ही, आपकी आमदनी को भी कम कर देंगी।"

            इसके बाद मैंने पॉल को बताया कि जब किसी बिजनेसमैन या प्रोफेशनल आदमी को यह डर सताता है कि उसकी पत्नी को उसके विवाहेतर प्रेमसंबंध का पता चल जाएगा तो वह असफल होने लगता है। वह दिन-रात यही सोचता रहता है, “क्या उसे पता चल जाएगा? क्या उसे पता चल जाएगा?" इस कारण उसका आत्मविश्वास कमज़ोर हो । जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि वह नौकरी या घर में कोई भी काम ठीक तरह से नहीं कर पाता।

        
           मैंने पॉल को याद दिलाया कि कई अपराधी कोई सबूत या संकेत नहीं छोड़ते, फिर भी वे सिर्फ इसलिए पकड़े जाते हैं क्योंकि वे अपराधिया की तरह व्यवहार करते हैं और उन्हें देखकर यह समझ में आ जाता है कि इन्होंने कोई ग़लत काम किया है। उनकी अपराधबोध की भावनाएँ उन्हें संदिग्ध आदमियों की सूची में शामिल कर देती हैं।

          हममें से हर एक में सही होने, सही सोचने और सही काम करने की इच्छा होती है। जब हम इस इच्छा के विपरीत व्यवहार करते हैं तो हम अपनी अंतरात्मा में कैंसर की बीमारी आमंत्रित कर लेते हैं। यह कैंसर बढ़ता है और हमारे आत्मविश्वास को कम करता जाता है। इसलिए इस तरह का कोई काम न करें, जिसे करने के बाद आपको यह डर सताने लगे, “क्या मैं पकड़ा जाऊँगा? क्या लोगों को इस बात का पता चल जाएगा? क्या मैं बचने में सफल हो पाऊँगा?"

          धोखा देकर और अपना आत्मविश्वास कम करके “अच्छे नंबर" लाने की यानी कि सफल होने की कोशिश कभी न करें।

          मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि पॉल को सीख मिल गई। उसने सही काम करने का व्यावहारिक मूल्य समझ लिया। मैंने सुझावदि कि वह बैठ जाए और एक बार फिर से परीक्षा दे। उसने मुझसे सवाल किया, “परंतु क्या आप मुझे कॉलेज से नहीं निकालेंगे?" मेरा
जवाब था, “मैं निष्कासन के नियम जानता हूँ। परंतु, अगर हम धोखा देने वाले सारे विद्यार्थियों को कॉलेज से निकाल देंगे तो हमारे आधे प्रोफ़ेसरों की छुट्टी हो जाएगी। और अगर हम धोखा देने का विचार करने वाले सभी विद्यार्थियों को निकाल देंगे, तो हमें कॉलेज में ताले लगाने पड़ेंगे।"

          "इसलिए मैं इस घटना को भूलने के लिए तैयार हूँ, अगर तुम एक काम करो।"

         "बिलकुल,” उसने कहा।

          मैंने उसे एक पुस्तक दी। पुस्तक का नाम था फ़िफ्टी इयर्स विथ द गोल्डन रूल। इसे देते हुए मैंने उससे कहा, “पॉल, इस पुस्तक को पढो और पढ़ने के बाद इसे वापस कर देना। जे. सी. पेनी के खुद के शब्दों में यह जानो कि किस तरह सही काम करने की वजह से वे अमेरिका के सबसे अमीर व्यक्तियों के समूह में शामिल हो गए।"

         सही काम करने से आपकी अंतरात्मा संतुष्ट रहती है। और इससे आत्मविश्वास भी बढ़ता है। जब हम कोई ग़लत काम करते हैं, तो दो नकारात्मक बातें होती हैं। पहली बात तो यह कि हममें अपराधबोध आ जाता है और इस अपराधबोध से हमारा आत्मविश्वास कम हो जाता है।दबात यह कि देर-सबेर दूसरे लोगों को हमारे गलत काम की जानकारी मिल जाती है और उनका हम पर से विश्वास उठ जाता है।

           सही काम करें और अपने आत्मविश्वास को बनाए रखें। यही सफल चिंतन का कारगर तरीका है। 

          यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत दिया जा रहा है जो 25 बार पढ़ने लायक है। इसे तब तक पढ़ते रहें, जब तक कि यह आपके दिमाग में पूरी तरह से न घुस जाए : विश्वासपूर्ण चिंतन के लिए विश्वासपूर्ण काम करें।

          महान मनोवैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज डब्ल्यू. क्रेन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अप्लाइड साइकलॉजी (शिकागो : हॉपकिन्स सिंडीकेट, इन्क. 1950) में लिखा है, "याद रखें, काम ही भावनाओं के अग्रज होते हैं। हम अपनी भावनाओं को तो सीधे नियंत्रित नहीं कर सकते। परंतु हम अपने कामों को नियंत्रित करके अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। ...वैवाहिक समस्याओं और ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए सच्चे मनोवैज्ञानिक तथ्यों को जानें। हर दिन सही काम करें और जल्दी ही आपमें सहीभा जाग जाएँगी। यह सुनिश्चित कर लें कि आप अपने जीवनसाथी के साथ डेटिंग करें, उसका चुंबन लें, हर दिन उसकी सच्ची तारीफ़ करें, और भी ऐसी ही छोटी-छोटी चीजें करें, और आपको प्यार कम होने की चिंता कभी नहीं करनी पड़ेगी। आप प्रेम के काम करते रहेंगे, तो जल्दी ही आपमें प्रेम की भावना भी उत्पन्न हो जाएगी।"

         मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शारीरिक गतिविधियों में बदलाव करके हम अपने रवैए को बदल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, आप अगर मुस्कराने की क्रिया करते हैं, तो आप सचमुच मस्कराने के मूड में आ जाएँगे। जब आप अपने शरीर को झुकाने के बजाय तान लेते हैं तो आप ज़्यादा सुपीरियर महसूस करने लगते हैं। इसके उलट अगर, त्यौरियाँ । चढ़ाकर देखें तो पाएँगे कि आप त्यौरियाँ चढाने के मड में आ गए हैं।

         यह सिद्ध करना तो आसान है कि अपनी क्रियाओं पर काब करक। आप अपनी भावनाओं को बदल सकते हैं। जो लोग अपना परिचय देने  

में संकोच करते हैं, वे अपने संकोच को आत्मविश्वास में बदल सकते हैं अगर वे सिर्फ कुछ सामान्य क्रियाएँ करें : पहली बात तो यह कि सामने वाले से गर्मजोशी से हाथ मिलाएं। इसके बाद, सामने वाले व्यक्ति की तरफ़ एकल सीधे देखें। और तीसरी बात, सामने वाले से कहें, "मुझे आपसे मिलकर खुशी हुई।"

           इन तीन साधारण क्रियाओं से आपका संकोच अपने आप और तत्काल दूर हो जाएगा। आत्मविश्वास से भरी क्रिया की वजह से आपमें
अपने आप आत्मविश्वास आ जाएगा।

          आत्मविश्वासपूर्ण चिंतन करने के लिए आत्मविश्वास की क्रियाएँ करें। जिस तरह की भावनाएँ आप स्वयं में जगाना चाहते हैं, उस तरहके काम करें। नीचे आत्मविश्वास बढ़ाने वाले पाँच अभ्यास दिए जा रहे हैं। इन्हें सावधानी से पढ़ें। फिर इनका अभ्यास करने की पूरी कोशिश करें और आप अपना आत्मविश्वास काफ़ी बढ़ा-चढ़ा पाएँगे।

          1. आगे की बेंच पर बैठे। कभी आपने मीटिंग या चर्च या क्लासरूम या किसी और तरह की सभा में इस बात पर गौर किया है कि पीछे की सीटें सबसे पहले भर जाती हैं ? ज़्यादातर लोग पीछे की लाइन में इसलिए बैठते हैं ताकि वे "लोगों की नज़रों में न आएँ"। और वे लोगों की नज़रों में आने से इसलिए बचना चाहते हैं क्योंकि उनमें आत्मविश्वास नहीं होता।

          आगे बैठने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इसका अभ्यास करें। आगे से यह नियम बना लें कि आप जितना आगे बैठ सकते हों, बैठें। यह बात तो पक्की है कि आगे बैठने से आप थोड़े ज़्यादा नज़रों में रहते हैं, परंतु याद रखें सफलता के लिए लोगों की नज़रों में रहना ज़रूरी होता है।

         2. नज़रें मिलाकर बात करने का अभ्यास करें। कोई व्यक्ति किस तरह अपनी आँखों का प्रयोग करता है, इससे भी हमें उसके बारे में काफ़ी जानकारी मिल सकती है। अगर कोई आपकी आँखों में सीधे नहीं देखता है, तो आपके मन में यह सवाल तत्काल आ जाता है, “यह व्यक्ति क्या छुपाने की कोशिश कर रहा है ? यह व्यक्ति किस बात से डरा हुआ है ? क्या यह मुझे धोखा देना चाहता है ? इस व्यक्ति के इरादे क्या हैं?"

आम तौर पर, आँखों के संपर्क में असफलता से दो बातें पता चलती हैं। पहली यह, "मैं आपके सामने आने पर असहज अनुभव करता हूँ। मैं आपसे हीन अनुभव करता हूँ। मैं आपसे डरा हुआ अनुभव करता हूँ।" या सामने वाले से आँखें न मिलाने से यह बात पता चलती है, "मैं।
अपराधबोध से ग्रस्त हूँ। मैंने ऐसा कुछ किया है या सोचा है जो मैं नहीं चाहता कि आपको पता चल जाए। मुझे डर है कि अगर मैं आपसे नज़रें। मिलाऊँगा तो आप मेरे दिल की बात समझ जाएंगे।" 

          जब आप नज़रें मिलाने से बचते हैं, तो आप सामने वाले पर अच्छी छाप नहीं छोड़ पाते। आप कहते हैं, “मैं डरा हुआ हूँ। मुझमें आत्मविश्वास की कमी है।" इस डर को जीतने का यही तरीका है कि आप सामने वाले से नज़रें मिलाकर बात करें।

          नज़रें मिलाकर बात करने से सामने वाले को यह संदेश जाता है, “मैं ईमानदार और सच्चा हूँ। मैं जो कह रहा हूँ, मैं उसमें पूरी तरह यकीन करता हूँ। मैं डरा हुआ नहीं हूँ। मैं आत्मविश्वास से भरा हुआ हूँ।"

          अपनी आँखों से काम लें। दूसरे व्यक्ति की आँखों में आँखें डालकर बात करें। इससे न सिर्फ आपमें आत्मविश्वास आ जाएगा, बल्कि इससे सामने वाला भी आप पर विश्वास करने लगेगा।

          3. 25 प्रतिशत तेज़ चलें। जब मैं छोटा था, तो काउंटी सीट पर जाना ही अपने आपमें एक रोचक अनुभव होता था। जब सारे काम हो चुके होते और हम कार में लौट आते, तो मेरी माँ अक्सर कहा करती थीं, “डेवी, यहाँ थोड़ी देर चुपचाप बैठो और देखो कि लोग किस तरह
चल रहे हैं।"

           माँ इस खेल को बहुत अच्छी तरह से खेलती थीं। वे कहा करती थीं, “उस आदमी को देखो। वह परेशान सा दिख रहा है ?" या, "तुम्हें क्या लगता है वह महिला क्या करने जा रही है ?" या. "उस आदमी को तरफ़ देखो। वह कोहरे में लिपटा हुआ लगता है।"

          लोगों को चलते हुए देखना सचमुच मज़ेदार था। मनोरंजन का यह तरीक़ा फ़िल्म देखने से सस्ता पड़ता था (मुझे बाद में पता चला कि इस खेल को खेलने के पीछे माँ का एक कारण यह भी था)। और इससे ज्यादा शिक्षा भी मिलती थी।

         मैं अब भी लोगों को चलते हुए देखता हूँ। कॉरीडॉर में, लॉबी में, फुटपाथ पर लोगों को चलते हुए देखकर मैं समझ लेता हूँ कि उनकी मानसिक स्थिति कैसी है।

         मनोवैज्ञानिक झुकी हुई मुद्राओं और सुस्त चाल का संबंध खुद के बारे में, अपनी नौकरी के बारे में, अपने आस-पास के लोगों के बारे में अप्रिय रवैए से जोड़ते हैं। परंतु मनोवैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि आप अपनी मुद्रा को बदलकर और अपनी चलने की गति को बदलकर अपने रवैए को सचमुच बदल सकते हैं। आप भी देखें। अगर देखेंगे, तो आप यह पाएँगे कि शरीर की क्रिया मानसिक क्रिया का परिणाम है। जो व्यक्ति हारा हुआ है, चोट खाया हुआ है वह मरा-मरा चलता है, सुस्त चलता है। उसमें आत्मविश्वास शून्य होता है।

          औसत लोग “औसत" चाल चलते हैं। उनकी गति “औसत" होती है। उनके चेहरे पर लिखा होता है, “मुझे अपने आप पर नाज़ नहीं है।"

         एक तीसरा समूह भी होता है। इस समूह के लोगों में प्रबल आत्मविश्वास होता है। वे आम लोगों से तेज़ चलते हैं। उनकी चाल में फुर्ती होती है। उनकी चाल दुनिया को बताती है, “मैं किसी महत्वपूर्ण काम से किसी महत्वपूर्ण जगह जा रहा हूँ। इससे भी बड़ी बात यह है कि जोकाम मैं 15 मिनट बाद करने जा रहा हूँ, मुझे उसमें सफलता मिलेगी।"

          आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए 25 प्रतिशत तेज़ चलने की तकनीक का प्रयोग करके देखें। अपने कंधों को सीधा कर लें, अपने सिर को ऊपर उठा लें, और थोड़े तेज़ क़दमों से आगे की तरफ़ बढ़े चलें। आप पाएँगे कि आपका आत्मविश्वास भी बढ़ चुका है।

         कोशिश करें और परिणाम खुद देखें।

       4. बोलने की आदत डालें। कई तरह के समूहों के साथ काम करते हुए मैंने यह पाया है कि बहुत से समझदार और योग्य लोग चर्चाओं में भाग नहीं लेते हैं। चर्चा के दौरान उनका मुँह ही नहीं खुल पाता। ऐसा नहीं है कि उनके पास बाक़ी लोगों जितने अच्छे विचार नहीं होते या वे बोल नहीं सकते। इसका कारण सिर्फ यह होता है कि उनमें आत्मविश्वास नहीं होता।

          यह चुप्पा व्यक्ति अपने बारे में इस तरह की बातें सोचता है, “मेरा विचार शायद काम का नहीं है। अगर मैं कुछ कहूँगा तो हो सकता है कि लोग मुझे मूर्ख समझें। इसलिए बेहतर यही है कि मैं चुपचाप बैठा रहँ | इसके अलावा, समूह के बाक़ी लोग मुझसे बेहतर जानते हैं। मैं दूसरों के सामने यह जताना नहीं चाहता कि मैं कितना नासमझ हूँ।" 

          जितनी बार यह चुप्पा व्यक्ति बोलने में असफल रहता है, वह अपने.आपको उतना ही ज़्यादा अक्षम और हीन बनाता जाता है। अक्सर वह खुद से यह कमज़ोर-सा वादा करता है (अंदर से वह जानता है कि इस वादे को वह कभी पूरा नहीं कर पाएगा) कि वह “अगली बार" मौका पड़ने पर ज़रूर बोलेगा।

          यह बहुत महत्वपूर्ण है : हर बार जब चुप्पा व्यक्ति बोलने में असफल रहता है, तो वह आत्मविश्वास को ख़त्म करने वाले ज़हर की एक और खुराक गटक लेता है। अपने आप पर उसका विश्वास उतना ही कम होता जाता है।

           सकारात्मक पहलू यह है कि आप जितना ज़्यादा बोलते हैं, आपका आत्मविश्वास उतना ही ज़्यादा बढ़ता जाता है और आपके लिए अगली बार बोलना उतना ही ज़्यादा आसान हो जाता है। बोलने की आदत डालें। आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए यह आदत विटामिन की तरह काम करती है।

           आत्मविश्वास बढ़ाने की इस तकनीक का प्रयोग करें। हर ओपन मीटिंग में बोलने का नियम बना लें। आप जिस बिज़नेस वार्ता, कमिटी मीटिंग, कम्युनिटी फ़ोरम में भाग लें, उसमें अपने आप कुछ न कुछ कहें। इस मामले में कोई अपवाद न रखें। कोई टिप्पणी करें, कोई सुझाव दे, कोई सवाल पूछे। और आख़िरी में कभी न बोलें। आपको सबसे पहले। बोलने की आदत डालनी चाहिए, आपको झिझक तोड़नी होगी।

          और मूर्ख दिखने के बारे में चिंता न करें। आप मुर्ख नहीं दिखेंगे अगला व्यक्ति चाहे आपसे सहमत न हो, परंतु कोई दूसरा व्यक्ति आपस जरूर सहमत होगा। अपने आपसे यह सवाल करना छोड दें, “क्या मैं कभी बोलने की हिम्मत कर पाऊँगा?"

          इसके बजाय, समूह के लीडर का ध्यान आकर्षित करने का लक्ष्य बनाएँ ताकि आप बोल सकें।

          बोलने के विशेष प्रशिक्षण और अनुभव के लिए अपने स्थानीय टोस्टमास्टर के क्लब में शामिल हो जाएँ। हज़ारों लोगों ने इस तरह के सुनियोजित कार्यक्रम में शामिल होकर लोगों के साथ और लोगों के सामने चर्चा करके अपना आत्मविश्वास बढ़ाया है।

           5. बड़ी मुस्कराहट दें। ज्यादातर लोगों का कहना है कि मुस्कराहट से उन्हें सच्ची ताक़त मिलती है। उन्हें बताया गया है कि मुस्कराहट आत्मविश्वास की कमी को दूर करने के लिए एक बढ़िया दवा है। परंतु ज्यादातर लोग इस बात में इसलिए यकीन नहीं करते, क्योंकि जब वे डरे होते हैं तो वे मुस्कराने की कोशिश ही नहीं करते।

            यह छोटा-सा प्रयोग करके देखें। आप पराजित अनुभव करें और बड़ी मुस्कराहट दें : एक साथ, एक ही समय में यह संभव नहीं है। आप ऐसा कर ही नहीं सकते। बड़ी मुस्कराहट आपको आत्मविश्वास देती है। बड़ी मुस्कराहट आपका डर भगाती है, चिंता दूर करती है और निराशा हर लेती है।

          और एक सच्ची मुस्कराहट सिर्फ आपके आत्मविश्वास को ही नहीं बढ़ाती, या सिर्फ आपके मन से बुरी भावनाओं को ही नहीं हटाती। सच्ची मुस्कराहट से लोगों का विरोध भी पिघल जाता है- और यह तत्काल होता है। अगर आप किसी को बड़ी-सी, सच्ची मुस्कराहट दें, तो सामने वाला व्यक्ति आपसे गुस्सा हो ही नहीं सकता। कुछ समय पहले की बात है मेरे साथ एक घटना हुई, जिसमें ऐसा ही हुआ। मैं चौराहे पर हरी बत्ती जलने का इंतज़ार कर रहा था कि तभी भड़ाम की आवाज़ आई! मेरे पीछे वाले ड्राइवर का पैर ब्रेक पर से हट गया था और उसने मेरी कार के बम्पर में पीछे से टक्कर मार दी थी। मैंने शीशे में से देखा कि वह बाहर निकल रहा था। मैं भी तत्काल बाहर निकल आया और नियमों की पुस्तक को भूलते हुए बहस के लिए तैयार हो गया। मैं मानता हूँ कि  मैं उससे बहस करके उसे नीचा दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार था

          परंतु सौभाग्य से, इसके पहले कि मुझे ऐसा करने का मौका मिलतावह मेरे पास आया, मुस्कराया और उसने गभीरता से कहा, "दोस्त मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था।" उसकी मुस्कराहट और उसके गंभीर वाय को सुनकर मेरा गुस्सा काफूर हो गया। जवाब में मैंने इस तरह की बात कही. “चलता है। ऐसा तो होता ही रहता है।” पलक झपकते ही हमारा विरोध मित्रता में बदल गया।

           बड़ी मुस्कराहट दें और आप महसूस करेंगे कि “एक बार फिर खशी के दिन लौट आए हैं।" परंतु मुस्कराहट बड़ी होनी चाहिए। आधी मुस्कराहट से काम नहीं चलेगा। आधी मुस्कराहट की सफलता की कोई गारंटी नहीं है। तब तक मुस्कराएँ जब तक आपके दाँत न दिखने लगें। बड़ी मुस्कराहट की सफलता की पूरी गारंटी है।

           मैंने कई बार सुना है, "हाँ, परंतु जब मैं डरा हुआ होता हूँ, या मैं गुस्से में होता हूँ तो मेरी मुस्कराने की इच्छा ही नहीं होती।"

         बिलकुल नहीं होती होगी। किसी की नहीं होती। परंतु यही तो खास बात है कि आप ऐसे वक्त भी खुद कहें, “मैं मुस्कराकर दिखा दूंगा।"

          फिर मुस्कराएँ।

          मुस्कराहट की शक्ति का दोहन करें।

    इन पाँच तकनीकों के प्रयोग से लाभ उठाएँ

        1. कार्य करने से डर दूर होता है। अपने डर को चिन्हित कर लें और फिर। रचनात्मक कार्य करें। अकर्मण्यता - किसी परिस्थिति के बारे में कुछ न करने की आदत - से डर बढ़ता है और आत्मविश्वास कम होता है।

        2. अपनी यादों के बैंक में केवल सकारात्मक विचार ही जमा करना की कोशिश करें। नकारात्मक, खद को नीचा दिखाने वाले विचारों का मानसिक राक्षस न बनने दें। अप्रिय घटनाओं या परिस्थितियों को याद करने की आदत छोड़ दें।

            3. लोगों को सही पहलू से देखें। याद रखें, लोग ज्यादातर मामलों में एक जैसे होते हैं और बहुत कम मामलों में एक-दूसरे से अलग होते हैं। सामने वाले के बारे में संतुलित नज़रिया रखें। आख़िर, वह भी आप ही की तरह एक इंसान है। और आप समझने के रवैए का भी प्रयोग करें। कई लोग भौंकते हैं, परंतु बहुत कम लोग सचमुच काटते हैं।

          4. वही काम करने की आदत डालें जो आपकी अंतरात्मा के हिसाब से ठीक हैं। इससे आपके जीवन में अपराधबोध का ज़हर नहीं घुल पाता। सही काम करना सफलता के लिए एक बहुत व्यावहारिक नियम है।

           5. अपने हर काम से यह झलकने दें, “मुझमें आत्मविश्वास है, काफ़ी आत्मविश्वास है।" अपने रोज़मर्रा के जीवन में इन छोटी-छोटी तकनीकों का प्रयोग करें।

1. “आगे की बेंच" पर बैठे।

2. नज़रें मिलाने का अभ्यास करें।

3. 25 प्रतिशत तेज़ चलें।

4. बोलने की आदत डालें।

5. बड़ी मुस्कराहट दें।

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Thursday, August 29, 2019

CHAPTER 3.2. डर का इलाज करने और विश्वास हासिल करने के लिए ये दो कदम उठाएँ:

डर का इलाज करने और विश्वास हासिल करने के लिए ये दो कदम उठाएँ:




       1. डर का असली कारण पता करें। यह तय कर लें कि आप वास्तव में किस चीज़ से डर रहे हैं।

      2. फिर कर्म करें। हर तरह का डर किसी न किसी तरह के काम से दूर हो सकता है।

      और याद रखें, झिझकने से आपका डर बढ़ता ही है, कम नहीं होता। इसलिए देर न करें, बल्कि तत्काल काम में जुट जाएँ। फैसला करें।

        आत्मविश्वास के अभाव का कारण होती है ख़राब याददाश्त। आपका दिमाग़ किसी बैंक की तरह होता है। हर दिन आप अपने "दिमाग़ के बैंक" में विचारों को जमा करते जाते हैं। विचारों का यह संग्रह बढ़ता जाता है और आपकी याददाश्त बन जाता है। जब भी आप सोचने बैठते हैं या आपके सामने कोई समस्या आती है तो दरअसल आप अपनी यादों के बैंक से पूछते हैं, "इस बारे में मैं क्या जानता हूँ?"

        आपकी यादों का बैंक पहले से जमा किए हुए विचारों के संग्रह में से आपको आपकी मनचाही जानकारी देता है। आपकी यादें ही वह मूलभूत सप्लायर हैं जो आपको नए विचार के लिए कच्चा माल प्रदान करती हैं।

         आपकी यादों के बैंक का टेलर बहुत ही भरोसेमंद है। वह आपको कभी धोखा नहीं देता। जब आप उसके पास जाकर कहते हैं, "मिस्टर टेलर, मुझे कुछ विचार निकालकर दें जिनसे यह सिद्ध हो कि मैं बाक़ी लोगों जितना योग्य नहीं हूँ," वह कहता है, “बिलकुल, सर। याद करें आपने पहले भी दो बार इस काम को करने की कोशिश की थी, और आप असफल हुए थे? याद करें आपकी छठी कक्षा की टीचर ने कहा था कि आप कोई भी काम ढंग से नहीं कर सकते। याद करें आपने अपने साथी कर्मचारियों को अपने बारे में यह कहते सना था... याद करें..."

         और मिस्टर टेलर एक के बाद एक विचार निकालकर आपको देते हैं जिनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि आप अयोग्य हैं, असमर्थ हैं।

           परंतु अगर आप अपनी यादों के टेलर से यह कहें, “मिस्टर टेलर, मझे एक महत्वपूर्ण फैसला करना है। क्या आप मुझे ऐसे विचार प्रदान करेंगे जिनसे मुझे हौसला मिले?"

          और इसके जवाब में मिस्टर टेलर कहते हैं, “बिलकुल, सर," परंतु इस बार वे आपको पहले से जमा किए हुए ऐसे विचार देते हैं जिनसे यह साबित होता है कि आप सफल हो सकते हैं। “याद करें आपने पहले भी ऐसी परिस्थिति में वह शानदार काम किया था... याद करें मिस्टर स्मिथ को आप पर कितना भरोसा था... याद करें आपके अच्छे दोस्त आपके बारे में यह कहा करते थे... याद करें..." मिस्टर टेलर पूरी तरह सहयोग करेंगे और आपको उसी तरह के विचार निकालने देंगे जिस तरह के विचार आप निकालना चाहते हैं। आखिर, यह आपका बैंक है।

         यहाँ पर दो उपाय दिए जा रहे हैं जिनके प्रयोग से आप अपनी यादों के बैंक का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं और अपना आत्मविश्वास जगा सकते हैं।

        1. अपनी यादों के बैंक में केवल सकारात्मक विचार ही जमा करें। इस बात को अच्छी तरह से समझ लें। हर व्यक्ति के जीवन में अप्रिय, मुश्किल, हतोत्साहित करने वाली घटनाएँ होती हैं। परंतु इन घटनाओं के प्रति असफल और सफल लोगों की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग होती हैं। असफल लोग बुरी घटनाओं को दिल से लगाकर रखते हैं। वे अप्रिय स्थितियों को बार-बार याद करते हैं, ताकि वे उनकी यादों में अच्छी तरह से जम जाएँ। वे अपने दिमाग से उन्हें नहीं निकाल पाते। रात को भी वे जिस घटना के बारे में सोचते हुए सोते हैं, वह दिन में हुई कोई अप्रिय घटना ही होती है।

        दूसरी तरफ़ आत्मविश्वास से पूर्ण, सफल लोग इस तरह की घटनाओं को "भूल जाते हैं।” सफल लोग अपनी यादों के बैंक में केवल सकारात्मक विचार ही रखते हैं।

         आपकी कार किस तरह चलेगी अगर हर सुबह काम पर जाने से पहले आप दो मुट्ठी धूल अपने फ्रैंक केस में डाल दें ? क्या आपका शानदार इंजन बैठ नहीं जाएगा और आप इससे जो कराना चाहते हैं, वह करने से इन्कार नहीं कर देगा? आपके दिमाग में जमा नकारात्मक,
अप्रिय विचार भी आपके दिमाग को इसी तरह से प्रभावित करते हैं। नकारात्मक विचार आपकी मानसिक मोटर को इसी तरह की अनावश्यक टूटफूट का शिकार बनाते हैं। इनसे चिंता, कुंठा और हीनता की भावनाएँ पैदा होती हैं। नकारात्मक विचार आपको सड़क के किनारे खड़ा रखते हैं, जबकि बाक़ी लोग अपनी गाड़ियों पर फर्राटे से आगे बढ़ रहे होते हैं।

         ऐसा करें। उन क्षणों में जब आप अपने विचारों के साथ अकेले हों- जब आप अपनी कार चला रहे हों या अकेले खाना खा रहे हों - सुखद, सकारात्मक घटनाएँ याद करें। अपनी यादों के बैंक में अच्छे विचार डालें। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। इससे आपमें “मैं सचमुच अच्छा हूँ" की भावना जागती है। इससे आपका शरीर भी स्वस्थ रहता है।

        इसका एक बढ़िया तरीका यह है। सोने जाने से पहले, अपनी यादों के बैंक में अच्छे विचारों को डाल दें। अपने जीवन की अच्छी बातों को याद करें। यह सोचें कि आपको कितनी सारी चीज़ों के लिए ऊपर वाले का शुक्रगुज़ार होना चाहिए : आपकी पत्नी या आपका पति, आपके बच्चे, आपके दोस्त, आपका स्वास्थ्य। उन अच्छी चीज़ों को याद करें जो आपने लोगों को आज करते देखा है। अपनी छोटी-छोटी सफलताओं और उपलब्धियों को याद करें। उन कारणों को दुहराएँ कि आपको आज जीवित होने के लिए खुश क्यों होना चाहिए।

          2. अपनी यादों के बैंक से केवल सकारात्मक विचार ही निकालें। कई वर्ष पहले मैं शिकागो में मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की एक फर्म के साथ करीबी रूप से जुड़ा हुआ था। वे कई तरह के मामले सुलझाते थे, परंतु उनमें से ज़्यादातर मामले विवाह संबंधी समस्याओं और मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों से संबंधित होते थे।

         एक दिन मैं फ़र्म के मुखिया से उसके प्रोफेशन और उसकी तकनीकों के बारे में बात कर रहा था। मैं यह जानना चाहता था कि वह किस तरह असंतुलित व्यक्ति की मदद करता है। उसने कहा, “क्या आप जानते हैं। कि लोग अगर केवल एक चीज़ कर लें, तो उन्हें मेरी सेवाओं की कभी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

           "वह क्या ?” मैंने उत्सुकता से पूछा।

          "सिर्फ यही- कि आप अपने नकारात्मक विचारों को नष्ट कर दें, इससे पहले कि वे विचार राक्षस बन जाएँ और आपको नष्ट कर दें।"

         "मैं जिन लोगों की मदद करता हूँ उनमें से ज्यादातर लोग,” उसने कहा, "मानसिक आतंक की दुनिया में रहते हैं। शादी की बहुत सारी कठिनाइयाँ 'हनीमून राक्षस' की वजह से होती हैं। हनीमून उतना संतोषजनक नहीं रहा होगा, जितना एक या दोनों जीवनसाथी चाहते हों। परंतु उस याद को दफ़ना देने के बजाय वे लोग सैकड़ों बार उस पर विचार करते रहते हैं जब तक कि यह उनके वैवाहिक जीवन की एक बहुत बड़ी बाधा नहीं बन जाती। वे मेरे पास पाँच या दस साल बाद आते हैं।

          "आम तौर पर, मेरे ग्राहक यह नहीं जान पाते कि समस्या की जड़ कहाँ है। यह मेरा काम है कि मैं उनकी कठिनाई का विश्लेषण करूँ और उन्हें यह बताऊँ कि उन्होंने राई का पहाड़ बना लिया है।

          "कोई भी व्यक्ति किसी भी अप्रिय घटना को मानसिक राक्षस बना सकता है," मेरे मनोवैज्ञानिक दोस्त ने आगे कहा। "नौकरी की असफलता, असफल रोमांस, बुरा निवेश, टीन-एज बच्चे के व्यवहार से निराशा- ऐसे आम राक्षस हैं जिनकी वजह से मैंने लोगों को परेशान देखा है और मैं इन राक्षसों को मारने में इन लोगों की मदद करता हूँ।"

             यह स्पष्ट है कि अगर हम किसी भी नकारात्मक विचार को बार-बार दोहराएँगे तो इसका मतलब है कि हम इसे खाद-पानी दे रहे हैं। और अगर हम इसे खाद-पानी देंगे, तो यह धीरे-धीरे बड़ा राक्षस बनकर हमारे आत्मविश्वास को नष्ट कर देगा और हमारी सफलता की राह में गंभीर मनोवैज्ञानिक कठिनाइयाँ खड़ी कर देगा।

            कॉस्मोपॉलिटन मैग्ज़ीन में हाल ही में छपे एक लेख "द ड्राइव टुवर्ड सेल्फ़-डेस्ट्रक्शन" में एलिस मल्काहे ने इस तरफ़ इशारा किया कि हर साल 30,000 अमेरिकी आत्महत्या कर लेते हैं और 100,000 लोगआत्महत्या का असफल प्रयास करते हैं। उन्होंने आगे कहा, “इस बात के आश्चर्यजनक प्रमाण मिले हैं कि लाखों-करोड़ों दूसरे लोग धीमे-धीमे, कम स्पष्ट तरीकों से खुद को मार रहे हैं। बाक़ी के लोग शारीरिक आत्महत्या करने के बजाय, आध्यात्मिक आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि वे खुद को कई तरह से अपमानित, दंडित कर रहे हैं और कुल मिलाकर अपने आपको छोटा बना रहे हैं।"

          जिस मनोवैज्ञानिक मित्र का मैंने ज़िक्र किया था, उसने मुझे बताया कि किस तरह उसने अपनी एक ऐसी मरीज़ को रोका जो "मानसिक और आध्यात्मिक आत्महत्या करने पर तुली हुई थी। उसने कहा, “इस मरीज़ की उम्र पैंतीस से ऊपर होगी। उसके दो बच्चे थे। सामान्य भाषा में कहा जाए तो उसे गंभीर डिप्रेशन था। अपनी जिंदगी का हर अनुभव उसे दःखद अनुभव ही लगता था। उसका स्कूली जीवन, उसकी शादी, बच्चों का लालन-पालन, जिन जगहों पर वह रही थी- सभी के बारे में उसकी सोच नकारात्मक थी। उसने बताया कि उसे याद नहीं है कि वह कभी सुखी भी रही थी। और चूँकि व्यक्ति अपने अतीत की कूची से ही अपने वर्तमान में रंग भरता है इसलिए उसे वर्तमान जीवन में भी सिर्फ निराशा और अँधेरा ही नज़र आ रहा था।

          “जब मैंने उससे पूछा कि सामने वाली तस्वीर में उसे क्या दिख रहा था, तो उसने कहा, 'ऐसा लगता है जैसे यहाँ आज रात तूफ़ान आने वाला है। यह उस तस्वीर का सबसे निराशाजनक विश्लेषण था।" (यह तस्वीर एक बड़ी ऑइल पेंटिंग है जिसमें सूर्य आसमान में नीचे की तरफ़ है। चित्र बहुत चतुराई से बनाया गया है और इसे सूर्योदय का दृश्य भी समझा जा सकता है और सूर्यास्त का भी। मनोवैज्ञानिक ने कहा कि लोग तस्वीर में जो देखते हैं, उससे उनके व्यक्तित्व के बारे में संकेत मिल जाता है। ज्यादातर लोग कहते हैं कि यह सूर्योदय का दृश्य है जबकि मानसिक रूप से असंतुलित, डिप्रेस्ड व्यक्ति हमेशा इसे सूर्यास्त का दृश्य बताते हैं।)

          “एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मैं किसी व्यक्ति की याददाश्त तो नहीं बदल सकता। परंतु अगर मरीज़ सहयोग दे, तो मैं उसे अपने अतीत को अलग तरीके से देखने का नज़रिया सिखा सकता हूँ। मैंने इस महिला को । भी ऐसा ही करना सिखाया। मैंने उसे बताया कि वह अपने अतीत को पूरी तरह निराशावादी रवैए से न देखे और उसमें से खुशी और आनंद के पलों को याद करने की कोशिश करे। छह महीनों के बाद उसकी हालत में थोड़ा सा सुधार हुआ। उस वक़्त मैंने उसे एक ख़ास काम सौंपा। मैंने उससे कहा कि वह हर दिन तीन कारण लिखे जिनके कारण उसे खुश होना चाहिए। हर सप्ताह गुरुवार को मैं उसके लिखे कारणों को देख लेता था। यह सिलसिला तीन माह तक चलता रहा। उसमें काफ़ी सुधार होरहा था। आज वह महिला एक सामान्य जीवन जी रही है। वह सकारात्मक है और वह ज़्यादातर लोगों जितनी ही सुखी है।"

       जब इस महिला ने अपनी यादों के बैंक से नकारात्मक विचार निकालना बंद कर दिया, तो उसकी हालत में सुधार होना शुरू हो गया।

         चाहे मनोवैज्ञानिक समस्या बड़ी हो या छोटी, इलाज हमेशा तभी शुरू होता है जब व्यक्ति अपनी यादों के बैंक से नकारात्मक विचारों को निकालना बंद कर देता है और उनके बजाय सकारात्मक विचार निकालना शुरू कर देता है।

         मानसिक राक्षस न बनाएँ। अपनी यादों के बैंक से अप्रिय विचार निकालना बंद कर दें। जब भी आपको किसी तरह की कोई परिस्थिति याद आए, तो उसके अच्छे हिस्से के बारे में सोचें। बुरे हिस्से को भूल जाएँ। उसे दफना दें। अगर आप यह पाएँ कि आप नकारात्मक पहलू पर ही विचार कर रहे हैं, तो उस घटना से अपने दिमाग को पूरी तरह हटा दें।

         और यहाँ हम आपको एक और महत्वपूर्ण और उत्साहवर्द्धक बात बताना चाहते हैं। आपका मस्तिष्क अप्रिय घटनाओं को भुलाना चाहता है। अगर आप सहयोग करें, तो अप्रिय यादें धीरे-धीरे सिकुड़ती जाती हैं और आपकी यादों के बैंक का टेलर उन्हें बाहर निकालता जाता है।

        डॉ. मैल्विन एस. हैविक एक प्रसिद्ध एड्वर्टाइजमेंट मनोवैज्ञानिक हैं और याद रखने की हमारी योग्यता के बारे में वे कहते हैं, “जब जागने वाली भावना सुखद होती है तो विज्ञापन को याद रखना आसान होता है। जब जागने वाली भावना सुखद नहीं होती, तो पाठक या श्रोता उस विज्ञापन के संदेश को जल्दी ही भूल जाते हैं। अप्रिय घटनाएँ हमारी चाही गई चीज़ों के ख़िलाफ़ होती हैं, इसलिए हम उन्हें याद नहीं रखना चाहते।" 

संक्षेप में, अगर हम उन्हें बार-बार याद न करें तो अप्रिय घटनाओं को भूलना आसान है। अपनी यादों के बैंक से केवल सकारात्मक विचार ही निकालें। बाक़ी को यूँ ही बेकार पड़ा रहने दें। और आपका आत्मविश्वास आसमान छू लेगा। आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किला फतह कर सकते हैं। आपको लगेगा आप दुनिया की चोटी पर पहुँच सकते हैं। आप जब भी अपने नकारात्मक, खुद को छोटा करने वाले विचारों को याद करने से इन्कार करते हैं तो आप अपने डर को जीतने की तरफ़ एक बड़ा क़दम आगे बढ़ाते हैं।

          लोग दूसरे लोगों से क्यों डरते हैं ? जब दूसरे लोग हमारे आस-पास होते हैं तो हम इतना आत्म-चेतन क्यों हो जाते हैं ? हमारे संकोच की क्या वजह होती है? हम इस बारे में क्या कर सकते हैं?

         दूसरे लोगों का डर एक बड़ा डर होता है। परंतु इसे जीतने का भी एक तरीक़ा है। अगर आप उसे “सही पहलू" से देखने की आदत डाल लें तो आप लोगों के डर को जीत सकते हैं।

         मेरे एक सफल बिज़नेस मित्र ने मुझे बताया कि किस तरह उसने लोगों के बारे में सही नज़रिया सीखा। उसका उदाहरण सचमुच दिलचस्प है।

         “द्वितीय विश्वयुद्ध में सेना में जाने से पहले मैं हर एक के सामने झिझकता था, हर एक से डरता था। आप सोच भी नहीं सकते मैं उस समय कितना शर्मीला और संकोची हुआ करता था। मुझे लगता था बाक़ी लोग मुझसे बहुत ज़्यादा स्मार्ट हैं। मैं अपनी शारीरिक और
मानसिक कमियों को लेकर चिंता किया करता था। मैं सोचा करता था कि मेरा जन्म ही असफल होने के लिए हुआ है।

        "फिर क़िस्मत से मैं सेना में चला गया और वहाँ जाने के बाद मेरे दिल से लोगों का डर निकल गया। 1942 और 1943 के दौरान जब सेना में लोगों को भर्ती किया जा रहा था, तो मुझे भर्ती केंद्रों पर मेडिकल ऑफ़िसर के रूप में तैनात किया गया। मैंने इन लोगों के परीक्षण म सहयोग किया। मैं इन रंगरूटों को जितना देखता था. मेरे मन से लागा का डर उतना ही कम होता जाता था।

          “सैकड़ों की तादाद में लोग खड़े हुए थे. सभी पूरे कपड़े उतार हुए। थे और सभी लगभग एक-से दिख रहे थे। हाँ. इनमें से कुछ माटयार कुछ दुबले, कुछ लंबे थे और कुछ नाटे. परंत वे सभी परेशान थे, सभी अकेलापन अनुभव कर रहे थे। कुछ समय पहले यही लोग युवा
एक्जीक्यूटिव हुआ करते थे। कुछ समय पहले इनमें से कुछ किसान थे, कछ सेल्समेन थे, कुछ ब्लू कालर कर्मचारी थे, और कुछ यूँ ही सड़कों पर खाक छाना करते थे। कुछ दिन पहले ये लोग अलग-अलग काम किया करते थे। परंतु भर्ती केंद्र पर वे सारे लोग एक-से दिख रहे थे।

         तब मैंने एक महत्वपूर्ण बात सोची। मैंने पाया कि लोग ज़्यादातर मामलों में एक-से होते हैं। लोगों में समानताएँ ज़्यादा होती हैं, और असमानताएँ कम होती हैं। मैंने पाया कि सामने वाला आदमी भी मेरे जैसा ही है। उसे भी अच्छा खाना पसंद है, उसे भी अपने परिवार और
दोस्तों की याद आती है, वह भी तरक्की करना चाहता है, उसके पास भी समस्याएँ हैं और वह भी आराम करना चाहता है। इसलिए, अगर सामने वाला मेरे जैसा ही है, तो उससे डरने की कोई वजह ही नहीं है।"

अब, मैं आपसे पूछता हूँ। क्या यह बात काम की नहीं है? अगर सामने वाला मेरे जैसा ही है, तो उससे डरने की कोई वजह ही नहीं है।

            लोगों को सही नज़रिए से देखने के दो तरीके ये हैं :

          1. सामने वाले व्यक्ति को संतुलित दृष्टि से देखें। लोगों के साथ व्यवहार करते समय इन दो बातों का ध्यान रखें : पहली बात तो यह कि सामने वाला व्यक्ति महत्वपूर्ण है। निश्चित रूप से वह महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। परंतु यह भी याद रखें कि आप भी महत्वपूर्ण हैं। तो जब आप किसी व्यक्ति से मिलें तो ऐसा सोचें, “हम दो महत्वपूर्ण लोग मिलकर किसी आपसी लाभ या रुचि के विषय पर चर्चा कर रहे हैं।"

         कुछ महीने पहले, एक बिज़नेस एक्जीक्यूटिव ने फोन पर मुझे बताया कि उसने मेरे सुझाए एक युवक को नौकरी पर रख लिया है। "आपको पता है मुझे उसकी किस बात ने प्रभावित किया," मेरे दोस्त न कहा। “कौन सी बात ने?" मैंने पूछा। "मुझे उसका आत्मविश्वास बेहद पसंद आया। ज्यादातर उम्मीदवार तो कमरे में घुसते समय डरे और सहमे या उन्होंने मुझे उस तरह के जवाब दिए जो उनकी राय में मैं सता पाहता था। एक तरीके से ज्यादातर उम्मीदवार भिखारियों की तरह व्यवहार कर रहे थे- उन्हें आप कुछ भी दे सकते थे और उन्हें आपसे किसी ख़ास चीज़ की उम्मीद नहीं थी।

         “परंतु जी. का व्यवहार इन सबसे अलग था। उसने मेरे प्रति सम्मान दिखाया, परंतु इसके साथ ही साथ महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसने अपने प्रति भी सम्मान दिखाया। मैंने उससे जितने सवाल पूछे. उसने भी मुझसे तक़रीबन उतने ही सवाल पूछे। वह कोई चूहा नहीं है। वह असली मर्द है और मैं उसके आत्मविश्वास से बहुत प्रभावित हुआ।"

           आपसी महत्व का रवैया आपको परिस्थिति को देखने का संतुलित रवैया देता है। सामने वाला व्यक्ति आपकी नज़र में आपसे ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं बन पाता।

          हो सकता है सामने वाला व्यक्ति बहुत बड़ा, बहुत महत्वपूर्ण दिख रहा हो। परंतु याद रखें, है तो वह भी एक इंसान ही। उसके पास भी तो वही रुचियाँ, इच्छाएँ और समस्याएँ होंगी जो आपके पास हैं।

        2. समझने का रवैया विकसित करें। जो लोग आपको नीचा दिखाना चाहते हैं, आपके पर कतरना चाहते हैं, आपकी टाँग खींचना चाहते हैं, आपकी बुराई करना चाहते हैं। ऐसे लोगों की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है। अगर आप इनका सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो यह लोग आपके आत्मविश्वास में बड़े-बड़े छेद कर देंगे और आपको ऐसा लगेगा जैसे आप पूरी तरह हार चुके हैं। आपको ऐसे वयस्क हमलावर के विरुद्ध ढाल चाहिए, उस हमलावर के लिए जो अपनी पूरी ताकत से आप पर चढ़ाई करने के लिए कमर कसे बैठा है।

            कुछ महीने पहले मेम्फिस होटल की रिज़र्वेशन डेस्क पर मैंने सीखा कि इस तरह के लोगों का सामना किस तरह से किया जा सकता है। 

           शाम के 5 बजे थे और होटल में नए अतिथियों का रजिस्ट्रेशन किया जा रहा था। मेरे सामने वाले आदमी ने क्लर्क को अपना नाम बताया। क्लर्क ने कहा, “यस सर, आपके लिए एक बढ़िया सिंगल रूम बुक किया हुआ है।"

           "सिंगल,” वह आदमी गुस्से से चिल्लाया, "मैंने तो डबल बेड रूम  का ऑर्डर दिया था।"

           क्लर्क ने विनम्रता से जवाब दिया, “मैं देख लेता हूँ, सर।" उसने अपनी फ़ाइल निकाली और उसमें देखकर कहा, "माफ़ कीजिए, सर। आपके टेलीग्राम में साफ़ लिखा हुआ था कि सिंगल रूम चाहिए। अगर खाली होता तो मैं आपको खुशी-खुशी डबल बेडरूम दे देता परंतु हमारे पास अभी कोई डबल बेडरूम ख़ाली नहीं है।"

           क्रुद्ध ग्राहक चिल्लाया, “भाड़ में जाए कि टेलीग्राम में क्या लिखा है, मुझे तो डबल बेडरूम ही चाहिए।"

           फिर उसने इस लहज़े में बात करना शुरू कर दिया “तुम नहीं जानते मैं कौन हूँ" और उसके बाद वह यहाँ तक आ गया “मैं तुम्हें देख लूँगा। मैं तुम्हें नौकरी से निकलवा दूंगा। मैं तुम्हें यहाँ नहीं रहने दूंगा।"

शाब्दिक आक्रमण की इस बौछार को विनम्रता से सहन करते हुए क्लर्क ने कहा, “सर, माफ़ कीजिए, हमने आपके निर्देशों का पालन किया है।" 

आख़िरकार ग्राहक जो अब आगबबूला हो चुका था बोला, "चाहे मुझे सबसे बढ़िया कमरा भी मिल जाए, तो भी अब मैं इस होटल में कभी नहीं ठहरूँगा,” और यह कहकर वह होटल से बाहर निकल गया।

          मैं डेस्क पर पहुँचा और मैं सोच रहा था कि क्लर्क इस बदतमीज़ी भरे व्यवहार के कारण विचलित होगा। परंतु मुझे हैरत हुई जब उसने मेरा स्वागत मधुर आवाज़ में “गुड ईवनिंग, सर" कहकर किया। जब वह मेरे रजिस्ट्रेशन की कार्यवाही पूरी कर रहा था, तो मैंने उससे कहा, “मुझे आपका तरीक़ा पसंद आया। आपका अपनी भावनाओं पर ज़बर्दस्त नियंत्रण है।"

         “सर,” क्लर्क ने कहा, “मैं इस तरह के आदमी पर गुस्सा नहीं हो सकता। वह वास्तव में मुझ पर गुस्सा नहीं हो रहा था। मैं तो सिर्फ एक बलि का बकरा था। शायद उस बेचारे को अपनी पत्नी से कोई समस्या होगी, या उसका बिज़नेस चौपट हो रहा होगा या हो सकता है वह हीन भावना से ग्रस्त हो और यह उसके लिए एक सुनहरा अवसर था जब वह अपनी शक्ति सिद्ध कर सके। मैं वह आदमी था जिस पर वह अपने दिल की भड़ास निकाल सकता था।"

क्लर्क ने बाद में यह जोड़ दिया, “अंदर से शायद वह बहुत भला आदमी होगा। ज्यादातर लोग होते हैं।"

            लिफ्ट की तरफ बढ़ते समय मैं उसके शब्दों को दुहरा रहा था "अंदर से शायद वह बहुत भला आदमी होगा। ज़्यादातर लोग होते हैं।"

           जब भी कोई आप पर आक्रमण करे, तो आप इन दो वाक्यों को याद कर लें। अपने गुस्से पर काबू रखें। इस तरह की स्थितियों में जीतने का यही तरीका होता है कि सामने वाले को अपने दिल की भड़ास निकाल लेनेदे और फिर इस घटना को भूल जाएँ।

            कई साल पहले विद्यार्थियों की परीक्षा की कॉपी जाँचते समय एक कॉपी को देखकर मुझे हैरत हुई। इस विद्यार्थी ने पूरे साल समूह चर्चाओं और पिछले टेस्ट्स में यह साबित किया था कि उसमें प्रतिभा थी, जबकि उसकी परीक्षा की कॉपी कुछ और ही कह रही थी। मुझे ऐसा अनुमान था कि वह कक्षा में सबसे ज़्यादा नंबर लाएगा। इसके बजाय उसके नंबर परीक्षा में सबसे कम आ रहे थे। जैसा में इस तरह के मामले में किया करता था, मैंने अपनी सेक्रेटरी से कहा कि वह उस विद्यार्थी को मेरे ऑफिस में एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करने के लिए बुलवाए।


           जल्दी ही पॉल डब्ल्यू. वहाँ आया। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी बुरे दौर से गुजर रहा था। उसके बैठने के बाद मैंने उससे कहा, “क्या हुआ, पॉल? तुमने परीक्षा में जिस तरह लिखा है, उस तरह की मुझे तुमसे उम्मीद नहीं थी।"


           पॉल पशोपेश में था। उसने अपने पैरों की तरफ़ देखते हुए जवाब दिया, “सर, जब मैंने देखा कि आपने मुझे नकल करते हुए देख लिया है। तो इसके बाद मेरी हालत ख़राब हो गई। मैं कोई सवाल ठीक से नहीं कर पाया। ईमानदारी से कहूँ तो मैंने ज़िंदगी में पहली बार नक़ल की थी। में अच्छे नंबरों से पास होना चाहता था, इसलिए मैंने सोचा क्यों न। बेईमानी का सहारा ले लूँ ?"


वह बुरी तरह परेशान दिख रहा था। परंतु एक बार जब उसने बोलना शुरू कर दिया, तो फिर वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था।"मुझे लगता है अब आप मुझे कॉलेज से निकाल देंगे। यूनिवर्सिटी का नियम तो यही है कि अगर कोई विद्यार्थी किसी भी तरह की बेईमानी करेगा, तो उसे हमेशा के लिए कॉलेज से निष्कासित किया जा सकता है।"


          यहाँ पर पॉल ने यह बताना शुरू कर दिया कि कॉलेज से निकाले जाने के बाद उसके परिवार की इज़्ज़त ख़ाक में मिल जाएगी, उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी और इसके अलावा और भी बहुत सारे बुरे परिणाम होंगे।आख़िरकार मैंने उससे कहा, “अब बस भी करो। शांत बैठ जाओ। मैं तुम्हें कुछ बता दूं। मैंने तुम्हें नक़ल करते हुए नहीं देखा। जब तक तुमने मुझे इसके बारे में नहीं बताया, तब तक मुझे यह अंदाज़ा ही नहीं था कि समस्या यह थी। मुझे दुःख है, पॉल, कि तुमने नक़ल की।”


         फिर मैंने आगे कहा, “पॉल, मुझे बताओ कि तुम अपनी यूनिवर्सिटी के अनुभव से क्या सीखना चाहते हो?"


          अब वह थोड़ा शांत हो चुका था और एक पल रुकने के बाद उसने जवाब दिया, “डॉक्टर, मुझे लगता है कि मेरा असली लक्ष्य तो जीने का तरीक़ा सीखना है, परंतु मुझे लगता है कि मैं अपने लक्ष्य को हासिल करने में बुरी तरह असफल हो चुका हूँ।"


           "हम कई तरीकों से सीखते हैं,” मैंने कहा। “मुझे लगता है तुम इस अनुभव से सफलता का असली सबक सीख सकते हो।" 


        "जब तुमने अपनी पर्ची से नक़ल की, तो तुम्हारी अंतरात्मा तुम्हें कचोटने लगी। इससे तुममें अपराधबोध की भावना जाग गई और तुम्हारा आत्मविश्वास ख़त्म हो गया। जैसा तुमने कहा इसके बाद तुम्हारी हालत ख़राब हो गई।


          “ज्यादातर बार होता यह है, पॉल, कि सही और गलत का मसला हम नैतिक या धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हैं। अब इस बात को समझ लो, मैं यहाँ तुम्हें भाषण नहीं दे रहा हूँ, न ही तुम्हें सही और गलत काम के बारे में कोई प्रवचन देने के मूड में हूँ। परंतु यह ज़रूरी है कि हम इसके व्यावहारिक पहलू पर नज़र डालें। जब तुम कोई ऐसा काम करते हो जो तुम्हारी अंतरात्मा के खिलाफ़ होता है, तो तुममें अपराधबोध आ जाता है और इस अपराधबोध के कारण तुम्हारी सोचने की क्षमता खत्म हो जाती है। आप ठीक तरह से नहीं सोच सकते क्योंकि आपका दिमाग


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Tuesday, August 20, 2019

CHAPTER 3.1 विश्वास जगाएँ, डर भगाएँ

                      विश्वास जगाएँ, डर भगाएँ



         जब हम डरे होते हैं तो हमारे दोस्त हमें समझाते हैं, “यह तुम्हारे मन का वहम है। चिंता मत करो। डरने की कोई बात नहीं है।"



         परंतु आप और हम जानते हैं कि डर की इस किस्म की दवा से काम नहीं चलता है। इस तरह की तसल्ली से हमें कुछ मिनट या कुछ घंटे का ही आराम मिलता है। “यह तुम्हारे मन का वहम है" वाले उपचार से विश्वास नहीं जागता, न ही डर का इलाज होता है।



          हाँ, डर वास्तविक होता है। और इसे जीत ने से पहले हमें यह मानना ही पड़ेगा कि इसका अस्तित्व होता है।



          आजकल इंसान के ज़्यादातर डर मनोवैज्ञानिक होते हैं। चिंता, तनाव, उलझन, संत्रास- यह सभी हमारी नकारात्मक, अनुशासनहीन कल्पना के कारण पैदा होते हैं। परंतु सिर्फ यह जानने से कि डर कैसे पैदा होता है, उस डर का इलाज नहीं हो जाता। जब डॉक्टर यह पता लगा लेता है कि आपके शरीर में कहीं पर कोई इन्फेक्शन है, तो उसका काम वहीं पर पूरा नहीं हो जाता। इसके बाद वह इन्फेक्शन का इलाज भी करता है। 



          “यह तुम्हारे मन का वहम है" वाला पुराना विचार यह मानता है। कि डर का वास्तव में अस्तित्व होता ही नहीं है। परंतु ऐसा नहीं है। डर का अस्तित्व होता है। डर असली है। डर सफलता का नंबर एक दुश्मन है। डर लोगों को अवसर का लाभ उठाने से रोकता है। डर लोगों को शारीरिक रूप से कमज़ोर बना देता है। डर लोगों को बीमार बना देता है। डर लोगों की जिंदगी को छोटा कर देता है। आप जब बोलना चाहते हैं, तो डर आपके मुँह को बंद रखता है।



         डर - अनिश्चितता, आत्मविश्वास का अभाव - के ही कारण हमारी। अर्थव्यवस्था में मंदियाँ आती हैं। डर के ही कारण करोड़ों लोग इतना कम हासिल कर पाते हैं और जीवन का इतना कम आनंद ले पाते हैं।



          वास्तव में डर एक शक्तिशाली भावना है। किसी न किसी रूप में डर लोगों को वह हासिल करने से रोकता है जो वे जीवन में हासिल करना चाहते हैं।



          हर तरह और हर आकार का डर मनोवैज्ञानिक इन्फेक्शन का एक रूप है। हम अपने मानसिक इन्फेक्शन को भी उसी तरीके से दूर कर सकते हैं जिस तरह हम अपने शारीरिक इन्फेक्शन को दूर करते हैं- यानी उसका इलाज करके।



          इसके लिए सबसे पहले हमें उपचार के पहले की तैयारी करनी होगी। यह जानना होगा कि आत्मविश्वास आसमान से आकर हमारे दिमाग़ में नहीं घुसता, बल्कि हासिल किया जाता है, विकसित किया जाता है। कोई भी व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ पैदा नहीं होता। जिन लोगो में आत्मविश्वास प्रचुरता में होता है,जिन्होंने चिंता को जीत लिया है, जो हर जगह और हर कहीं बेफ़िक्री से आते-जाते हैं, उन्होंने यह आत्मविश्वास धीरे-धीरे हासिल किया है।



    आप भी ऐसा ही कर सकते हैं। यह अध्याय आपको बताएगा, कैसे।



द्वितीय विश्वयुद्ध में नेवी ने यह फैसला किया कि इसके सभी नए रंगरूटों को तैरना आना चाहिए। इसके पीछे यह विचार था कि तैरना आने से किसी डूबते आदमी की जान बचाई जा सकती है।



          जिन लोगों को तैरना नहीं आता था, उनके लिए तैरने की आयोजित की गईं। मैंने इस तरह के एक प्रशिक्षण को देखा। सतही पर यह देखना मज़ेदार था कि इतने बड़े-बड़े, जवान, और स्वर कुछ फुट गहरे पानी में कूदने से घबरा रहे थे। इन लोगों को 61 स्टैंड से पानी में कूदना था और पानी सिर्फ 8 फुट गहरा था। हालाँकि आस-पास बहुत से विशेषज्ञ तैराक खड़े थे और जान का कोई जोखिम नहीं था, फिर भी ये वयस्क लोग बुरी तरह आतंकित थे।



        गहराई से सोचने पर यह दुःखद प्रसंग था। उनका डर वास्तविक था। परंतु उनमें और हार के डर के बीच में केवल एक ही चीज़ आड़े आ रही थी, और वह थी नीचे के पानी में छलाँग। एक से ज्यादा बार मैंने देखा कि इन युवकों को बोर्ड से “अनपेक्षित" धक्का दे दिया गया। और इसका परिणाम यह हुआ कि पानी से उनका डर हमेशा के लिए दूर हो गया।



          हज़ारों भूतपूर्व नेवी के जवान इस घटना से परिचित होंगे। इस घटना से हमें यह शिक्षा मिलती है : काम करने से डर दूर होता है। दुविधा में रहने या अनिर्णय की स्थिति में रहने से या काम टालने से हमारा डर बढ़ता है।



          इसे अभी हाल अपनी सफल नियमों की पुस्तिका में लिख लें। काम करने से डर दूर होता है।



         काम करने से डर सचमुच दूर होता है। कुछ महीनों पहले चालीस साल का एक परेशानहाल एक्जीक्यूटिव मुझसे मिलने आया। वह एक बड़े रिटेलिंग संगठन में महत्वपूर्ण पद पर था।



          चिंतित स्वर में उसने मुझे बताया, “मुझे डर है कि मेरी नौकरी छूट जाएगी। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे थोड़े से दिन बचे हैं।"



        “क्यों?" मैंने पूछा।



         "सभी बातें मेरे ख़िलाफ़ हैं। मेरे विभाग की बिक्री के आँकड़े पिछले साल से 7 प्रतिशत कम हैं। यह बहुत बुरा है, ख़ासकर तब जब हमारे स्टोर की सेल पिछले साल की तुलना में 6 प्रतिशत बढ़ी है। मैंने हाल ही में कुछ ग़लत फैसले लिए हैं और मुझे कई बार मीटिंग में यह संकेत दिया गया है कि मैं कंपनी की प्रगति के साथ-साथ प्रगति नहीं कर पा रहा हूँ।



          “मुझे इतना बुरा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ। मेरी पकड़ ढीली होती जा रही है और यह सबको साफ़ दिख रहा है। मेरे कर्मचारियों को भी इस बात का एहसास है। मेरे सेल्समेन भी यह देख सकते हैं। दूसरे एक्जीक्यूटिव भी यह जानते हैं कि मैं ढलान पर नीचे फिसल रहा हूँ। एक साथी एक्जीक्यूटिव ने तो पिछली मीटिंग में यहाँ तक सुझाव दिया कि मेरा कुछ काम उसके डिपार्टमेंट को सौंप दिया जाए, 'ताकि स्टोर के लिए कुछ लाभ कमाया जा सके।' मैं एक ऐसा डूबता हुआ आदमी हूँ, जिसे बहुत सारे लोग डूबता हुआ देख रहे हैं और उसके डूबने का इंतज़ार कर रहे हैं।"



           एक्जीक्यूटिव ने अपनी दुर्दशा पर बोलना जारी रखा। आखिरकार मैंने उसे बीच में रोककर उससे पूछ ही लिया, "तो आप इस बारे में क्या कर रहे हैं ? आप स्थिति को सुधारने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं ?"



         _“मैं इसमें कर ही क्या सकता हूँ?" उसने जवाब दिया, "मैं सिर्फ यही उम्मीद कर रहा हूँ कि सब कुछ ठीक हो जाए।"



           इस पर मैंने कहा, “परंतु क्या उम्मीद करने से ही सब कुछ ठीक हो जाएगा?" फिर बिना उसे जवाब देने का मौक़ा दिए मैंने उससे अगला सवाल पूछा :



           "क्यों न उम्मीद करने के साथ-साथ आप कुछ प्रयास भी करें?"



          "कैसे?" उसने कहा।



         “आपके मामले में दो तरह के काम किए जा सकते हैं। पहला तो यह कि आप अपनी सेल्स को बढ़ाकर दिखाएँ। हमें यहीं से शरू करना होगा। कोई न कोई वजह तो होगी जिसके कारण आपकी सेल्स कम हो रही है। उस वजह का पता लगाएँ। हो सकता है कि आपको अपना पुराना माल निकालने के लिए स्पेशल सेल लगानी पड़े, ताकि आप नया माल ख़रीद सकें। शायद आपको अपने डिस्प्ले काउन्टर्स को अलग तरीके से जमाना चाहिए। शायद आपको अपने सेल्समैनों में ज्यादा उत्साह भरना चाहिए। मैं यह तो नहीं बता सकता कि किस तरह आपका सेल्स वॉल्यूम बढ़ सकता है, परंतु यह किसी न किसी तरह तो बढ़ ही सकता है। और इसके अलावा आप अपने मैनेजर से भी बात करके देख लें। हो सकता है कि वे आपको नौकरी से निकालने वाले हों, परंतु अगर आप उनकी सलाह लेंगे तो वे आपको समस्या को सुलझाने के लिए  निश्चित रूप से ज़्यादा मोहलत दे देंगे। स्टोर के लिए आपका विकल्प हुँढना बहुत मुश्किल होगा बशर्ते कि टॉप मैनेजमेंट को यह लगे कि आप समस्या को सुलझाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं।"



         मैं आगे कहता रहा, “इसके बाद आप अपने कर्मचारियों से, अपने अधीनस्थों से बात करें। डूबते हुए आदमी की तरह व्यवहार करना छोड़ दें। अपने आस-पास के लोगों को यह एहसास होने दें कि आपमें अभी जान बाक़ी है।”



         एक बार फिर उसकी आँखों में हिम्मत लौट आई थी। फिर उसने पछा, "आपने कहा था कि में दो क़दम उठा सकता है। दूसरा क़दम क्या
है?"



          "दूसरा क़दम यह है, जिसे आप बीमा योजना कह सकते हैं, कि आप किसी दूसरे स्टोर में अपने लिए ऐसी जगह ढूँढ़कर रखें जहाँ आपको यहाँ से ज़्यादा तनख्वाह मिल सके।



         “अगर आप सकारात्मक कार्य करेंगे तो मुझे नहीं लगता कि आपको इसकी ज़रूरत पड़ेगी। आपकी कर्मठता से आपके सेल्स आँकड़े निश्चित रूप से सुधर जाएँगे। फिर भी एक-दो विकल्प रहना हमेशा ज़्यादा अच्छा होता है। याद रखें, बेरोज़गार आदमी के लिए नौकरी हासिल करना बहुत मुश्किल होता है, जबकि पहले से नौकरी कर रहे आदमी के लिए नौकरी हासिल करना बेरोज़गार की तुलना में दस गुना ज़्यादा आसान होता है।"



            दो दिन पहले यही एक्जीक्यूटिव मुझसे मिलने आया।



          “आपसे चर्चा के बाद मैं काम में जुट गया। मैंने बहुत से बदलाव किए, परंतु सबसे बड़ा बदलाव मैंने अपने सेल्समैनों के रवैए में किया। पहले मैं सप्ताह में एक बार मीटिंग लिया करता था, अब मैं हर सुबह मीटिंग लेता हूँ। मैंने इन सभी लोगों में उत्साह भर दिया है। ऐसा लगता है कि मेरे जोश को देखकर उनमें भी हौसला आ गया है। जब उन्होंने देखा कि मुझमें जान बाक़ी है, तो उन्होंने भी ज्यादा मेहनत करने का फैसला कर लिया। ऐसा लगता है जैसे वे सिर्फ इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि मैं आगे बढ़ने में पहल करूँ।



        “अब सब कुछ ठीक चल रहा है। पिछले हफ्ते मेरी बिक्री पिछले साल की तुलना में ज्यादा हुई है और यह स्टोर की औसत बिक्री से भी काफ़ी अच्छी है।



         “ओह, बहरहाल,” उसने कहा, “मैं आपको एक और अच्छी ख़बर सुनाना चाहता हूँ। मुझे दो वैकल्पिक नौकरियों के प्रस्ताव मिले हैं। निश्चित रूप से इससे मैं खुश हूँ परंतु मैंने दोनों को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि यहाँ पर सब कुछ एक बार फिर ठीक-ठाक हो गया है।” 



           जब हम कठिन समस्याओं का सामना करते हैं, तो हम तब तक दलदल में फँसे रहते हैं जब तक कि हम कर्म नहीं करते। आशा से शुरुआत होती है। परंतु जीतने के लिए आशा के साथ-साथ कर्म की भी ज़रूरत होती है।



           कर्म के सिद्धांत पर अमल करें। अगली बार जब भी आपको डर लगे, चाहे डर छोटा हो या बड़ा, अपने आपको सँभालें। फिर इस सवाल का जवाब ढूँढ़ें : किस तरह के काम से मैं अपने डर को जीत सकता हूँ?



         अपने डर का कारण खोज लें। फिर उचित कदम उठाएँ।



          डर और उनके उपचार के कुछ उदाहरण नीचे बताए गए हैं।







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Friday, August 16, 2019

CHAPTER 2.3. बुद्धि के बहानासाइटिस के इलाज के तीन तरीके

        


         बुद्धि के बहानासाइटिस के इलाज के तीन तरीके

बुद्धि के बहानासाइटिस के इलाज के तीन आसान तरीके हैं :

          1. अपनी खुद की बुद्धि को कभी कम न आँके और दूसरों की बुद्धि को कभी ज़रूरत से ज्यादा न आँकें। अपनी सेवाओं को सस्ते में न बेचें। अपने अच्छे बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करें। अपने गुणों को खोजें। याद रखें, महत्व इस बात का नहीं है कि आपमें कितनी बुद्धि है। महत्व तो इस बात का है कि आप अपने दिमाग़ का किस तरह इस्तेमाल करते हैं। इस बात पर सिर न धुनें कि आपका आई क्यू कम है, बल्कि अपनी मानसिकता को सकारात्मक करें।

        2. अपने आपको बार-बार याद दिलाएँ, “मेरी बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण है मेरा नज़रिया।” नौकरी पर और घर पर सकारात्मक नज़रिए का अभ्यास करें। काम टालने के तरीके खोजने के बजाय काम करने के तरीके खोजें। अपने आपमें “मैं जीत रहा हूँ" का रवैया विकसित करें। अपनी बुद्धि का रचनात्मक और सकारात्मक प्रयोग करें। अपनी बुद्धि का प्रयोग इस तरह करें कि आप जीत सकें। अपनी  बुद्धि का दुरुपयोग अपनी असफलता के अच्छे बहाने खोजने में न करें।

         3. याद रखें कि तथ्यों को रटने से ज्यादा महत्वपूर्ण और बहुमूल्य है सोचने की योग्यता। अपने दिमाग को रचनात्मक बनाएँ और नए-नए विचार आने दें। काम करने के नए और बेहतर तरीके खोजते रहें। खुद से पूछे, “क्या मैं अपनी मानसिक क्षमता का उपयोग इतिहास रचने में कर रहा हूँ या इतिहास रटने में?" -

        4. “कोई फायदा नहीं। मेरी उम्र ज़्यादा (या कम) है।" उम्र का बहानासाइटिस असफलता की एक ऐसी बीमारी है जिसमें दोष उम्र के मत्थे मढ़ दिया जाता है। इसके दो आसानी से पहचाने जाने वाले रुप हैं: 'मेरी उम्र ज़्यादा है' का रूप और 'मेरी उम्र अभी बहुत कम है' का ब्रांड। 

        आपने हर उम्र के सैकड़ों लोगों को अपनी असफलताओं के बारे में इस तरह की बातें करते सुना होगा : “इस काम में सफल होने के लिए मेरी उम्र बहुत ज़्यादा (या बहुत कम) है। अपनी उम्र के कारण ही मैं वह नहीं कर सकता जो मैं करना चाहता हूँ या जो करने में मैं सक्षम हूँ।"

        यह आश्चर्यजनक है परंतु बहुत कम लोग ऐसा महसूस करते हैं कि उनकी उम्र किसी काम के लिए “बिलकुल सही" है। इस बहाने ने हज़ारों लोगों के लिए सच्चे अवसर के दरवाजे बंद कर दिए हैं। वे सोचते हैं कि उनकी उम्र ही ग़लत है, इसलिए वे कोशिश करने की जहमत भी नहीं उठाते।

         उम्र के बहानासाइटिस का सबसे लोकप्रिय रूप है “मेरी उम्र ज्यादा है।" यह बीमारी बहुत सूक्ष्म तरीके से फैलाई जाती है। टीवी के सीरियलों में दिखाया जाता है कि जब कंपनी के विलय के कारण किसी एक्जीक्यूटिव की नौकरी छूट जाती है, तो वह बेरोज़गार हो जाता है। उसे कहीं भी नौकरी नहीं मिल पाती, क्योंकि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। मिस्टर एक्जीक्यूटिव महीनों तक नौकरी की तलाश करते हैं, परंतू उन्हें नौकरी नहीं मिलती और इस दौरान वे कुछ समय तक आत्महत्या के विकल्प पर विचार करते हैं और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
कि अब खुद को रिटायर समझ लेने में ही समझदारी है।

      “चालीस के बाद आपकी जिंदगी में मुश्किलें क्यों बढ़ जाती हैं," यह विषय नाटकों और पत्रिकाओं के लेखों में लोकप्रिय है, इसलिए नहीं क्योंकि इसमें सच्चे तथ्य हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि बहाना ढूँढ़ने वाले बहुत से लोग इसी तरह के नाटक देखना चाहते हैं और इसी तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं।

उम्र के बहानासाइटिस का इलाज क्या है

उम्र के बहानासाइटिस का इलाज किया जा सकता है। कुछ साल पहले जब मैंने एक सेल्स ट्रेनिंग प्रोग्राम का संचालन किया था, तो मैंने एक अच्छे सीरम की खोज की थी जो इस बीमारी का इलाज तो करता ही था, साथ ही यह भी सुनिश्चित करता था कि यह बीमारी आपको कभी न हो।

        इस प्रोग्राम में सेसिल नाम का एक प्रशिक्षु था। चालीस वर्षीय सेसिल निर्माता का प्रतिनिधि बनना चाहता था, परंतु सोचता था कि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। उसने कहा, "मुझे शुरू से सब कुछ करना पडेगा। और अब मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? अब मैं चालीस बरस का हो गया हूँ।"

        मैंने “ज्यादा उम्र की समस्या" पर सेसिल के साथ कई बार बात की। मैंने परानी दवा का इस्तेमाल किया, 'आपकी उम्र उतनी ही होती है. जितना आप समझते हैं।' परंतु मैंने पाया कि उसका मर्ज़ इस दवा से ठीक नहीं हो रहा है। (ज़्यादातर लोग इसके जवाब में कहते हैं, “परंत
मैं अपने आपको बूढ़ा समझता हूँ!")


       अंततः, मैंने एक ऐसा तरीक़ा खोज लिया जो जादू की तरह काम कर गया। एक दिन मैंने सेसिल से कहा, "ससिल, मुझे यह बताओ कि किसी आदमी की रचनात्मक उम्र कब शुरू होती है ?" |


        उसने एक-दो सेकंड तक सोचने के बाद जवाब दिया, "लगभग 20 साल की उम्र में।"

       “अच्छा," मैंने कहा, “और अब मुझे यह बताओ कि किसी आदमी की रचनात्मक उम्र कब ख़त्म होती है?"

         सेसिल ने जवाब दिया, “मुझे लगता है कि अगर वह तंदुरुस्त है और अपने काम को पसंद करता है तो कोई आदमी 70 साल की उम्र तक रचनात्मक कार्य कर सकता है।"

          "ठीक है," मैंने कहा, “बहुत से लोग 70 साल के बाद भी बहुत से रचनात्मक कार्य करते हैं, परंतु मैं आपसे सहमत हो जाता हूँ कि किसी आदमी के रचनात्मक कार्य करने की उम्र 20 से 70 साल के बीच होती है। और इस दौरान उसके पास 50 साल यानी कि आधी सदी होती है। "सेसिल," मैंने कहा, "आप अभी चालीस साल के हैं। आपकी रचनात्मक ज़िंदगी कितनी ख़त्म हो चुकी है ?"

        “बीस साल," उसने जवाब दिया।


        “और आपकी रचनात्मक ज़िंदगी अभी कितनी बाक़ी है ?" |


        "तीस साल," उसने जवाब दिया।

        "दूसरे शब्दों में, सेसिल, आपने अभी आधा रास्ता भी तय नहीं किया है। आपने अभी अपने रचनात्मक वर्षों का सिर्फ 40 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा किया है।"

         मैंने सेसिल की तरफ़ देखा और यह महसूस किया कि यह बात उसके दिल को छू गई थी। उसकी उम्र का बहानासाइटिस तत्काल दूर हो गया। सेसिल ने देखा कि उसके सामने अभी बहुत से अवसरपूर्ण वर्ष मौजूद हैं। अभी तक वह सोचता था, “मैं तो अब बूढ़ा हो चला हूँ," परंतु अब वह सोचने लगा, "मैं अब भी युवा हूँ।" सेसिल ने अब महसूस किया कि हमारी उम्र कितनी है, इस बात का कोई खास महत्व नहीं होता। दरअसल, उम्र के बारे में हमारा नज़रिया ही हमारे लिए वरदान या शाप बन जाता है।

         उम्र के बहानासाइटिस का इलाज करने से आपके लिए अवसरों के वे बंद दरवाज़े खुल जाएंगे जिन पर इस बीमारी की वजह से ताला लगा हुआ था। मेरे एक रिश्तेदार ने अलग-अलग तरह के काम करने में अपने कई साल बर्बाद किए- जैसे सेल्समैनशिप, अपना बिज़नेस करना. बैंको काम करना- परंतु वह यह तय नहीं कर पाया कि वह क्या करना चाहता था या उसे कौन सा काम पसंद था। आखिरकार, वह इस नतीजे पर पहुँचा कि वह पादरी बनना चाहता था। परंतु जब उसने इस बारे में सोचा तो उसने पाया कि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। अब वह 45 वर्ष का था. उसके तीन बच्चे थे और उसके पास पैसा भी ज़्यादा नहीं था।

        परंतु सौभाग्य से उसने अपनी पूरी ताक़त जुटाई और खुद से कहा. "चाहे मेरी उम्र पैंतालीस साल हो या पैंसठ साल, मैं पादरी बनकर
दिखाऊँगा।"

          उसके पास आस्था का भंडार था, और इसके सिवा कुछ नहीं था। उसने विस्कॉन्सन में 5 वर्षीय धर्मशास्त्र प्रशिक्षण कार्यक्रम में अपना नाम लिखवा लिया। पाँच साल बाद वह पादरी बन गया और इलिनॉय के चर्च में अपने लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब हुआ।

          बूढ़ा ? बिलकुल नहीं। अभी तो उसके सामने 20 वर्ष की रचनात्मक ज़िंदगी बाक़ी थी। मैं इस आदमी से हाल ही में मिला था और उसने मुझे बताया, “अगर मैंने 45 वर्ष की उम्र में इतना बड़ा फैसला नहीं किया होताbतो मेरी बाकी ज़िंदगी दुःख भरी होती। जबकि अभी मैं अपने आपको उतना ही युवा समझता हूँ जितना कि मैं 25 वर्ष पहले था।"

           और उसकी उम्र कम लग भी रही थी। जब आप उम्र के बहानासाइटिस को हरा देते हैं, तो इसका स्वाभाविक परिणाम यह होता है कि आपमें युवावस्था का आशावाद आ जाता है और आप युवा दिखने भी लगते हैं। जब आप उम्र की सीमाओं के अपने डर को जीत लेते हैं तो आप अपनी जिंदगी में कुछ साल तो जोड़ ही लेते हैं, अपनी सफलता में भी कुछ साल जोड़ लेते हैं।

             यूनिवर्सिटी के मेरे एक पुराने सहयोगी ने मुझे ऐसा दिलचस्प तरीका बताया जिससे उम्र के बहानासाइटिस को हराया जा सकता था। बिल ने हार्वर्ड से बीस के दशक में ग्रैजुएशन किया था। 24 साल तक स्टॉक ब्रोकर रहने के बाद बिल ने यह फैसला किया कि वह कॉलेज प्रोफ़ेसर बनेगा। बिल के दोस्तों ने उसे चेतावनी दी कि यह बहुत मेहनत का काम है और उससे इस उम्र में उतनी मेहनत नहीं होगी। परंतु बिल ने अपने लक्ष्य को हासिल करने का पक्का इरादा कर लिया था और उसने 51 वर्ष की उम्र में यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय में दाखिला लिया। 55 वर्ष की उम्र में उसे डिग्री मिली। आज बिल एक बढ़िया आर्टस कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ़
इकॉनोमिक्स का चेयरमैन है। वह सुखी भी है। वह मुस्कराते हुए कहता है, “अभी तो मेरी जिंदगी के एक तिहाई बेहतरीन साल बाक़ी हैंl"

          ज़्यादा उम्र का बहाना असफलता देने वाली बीमारी है। इसे हराएँ, वरना यह आपको हरा देगी।

            कोई आदमी ज़्यादा छोटा कब होता है ? “मेरी उम्र अभी बहुत कम है" भी उम्र के बहानासाइटिस का एक ऐसा प्रकार है जिसने कई लोगों का भविष्य चौपट कर दिया है। लगभग एक साल पहले जेरी नाम का 23 वर्षीय युवक मेरे पास एक समस्या लेकर आया। जेरी सर्विस में एक पैराट्रपर था और इसके बाद वह कॉलेज गया था। कॉलेज जाते-जाते भी जेरी ने अपने पत्नी और बच्चों की खातिर एक बड़ी ट्रांसफ़र-एंड-स्टोरेज कंपनी के लिए सेल्समैन का काम किया। उसने बहुत बेहतरीन काम किया। कॉलेज में भी और कंपनी में भी।

            परंतु आज जेरी चिंतित था। “डॉ. श्वार्ट्ज़," उसने कहा, “मेरी एक समस्या है। मेरी कंपनी ने मुझे सेल्स मैनेजर बनाने का फैसला किया है। इससे मैं आठ सेल्समैनों का सुपरवाइज़र बन जाऊँगा।"

          मैंने कहा, "बधाइयाँ, यह तो बहुत बढ़िया बात है। फिर तुम इतने परेशान क्यों दिख रहे हो?"

           उसने जवाब दिया, “मुझे जिन आठ लोगों का सुपरवाइज़र बनाया गया है. वे सभी मुझसे सात साल से लेकर इक्कीस साल तक बड़े हैं। मुझेऐसे में क्या करना चाहिए? क्या मैं यह काम ठीक से कर सकता हूँ?"

          "जेरी," मैंने कहा, "तुम्हारी कंपनी का जनरल मैनेजर तो यही समझता है कि तुम यह काम ठीक से कर पाओगे वरना वह तुम्हें सुपरवाइज़र बनाता ही क्यों। सिर्फ तीन बातें याद रखो और हर चीज़ ठीक हो जाएगी। पहली बात तो यह कि उम्र पर ध्यान ही मत दो। खेत में कोई बच्चा तभी आदमी माना जाता है जब वह यह साबित कर देता है कि वह आदमी के बराबर काम कर सकता है। उसकी उम्र से इसका कोई लेना-देना नहीं होता। और यही तुम्हें भी साबित करना होगा। जब तुम यह साबित कर दोगे कि तुम सेल्स मैनेजर के काम को अच्छी तरह से कर सकते हो, तो तुम अपने आप उतने बड़े हो जाओगे।

          “दूसरी बात, अपने 'प्रमोशन' पर कभी इतराने की कोशिश मत करना। सेल्समैनों के प्रति सम्मान दिखाना। उनसे सलाह लेना। उन्हें यह महसूस कराना कि वे एक टीम के कप्तान के साथ काम कर रहे हैं, किसी तानाशाह के साथ नहीं। अगर तुम ऐसा करोगे, तो वे लोग तुम्हारे
साथ काम करेंगे, न कि तुम्हारे विरुद्ध।

          "तीसरी बात, इस बात की आदत डाल लो कि तुमसे ज्यादा उम्र वाले लोग तुम्हारे अधीन काम करें। हर क्षेत्र का लीडर जल्दी ही यह जान लेता है कि उसकी उम्र अपने कई अधीनस्थों से कम है। इसलिए इस बात की आदत डाल लो। यह आगे आने वाले सालों में तुम्हारे काफ़ी काम आएगी, जब तुम्हें और भी बड़े अवसर मिलेंगे।

          "और याद रखो, जेरी, तुम्हारी उम्र तुम्हारी सफलता की राह में कभी बाधा नहीं बनेगी, जब तक कि तुम खुद उसे बाधा न बनाओ।"

        आज जेरी का काम बढ़िया चल रहा है। उसे ट्रांसपोर्टेशन बिज़नेस पसंद है और कुछ ही सालों में वह अपनी खुद की कंपनी शुरू करने की योजना बना रहा है।

          कम उम्र तभी बाधा बनती है, जब आप खुद ऐसा सोचते हैं। आप अक्सर सुनते होंगे कि कई कामों में "काफ़ी" शारीरिक परिपक्वता की जरूरत होती है जैसे सिक्युरिटीज़ या बीमा बेचने में। किसी निवेशक का विश्वास जीतने के लिए या तो आपके बाल सफ़ेद होने चाहिए या फिर आपके सिर पर बाल ही नहीं होने चाहिए- ऐसा सोचना सरासर मर्खता है। असली महत्व तो इस बात का है कि आप अपना काम कितनी अच्छी तरह से करते हैं। अगर आप अपने काम पर पकड़ रखते हैं, लोगों को समझते हैं तो आप पर्याप्त परिपक्व हैं। उम्र का योग्यता से कोई सीधा संबंध नहीं होता जब तक कि आप खुद को यह यकीन न दिला दें कि उम्र और केवल उम्र ही आपको सफलता या असफलता दिला सकती है।

           कई युवा लोग यह महसूस करते हैं कि वे अपनी कम उम्र के कारण जिंदगी की दौड़ में पीछे हैं। हो सकता है कि किसी ऑफ़िस में कोई असुरक्षित आदमी या वह आदमी जिसे अपनी नौकरी छूटने का डर हो, आपके आगे बढ़ने की राह में रोड़े डाले। और हो सकता है कि वह आपकी उम्र का और आपके अनुभव की कमी का ज़िक्र भी करे।

           परंतु आपको ऐसे असुरक्षित लोगों की बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है। कंपनी के मालिक, कंपनी के मैनेजर ऐसा नहीं सोचेंगे। वे आपको उतनी ज़िम्मेदारी देंगे, जितनी कि आप निभा सकें। यह साबित करें कि आपमें योग्यता है, सकारात्मक रवैया है और आपकी कम । उम्र एक लाभ के रूप में गिनी जाएगी।

         संक्षेप में, उम्र के बहानासाइटिस के इलाज यह हैं :

         1. अपनी वर्तमान उम्र के बारे में सकारात्मक सोच रखें। यह सोचें, "मैं अभी भी युवा हूँ;" यह न सोचें, “मैं अब बूढ़ा हो चुका हूँ।" नए लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश करते रहें। ऐसा करेंगे तो आपमें मानसिक उत्साह आ जाएगा और आप अधिक युवा भी दिखने लगेंगे।

         2. हिसाब लगाएँ कि आपके पास कितना रचनात्मक समय बचा है। याद रखें, तीस साल के आदमी के पास अपने जीवन का 80 प्रतिशत रचनात्मक समय शेष है। और 50 साल के आदमी के पास अब भी 40 प्रतिशत समय है- शायद सर्वश्रेष्ठ समय तो अभी आना शेष है। ज़्यादातर लोग जितना सोचते हैं, ज़िंदगी दरअसल उससे लंबी होती है!

        3. भविष्य में वह काम करें जो आप सचमुच करना चाहते हों। जब आप अपने दिमाग को नकारात्मक कर लेते हैं और सोचते हैं कि अब तो समय निकल चुका है, तभी आपके हाथ से समय सचमुच निकलता है। यह सोचना छोड़ दें, "मुझे यह काम सालों पहले शुरू कर देना चाहिए था।" यह असफलता की सोच है। इसके बजाय यह सोचें, “मैं अब शुरू करने जा रहा हूँ, मेरे सर्वश्रेष्ठ वर्ष अभी बाक़ी हैं।" सफल लोग इसी तरीके से सोचते हैं।

         4. "परंतु मेरा मामला अलग है। मेरी तो किस्मत ही खराब है।" हाल ही में, मैंने सड़क दुर्घटनाओं के बारे में एक ट्रैफ़िक इंजीनियर की बातें सुनीं। उसका कहना था कि हर साल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 40,000 लोग मर जाते हैं। उसकी चर्चा का मुख्य बिंदु यह था कि शायद ही कभी कोई सच्ची दुर्घटना होती हो। हम जिसे दुर्घटना मानते हैं, वह दरअसल किसी मानवीय या मशीनी गड़बड़ी का परिणाम होती है।

         यह ट्रैफिक विशेषज्ञ जो बात कह रहा था, उसका मूल भाव दार्शनिक और चिंतक हमें सदियों से सिखाते आ रहे हैं: हर चीज़ का कोई न कोई कारण होता है। कोई भी चीज़ बिना कारण के नहीं होती। आज बाहर जो मौसम है, वह भी दुर्घटनावश नहीं है। वह किन्हीं विशेष
कारणों से वैसा है। और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इंसान के मामले इस नियम का अपवाद है।

          परंतु शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रता हो जब हम किसी को अपनी "बदकिस्मती" को दोष देते न सुनते हों। और वह दुर्लभ दिन ही होगा जब आप किसी दूसरे आदमी की सफलता के बारे में उसकी “अच्छी" किस्मत की दुहाई न सुनें।

          मैं आपको एक उदाहरण से समझाना चाहता हूँ कि लोग किस तरह क्रिस्मत के बहानासाइटिस से पीड़ित होते हैं। मैंने तीन युवा जूनियर एक्जीक्यूटिब्ज के साथ हाल ही में लंच लिया। उस दिन चर्चा का मुख्य बिंदु था जॉज सी. का प्रमोशन। कल तक जॉर्ज इन्हीं लोगों की तरह जूनियर एक्जीक्यूटिव था। आज उसे प्रमोशन मिल गया था।

          जॉर्ज को प्रमोशन क्यों मिला? इन तीनों लोगों ने इस मुद्दे का पोस्टमार्टम किया और बहुत से कारण खोज निकाले : अच्छी किस्मत, मक्खनपॉलिश, प्रेशर, और जॉर्ज की पत्नी का सोर्स, यानी सच्चाई को छोड़कर हर बात कही गई। सच्चाई यह थी कि जॉर्ज इस प्रमोशन के लिए सबसे ज़्यादा योग्य था। वह अपने काम को बेहतर तरीके से कर रहा था। वह ज्यादा मेहनत से काम कर रहा था। वह अधिक प्रभावी और कार्यकुशल व्यक्ति था।

           मैं यह भी जानता था कि उस कंपनी के सीनियर ऑफिसर्स ने काफ़ी सोच-विचार किया था कि इन चारों में से किसे प्रमोशन मिले। मेरे इन तीन निराश दोस्तों को यह समझना चाहिए था कि कंपनी के सीनियर ऑफिसर्स जब प्रमोशन देते हैं, तो वे चारों नाम लिखकर टोपी में से किसी एक का नाम नहीं निकालते हैं।

           मैं मशीन के पुर्जे बनाने वाली कंपनी के सेल्स एक्जीक्यूटिव से किस्मत केबहानासाइटिस के बारे में बातें कर रहा था। वह समस्या को सनकर रोमांचित हो गया और उसने मुझे अपने जीवन का एक किस्सा नाका सुनाया।

          "मैंने इसका यह नाम तो पहले कभी नहीं सुना,” उसका कहना था, "परंतु हर सेल्समैन इस गंभीर समस्या से जूझता है। कल ही हमारी कंपनी में जो घटना हुई, उससे आपको एक बढ़िया उदाहरण मिल जाएगा।

          "हमारा एक सेल्समैन चार बजे मशीन के पुों का एक बड़ा ऑर्डर लेकर आया। ऑर्डर 112,000 डॉलर का था। दूसरा सेल्समैन उस वक्त वहीं ऑफ़िस में खड़ा हुआ था। इस सेल्समैन का माल इतना कम बिकता था कि वह कंपनी पर बोझ बनता जा रहा था। जब जॉन ने अच्छी ख़बर सुनाई तो उसने ईर्ष्या भरी बधाइयाँ तो दी, परंतु साथ में यह भी कहा, 'जॉन, एक बार फिर तुम्हारी किस्मत अच्छी रही!' ।

           "देखने वाली बात यह है कि यह कमज़ोर सेल्समैन यह मानने को तैयार ही नहीं था कि जॉन के बड़े ऑर्डर से किस्मत का कोई लेना-देना नहीं था। जॉन उस ग्राहक पर कई महीनों से मेहनत कर रहा था। उसने वहाँ आधा दर्जन लोगों से लंबी और बार-बार चर्चाएँ की थीं। जॉन रातों को योजनाएँ बनाया करता था कि वह किस तरह यह ऑर्डर हासिल कर सकता था। फिर उसने हमारे इंजीनियरों के साथ बैठकर उस यंत्र के शुरुआती डिज़ाइन बनवाए। जॉन खुशकिस्मत नहीं था; जब तक कि आप सुनियोजित काम करने के तरीके को किस्मत का नाम न दें।"

            अगर किस्मत के सहारे हम जनरल मोटर्स को एक बार फिर से गठित करें। अगर किस्मत ही यह तय करे कि कौन आदमी मैनेजर बनेगा और कौन चपरासी. तो इस देश का हर बिज़नेस चौपट हो जाएगा। एक मिनट के लिए कल्पना करें कि जनरल मोटर्स को हम किस्मत के सहारे पूरी तरह पुनर्गठित करें। इस काम के लिए हम एक बक्से में सभी कर्मचारियों के नाम की पर्ची डाल दें। पर्ची उठाने पर जिसके नाम की पहली पर्ची खुलेगी, उसे हम प्रेसिडेन्ट बना देंगे, दूसरे नाम वाले को वाइस प्रेसिडेन्ट और इसी क्रम से हम नीचे की तरफ़ आते जाएँगे।

          यह मूर्खतापूर्ण लगता है, नहीं क्या? परंतु किस्मत जब काम करती है, तो इसी तरह से करती है।

          जो लोग किसी भी व्यवसाय में चोटी पर पहुँचते हैं, चाहे वह बिज़नेस मैनेजमेंट हो, सेल्समैनशिप हो, कानून, इंजीनियरिंग, अभिनय या और कोई क्षेत्र हो, वे इसलिए चोटी पर पहुँचते हैं, क्योंकि उनका नज़रिया उत्कृष्ट होता है और वे साथ में कड़ी मेहनत भी करते हैं।

           क़िस्मत के बहानासाइटिस को दो तरीक़ों से जीतें

           1. कारण और परिणाम के नियम को स्वीकार करें। जब आपको लगे कि कोई आदमी "खुशकिस्मत" है तो ज़रा गौर से देखें। तब आपको यह दिखेगा कि जिसे आप पहली नज़र में अच्छी किस्मत समझे थे, दरअसल वह तैयारी, योजना और सफलता के नज़रिए का परिणाम है। इसी तरह किसी आदमी की "बदकिस्मती" को भी गौर से देखें। आपको उसके पीछे भी कुछ कारण मिलेंगे। मिस्टर सफल को जब झटका लगता है, तो वे उससे कुछ सीखते हैं और उससे लाभ उठाते हैं। परंतु जब मिस्टर असफल हारते हैं, तो वे अपनी असफलता से कुछ नहीं सीखते और बहाने बनाते रहते हैं।

            2. कभी भी दिवास्वप्न न देखें। अपनी मानसिक ऊर्जा को ऐसे सपने देखने में ज़ाया न करें जिसमें बिना मेहनत के सफलता हासिल की जा सकती हो। हम किस्मत के सहारे सफल नहीं होते। सफलता उन चीज़ों को करने से आती है और उन सिद्धांतों में पारंगत होने से मिलती है जो सफल में सहायक होते हैं। प्रमोशन, जीत, जीवन की अच्छी चीज़ों में किस्मत का सहारा न लें। किस्मत से ये चीजें नहीं मिला करतीं। इसके बजाय, आप अपने आपमें ऐसे गुण विकसित करें कि आप सचमुच एक विजेता बन जाएँ।

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Monday, August 12, 2019

CHAPTER 2.2. सेहत के बहानासाइटिस से बचने के चार तरीके



सेहत के बहानासाइटिस से बचने के चार तरीके

सेहत के बहानासाइटिस से बचाव के सर्वश्रेष्ठ वैक्सीन के चार डोज़ हैं :

      1. अपनी सेहत के बारे में बात न करें। आप किसी बीमारी के बारे में जितनी ज्यादा बात करेंगे, चाहे वह साधारण सी सर्दी ही क्यों न हो, वह बीमारी उतनी ही बिगड़ती जाएगी। बुरी सेहत के बारे में बातें करना काँटों को खाद-पानी देने की तरह है। इसके अलावा, अपनी सेहत के बारे में बातें करते रहना एक बुरी आदत है। इससे लोग बोर हो जाते हैं। इससे आपको आत्म-केंद्रित और बुढ़िया की तरह बातें करने वाला समझा जा सकता है। सफलता की चाह रखने वाले आदमी अपनी “बुरी” सेहत के बारे में चिंता नहीं करता। अपनी बीमारी का रोना रोने से आपको थोड़ी सहानुभूति तो मिल सकती है (और मैं सकती शब्द पर ज़ोर देना चाहूँगा), परंतु जो आदमी हमेशा शिकायत करता रहता है, उसे कभी किसी का सम्मान, आदर या वफ़ादारी नहीं मिल सकते।

         2. अपनी सेहत के बारे में फालतू की चिंता करना छोड़ दें। डॉ. वॉल्टर अल्वरेज़ विश्वप्रसिद्ध मेयो क्लीनिक में एमेरिटस कन्सल्टेंट हैं। उन्होंने हाल ही में लिखा है, “मैं हमेशा फ़िजूल की चिंता करने वाले लोगों को ऐसा न करने की सलाह देता हूँ। उदाहरण के तौर पर, मैंने एक आदमी को देखा जिसे इस बात का पूरा विश्वास था कि उसका ‘गाल ब्लैडर' खराब है, हालाँकि आठ बार अलग-अलग क्लीनिकों में एक्स-रे। कराने पर भी उसका गाल ब्लैडर पूरी तरह सही दिख रहा था और डॉक्टरों का कहना था कि यह सिर्फ उसके मन का वहम है और दरअसल उसे कोई बीमारी नहीं है। मैंने उससे विनती की कि वह अब तो मेहरबानी करके अपने गाल ब्लैडर का एक्स-रे कराना छोड़ दे। मैंने सेहत का जरूरत  से ज्यादा ध्यान रखने वाले सैकड़ों लोगों को बार-बार जबरन ई भी कराते देखा है और मैंने उनसे भी यही विनती की है कि वे अपनी बीमारी के बारे में फालतू की चिंता करना छोड़ दें।

      3. आपकी सेहत जैसी भी हो, आपको उसके लिए कृतज्ञ होना चाहिए। एक पुरानी कहावत है, “मैं अपने फटे हुए जूतों को लेकर दुःखी हो रहा था, परंतु जब मैंने बिना पैरों वाले आदमी को देखा तो मुझे ऊपर वाले से कोई शिकायत नहीं रही, इसके बजाय मैं कृतज्ञ हो चला।” इस बात पर शिकायत करने के बजाय कि आपकी सेहत में क्या “अच्छा नहीं है, आपको इस बारे में खुश और कृतज्ञ होना चाहिए कि आपकी सेहत में क्या ‘अच्छा है। अगर आप कृतज्ञ होंगे तो आप कई असली
बीमारियों से भी बचे रहेंगे।

       4. अपने आपको यह अक्सर याद दिलाएँ “जंग लगने से बेहतर है घिस जाना।” आपको जीवन मिला है आनंद लेने के लिए। इसे बर्बाद न करें। जिंदगी जीने के बजाय अगर आप चिंता करते रहेंगे, तो आप जल्दी ही किसी अस्पताल में भर्ती नज़र आएँगे।

2.      “परंतु मेरे पास सफल लोगों जितनी बुद्धि नहीं है।” बुद्धि का बहानासाइटिस या “मेरे पास उतनी बुद्धि नहीं है” बहुत लोकप्रिय बहाना है। वास्तव में यह इतना आम है कि यह हमारे आस-पास के तक़रीबन 95 प्रतिशत लोगों में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है। बहानासाइटिस के बाक़ी रूपों में तो व्यक्ति बढ़-चढ़कर बातें करता है, परंतु इस क़िस्म के बहानासाइटिस यानी बुद्धि के बहानासाइटिस में व्यक्ति चुपचाप दुःखी होता रहता है। ज्यादातर लोग दूसरों के सामने यह मानने को तैयार नहीं होते कि उनमें पर्याप्त बुद्धि या समझ नहीं है। परंतु, वे अंदर से यह बात महसूस करते हैं।

         जब बुद्धि की बात आती है, तो हममें से ज्यादातर लोग दो तरह की मूलभूत गलतियाँ करते हैं :

          1. हम अपनी बुद्धि को कम आँकते हैं, और

          2. हम दूसरे व्यक्ति की बुद्धि को ज्यादा आँकते हैं।

        इन गलतियों के कारण लोग काफ़ी नुक़सान में रहते हैं। वे चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने में असफल रहते हैं, क्योंकिउ“बुद्धि की ज़रूरत होती है। परंतु तभी वहाँ एक ऐसा व्यक्ति आता है जो बुद्धि के बारे में ज़रा भी विचार नहीं करता और उसे वह काम मिल जाता है।

             दरअसल महत्व इस बात का नहीं है कि आपमें कितनी बुद्धि है। बल्कि इस बात का है कि जो आपके पास है आप उसका किस तरह उपयोग करते हैं। आपकी बुद्धि की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह चिंतन या वह नज़रिया जो आपकी बुद्धि को दिशा दिखा रहा है। मुझे
इस बात को दोहराने दें, क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है : आपकी बुद्धि की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह चिंतन या वह नज़रिया जो आपकी बुद्धि को दिशा दिखा रहा है।

देश के मशहूर डॉक्टर एडवर्ड टेलर से एक बार किसी ने यह सवाल पूछा, “क्या कोई भी बच्चा वैज्ञानिक बन सकता है ?” टेलर ने जवाबदि  “वैज्ञानिक बनने के लिए तूफ़ानी दिमाग की ज़रूरत नहीं होती, न ही चमत्कारी याददाश्त की ज़रूरत होती है, न ही यह ज़रूरी है कि बच्चा स्कूल में बहुत अच्छे नंबरों से पास हो। वैज्ञानिक बनने के लिए केवल यह ज़रूरी है कि बच्चे की विज्ञान में काफ़ी रुचि हो। उसकी यह रुचि जितनी ज्यादा होगी, वह उतना ही बड़ा वैज्ञानिक बन सकता है।”

           तो रुचि या उत्साह विज्ञान में 
महत्वपूर्ण होते हैं!

         अगर 100 आई क्यू वाले किसी व्यक्ति का रवैया सकारात्मक, आशावादी और सहयोगात्मक है, तो वह उस व्यक्ति से ज्यादा पैसा, सफलता और सम्मान हासिल करेगा, जिसका आई क्यू तो 120 है, परंतु उसका रवैया नकारात्मक, निराशावादी और असहयोगात्मक है।

किसी काम में जुटे रहिए जब तक कि वह पूरा न हो जाए- यही असली पते की बात है। आलसी बुद्धि किस काम की ? अक्सर जुटे रहने वाला व्यक्ति उस बुद्धिमान और प्रतिभाशाली व्यक्ति से ज्यादा सफल होता है जो कोई काम पूरा नहीं करता है।

जुटे रहने की क्षमता ही योग्यता का 95 प्रतिशत हिस्सा है।

        पिछले साल मैं अपने कॉलेज के एक पुराने दोस्त चक से 10 साल बाद मिला। चक बहुत ही प्रतिभाशाली छात्र था और उसने ऑनर्स केसा ग्रेजुएशन किया था। जब मैं उससे आख़िरी बार मिला था, तो उसका लक्ष्य था पश्चिमी नेब्रास्का में अपना बिज़नेस खड़ा करना।

         मैंने चक से पूछा कि आखिरकार उसने किस तरह का बिज़नेस खड़ा किया है।

          उसका जवाब था, “मैं कोई बिज़नेस खड़ा नहीं कर पाया। पाँच साल पहले मैं तुम्हें यह नहीं बताता, एक साल पहले भी नहीं, परंतु अब
मैं इस बारे में बात करने के लिए तैयार हैं।” 

“अब जब मैं अपने कॉलेज के दिनों की याद करता हूँ, तो मुझे यह महसूस होता है कि मैं हर योजना की खामियाँ ढूँढने में माहिर था। मैं यह बता सकता था कि कोई बिज़नेस क्यों चौपट हो जाएगा, कोई योजना क्यों असफल हो जाएगी, राह में कितनी मुश्किलें आएंगी : 'आपके पास बहुत सारी पूँजी होनी चाहिए, 'यह सुनिश्चित कर लें कि बिज़नेस साइकल सही हो,' जो सामान हम बनाएँगे, क्या उसकी बहुत माँग है?' ‘क्या स्थानीय उद्योग स्थिर और स्थाई हैं ?'- और इसी तरह के एक हज़ार एक सवाल जिनके जवाब ढूंढे बिना कोई बिज़नेस शुरू करना खतरनाक हो सकता था।

मुझे सबसे ज्यादा कष्ट इस बात से होता है कि मेरे वे दोस्त जिनमें ज्यादा बुद्धि नहीं थी, या वे लोग जो कभी कॉलेज गए ही नहीं थे, उन्होंने अच्छे-खासे बिज़नेस खड़े कर लिए हैं। जबकि मैं वहीं का वहीं हैं, उनकी कंपनियों का ऑडिट करता फिर रहा हूँ। कोई बिज़नेस क्यों असफल हो सकता है. इसके बारे में सोचते रहने के बजाय काश मैंने यह सोचा होता। कि कोई बिज़नेस किस तरह सफल हो सकता है! अगर मैंने सकारात्मक चिंतन किया होता तो मेरी जिंदगी ज्यादा सुखद होती।"

         चक की बुद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण था उसका सोचने का नज़रिया, जिसने चक की बुद्धि को गलत राह दिखाई। कई प्रतिभाशाली लोग क्यों असफल होते हैं ? पिछले कई सालों से मैं एक ऐसे आदमी के संपर्क में हैं जो बेहद प्रतिभाशाली है, जिसमें बुद्धि की कोई कमी नहीं है और उसका नाम है फी बेटा काप्पा। इतनी बुद्धि होने के बावजूद वह बहुत असफल है। उसकी नौकरी भी सामान्य है (वह ज़िम्मेदारियों से घबराता है)। उसने कभी शादी नहीं की (वह मानता है। कि ज्यादातर शादियों का अंत तलाक़ में होता है)। उसके बहुत कम दोस्त हैं (लोगों से बातें करना उसे बोरिंग लगता है)। उसने किसी तरह की जायदाद नहीं खरीदी है (इस डर से कि कहीं वह अपना पैसा न गंवा दे)। यह आदमी अपनी बद्धि का इस्तेमाल करके यह सिद्ध कर देता है कि चीजें क्यों असफल होंगी। इसके बजाय उसे अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके यह सिद्ध करना चाहिए कि सफल किस तरह हुआ जाए।'

        जैसा मैंने कहा उसके पास बुद्धि की कमी नहीं है, सिर्फ उसके सोचने का नज़रिया गलत है। और इसी कारण यह प्रतिभाशाली आदमी समाज को बहुत कम योगदान दे पाया है और उसने कोई रचनात्मक कार्य नहीं किया है। अगर वह अपना नज़रिया बदल ले, तो वह बड़े-बड़े काम कर सकता है। उसमें अद्भुत सफलता दिलाने वाला दिमाग़ तो है, परंतु उसका नज़रिया उतना ताक़तवर नहीं है।

मैं एक और ऐसे ही आदमी को जानता हूँ जो न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पीएच.डी. करने के बाद सेना में भर्ती हुआ। उसने सेना में तीन साल किस तरह बिताए ? स्टाफ़ ऑफ़िसर के रूप में नहीं। न ही स्टाफ़ स्पेशलिस्ट के रूप में। इसके बजाय, वह तीन साल तक सेना का ट्रक चलाता रहा। क्यों ? क्योंकि उसके मन में अपने साथी सिपाहियों के प्रति नकारात्मक विचार भरे हुए थे (“मैं उनसे श्रेष्ठ हूँ”), सेना के नियम-क़ायदों से वह चिढता था (“सारे नियम बकवास और मूर्खतापूर्ण हैं”), अनुशासन को वह पसंद नहीं करता था (“यह दूसरों पर लागू होता होगा, मुझ पर नहीं होगा”), यानी कि हर चीज़ के बारे में उसका नज़रिया नकारात्मक था, जिसमें वह खुद भी शामिल था (“मैं कैसा मूर्ख था जो इस झमेले में आ फँसा और अब यहाँ से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूंढ पा रहा हैं")।

         ऐसे आदमी का आदर कौन करता ? उसका सारा ज्ञान उसके दिमाग के गोदाम में भरा रहा और वहीं दफ़न होकर रह गया। उसके
नकारात्मक विचारों ने उसे निठल्ला बना दिया था।

            याद रखें, आपकी बुद्धि की मात्रा से ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह चिंतन या वह नज़रिया जो आपकी बुद्धि को दिशा दिखा रहा है। पीएच. डी. की डिग्री भी इस मूलभूत सफलता के सिद्धांत के सामने हार जाती है।

         कई साल पहले मैं अपने करीबी दोस्त फिल के ऑफ़िस में बैठा था। फिल एक बड़ी एडवर्टाइजिंग एजेंसी में ऑफ़िसर था। फिल अपनी एजेंसी के मार्केटिंग रिसर्च का निदेशक था और उसका काम ज़ोरदार चल रहा था।

            क्या फिल बहुत “दिमाग वाला था ? बिलकुल नहीं। फिल को रिसर्च तकनीक का ज़रा भी ज्ञान नहीं था। उसे सांख्यिकी की बिलकुल
समझ नहीं थी। वह कॉलेज प्रैजुएट भी नहीं था (हालाँकि उसके सभी मातहत कर्मचारी कॉलेज ग्रेजुएट थे)। और फिल यह दावा भी नहीं
करता था कि उसे रिसर्च के तकनीकी पहलू का ज्ञान है। तो फिर फिल में ऐसी क्या बात थी कि उसे साल भर में 30,000 डॉलर मिलते थे,
जबकि उसके मातहतों को सिर्फ 10,000 डॉलर ही मिलते थे ? 

          फिल “इंसानों” का इंजीनियर था। फिल 100 प्रतिशत सकारात्मक था। जब लोगों का उत्साह ठंडा पड़ जाता था, तो फिल उन्हें प्रेरित कर सकता था। फिल उत्साही था। वह उत्साह पैदा कर सकता था। फिल में लोगों की समझ थी और इसलिए वह सचमुच जानता था कि उनसे कैसे काम लिया जा सकता है और इससे भी बड़ी बात यह कि वह उन लोगों को पसंद करता था।

           कंपनी ने फिल को उन कर्मचारियों से तीन गुना ज्यादा बहुमूल्य समझा जिनमें उससे ज्यादा आई क्यू या दिमाग़ था। और निश्चित रूप से फिल में बुद्धि तो कम थी, परंतु उसके सोचने के तरीके या नज़रिए ने उसे कंपनी के लिए इतना मूल्यवान बना दिया था।

       कॉलेज में दाखिल होने वाले 100 में से सिर्फ 50 प्रतिशत ही पैजएट हो पाएँगे। मैं यह जानकर हैरान हुआ इसलिए मैंने एक बड़ी
यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर ऑफ़ एडमीशन से इसका कारण पूछा।

         उसने कहा, “इसका कारण कम बुद्धि नहीं है। अगर उनमें पर्याप्त योग्यता नहीं होती, तो हम उन्हें दाख़िला ही नहीं देते। और सवाल पैसे
का भी नहीं है। आजकल जो भी अपने कॉलेज की फ़ीस के लिए काम करने को तैयार है, उसके लिए काम की कोई कमी नहीं है। असली कारण है नज़रिया या रवैया। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि कितने सारे नौजवान सिर्फ इसलिए कॉलेज छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें प्रोफेसर पसंद नहीं होते, या उन्हें अपने विषय में मज़ा नहीं आता या उन्हें पसंदीदा साथी नहीं मिलते।”

नकारात्मक नज़रिए के कारण ही कई जूनियर एक्जीक्यूटिव्ज़ ऊँचे पदों पर नहीं पहुँच पाते। ऐसे हज़ारों युवा एक्ज़ीक्यूटिव्ज़ हैं जिनमें पर्याप्त बुद्धि तो है, परंतु उनका रवैया नकारात्मक, चिड़चिड़ा, निराशावादी और अपमानजनक है। जैसा एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बताया, “ऐसा दुर्लभ ही है कि हम किसी युवा ऑफ़िसर को दिमाग़ या बुद्धि की कमी के कारण प्रमोशन नहीं देते। लगभग हमेशा इसका कारण होता है उसका रवैया या नज़रिया।"

         मुझे एक बीमा कंपनी ने एक रिसर्च करने को कहा। वे यह जानना चाहते थे कि उनके चोटी के 25 प्रतिशत एजेंट 75 प्रतिशत बीमा करने में सफल क्यों हो रहे हैं, जबकि सबसे नीचे के 25 प्रतिशत एजेंट कुल बीमे का सिर्फ 5 प्रतिशत ही क्यों कर पा रहे हैं। इसका कारण क्या था ?

         हज़ारों फ़ाइलों को गौर से देखा गया। इस रिसर्च में एक बात उभरकर आई कि सबसे चोटी के और सबसे निचले बीमा एजेंटों की बुद्धि में कोई ख़ास अंतर नहीं था। उनकी सफलता में अंतर का कारण उनकी शिक्षा का अंतर भी नहीं था। बेहद सफल और बहुत असफल लोगों में जो सबसे बड़ा अंतर पाया गया, वह था उनके रवैए या नज़रिए का चोटी के बीमा एजेंट चिंता कम करते थे, ज्यादा उत्साही थे, लोगों को सचमुच पसंद करते थे।

        हम अपनी बुद्धि की मात्रा को तो बदल नहीं सकते, परंतु हम उस तरीके को तो बदल ही सकते हैं जिससे हम अपनी बुद्धि का इस्तेमाल
करते हैं।

          ज्ञान ही शक्ति है- अगर आप इसका रचनात्मक प्रयोग करें। बुद्धि के बहानासाइटिस से जुड़ी हुई एक गलत धारणा यह है कि ज्ञान ही शक्ति है। परंतु यह बात पूरी तरह सही नहीं है, यह केवल आधी सही है। ज्ञान केवल संभावित शक्ति है। ज्ञान शक्ति तभी बनता है जब इसका उपयोग किया जाता है और सिर्फ तभी, जब यह उपयोग सकारात्मक या रचनात्मक हो।

         एक बार महान वैज्ञानिक आइंस्टीन से किसी ने पूछा कि एक मील में कितने फुट होते हैं। आइंस्टीन ने जवाब दिया, “मुझे नहीं मालूम। मैं अपने दिमाग़ में ऐसी जानकारी क्यों भरूं जो मैं किसी भी किताब से दो मिनट में हासिल कर सकता हूँ?"

    आइंस्टीन ने हमें एक बड़ा सबक़ सिखाया है। उनका मानना था कि हमें अपने दिमाग को तथ्यों या जानकारी का गोदाम बनाने से बचना चाहिए और इसके बजाय यह ज्यादा महत्वपूर्ण था कि हम अपने दिमाग से सही तरीके से सोचें।

         एक बार हेनरी फ़ोर्ड ने शिकागो ट्रिब्यून पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया। कारण यह था कि उस अखबार ने फ़ोर्ड को अज्ञानी कह दिया था। फ़ोर्ड ने उनसे यह “सिद्ध करने को कहा।

     ट्रिब्यून ने फ़ोर्ड से दर्जनों सवाल पूछे, जैसे “बेनेडिक्ट अर्नाल्ड कौन थे ?”, “क्रांति का युद्ध कब लड़ा गया था ?” इत्यादि। और फ़ोर्ड ज्यादातर सवालों के जवाब नहीं दे पाए, क्योंकि उनकी औपचारिक शिक्षा कम हुई थी।

     आखिरकार फ़ोर्ड काफ़ी परेशान होकर गुस्से से बोले, “मैं इन सवालों के जवाब तो नहीं जानता, परंतु मैं पाँच मिनट में ऐसे आदमी को ढूँढ़ सकता हूँ जो इन सारे सवालों के जवाब जानता हो।” 

    हेनरी फ़ोर्ड ने फालतू की जानकारी हासिल करने में कभी रुचि नहीं ली। उन्हें वह बात मालूम थी जो हर सफल एक्ज़ीक्यूटिव जानता है : दिमाग को तथ्यों का गैरेज मत बनाओ, यह जानकारी रखो कि जानकारी कहाँ से हासिल हो सकती है।

     तथ्यों के आदमी का मोल क्या है ? मैंने एक दोस्त के साथ एक बहुत रोचक शाम गुज़ारी। मेरा दोस्त एक नई परंतु तेज़ी से बढ़ रही कंपनी का प्रेसिडेन्ट है। टीवी पर एक लोकप्रिय क्विज़ कार्यक्रम आ रहा था। जिस आदमी से सवाल पूछे जा रहे थे, वह पिछले कुछ सप्ताहों से लगातार आ रहा था। वह सभी तरह के सवालों के जवाब दे सकता था, चाहे उनमें से कुछ सवाल कितने ही मूर्खतापूर्ण क्यों न हों।

         जब उस आदमी ने एक बहुत मुश्किल सवाल का जवाब दिया जिसका संबंध अर्जेन्टीना के किसी पहाड़ से था, तो मेरे दोस्त ने मुझसे
कहा, “तुम्हें क्या लगता है कि मैं इस आदमी को कितने डॉलर की नौकरी दूंगा?"

"कितने की?", मैंने पूछा।

      "300 डॉलर से एक सेंट भी ज्यादा नहीं- प्रति सप्ताह नहीं, प्रति माह भी नहीं, बल्कि जीवन भर। मैंने उसके ज्ञान की थाह ले ली है। यह 'विशेषज्ञ' सोच नहीं सकता। वह केवल रट सकता है, याद कर सकता है। वह एक इंसानी एन्साइक्लोपीडिया है और मैं समझता हूँ कि मैं 300 डॉलर में एक अच्छा एन्साइक्लोपीडिया ख़रीद सकता हूँ। वास्तव में, शायद यह क़ीमत भी उसके लिए ज़्यादा होगी। इस आदमी को जितना पता है, उसका १० प्रतिशत हिस्सा तो मुझे 2 डॉलर की जनरल नॉलेज की किताब में ही मिल जाएगा।

“मैं अपने आस-पास ऐसे लोगों को चाहता हूँ जो समस्याएँ सुलझा सकें, जिनके पास विचार हों। जो सपने देख सकें और फिर उन सपनों को साकार कर सकें। जिस आदमी में विचार हैं वह मेरे साथ पैसे कमा सकता है, जिसके पास सिर्फ़ तथ्य हैं, वह मेरे साथ पैसे नहीं कमा पाएगा।"

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