Sunday, September 8, 2019

CHAPTER 4.2. यह न देखें कि क्या है, यह देखें कि क्या हो सकता है

       यह न देखें कि क्या है, यह देखें कि क्या हो सकता है


बड़े चिंतक सिर्फ यही नहीं देखते कि क्या है, वे यह भी देख सकते हैं कि क्या हो सकता है। यहाँ पर चार उदाहरण दिए जा रहे हैं कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।

           1. रियल एस्टेट की कीमत कैसे बढ़ती है? एक बेहद सफल रिएल्टर, जो ग्रामीण इलाके की जायदाद का विशेषज्ञ है, का कहना है कि अगर हम भविष्य की कल्पना कर सकें, तो इससे हमें बहुत लाभ हो सकता है। जहाँ आज कुछ नहीं है, वहाँ कल क्या हो सकता है, इस बात की कल्पना करना हमें सीखना चाहिए।

            मेरे दोस्त ने कहा, "ग्रामीण इलाक़ा होने के कारण यहाँ ज्यादातर ज़मीन-जायदाद बहुत आकर्षक नहीं होती। मैं इसलिए सफल हुआ हूँ क्योंकि मैं अपने ग्राहकों को यह नहीं बताता कि उनके फ़ार्म की हालत अभी कैसी है।

         "मैं अपने पूरे सेल्स प्लान को इस बात के चारों तरफ़ बनाता हूँ कि यह फ़ार्म भविष्य में क्या बन सकता है। ग्राहक को अगर मैं सीधे तरीके से यह बताऊँ, 'इस फ़ार्म में इतने एकड़ जमीन, इतने एकड़ पेड़ हैं और यह शहर से इतने मील दूर है' तो इससे वह उत्साहित नहीं होगा और इसे कभी नहीं ख़रीदेगा। परंतु जब मैं उसे एक ऐसी योजना बताता हूँ कि वह इस फ़ार्म पर क्या-क्या कर सकता है, तो वह इस फ़ार्म को खुशी-खुशी खरीद लेता है। मैं आपको बताता हूँ कि मैं ऐसा किस तरह करता हूँ।"

            उसने अपना ब्रीफ़केस खोला और एक फ़ाइल निकाली। “यह फ़ार्म," उसने कहा, "अभी-अभी हमारे पास आया है। यह भी बाक़ी फ़ार्मों की तरह है। यह शहर से 43 मील की दूरी पर है। इसका घर टूटी-फूटी हालत में है और पिछले पांच साल से यहाँ खेती नहीं हुई है। अब मैं आपको यह बताता हूँ कि मैंने क्या किया है। मैंने इस जगह का पूरा अध्ययन करने के लिए पिछले सप्ताह यहाँ दो दिन गुज़ारे। मैंने इस पूरी जगह के कई चक्कर लगाए। मैंने पड़ोसी फ़ार्मों को भी देखा। मैंने वर्तमान और प्रस्तावित हाइवे प्लान के संदर्भ में भी फ़ार्म की लोकेशन को देखा। मैंने खुद से पूछा, 'यह फ़ार्म किस बड़े काम के लिए उपयुक्त है ?'

             "मुझे इसमें तीन संभावनाएँ दिखीं। मैंने तीनों की योजना बना ली।" उसने मुझे हर योजना दिखाई। हर योजना स्पष्ट थी और विस्तार से बनी थी। एक प्लान में सुझाव दिया गया था कि फ़ार्म को घुड़सवारी के अस्तबल में बदल दिया जाए। इस प्लान में बताया गया था कि विचार दमदार है : शहर बढ़ रहा है, लोग गाँव को ज्यादा पसंद करने लगे हैं,लोग मनोरंजन पर ज्यादा ख़र्च करने लगे हैं, सड़कें अच्छी हैं। इस पर में बताया गया था कि किस तरह यहाँ पर काफ़ी घोड़े रखे जा सकते है जिससे घुड़सवारी से काफ़ी आमदनी की जा सकती है। घुड़सवारी के अस्तबल का विचार काफ़ी अच्छा और प्रेरक था। योजना को स्पष्ट विस्तृत और दमदार होना चाहिए, मैं "देख" सकता था कि पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए एक दर्जन दंपति घुड़सवारी का आनंद ले रहे थे।'

           इसी तरीके से इस मेहनती सेल्समैन ने दूसरी विस्तृत योजना बनाई कि किस तरह इसे वृक्षों के फ़ार्म में बदला जा सकता है और तीसरी योजना थी कि यहाँ पर वृक्षों के फार्म के साथ-साथ पोल्ट्री फार्म भी शुरू किया जा सकता है।

           “अब, जब मैं अपने ग्राहकों से चर्चा करता हूँ तो मुझे उन्हें यह विश्वास नहीं दिलाना होता कि इसकी वर्तमान हालत में इस फ़ार्म को ख़रीदना एक अच्छा सौदा है। मैं उन्हें एक ऐसी तस्वीर दिखाता हूँ जिसमें फ़ार्म पैसा बनाने वाला व्यवसाय बन जाता है।

           “इससे मैं न सिर्फ़ ज़्यादा फ़ार्म बेच सकता हूँ और ज़्यादा तेज़ी से बेच सकता हूँ, बल्कि जायदाद बेचने के मेरे तरीके का एक और फायदा भी है। मैं अपने प्रतियोगियों से ज्यादा कीमत पर फ़ार्म बेच सकता हूँ। लोग ज़मीन और एक विचार के लिए जो क़ीमत देते हैं वह सिर्फ़ ज़मीन के लिए दी गई क़ीमत से स्वाभाविक तौर पर ज़्यादा होती है। इसी कारण ज़्यादातर लोग अपने फ़ार्मों को मेरे यहाँ से बेचना चाहते हैं और हर बिक्री पर मेरा कमीशन बढ़ता जाता है।'

          इसका संदेश यह है : वर्तमान में चीजें कैसी हैं, यह देखने के बजाय यह देखें कि वे भविष्य में कैसी हो सकती हैं। कल्पनाशक्ति से हर चीज़ ज़्यादा कीमती बन जाती है। बड़ा चिंतक हमेशा इस बात की कल्पना कर लेता है कि भविष्य में क्या किया जा सकता है। वह केवल वर्तमान में ही नहीं उलझा रहता।

         2. एक ग्राहक का कितना मूल्य होता है? एक डिपार्टमेंट स्टोर एक्जीक्यूटिव मैनेजरों की मीटिंग को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा, “हालाँकि मेरे विचार आपको पुराने जमाने के लगेंगे, परंतु मैं उस विचारधारा की है कि अगर आप अपने ग्राहकों से दोस्ताना, शालीन व्यवहार करेंगे तो वे बार-बार आपके पास आएंगे। एक दिन मैं अपने स्टोर में घूम रही थी। मैंने अपने सेल्समैन को एक ग्राहक से बहस करते सुना। ग्राहक गुस्से में बाहर चला गया।

         "इसके बाद, सेल्समैन ने दूसरे सेल्समैन से कहा, 'मैं 1.98 डॉलर के ग्राहक के पीछे अपना समय क्यों ख़राब करूँ। उसकी ज़रूरत के सामान के लिए पूरे स्टोर को क्यों छायूँ ? वह इस काबिल ही नहीं है।"

           “मैं वहाँ से चली आई," एक्जीक्यूटिव ने कहा, “परंतु मैं अपने दिमाग़ से उस बात को नहीं निकाल पाई। मैंने सोचा कि यह बहुत गंभीर मामला है जब हमारे सेल्समैन अपने ग्राहकों को 1.98 की श्रेणी में रखते हैं। मैंने तभी यह फैसला किया कि सोच के इस ढंग को बदलना होगा। जब मैं वापस अपने ऑफ़िस में पहुंची, तो मैंने अपने रिसर्च डायरेक्टर को बुलाया और उससे पूछा कि हमारे स्टोर में पिछले साल औसत ग्राहक ने कितने पैसे का माल ख़रीदा। उसने मुझे जो आँकड़ा बताया, उससे मुझे भी हैरत हुई। हमारे रिसर्च डायरेक्टर के आँकड़ों के हिसाब से औसत ग्राहक ने हमारे स्टोर से 362 डॉलर का सामान खरीदा।

          "इसके बाद मैंने अपने सुपरवाइज़र्स की मीटिंग बुलाई और उन्हें यह घटना बताई। फिर मैंने उन्हें यह बताया कि हमारे ग्राहक का मूल्य वास्तव में कितना है। एक बार मैंने जब इन लोगों को यह समझा दिया कि किसी ग्राहक को एक बार की खरीदारी के हिसाब से नहीं तौलना चाहिए बल्कि सालाना खरीदारी के हिसाब से तौलना चाहिए, तो हमारे स्टोर में ग्राहकों के प्रति दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया।”

         रिटेलिंग एक्जीक्यूटिव की यह बात किसी भी तरह के बिज़नेस पर लागू होती है। बार-बार के बिज़नेस में लाभ होता है। अक्सर, कई धंधों में शुरुआत में तो कोई लाभ ही नहीं होता। ग्राहकों की भविष्य की खरीद को देखें, यह न देखें कि वे वर्तमान में क्या खरीद रहे हैं।

         ग्राहकों को मूल्यवान समझने से वे बड़े, नियमित संरक्षकों में बदल जाते हैं। ग्राहकों को तुच्छ समझने से वे किसी दूसरी जगह से सामान खरीदने लगते हैं। एक विद्यार्थी ने एक बार मुझे यह महत्वपूर्ण घटना सुनाई और बताया कि वह एक रेस्तराँ में कभी नाश्ता क्यों नहीं करता |

          "एक दिन लंच के लिए,” विद्यार्थी ने कहा, “मैंने एक नए रेस्त में जाने का फैसला किया। यह रेस्तराँ दो सप्ताह पहले ही खुला था। और लिए अभी पैसा बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए मैं सुनिश्चित कर लेता हैं कि मैं जो खरीद रहा हूँ, उसकी कीमत क्या है। मीट सेक्शन के पास से गुज़रते समय मैंने टर्की को देखा और उस पर कीमत डली थी 39 सेंट।

            "जब मैं कैश रजिस्टर के पास गया, तो चेकर ने मेरी ट्रे को देखा और कहा “1.09' मैंने विनम्रता से उससे दुबारा चेक करने को कहा. क्योंकि मेरे हिसाब से बिल 99 सेंट का होना चाहिए था। मेरी तरफ़ घूरने के बाद उसने फिर से हिसाब जोड़ा। हिसाब में जो अंतर आ रहा था वह टर्की की कीमत के कारण था। उसने 39 सेंट की जगह मुझसे 49 सेंट लिए थे। फिर मैंने उसका ध्यान उस साइनबोर्ड की तरफ़ खींचा जिसमें लिखा हुआ था 39 सेंट।

            "इससे वह भड़क गई। 'मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि साइनबोर्ड पर क्या लिखा है। इसका दाम है 49 सेंट। देखिए। यह रही आज की मूल्य सूची। किसी ने शायद ग़लती से वहाँ पर साइनबोर्ड लगा दिया होगा। आपको 49 सेंट ही देने होंगे।'

            "फिर मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि मैंने टर्की ली ही इसलिए थी क्योंकि इसका मूल्य 39 सेंट था। अगर इसका मूल्य 49 सेंटहोता तो मैं इसकी जगह कोई दूसरी चीज़ ले लेता।

           "इसके बाद भी उसका जवाब था, 'चाहे जो हो, आपको 49 सेंट देने होंगे।' मैंने ऐसा ही किया क्योंकि मैं वहाँ खड़े रहकर तमाशा खड़ा नहीं करना चाहता था। परंतु मैंने उसी समय यह फैसला भी कर लिया कि मैं दुबारा उस रेस्तराँ में नहीं जाऊँगा। मैं हर साल लंच पर 250 डॉलर। खर्च करता हूँ और यह बात तो पक्की है कि मैं उस रेस्तराँ में एक पाई भी ख़र्च नहीं करूँगा।"

          यह छोटे नज़रिए का एक उदाहरण है। चेकर ने कीमत काछोटा-सा अंतर ही देखा, उसने संभावित 250 डॉलर की सेल नहीं देखी |

         3. अंधे दूध वाले का मामला। हैरत की बात है कि लोग किस तरह भावी संभावना के प्रति अंधे होते हैं। कुछ साल पहले एक युवा दूध वाला हमारे घर पर दूध के बिज़नेस के सिलसिले में आया। मैंने उसे समझाया कि हमारा दूध वाला अच्छा दूध देता है और हम उसकी सेवाओं से संतुष्ट हैं। फिर मैंने उसे सुझाव दिया कि वह पड़ोस की महिला से पूछ ले।

           इसके जवाब में उसने कहा, “मैंने पड़ोस की महिला से पहले ही बात कर ली है, परंतु वे लोग दो दिन में एक क्वार्ट दूध ही लेते हैं और मैं इतनी कम रक़म के लिए यहाँ रुकूँ यह फ़ायदे का सौदा नहीं होगा।"

           "शायद आपकी बात सही हो,” मैंने कहा, “परंतु जब आप मेरी पड़ोसन से बात कर रहे थे, तो आपने यह नहीं देखा कि उस घर में दूध की माँग एक-दो महीने में बढ़ने वाली है? उनके यहाँ बच्चा पैदा होने वाला है, जो निश्चित रूप से काफ़ी दूध पिएगा।"

           उस युवक ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे उसे घुसा मार दिया गया हो और फिर उसने कहा, “कोई इंसान कितना अंधा हो सकता है ?"

           कभी जो परिवार दो दिन में एक क्वार्ट दूध खरीदता था, आज वही परिवार दो दिन में 7 क्वार्ट दूध ख़रीदता है, परंतु वह दूध वाला भविष्यदर्शी नहीं था। उस छोटे बच्चे के अब दो छोटे भाई और एक छोटी बहन और हो चुके हैं। और मुझे जानकारी मिली है कि उनके यहाँ एक और बच्चा पैदा होने वाला है।

           हम कितने अंधे हो सकते हैं? इसलिए यह देखें कि क्या हो सकता है, सिर्फ यही न देखें कि क्या है।

           जो स्कूल टीचर जिमी के सिर्फ़ वर्तमान व्यवहार के बारे में सोचेगा वह यही सोचेगा कि जिमी बदतमीज़, पिछड़ा और गँवार है। परंतु अगर टीचर ऐसा सोचेगा तो इससे जिमी का विकास नहीं हो पाएगा। परंतु जो टीचर जिमी की संभावनाओं को देख सकेगा वही उसका विकास कर पाएगा।

          ज़्यादातर लोग 'स्किड रो' से गुज़रते समय केवल हारे हुए शराबियों को देख पाते हैं। परंतु कुछ निष्ठावान लोग 'स्किड रो' से गुज़रते समय एक सुधरे हुए नागरिक की संभावना को भी देख सकते हैं। और चूंकि वे भविष्य की संभावना को देख पाते हैं, इसलिए वे यहाँ पर एक सफल सुधार कार्यक्रम शुरू कर पाते हैं।

           4. कौन सी चीज़ आपका मूल्य तय करती है ? कुछ सप्ताह पहले एक प्रशिक्षण सत्र के बाद एक युवक मुझसे मिलने आया और उसने मुझसे कहा कि वह मेरे साथ कुछ मिनट बात करना चाहता है। मैं इस युवक को जानता हूँ। इसकी उम्र अभी 26 साल है और यह बहुत ही गरीब घर से आया था। इसके अलावा मैं यह भी जानता था कि इसके शुरुआती वयस्क जीवन में इस पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा था। मैं यह भी जानता था कि वह ठोस भविष्य के लिए खुद को तैयार करने का सच्चा प्रयास कर रहा था।

            कॉफ़ी पीते हुए हमने उसकी तकनीकी समस्या का हल ढूँढ लिया और फिर हमारी चर्चा इस तरफ़ मुड गई कि किस तरह गरीब लोग भविष्य के प्रति आशावादी नज़रिया रख सकते हैं। उसकी बातों ने इस सवाल का सीधा और बढ़िया जवाब दे दिया।

             “मेरे पास बैंक में 200 डॉलर हैं। क्लर्क की मेरी नौकरी में तनख्वाह ज़्यादा नहीं है और न ही यह कोई ज़िम्मेदारी वाली नौकरी है। मेरी कार चार साल पुरानी है और मैं अपनी पत्नी के साथ दूसरी मंज़िल के एक छोटे-से अपार्टमेंट में रहता हूँ।

             “परंतु, प्रोफ़ेसर,” उसने कहा, "मैंने तय कर लिया है कि मेरे पास जो नहीं है, उसे मैं अपनी राह में बाधा नहीं बनने दूंगा।"

            मैं उसकी बात पूरी तरह नहीं समझ पाया इसलिए मैंने उसे विस्तार से उसका पूरा मतलब समझाने के लिए कहा।

            “देखिए,” उसने कहा, “मैं काफ़ी समय से लोगों का अध्ययन कर रहा हूँ और मैंने यह पाया है : जो लोग गरीब होते हैं वे अपने वर्तमान को देखते हैं। वे सिर्फ अपने वर्तमान को ही देख पाते हैं। वे भविष्य को नहीं देख पाते, वे सिर्फ अपने घटिया वर्तमान को ही देख पाते हैं। 

             “मेरे पड़ोसी का उदाहरण लें। वह लगातार रोता रहता है कि उसकी तनख्वाह कम है, उसकी छत लगातार टपकती रहती है, प्रमोशन किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाते हैं, डॉक्टर के बिल लगातार बढ़त जा रहे हैं। वह लगातार खुद को याद दिलाता रहता है कि वह गरीब है और इसलिए वह यह मान लेता है कि वह हमेशा ग़रीब ही बना रहेगा। वह इस तरह व्यवहार कर रहा है जैसे उसे जिंदगी भर उसी टूटे-फूटे अपार्टमेंट में रहने की सज़ा मिली हो।"

            मेरा दोस्त अपने दिल की बात बोल रहा था और एक पल रुकने के बाद उसने आगे कहा, “अगर मैं अपने वर्तमान की तरफ़ देखें - पुरानी कार, कम तनख्वाह, सस्ता अपार्टमेंट और हैमबर्गर का भोजन - तो मैं भी जल्दी ही निराश हो जाऊँगा। मैं देखूगा कि मेरी हस्ती कुछ नहीं है और मैं जिंदगी भर बिना हस्ती वाला आदमी बना रहूँगा।

            "परंतु मैं अपने भविष्य की कल्पना करता हूँ। मैं यह देखता हूँ कि मैं कुछ साल बाद क्या बन सकता हूँ। मैं अपने आपको क्लर्क के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक्जीक्यूटिव के रूप में देखता हूँ। मैं अपने छोटे अपार्टमेंट को नहीं देखता हूँ, बल्कि मैं बढ़िया नए उपनगरीय घर को देखता हूँ। और जब मैं अपने भविष्य को इस तरह से देखता हूँ तो मैं ज़्यादा बड़ा अनुभव करता हूँ और बड़ा सोच पाता हूँ। और मेरे पास
इस बात का बहुत अनुभव है कि इससे फायदा होता है।"

           क्या यह खुद को मूल्यवान बनाने की बढ़िया योजना नहीं है ? यह युवक वास्तव में अच्छी जिंदगी की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है। उसने सफलता के इस मूलभूत सिद्धांत को अपने जीवन में उतार लिया है : आपके पास क्या नहीं है, यह महत्वपूर्ण नहीं होता। इसके बजाय यह महत्वपूर्ण होता है कि आपके पास भविष्य में क्या होगा।

            दुनिया हम पर कीमत का जो टैग लगाती है वह उस टैग के अनुरूप ही होता है जो हम खुद पर लगाते हैं।

             यहाँ आपको यह बताया जा रहा है कि आप किस तरह अपने भविष्य की शक्ति को विकसित कर सकते हैं, यानी आप अपनी संभावनाओं को किस तरह देख सकते हैं। मैं इन्हें “मूल्य बढ़ाने वाले अभ्यास" कहता हूँ।

              1. चीज़ों का मूल्य बढ़ाने का अभ्यास करें। रियल एस्टेट का उदाहरण याद करें। खुद से पूछे, “किस तरह मैं इस कमरे या इस घर या इस बिज़नेस का मूल्य बढ़ा सकता हूँ?" चीज़ों का मूल्य बढ़ाने के लिए विचार खोजें। कोई भी चीज़ चाहे वह खाली प्लॉट हो, घर हो या बिजनेसहो, उसका मूल्य वही होता है जो उसके प्रयोग के विचार में छुपा होता है।

           2. लोगों का मूल्य बढ़ाने का अभ्यास करें। जब आप सफलता ही दनिया में ऊपर और ऊपर जाएँगे तो आपके पास ज़्यादातर काम “लोगों का विकास” करना होगा। खुद से पूछे, “मैं किस तरह अपने अधीनस्थों का 'मूल्य बढ़ा सकता हूँ?' मैं किस तरह उन्हें ज़्यादा प्रभावी बना सकता हूँ?" याद रखें, किसी व्यक्ति से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवाने के लिए आपको उसकी सर्वश्रेष्ठ क्षमताओं की कल्पना करनी होती है।

            3. खुद का मूल्य बढ़ाने का अभ्यास करें। खुद के साथ हर रोज़ एक इंटरव्यू रखें। खुद से पूछे, “आज मैं अपने आपको अधिक मूल्यवान बनाने के लिए क्या कर सकता हूँ?" अपने मूल्य की कल्पना अपने वर्तमान से न करें, इस बात से न करें कि आप आज क्या हैं, बल्कि अपने मूल्य की कल्पना अपने भविष्य से करें, इस बात से करें कि आप क्या बन सकते हैं। फिर उस संभावित मूल्य को हासिल करने के तरीके अपने आप आपके दिमाग में आ जाएँगे। कोशिश करके देखें।

मध्यम आकार की प्रिंटिंग कंपनी (60 कर्मचारी) के रिटायर्ड मालिक-मैनेजर ने मुझे बताया कि उसने अपना उत्तराधिकारी कैसे चुना।

           “पाँच साल पहले,” उसने कहा, “मुझे अकाउंटिंग और ऑफ़िस के बाक़ी काम के लिए अकाउंटेंट की ज़रूरत थी। मैंने हैरी नाम के 26 वर्षीय युवक को काम पर रख लिया। उसे प्रिंटिंग बिज़नेस की कोई समझ नहीं थी, परंतु उसके रिकॉर्ड से पता चलता था कि वह एक अच्छा अकाउंटेंट था। डेढ़ साल पहले जब मैं रिटायर हुआ तो हमने उसे अपनी कंपनी का प्रेसिडेंट और जनरल मैनेजर बना दिया।

             “जब मैं इस बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि हैरी में एक गुण। ऐसा था जो उसे बाक़ी सब लोगों से आगे कर देता था। हैरी पूरी कपना। में गंभीरता से सच्ची रुचि लेता था। वह सिर्फ चेक नहीं लिखता था, वह। सिर्फ रिकॉर्ड नहीं रखता था। जब भी वह देखता था कि वह बाकी । कर्मचारियों की मदद कर सकता था, वह तत्काल काम में जुट जाता था|

             "हेरी के आने के एक साल के भीतर हमारे कुछ कर्मचारा चल गए। हैरी मेरे पास एक फ्रिज-बेनिफ़िट प्रोग्राम लेकर आया और उसका कहना था कि इससे लागत कम आएगी। और इससे सचमुच लाभ हुआ।

           “हैरी ने और भी कई काम किए जिनसे सिर्फ उसके विभाग को नहीं, बल्कि पूरी कंपनी को फायदा हुआ। उसने हमारे उत्पादन विभाग का लागत अध्ययन तैयार किया और बताया कि किस तरह 30,000 डॉलर की नई मशीनों में निवेश करके हम ज्यादा लाभ कमा सकते हैं। एक बार हमारा माल नहीं बिक पा रहा था। हैरी हमारे सेल्स मैनेजर के पास गया और उनसे इस तरह की बात कही, 'मैं सेल्स के बारे में तो नहीं जानता, परंतु मैं आपकी मदद करने की कोशिश करूँगा।' और उसने ऐसा ही किया। हैरी के दिमाग़ में कई अच्छे विचार थे जिनकी वजह से हमारी बिक्री बढ़ गई।

           “जब भी कोई नया कर्मचारी कंपनी में आता था, हैरी उस आदमी की काफ़ी मदद करता था। हैरी पूरी कंपनी में सच्ची रुचि लेता था।

       “जब मैं रिटायर हुआ, तो हैरी ही मेरा उत्तराधिकारी बनने लायक था।

            “परंतु मुझे ग़लत मत समझना," मेरे दोस्त ने कहा, "हैरी ने उत्तराधिकारी बनने के लिए कोई कोशिश नहीं की। वह किसी के काम में अडंगा नहीं लगाता था। वह नकारात्मक रूप से आक्रामक नहीं था। वह लोगों की पीठ पीछे बुराई नहीं करता था और वह ऑर्डर भी नहीं देता था। वह सिर्फ मदद करता था। हैरी इस तरह बर्ताव करता था जैसे कंपनी में होने वाली हर चीज़ से उसे फ़र्क पड़ता था। उसने कंपनी के बिज़नेस को अपना बिज़नेस मान लिया था।"

             हैरी के उदाहरण से हम भी सीख सकते हैं। "मैं अपना काम कर रहा हूँ और यही काफ़ी है" वाला रवैया छोटी, नकारात्मक सोच है। बड़े चिंतक अपने आपको टीम के सदस्य के रूप में देखते हैं और अकेले नहीं, बल्कि टीम के साथ जीतते या हारते हैं। वे जितनी मदद कर सकते हैं, करते हैं, चाहे इसके बदले में उन्हें कोई सीधा लाभ हो रहा हो या न हो रहा हो। वह आदमी जो अपने डिपार्टमेंट के बाहर की हर समस्या को यह कहकर टाल देता है, “इससे मुझे कोई लेना-देना नहीं है, उसी डिपार्टमेंट के लोगों को इस बात की चिंता करने दो।" उसका रवैया उसे कभी लीडर नहीं बनवा सकता।

          इसका अभ्यास करें। बड़े चिंतक बनने का अभ्यास करें। कंपनी की रुचि को अपनी रुचि की तरह देखें। बड़ी कंपनियों में काम करने वाले बहुत कम लोग अपनी कंपनी में सच्ची, निःस्वार्थ रुचि लेते हैं। परंतु बहुत कम लोग ही बड़े चिंतक बनने के काबिल होते हैं। और इन्हीं थोड़े से लोगों को ज़्यादा ज़िम्मेदारी, ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरियाँ दी जाती हैं।

          बहुत से लोग अपनी उपलब्धि की राह में छोटी, घटिया, महत्वहीन चीज़ों को बाधा बना लेते हैं। हम इन चार उदाहरणों को देखें :

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Friday, September 6, 2019

CHAPTER 4.1. बड़ा कैसे सोचें?

                          बड़ा कैसे सोचें?

     हाल ही में मैंने एक बड़ी औद्योगिक कंपनी के रोज़गार विशेषज्ञ से। हा चर्चा की। यह विशेषज्ञ हर साल चार महीने कॉलेजों में जाकर वहाँ के प्रतिभाशाली सीनियर छात्रों को अपनी कंपनी के जूनियर एक्जीक्यूटिव प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चुनती थी। उसकी बातों से लगा जैसे वह छात्रों के रवैए से निराश थी।

          “मैं हर दिन 8 से 12 ऐसे कॉलेज सीनियर्स का इंटरव्यू लेती हूँ, जो हमारे साथ काम करना चाहते हैं। हम स्क्रीनिंग इंटरव्यू में जिस बात पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं, वह होती है उनकी प्रेरणा, उनका प्रयोजन। हम यह जानना चाहते हैं कि क्या यह आदमी कुछ साल बाद हमारे लिए बड़े प्रोजेक्ट कर सकता है, हमारे ब्रांच ऑफ़िस या फैक्टरी को सँभाल सकता है, या किसी और तरीके से कंपनी के लिए बड़ी ज़िम्मेदारी उठा सकता है।

          "मुझे यह कहना पड़ेगा कि मैं जिन लोगों से चर्चा करती हूँ, उनमें से ज़्यादातर सीनियर्स के व्यक्तिगत लक्ष्यों को देखकर मैं खुश नहीं हूँ। आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह 22 साल के लड़के हमारी बाक़ी किसी चीज़ से ज्यादा हमारे रिटायरमेंट प्लान में रुचि लेते हैं। उनका दूसरा पसंदीदा सवाल होता है, "क्या मुझे घूमने को मिलेगा?" उनमें से ज़्यादातर लोगों के लिए सफलता शब्द सुरक्षा का पर्यायवाची होता है। हम इस तरह के लोगों को अपनी कंपनी से जोड़ने का जोखिम क्यों उठाएँ?

          “आज के युवा बाक़ी बातों में तो इतने आधुनिक हो गए हैं, लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि वे अब भी अपने भविष्य के बारे में इतना संकुचित रवैया क्यों रखते हैं? हर दिन अवसर बढ़ते जा रहे हैं। वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षेत्रों में हमारा देश रिकॉर्ड तरक्की कर रहा है। हमारी जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है। अगर अमेरिका में तरक्की का कोई युग है, तो यही है।"

             अब अगर इतने सारे लोगों की सोच इतनी छोटी है, तो इसका मतलब यह हुआ कि अगर आप सचमुच बड़ा सोचते हैं तो आपके सामने बहुत कम प्रतियोगिता है और आपके लिए एक बहुत बड़े करियर का रास्ता खुला हुआ है।

             सफलता के मामले में लोगों को इंच या पौंड के हिसाब से नहीं नापा जाता, न ही उन्हें कॉलेज की डिग्रियों से या पारिवारिक पृष्ठभूमि के पैमाने से नापा जाता है। उन्हें तो उनकी सोच के आकार से नापा जाता है। आप कितना बड़ा सोचते हैं, यही आपकी उपलब्धियों के आकार को तय करता है। देखते हैं कि हम किस तरह अपनी सोच को बड़ा कर सकते हैं।

              कभी आपने खुद से पूछकर देखा है, “मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है?" शायद इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी खुद का मूल्यांकन कम करने की होती है- यानी कि खुद को सस्ते में बेचने की कमज़ोरी। आत्म-मूल्यांकन में कमी अनगिनत तरीकों से साफ़ दिखती है। जॉन अख़बार में एक नौकरी का विज्ञापन देखता है। वह इसी तरह की नौकरी करना चाहत है। परंतु वह इसके लिए कोई कोशिश नहीं करता क्योंकि वह सोचता है, "मैं इस नौकरी के लिए पर्याप्त योग्य नहीं हूँ, इसलिए कोशिश करने की मेहनत क्यों करूँ?" या जिम जोन के साथ डेटिंग पर जाना चाहता है, परंतु वह उससे नहीं पूछता क्योंकि उसे लगता है कि वह तैयार नहीं होगी।

              टॉम को लगता है कि मिस्टर रिचर्ड्स उसके माल के अच्छे ग्राहक हो सकते हैं, परंतु टॉम मिस्टर रिचर्ड्स से मिलने नहीं जाता। उसे। लगता है कि मिस्टर रिचर्ड्स जैसे बड़े आदमी उससे नहीं मिलेंगे। पीट नौकरी का आवेदन भर रहा है। उसमें एक प्रश्न पूछा जाता है, “आप शुरुआत में कितनी तनख्वाह चाहेंगे?" पीट एक छोटी-सी रकम लिख। देता है क्योंकि उसे लगता है कि वह इससे ज्यादा तनख्वाह के योग्य नहीं है, जबकि वह इससे ज़्यादा तनख्वाह पाना चाहता है।

              हज़ारों सालों से दार्शनिक हमें यह अच्छी सलाह देते आ रहे हैं : खुद को जानें। परंतु ज़्यादातर लोग इस सलाह का मतलब यह निकालते हैं कि खुद के नकारात्मक पहलू को जानें। ज्यादातर आत्म-मूल्यांकनों में लोग अपनी ग़लतियों, कमियों, अयोग्यताओं की लंबी सी मानसिक सूची बना लेते हैं।

           हमें अपनी कमियाँ पता हों; अच्छी बात है। इनसे हमें यह पता चलता है कि हमें इन क्षेत्रों में सुधार करना है। परंतु अगर हम सिर्फ अपने नकारात्मक पहलू को ही जान पाएँ तो हम परेशानी में फँस जाएँगे। हमारा मूल्य अपनी नज़रों में कम हो जाएगा।

          यहाँ एक अभ्यास दिया गया है जिससे आप अपने सच्चे आकार को नाप सकते हैं। मैंने इसे एक्जीक्यूटिब्ज़ और सेल्स पर्सनेल के अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आज़माया है। यह वाक़ई काम करता है।

        1. अपने पाँच प्रमुख गुणों को तय करें। किसी निष्पक्ष दोस्त की मदद लें - जैसे आपकी पत्नी, आपका सीनियर, आपका प्रोफ़ेसर - कोई समझदार व्यक्ति जो आपको सच्ची राय दे सके। (गुणों के उदाहरण हैं शिक्षा, अनुभव, तकनीकी योग्यता, हुलिया, संतुलित घरेलू जीवन, रवैया, व्यक्तित्व, लीडरशिप की योग्यता)।

        2. हर गुण के सामने अपने उन तीन परिचित व्यक्तियों के नाम लिख लें जो बेहद सफल हैं परंतु उनमें यह गुण उतनी मात्रा में नहीं है, जितनी मात्रा में यह गुण आपमें है।

         इस अभ्यास को पूरा कर लेने पर आप पाएँगे कि आप किसी न किसी बात में कई सफल लोगों से आगे हैं।

          ईमानदारी से आप एक ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं : आप जितना सोचते हैं, आप उससे बड़े हैं। इसलिए, आप अपनी सोच को भी अपने असली आकार के हिसाब से बना लें। उतना ही बड़ा सोचें जितने बड़े आप हैं! और कभी, खुद को सस्ते में न बेचें!

          जो व्यक्ति “अचल" शब्द के लिए “दुर्भेद्य' शब्द का प्रयोग करता है या "बचत” की जगह "मितव्ययिता" शब्द का प्रयोग करता है, उसके बारे में हम यह जान जाते हैं कि उसकी शब्दावली का दायरा बड़ा है। परंतु क्या उसके पास एक बड़े चिंतक की शब्दावली है? शायद नहीं। जो लोग कठिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो लोग ऐसे आलंकारिक वाक्यों का प्रयोग करते हैं जिन्हें समझने में आम लोगों को कठिनाई होती है वे दरअसल दिखावटी और घमंडी लोग होते हैं। और दिखावटी लोग आम तौर पर छोटे चिंतक होते हैं।

           किसी व्यक्ति की शब्दावली का महत्वपूर्ण पैमाना उसके शब्दों की संख्या या आकार नहीं है। असली महत्व की बात तो यह है कि उसके शब्दों का उस पर और सामने वाले पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

           यहाँ एक मूलभूत बात बताई जा रही है : हम शब्दों और वाक्यों में नहीं सोचते हैं। हम तस्वीरों और/या बिंबों में सोचते हैं। शब्द विचारों के लिए कच्चा माल हैं। जब इन्हें बोला जाता है या पढ़ा जाता है तो हमारा दिमागी कंप्यूटर इन शब्दों को अपने आप तस्वीरों में बदल लेता है। हर शब्द, हर वाक्य, आपके दिमाग में एक अलग तस्वीर बनाता है। अगर कोई यह कहता है, "जिम ने एक नया स्पलिट-लेवल ख़रीदा है." तो हमारे दिमाग में एक अलग तस्वीर बनती है। परंतु अगर आपको बताया जाता है, "जिम ने एक नया रैच हाउस ख़रीदा है" तो आपके दिमाग में दूसरी ही तस्वीर बनती है। हमारे दिमाग में अलग-अलग तस्वीरें अलग-अलग शब्दों की वजह से बनती हैं।

           इसे इस तरीके से देखें। जब आप बोलते हैं या लिखते हैं तो आप एक तरह से दूसरे लोगों के दिमाग में फ़िल्में दिखाने वाले प्रोजेक्टर का काम कर रहे हैं। और आप जिस तरह की फ़िल्म दिखाएँगे, सामने वाले पर आपका प्रभाव वैसा ही पड़ेगा।

           मान लीजिए आप लोगों को यह बताते हैं, “मुझे यह बताते हुए। दुःख हो रहा है कि हम असफल हो गए हैं।" इस वाक्य का उन लोगा। पर क्या असर होगा? वे लोग इन शब्दों में हार और निराशा और दुःख। के चित्र देखेंगे, जो “असफल" शब्द में छुपे हुए हैं। इसके बजाय अगर आप कहते हैं, “यह रहा एक नया उपाय, जिससे हम सफल हो सकते है, तो इससे उनका उत्साह बढ़ जाएगा और वे एक बार फिर कोशिश करने के लिए तैयार हो जाएंगे।

           मान लीजिए आप कहते हैं, “हमारे सामने एक समस्या है।" ऐसा कहने पर दूसरों के दिमाग में आप एक ऐसी तस्वीर बना देंगे जो सुलझाने में मश्किल और अप्रिय होगी। इसके बजाय यह कहें, “हमारे सामने एक चुनौती है।" और इस वाक्य से आप एक ऐसी मानसिक तस्वीर बना देते हैं जिसमें आनंद है, खेल है, करने के लिए कुछ अच्छा है।

   
             या किसी समूह से कहें, "हमने काफ़ी बड़ा ख़र्च कर डाला।” और लोगों को लगता है कि ख़र्च हुआ पैसा कभी वापस नहीं लौटेगा। निश्चित रूप से यह नकारात्मक वाक्य है। इसके बजाय यह कहें, “हमने काफ़ी बड़ा निवेश किया है," और लोग एक ऐसी तस्वीर बना लेंगे जिसमें बाद में लाभ लौटता हुआ दिखता है, और यह एक बहुत सुखद दृश्य होता है।

           मुद्दे की बात यह है : बड़े चिंतकों में अपने और दूसरों के मस्तिष्क में सकारात्मक, प्रगतिशील और आशावादी तस्वीरें बनाने की कला होती है। बड़ी सोच के लिए हमें ऐसे शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए जो बड़े, सकारात्मक मानसिक चित्र प्रदान कर सकें।

       नीचे बाएं हाथ के कॉलम में कुछ वाक्य दिए गए हैं जिनसे छोटे, नकारात्मक, निराशाजनक विचार उत्पन्न होते हैं। दाएँ हाथ के कॉलम में उसी परिस्थिति को बड़े, सकारात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।

       पढ़ते समय खुद से पूछे, “मैं किस तरह के मानसिक चित्र देख रहा हूँ?"



     

  बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित करने के चार तरीके

       यहाँ चार तरीके दिए जा रहे हैं, जिनकी मदद से आप बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित कर सकते हैं।

           1. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बड़े, सकारात्मक, आशावादी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें। जब कोई आपसे पूछता है, “आप आज कैसा महसूस कर रहे हैं ?" और आप उसे जवाब देते हैं, “मैं थका हुआ हूँ (मुझे सिरदर्द है, काश कि आज शनिवार होता, मेरा आज बहुत बुरा हाल है)" तो आप अपनी स्थिति को अपने ही हाथों ख़राब कर रहे हैं। इसका अभ्यास करें : यह एक बहुत आसान बात है, परंतु इसमें बहुत शक्ति है। जब भी कोई आपसे पूछे, “आप कैसे हैं ?" या “आप आज कैसा महसूस कर रहे हैं ?" तो जवाब में हमेशा कहें, “बहुत बढ़िया! धन्यवाद और आप कैसे हैं ?" या कहें “बेहतरीन" या "शानदार"। हर मौके पर कहें कि आप बढ़िया महसूस कर रहे हैं और आप सचमुच बढ़िया महसूस करने लगेंगे और ज्यादा बड़ा भी। एक ऐसे व्यक्ति बनें जो हमेशा बढ़िया महसूस करता है। इससे दोस्त बनते हैं।

          2. दूसरे लोगों का वर्णन करते समय चमकीले, खुशनुमा, सकारात्मक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें। यह नियम बना लें कि आप अपने सभी दोस्तों और सहयोगियों के लिए बड़े, सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करेंगे। जब आप किसी के साथ किसी तीसरे अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हों, तो आप उसकी बड़े शब्दों में प्रशंसा करें, “हाँ, वह बढ़िया आदमी है।" "लोग कहते हैं उसका काम बहुत बढ़िया है।" इस बात का बहुत ध्यान रखें कि आप उसकी बुराई न करें या घटिया भाषा का इस्तेमाल न करें। देर सबेर तीसरे व्यक्ति को पता चल जाता है कि आपने क्या कहा था, और आपने जो बुराई की थी, वह आपको ही बुरा बना सकती है।

           3. दूसरों का उत्साह बढ़ाने के लिए सकारात्मक भाषा का प्रयोग करें। हर मौके पर लोगों की तारीफ़ करें। अपनी पत्नी या अपने पति की हर रोज़ तारीफ़ करें। अपने साथ काम करने वालों की रोज़ तारीफ़ करें। अगर सच्ची तारीफ़ की जाए, तो यह सफलता का औज़ार बन जाती है। इसका प्रयोग करें! इसका प्रयोग बार-बार, हर बार करें। लोगों के हुलिए, उनके काम, उनकी उपलब्धियों, उनके परिवार की तारीफ़ करें।

         4. दूसरों के सामने योजना प्रस्तुत करते समय सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें। जब लोग इस तरह की बात सुनते हैं- “मैं आपको एक अच्छी खबर सुनाना चाहता हूँ। हमारे सामने एक सुनहरा अवसर है..." तो उनके दिमाग में आशा जाग जाती है। परंतु जब वे इस तरह की कोई बात सुनते हैं, "चाहे आप इसे पसंद करें या न करें, हमें यह काम करना है," तो दिमाग़ की फ़िल्म बोझिल, बोरिंग हो जाती है और वे भी इसी तरह के हो जाते हैं। जीत का वादा करें और उनकी आँखों में चमक आ जाएगी। जीत का वादा करें और आपको समर्थन हासिल हो जाएगा। महल बनाएँ, क़ब्र न खोदें!

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Sunday, September 1, 2019

CHAPTER. 3.3. लगातार यही सवाल पूछता रहता है, 'क्या में पकड़ा जाऊँगा? क्या में पकड़ा जाऊँगा?'



लगातार यही सवाल पूछता रहता है, 'क्या में पकड़ा जाऊँगा? क्या में पकड़ा जाऊँगा?'

           "पॉल," मैंने आगे कहा, "तुम्हें परीक्षा में अच्छे नंबर' की इतनी ज़्यादा चाह थी कि तुमने वह किया जो तुम्हारी नज़रों में गलत जीवन में बहुत सारे मौके आएँगे जब 'सफलता हासिल करने के लिए तुम्हारे सामने गलत काम करने का प्रलोभन मौजूद होगा। उदाहरण तौर पर, किसी दिन आप इतनी बुरी तरह कोई सामान बेचना चाहेंगे कि आप अपने ग्राहक को जान-बूझकर गलत जानकारी देकर उसे खरीदने के लिए मजबूर कर देंगे। और ऐसा करने से आपको सफलता मिल सकती है। परंतु इससे होता यह है। आपका अपराधबोध आप पर हावी हो जाएगा और अगली बार जब आप अपने ग्राहक को देखेंगे तो आप परेशान हो जाएँगे, तनाव में आ जाएंगे। आप सोचने लगेंगे, 'क्या उसे पता चल गया है कि मैंने उसे धोखा दिया था ?' आपकी प्रस्तुति इसलिए प्रभावी नहीं होगी क्योंकि आप पूरे मन से प्रस्तुति नहीं दे पाएंगे। इस बात की संभावना है कि आप इसके बाद उसी ग्राहक को दूसरी, तीसरी, चौथी और कई बार सामान बेचने का अवसर गँवा देंगे। लंबे समय में इस तरह की ग़लत सेल्स तकनीकें आपकी अंतरात्मा को तो चोट पहुँचाएँगी ही, आपकी आमदनी को भी कम कर देंगी।"

            इसके बाद मैंने पॉल को बताया कि जब किसी बिजनेसमैन या प्रोफेशनल आदमी को यह डर सताता है कि उसकी पत्नी को उसके विवाहेतर प्रेमसंबंध का पता चल जाएगा तो वह असफल होने लगता है। वह दिन-रात यही सोचता रहता है, “क्या उसे पता चल जाएगा? क्या उसे पता चल जाएगा?" इस कारण उसका आत्मविश्वास कमज़ोर हो । जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि वह नौकरी या घर में कोई भी काम ठीक तरह से नहीं कर पाता।

        
           मैंने पॉल को याद दिलाया कि कई अपराधी कोई सबूत या संकेत नहीं छोड़ते, फिर भी वे सिर्फ इसलिए पकड़े जाते हैं क्योंकि वे अपराधिया की तरह व्यवहार करते हैं और उन्हें देखकर यह समझ में आ जाता है कि इन्होंने कोई ग़लत काम किया है। उनकी अपराधबोध की भावनाएँ उन्हें संदिग्ध आदमियों की सूची में शामिल कर देती हैं।

          हममें से हर एक में सही होने, सही सोचने और सही काम करने की इच्छा होती है। जब हम इस इच्छा के विपरीत व्यवहार करते हैं तो हम अपनी अंतरात्मा में कैंसर की बीमारी आमंत्रित कर लेते हैं। यह कैंसर बढ़ता है और हमारे आत्मविश्वास को कम करता जाता है। इसलिए इस तरह का कोई काम न करें, जिसे करने के बाद आपको यह डर सताने लगे, “क्या मैं पकड़ा जाऊँगा? क्या लोगों को इस बात का पता चल जाएगा? क्या मैं बचने में सफल हो पाऊँगा?"

          धोखा देकर और अपना आत्मविश्वास कम करके “अच्छे नंबर" लाने की यानी कि सफल होने की कोशिश कभी न करें।

          मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि पॉल को सीख मिल गई। उसने सही काम करने का व्यावहारिक मूल्य समझ लिया। मैंने सुझावदि कि वह बैठ जाए और एक बार फिर से परीक्षा दे। उसने मुझसे सवाल किया, “परंतु क्या आप मुझे कॉलेज से नहीं निकालेंगे?" मेरा
जवाब था, “मैं निष्कासन के नियम जानता हूँ। परंतु, अगर हम धोखा देने वाले सारे विद्यार्थियों को कॉलेज से निकाल देंगे तो हमारे आधे प्रोफ़ेसरों की छुट्टी हो जाएगी। और अगर हम धोखा देने का विचार करने वाले सभी विद्यार्थियों को निकाल देंगे, तो हमें कॉलेज में ताले लगाने पड़ेंगे।"

          "इसलिए मैं इस घटना को भूलने के लिए तैयार हूँ, अगर तुम एक काम करो।"

         "बिलकुल,” उसने कहा।

          मैंने उसे एक पुस्तक दी। पुस्तक का नाम था फ़िफ्टी इयर्स विथ द गोल्डन रूल। इसे देते हुए मैंने उससे कहा, “पॉल, इस पुस्तक को पढो और पढ़ने के बाद इसे वापस कर देना। जे. सी. पेनी के खुद के शब्दों में यह जानो कि किस तरह सही काम करने की वजह से वे अमेरिका के सबसे अमीर व्यक्तियों के समूह में शामिल हो गए।"

         सही काम करने से आपकी अंतरात्मा संतुष्ट रहती है। और इससे आत्मविश्वास भी बढ़ता है। जब हम कोई ग़लत काम करते हैं, तो दो नकारात्मक बातें होती हैं। पहली बात तो यह कि हममें अपराधबोध आ जाता है और इस अपराधबोध से हमारा आत्मविश्वास कम हो जाता है।दबात यह कि देर-सबेर दूसरे लोगों को हमारे गलत काम की जानकारी मिल जाती है और उनका हम पर से विश्वास उठ जाता है।

           सही काम करें और अपने आत्मविश्वास को बनाए रखें। यही सफल चिंतन का कारगर तरीका है। 

          यहाँ एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत दिया जा रहा है जो 25 बार पढ़ने लायक है। इसे तब तक पढ़ते रहें, जब तक कि यह आपके दिमाग में पूरी तरह से न घुस जाए : विश्वासपूर्ण चिंतन के लिए विश्वासपूर्ण काम करें।

          महान मनोवैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज डब्ल्यू. क्रेन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अप्लाइड साइकलॉजी (शिकागो : हॉपकिन्स सिंडीकेट, इन्क. 1950) में लिखा है, "याद रखें, काम ही भावनाओं के अग्रज होते हैं। हम अपनी भावनाओं को तो सीधे नियंत्रित नहीं कर सकते। परंतु हम अपने कामों को नियंत्रित करके अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। ...वैवाहिक समस्याओं और ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए सच्चे मनोवैज्ञानिक तथ्यों को जानें। हर दिन सही काम करें और जल्दी ही आपमें सहीभा जाग जाएँगी। यह सुनिश्चित कर लें कि आप अपने जीवनसाथी के साथ डेटिंग करें, उसका चुंबन लें, हर दिन उसकी सच्ची तारीफ़ करें, और भी ऐसी ही छोटी-छोटी चीजें करें, और आपको प्यार कम होने की चिंता कभी नहीं करनी पड़ेगी। आप प्रेम के काम करते रहेंगे, तो जल्दी ही आपमें प्रेम की भावना भी उत्पन्न हो जाएगी।"

         मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शारीरिक गतिविधियों में बदलाव करके हम अपने रवैए को बदल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, आप अगर मुस्कराने की क्रिया करते हैं, तो आप सचमुच मस्कराने के मूड में आ जाएँगे। जब आप अपने शरीर को झुकाने के बजाय तान लेते हैं तो आप ज़्यादा सुपीरियर महसूस करने लगते हैं। इसके उलट अगर, त्यौरियाँ । चढ़ाकर देखें तो पाएँगे कि आप त्यौरियाँ चढाने के मड में आ गए हैं।

         यह सिद्ध करना तो आसान है कि अपनी क्रियाओं पर काब करक। आप अपनी भावनाओं को बदल सकते हैं। जो लोग अपना परिचय देने  

में संकोच करते हैं, वे अपने संकोच को आत्मविश्वास में बदल सकते हैं अगर वे सिर्फ कुछ सामान्य क्रियाएँ करें : पहली बात तो यह कि सामने वाले से गर्मजोशी से हाथ मिलाएं। इसके बाद, सामने वाले व्यक्ति की तरफ़ एकल सीधे देखें। और तीसरी बात, सामने वाले से कहें, "मुझे आपसे मिलकर खुशी हुई।"

           इन तीन साधारण क्रियाओं से आपका संकोच अपने आप और तत्काल दूर हो जाएगा। आत्मविश्वास से भरी क्रिया की वजह से आपमें
अपने आप आत्मविश्वास आ जाएगा।

          आत्मविश्वासपूर्ण चिंतन करने के लिए आत्मविश्वास की क्रियाएँ करें। जिस तरह की भावनाएँ आप स्वयं में जगाना चाहते हैं, उस तरहके काम करें। नीचे आत्मविश्वास बढ़ाने वाले पाँच अभ्यास दिए जा रहे हैं। इन्हें सावधानी से पढ़ें। फिर इनका अभ्यास करने की पूरी कोशिश करें और आप अपना आत्मविश्वास काफ़ी बढ़ा-चढ़ा पाएँगे।

          1. आगे की बेंच पर बैठे। कभी आपने मीटिंग या चर्च या क्लासरूम या किसी और तरह की सभा में इस बात पर गौर किया है कि पीछे की सीटें सबसे पहले भर जाती हैं ? ज़्यादातर लोग पीछे की लाइन में इसलिए बैठते हैं ताकि वे "लोगों की नज़रों में न आएँ"। और वे लोगों की नज़रों में आने से इसलिए बचना चाहते हैं क्योंकि उनमें आत्मविश्वास नहीं होता।

          आगे बैठने से आत्मविश्वास बढ़ता है। इसका अभ्यास करें। आगे से यह नियम बना लें कि आप जितना आगे बैठ सकते हों, बैठें। यह बात तो पक्की है कि आगे बैठने से आप थोड़े ज़्यादा नज़रों में रहते हैं, परंतु याद रखें सफलता के लिए लोगों की नज़रों में रहना ज़रूरी होता है।

         2. नज़रें मिलाकर बात करने का अभ्यास करें। कोई व्यक्ति किस तरह अपनी आँखों का प्रयोग करता है, इससे भी हमें उसके बारे में काफ़ी जानकारी मिल सकती है। अगर कोई आपकी आँखों में सीधे नहीं देखता है, तो आपके मन में यह सवाल तत्काल आ जाता है, “यह व्यक्ति क्या छुपाने की कोशिश कर रहा है ? यह व्यक्ति किस बात से डरा हुआ है ? क्या यह मुझे धोखा देना चाहता है ? इस व्यक्ति के इरादे क्या हैं?"

आम तौर पर, आँखों के संपर्क में असफलता से दो बातें पता चलती हैं। पहली यह, "मैं आपके सामने आने पर असहज अनुभव करता हूँ। मैं आपसे हीन अनुभव करता हूँ। मैं आपसे डरा हुआ अनुभव करता हूँ।" या सामने वाले से आँखें न मिलाने से यह बात पता चलती है, "मैं।
अपराधबोध से ग्रस्त हूँ। मैंने ऐसा कुछ किया है या सोचा है जो मैं नहीं चाहता कि आपको पता चल जाए। मुझे डर है कि अगर मैं आपसे नज़रें। मिलाऊँगा तो आप मेरे दिल की बात समझ जाएंगे।" 

          जब आप नज़रें मिलाने से बचते हैं, तो आप सामने वाले पर अच्छी छाप नहीं छोड़ पाते। आप कहते हैं, “मैं डरा हुआ हूँ। मुझमें आत्मविश्वास की कमी है।" इस डर को जीतने का यही तरीका है कि आप सामने वाले से नज़रें मिलाकर बात करें।

          नज़रें मिलाकर बात करने से सामने वाले को यह संदेश जाता है, “मैं ईमानदार और सच्चा हूँ। मैं जो कह रहा हूँ, मैं उसमें पूरी तरह यकीन करता हूँ। मैं डरा हुआ नहीं हूँ। मैं आत्मविश्वास से भरा हुआ हूँ।"

          अपनी आँखों से काम लें। दूसरे व्यक्ति की आँखों में आँखें डालकर बात करें। इससे न सिर्फ आपमें आत्मविश्वास आ जाएगा, बल्कि इससे सामने वाला भी आप पर विश्वास करने लगेगा।

          3. 25 प्रतिशत तेज़ चलें। जब मैं छोटा था, तो काउंटी सीट पर जाना ही अपने आपमें एक रोचक अनुभव होता था। जब सारे काम हो चुके होते और हम कार में लौट आते, तो मेरी माँ अक्सर कहा करती थीं, “डेवी, यहाँ थोड़ी देर चुपचाप बैठो और देखो कि लोग किस तरह
चल रहे हैं।"

           माँ इस खेल को बहुत अच्छी तरह से खेलती थीं। वे कहा करती थीं, “उस आदमी को देखो। वह परेशान सा दिख रहा है ?" या, "तुम्हें क्या लगता है वह महिला क्या करने जा रही है ?" या. "उस आदमी को तरफ़ देखो। वह कोहरे में लिपटा हुआ लगता है।"

          लोगों को चलते हुए देखना सचमुच मज़ेदार था। मनोरंजन का यह तरीक़ा फ़िल्म देखने से सस्ता पड़ता था (मुझे बाद में पता चला कि इस खेल को खेलने के पीछे माँ का एक कारण यह भी था)। और इससे ज्यादा शिक्षा भी मिलती थी।

         मैं अब भी लोगों को चलते हुए देखता हूँ। कॉरीडॉर में, लॉबी में, फुटपाथ पर लोगों को चलते हुए देखकर मैं समझ लेता हूँ कि उनकी मानसिक स्थिति कैसी है।

         मनोवैज्ञानिक झुकी हुई मुद्राओं और सुस्त चाल का संबंध खुद के बारे में, अपनी नौकरी के बारे में, अपने आस-पास के लोगों के बारे में अप्रिय रवैए से जोड़ते हैं। परंतु मनोवैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि आप अपनी मुद्रा को बदलकर और अपनी चलने की गति को बदलकर अपने रवैए को सचमुच बदल सकते हैं। आप भी देखें। अगर देखेंगे, तो आप यह पाएँगे कि शरीर की क्रिया मानसिक क्रिया का परिणाम है। जो व्यक्ति हारा हुआ है, चोट खाया हुआ है वह मरा-मरा चलता है, सुस्त चलता है। उसमें आत्मविश्वास शून्य होता है।

          औसत लोग “औसत" चाल चलते हैं। उनकी गति “औसत" होती है। उनके चेहरे पर लिखा होता है, “मुझे अपने आप पर नाज़ नहीं है।"

         एक तीसरा समूह भी होता है। इस समूह के लोगों में प्रबल आत्मविश्वास होता है। वे आम लोगों से तेज़ चलते हैं। उनकी चाल में फुर्ती होती है। उनकी चाल दुनिया को बताती है, “मैं किसी महत्वपूर्ण काम से किसी महत्वपूर्ण जगह जा रहा हूँ। इससे भी बड़ी बात यह है कि जोकाम मैं 15 मिनट बाद करने जा रहा हूँ, मुझे उसमें सफलता मिलेगी।"

          आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए 25 प्रतिशत तेज़ चलने की तकनीक का प्रयोग करके देखें। अपने कंधों को सीधा कर लें, अपने सिर को ऊपर उठा लें, और थोड़े तेज़ क़दमों से आगे की तरफ़ बढ़े चलें। आप पाएँगे कि आपका आत्मविश्वास भी बढ़ चुका है।

         कोशिश करें और परिणाम खुद देखें।

       4. बोलने की आदत डालें। कई तरह के समूहों के साथ काम करते हुए मैंने यह पाया है कि बहुत से समझदार और योग्य लोग चर्चाओं में भाग नहीं लेते हैं। चर्चा के दौरान उनका मुँह ही नहीं खुल पाता। ऐसा नहीं है कि उनके पास बाक़ी लोगों जितने अच्छे विचार नहीं होते या वे बोल नहीं सकते। इसका कारण सिर्फ यह होता है कि उनमें आत्मविश्वास नहीं होता।

          यह चुप्पा व्यक्ति अपने बारे में इस तरह की बातें सोचता है, “मेरा विचार शायद काम का नहीं है। अगर मैं कुछ कहूँगा तो हो सकता है कि लोग मुझे मूर्ख समझें। इसलिए बेहतर यही है कि मैं चुपचाप बैठा रहँ | इसके अलावा, समूह के बाक़ी लोग मुझसे बेहतर जानते हैं। मैं दूसरों के सामने यह जताना नहीं चाहता कि मैं कितना नासमझ हूँ।" 

          जितनी बार यह चुप्पा व्यक्ति बोलने में असफल रहता है, वह अपने.आपको उतना ही ज़्यादा अक्षम और हीन बनाता जाता है। अक्सर वह खुद से यह कमज़ोर-सा वादा करता है (अंदर से वह जानता है कि इस वादे को वह कभी पूरा नहीं कर पाएगा) कि वह “अगली बार" मौका पड़ने पर ज़रूर बोलेगा।

          यह बहुत महत्वपूर्ण है : हर बार जब चुप्पा व्यक्ति बोलने में असफल रहता है, तो वह आत्मविश्वास को ख़त्म करने वाले ज़हर की एक और खुराक गटक लेता है। अपने आप पर उसका विश्वास उतना ही कम होता जाता है।

           सकारात्मक पहलू यह है कि आप जितना ज़्यादा बोलते हैं, आपका आत्मविश्वास उतना ही ज़्यादा बढ़ता जाता है और आपके लिए अगली बार बोलना उतना ही ज़्यादा आसान हो जाता है। बोलने की आदत डालें। आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए यह आदत विटामिन की तरह काम करती है।

           आत्मविश्वास बढ़ाने की इस तकनीक का प्रयोग करें। हर ओपन मीटिंग में बोलने का नियम बना लें। आप जिस बिज़नेस वार्ता, कमिटी मीटिंग, कम्युनिटी फ़ोरम में भाग लें, उसमें अपने आप कुछ न कुछ कहें। इस मामले में कोई अपवाद न रखें। कोई टिप्पणी करें, कोई सुझाव दे, कोई सवाल पूछे। और आख़िरी में कभी न बोलें। आपको सबसे पहले। बोलने की आदत डालनी चाहिए, आपको झिझक तोड़नी होगी।

          और मूर्ख दिखने के बारे में चिंता न करें। आप मुर्ख नहीं दिखेंगे अगला व्यक्ति चाहे आपसे सहमत न हो, परंतु कोई दूसरा व्यक्ति आपस जरूर सहमत होगा। अपने आपसे यह सवाल करना छोड दें, “क्या मैं कभी बोलने की हिम्मत कर पाऊँगा?"

          इसके बजाय, समूह के लीडर का ध्यान आकर्षित करने का लक्ष्य बनाएँ ताकि आप बोल सकें।

          बोलने के विशेष प्रशिक्षण और अनुभव के लिए अपने स्थानीय टोस्टमास्टर के क्लब में शामिल हो जाएँ। हज़ारों लोगों ने इस तरह के सुनियोजित कार्यक्रम में शामिल होकर लोगों के साथ और लोगों के सामने चर्चा करके अपना आत्मविश्वास बढ़ाया है।

           5. बड़ी मुस्कराहट दें। ज्यादातर लोगों का कहना है कि मुस्कराहट से उन्हें सच्ची ताक़त मिलती है। उन्हें बताया गया है कि मुस्कराहट आत्मविश्वास की कमी को दूर करने के लिए एक बढ़िया दवा है। परंतु ज्यादातर लोग इस बात में इसलिए यकीन नहीं करते, क्योंकि जब वे डरे होते हैं तो वे मुस्कराने की कोशिश ही नहीं करते।

            यह छोटा-सा प्रयोग करके देखें। आप पराजित अनुभव करें और बड़ी मुस्कराहट दें : एक साथ, एक ही समय में यह संभव नहीं है। आप ऐसा कर ही नहीं सकते। बड़ी मुस्कराहट आपको आत्मविश्वास देती है। बड़ी मुस्कराहट आपका डर भगाती है, चिंता दूर करती है और निराशा हर लेती है।

          और एक सच्ची मुस्कराहट सिर्फ आपके आत्मविश्वास को ही नहीं बढ़ाती, या सिर्फ आपके मन से बुरी भावनाओं को ही नहीं हटाती। सच्ची मुस्कराहट से लोगों का विरोध भी पिघल जाता है- और यह तत्काल होता है। अगर आप किसी को बड़ी-सी, सच्ची मुस्कराहट दें, तो सामने वाला व्यक्ति आपसे गुस्सा हो ही नहीं सकता। कुछ समय पहले की बात है मेरे साथ एक घटना हुई, जिसमें ऐसा ही हुआ। मैं चौराहे पर हरी बत्ती जलने का इंतज़ार कर रहा था कि तभी भड़ाम की आवाज़ आई! मेरे पीछे वाले ड्राइवर का पैर ब्रेक पर से हट गया था और उसने मेरी कार के बम्पर में पीछे से टक्कर मार दी थी। मैंने शीशे में से देखा कि वह बाहर निकल रहा था। मैं भी तत्काल बाहर निकल आया और नियमों की पुस्तक को भूलते हुए बहस के लिए तैयार हो गया। मैं मानता हूँ कि  मैं उससे बहस करके उसे नीचा दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार था

          परंतु सौभाग्य से, इसके पहले कि मुझे ऐसा करने का मौका मिलतावह मेरे पास आया, मुस्कराया और उसने गभीरता से कहा, "दोस्त मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था।" उसकी मुस्कराहट और उसके गंभीर वाय को सुनकर मेरा गुस्सा काफूर हो गया। जवाब में मैंने इस तरह की बात कही. “चलता है। ऐसा तो होता ही रहता है।” पलक झपकते ही हमारा विरोध मित्रता में बदल गया।

           बड़ी मुस्कराहट दें और आप महसूस करेंगे कि “एक बार फिर खशी के दिन लौट आए हैं।" परंतु मुस्कराहट बड़ी होनी चाहिए। आधी मुस्कराहट से काम नहीं चलेगा। आधी मुस्कराहट की सफलता की कोई गारंटी नहीं है। तब तक मुस्कराएँ जब तक आपके दाँत न दिखने लगें। बड़ी मुस्कराहट की सफलता की पूरी गारंटी है।

           मैंने कई बार सुना है, "हाँ, परंतु जब मैं डरा हुआ होता हूँ, या मैं गुस्से में होता हूँ तो मेरी मुस्कराने की इच्छा ही नहीं होती।"

         बिलकुल नहीं होती होगी। किसी की नहीं होती। परंतु यही तो खास बात है कि आप ऐसे वक्त भी खुद कहें, “मैं मुस्कराकर दिखा दूंगा।"

          फिर मुस्कराएँ।

          मुस्कराहट की शक्ति का दोहन करें।

    इन पाँच तकनीकों के प्रयोग से लाभ उठाएँ

        1. कार्य करने से डर दूर होता है। अपने डर को चिन्हित कर लें और फिर। रचनात्मक कार्य करें। अकर्मण्यता - किसी परिस्थिति के बारे में कुछ न करने की आदत - से डर बढ़ता है और आत्मविश्वास कम होता है।

        2. अपनी यादों के बैंक में केवल सकारात्मक विचार ही जमा करना की कोशिश करें। नकारात्मक, खद को नीचा दिखाने वाले विचारों का मानसिक राक्षस न बनने दें। अप्रिय घटनाओं या परिस्थितियों को याद करने की आदत छोड़ दें।

            3. लोगों को सही पहलू से देखें। याद रखें, लोग ज्यादातर मामलों में एक जैसे होते हैं और बहुत कम मामलों में एक-दूसरे से अलग होते हैं। सामने वाले के बारे में संतुलित नज़रिया रखें। आख़िर, वह भी आप ही की तरह एक इंसान है। और आप समझने के रवैए का भी प्रयोग करें। कई लोग भौंकते हैं, परंतु बहुत कम लोग सचमुच काटते हैं।

          4. वही काम करने की आदत डालें जो आपकी अंतरात्मा के हिसाब से ठीक हैं। इससे आपके जीवन में अपराधबोध का ज़हर नहीं घुल पाता। सही काम करना सफलता के लिए एक बहुत व्यावहारिक नियम है।

           5. अपने हर काम से यह झलकने दें, “मुझमें आत्मविश्वास है, काफ़ी आत्मविश्वास है।" अपने रोज़मर्रा के जीवन में इन छोटी-छोटी तकनीकों का प्रयोग करें।

1. “आगे की बेंच" पर बैठे।

2. नज़रें मिलाने का अभ्यास करें।

3. 25 प्रतिशत तेज़ चलें।

4. बोलने की आदत डालें।

5. बड़ी मुस्कराहट दें।

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Thursday, August 29, 2019

CHAPTER 3.2. डर का इलाज करने और विश्वास हासिल करने के लिए ये दो कदम उठाएँ:

डर का इलाज करने और विश्वास हासिल करने के लिए ये दो कदम उठाएँ:




       1. डर का असली कारण पता करें। यह तय कर लें कि आप वास्तव में किस चीज़ से डर रहे हैं।

      2. फिर कर्म करें। हर तरह का डर किसी न किसी तरह के काम से दूर हो सकता है।

      और याद रखें, झिझकने से आपका डर बढ़ता ही है, कम नहीं होता। इसलिए देर न करें, बल्कि तत्काल काम में जुट जाएँ। फैसला करें।

        आत्मविश्वास के अभाव का कारण होती है ख़राब याददाश्त। आपका दिमाग़ किसी बैंक की तरह होता है। हर दिन आप अपने "दिमाग़ के बैंक" में विचारों को जमा करते जाते हैं। विचारों का यह संग्रह बढ़ता जाता है और आपकी याददाश्त बन जाता है। जब भी आप सोचने बैठते हैं या आपके सामने कोई समस्या आती है तो दरअसल आप अपनी यादों के बैंक से पूछते हैं, "इस बारे में मैं क्या जानता हूँ?"

        आपकी यादों का बैंक पहले से जमा किए हुए विचारों के संग्रह में से आपको आपकी मनचाही जानकारी देता है। आपकी यादें ही वह मूलभूत सप्लायर हैं जो आपको नए विचार के लिए कच्चा माल प्रदान करती हैं।

         आपकी यादों के बैंक का टेलर बहुत ही भरोसेमंद है। वह आपको कभी धोखा नहीं देता। जब आप उसके पास जाकर कहते हैं, "मिस्टर टेलर, मुझे कुछ विचार निकालकर दें जिनसे यह सिद्ध हो कि मैं बाक़ी लोगों जितना योग्य नहीं हूँ," वह कहता है, “बिलकुल, सर। याद करें आपने पहले भी दो बार इस काम को करने की कोशिश की थी, और आप असफल हुए थे? याद करें आपकी छठी कक्षा की टीचर ने कहा था कि आप कोई भी काम ढंग से नहीं कर सकते। याद करें आपने अपने साथी कर्मचारियों को अपने बारे में यह कहते सना था... याद करें..."

         और मिस्टर टेलर एक के बाद एक विचार निकालकर आपको देते हैं जिनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि आप अयोग्य हैं, असमर्थ हैं।

           परंतु अगर आप अपनी यादों के टेलर से यह कहें, “मिस्टर टेलर, मझे एक महत्वपूर्ण फैसला करना है। क्या आप मुझे ऐसे विचार प्रदान करेंगे जिनसे मुझे हौसला मिले?"

          और इसके जवाब में मिस्टर टेलर कहते हैं, “बिलकुल, सर," परंतु इस बार वे आपको पहले से जमा किए हुए ऐसे विचार देते हैं जिनसे यह साबित होता है कि आप सफल हो सकते हैं। “याद करें आपने पहले भी ऐसी परिस्थिति में वह शानदार काम किया था... याद करें मिस्टर स्मिथ को आप पर कितना भरोसा था... याद करें आपके अच्छे दोस्त आपके बारे में यह कहा करते थे... याद करें..." मिस्टर टेलर पूरी तरह सहयोग करेंगे और आपको उसी तरह के विचार निकालने देंगे जिस तरह के विचार आप निकालना चाहते हैं। आखिर, यह आपका बैंक है।

         यहाँ पर दो उपाय दिए जा रहे हैं जिनके प्रयोग से आप अपनी यादों के बैंक का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं और अपना आत्मविश्वास जगा सकते हैं।

        1. अपनी यादों के बैंक में केवल सकारात्मक विचार ही जमा करें। इस बात को अच्छी तरह से समझ लें। हर व्यक्ति के जीवन में अप्रिय, मुश्किल, हतोत्साहित करने वाली घटनाएँ होती हैं। परंतु इन घटनाओं के प्रति असफल और सफल लोगों की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग होती हैं। असफल लोग बुरी घटनाओं को दिल से लगाकर रखते हैं। वे अप्रिय स्थितियों को बार-बार याद करते हैं, ताकि वे उनकी यादों में अच्छी तरह से जम जाएँ। वे अपने दिमाग से उन्हें नहीं निकाल पाते। रात को भी वे जिस घटना के बारे में सोचते हुए सोते हैं, वह दिन में हुई कोई अप्रिय घटना ही होती है।

        दूसरी तरफ़ आत्मविश्वास से पूर्ण, सफल लोग इस तरह की घटनाओं को "भूल जाते हैं।” सफल लोग अपनी यादों के बैंक में केवल सकारात्मक विचार ही रखते हैं।

         आपकी कार किस तरह चलेगी अगर हर सुबह काम पर जाने से पहले आप दो मुट्ठी धूल अपने फ्रैंक केस में डाल दें ? क्या आपका शानदार इंजन बैठ नहीं जाएगा और आप इससे जो कराना चाहते हैं, वह करने से इन्कार नहीं कर देगा? आपके दिमाग में जमा नकारात्मक,
अप्रिय विचार भी आपके दिमाग को इसी तरह से प्रभावित करते हैं। नकारात्मक विचार आपकी मानसिक मोटर को इसी तरह की अनावश्यक टूटफूट का शिकार बनाते हैं। इनसे चिंता, कुंठा और हीनता की भावनाएँ पैदा होती हैं। नकारात्मक विचार आपको सड़क के किनारे खड़ा रखते हैं, जबकि बाक़ी लोग अपनी गाड़ियों पर फर्राटे से आगे बढ़ रहे होते हैं।

         ऐसा करें। उन क्षणों में जब आप अपने विचारों के साथ अकेले हों- जब आप अपनी कार चला रहे हों या अकेले खाना खा रहे हों - सुखद, सकारात्मक घटनाएँ याद करें। अपनी यादों के बैंक में अच्छे विचार डालें। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। इससे आपमें “मैं सचमुच अच्छा हूँ" की भावना जागती है। इससे आपका शरीर भी स्वस्थ रहता है।

        इसका एक बढ़िया तरीका यह है। सोने जाने से पहले, अपनी यादों के बैंक में अच्छे विचारों को डाल दें। अपने जीवन की अच्छी बातों को याद करें। यह सोचें कि आपको कितनी सारी चीज़ों के लिए ऊपर वाले का शुक्रगुज़ार होना चाहिए : आपकी पत्नी या आपका पति, आपके बच्चे, आपके दोस्त, आपका स्वास्थ्य। उन अच्छी चीज़ों को याद करें जो आपने लोगों को आज करते देखा है। अपनी छोटी-छोटी सफलताओं और उपलब्धियों को याद करें। उन कारणों को दुहराएँ कि आपको आज जीवित होने के लिए खुश क्यों होना चाहिए।

          2. अपनी यादों के बैंक से केवल सकारात्मक विचार ही निकालें। कई वर्ष पहले मैं शिकागो में मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की एक फर्म के साथ करीबी रूप से जुड़ा हुआ था। वे कई तरह के मामले सुलझाते थे, परंतु उनमें से ज़्यादातर मामले विवाह संबंधी समस्याओं और मनोवैज्ञानिक कठिनाइयों से संबंधित होते थे।

         एक दिन मैं फ़र्म के मुखिया से उसके प्रोफेशन और उसकी तकनीकों के बारे में बात कर रहा था। मैं यह जानना चाहता था कि वह किस तरह असंतुलित व्यक्ति की मदद करता है। उसने कहा, “क्या आप जानते हैं। कि लोग अगर केवल एक चीज़ कर लें, तो उन्हें मेरी सेवाओं की कभी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

           "वह क्या ?” मैंने उत्सुकता से पूछा।

          "सिर्फ यही- कि आप अपने नकारात्मक विचारों को नष्ट कर दें, इससे पहले कि वे विचार राक्षस बन जाएँ और आपको नष्ट कर दें।"

         "मैं जिन लोगों की मदद करता हूँ उनमें से ज्यादातर लोग,” उसने कहा, "मानसिक आतंक की दुनिया में रहते हैं। शादी की बहुत सारी कठिनाइयाँ 'हनीमून राक्षस' की वजह से होती हैं। हनीमून उतना संतोषजनक नहीं रहा होगा, जितना एक या दोनों जीवनसाथी चाहते हों। परंतु उस याद को दफ़ना देने के बजाय वे लोग सैकड़ों बार उस पर विचार करते रहते हैं जब तक कि यह उनके वैवाहिक जीवन की एक बहुत बड़ी बाधा नहीं बन जाती। वे मेरे पास पाँच या दस साल बाद आते हैं।

          "आम तौर पर, मेरे ग्राहक यह नहीं जान पाते कि समस्या की जड़ कहाँ है। यह मेरा काम है कि मैं उनकी कठिनाई का विश्लेषण करूँ और उन्हें यह बताऊँ कि उन्होंने राई का पहाड़ बना लिया है।

          "कोई भी व्यक्ति किसी भी अप्रिय घटना को मानसिक राक्षस बना सकता है," मेरे मनोवैज्ञानिक दोस्त ने आगे कहा। "नौकरी की असफलता, असफल रोमांस, बुरा निवेश, टीन-एज बच्चे के व्यवहार से निराशा- ऐसे आम राक्षस हैं जिनकी वजह से मैंने लोगों को परेशान देखा है और मैं इन राक्षसों को मारने में इन लोगों की मदद करता हूँ।"

             यह स्पष्ट है कि अगर हम किसी भी नकारात्मक विचार को बार-बार दोहराएँगे तो इसका मतलब है कि हम इसे खाद-पानी दे रहे हैं। और अगर हम इसे खाद-पानी देंगे, तो यह धीरे-धीरे बड़ा राक्षस बनकर हमारे आत्मविश्वास को नष्ट कर देगा और हमारी सफलता की राह में गंभीर मनोवैज्ञानिक कठिनाइयाँ खड़ी कर देगा।

            कॉस्मोपॉलिटन मैग्ज़ीन में हाल ही में छपे एक लेख "द ड्राइव टुवर्ड सेल्फ़-डेस्ट्रक्शन" में एलिस मल्काहे ने इस तरफ़ इशारा किया कि हर साल 30,000 अमेरिकी आत्महत्या कर लेते हैं और 100,000 लोगआत्महत्या का असफल प्रयास करते हैं। उन्होंने आगे कहा, “इस बात के आश्चर्यजनक प्रमाण मिले हैं कि लाखों-करोड़ों दूसरे लोग धीमे-धीमे, कम स्पष्ट तरीकों से खुद को मार रहे हैं। बाक़ी के लोग शारीरिक आत्महत्या करने के बजाय, आध्यात्मिक आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि वे खुद को कई तरह से अपमानित, दंडित कर रहे हैं और कुल मिलाकर अपने आपको छोटा बना रहे हैं।"

          जिस मनोवैज्ञानिक मित्र का मैंने ज़िक्र किया था, उसने मुझे बताया कि किस तरह उसने अपनी एक ऐसी मरीज़ को रोका जो "मानसिक और आध्यात्मिक आत्महत्या करने पर तुली हुई थी। उसने कहा, “इस मरीज़ की उम्र पैंतीस से ऊपर होगी। उसके दो बच्चे थे। सामान्य भाषा में कहा जाए तो उसे गंभीर डिप्रेशन था। अपनी जिंदगी का हर अनुभव उसे दःखद अनुभव ही लगता था। उसका स्कूली जीवन, उसकी शादी, बच्चों का लालन-पालन, जिन जगहों पर वह रही थी- सभी के बारे में उसकी सोच नकारात्मक थी। उसने बताया कि उसे याद नहीं है कि वह कभी सुखी भी रही थी। और चूँकि व्यक्ति अपने अतीत की कूची से ही अपने वर्तमान में रंग भरता है इसलिए उसे वर्तमान जीवन में भी सिर्फ निराशा और अँधेरा ही नज़र आ रहा था।

          “जब मैंने उससे पूछा कि सामने वाली तस्वीर में उसे क्या दिख रहा था, तो उसने कहा, 'ऐसा लगता है जैसे यहाँ आज रात तूफ़ान आने वाला है। यह उस तस्वीर का सबसे निराशाजनक विश्लेषण था।" (यह तस्वीर एक बड़ी ऑइल पेंटिंग है जिसमें सूर्य आसमान में नीचे की तरफ़ है। चित्र बहुत चतुराई से बनाया गया है और इसे सूर्योदय का दृश्य भी समझा जा सकता है और सूर्यास्त का भी। मनोवैज्ञानिक ने कहा कि लोग तस्वीर में जो देखते हैं, उससे उनके व्यक्तित्व के बारे में संकेत मिल जाता है। ज्यादातर लोग कहते हैं कि यह सूर्योदय का दृश्य है जबकि मानसिक रूप से असंतुलित, डिप्रेस्ड व्यक्ति हमेशा इसे सूर्यास्त का दृश्य बताते हैं।)

          “एक मनोवैज्ञानिक के रूप में मैं किसी व्यक्ति की याददाश्त तो नहीं बदल सकता। परंतु अगर मरीज़ सहयोग दे, तो मैं उसे अपने अतीत को अलग तरीके से देखने का नज़रिया सिखा सकता हूँ। मैंने इस महिला को । भी ऐसा ही करना सिखाया। मैंने उसे बताया कि वह अपने अतीत को पूरी तरह निराशावादी रवैए से न देखे और उसमें से खुशी और आनंद के पलों को याद करने की कोशिश करे। छह महीनों के बाद उसकी हालत में थोड़ा सा सुधार हुआ। उस वक़्त मैंने उसे एक ख़ास काम सौंपा। मैंने उससे कहा कि वह हर दिन तीन कारण लिखे जिनके कारण उसे खुश होना चाहिए। हर सप्ताह गुरुवार को मैं उसके लिखे कारणों को देख लेता था। यह सिलसिला तीन माह तक चलता रहा। उसमें काफ़ी सुधार होरहा था। आज वह महिला एक सामान्य जीवन जी रही है। वह सकारात्मक है और वह ज़्यादातर लोगों जितनी ही सुखी है।"

       जब इस महिला ने अपनी यादों के बैंक से नकारात्मक विचार निकालना बंद कर दिया, तो उसकी हालत में सुधार होना शुरू हो गया।

         चाहे मनोवैज्ञानिक समस्या बड़ी हो या छोटी, इलाज हमेशा तभी शुरू होता है जब व्यक्ति अपनी यादों के बैंक से नकारात्मक विचारों को निकालना बंद कर देता है और उनके बजाय सकारात्मक विचार निकालना शुरू कर देता है।

         मानसिक राक्षस न बनाएँ। अपनी यादों के बैंक से अप्रिय विचार निकालना बंद कर दें। जब भी आपको किसी तरह की कोई परिस्थिति याद आए, तो उसके अच्छे हिस्से के बारे में सोचें। बुरे हिस्से को भूल जाएँ। उसे दफना दें। अगर आप यह पाएँ कि आप नकारात्मक पहलू पर ही विचार कर रहे हैं, तो उस घटना से अपने दिमाग को पूरी तरह हटा दें।

         और यहाँ हम आपको एक और महत्वपूर्ण और उत्साहवर्द्धक बात बताना चाहते हैं। आपका मस्तिष्क अप्रिय घटनाओं को भुलाना चाहता है। अगर आप सहयोग करें, तो अप्रिय यादें धीरे-धीरे सिकुड़ती जाती हैं और आपकी यादों के बैंक का टेलर उन्हें बाहर निकालता जाता है।

        डॉ. मैल्विन एस. हैविक एक प्रसिद्ध एड्वर्टाइजमेंट मनोवैज्ञानिक हैं और याद रखने की हमारी योग्यता के बारे में वे कहते हैं, “जब जागने वाली भावना सुखद होती है तो विज्ञापन को याद रखना आसान होता है। जब जागने वाली भावना सुखद नहीं होती, तो पाठक या श्रोता उस विज्ञापन के संदेश को जल्दी ही भूल जाते हैं। अप्रिय घटनाएँ हमारी चाही गई चीज़ों के ख़िलाफ़ होती हैं, इसलिए हम उन्हें याद नहीं रखना चाहते।" 

संक्षेप में, अगर हम उन्हें बार-बार याद न करें तो अप्रिय घटनाओं को भूलना आसान है। अपनी यादों के बैंक से केवल सकारात्मक विचार ही निकालें। बाक़ी को यूँ ही बेकार पड़ा रहने दें। और आपका आत्मविश्वास आसमान छू लेगा। आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किला फतह कर सकते हैं। आपको लगेगा आप दुनिया की चोटी पर पहुँच सकते हैं। आप जब भी अपने नकारात्मक, खुद को छोटा करने वाले विचारों को याद करने से इन्कार करते हैं तो आप अपने डर को जीतने की तरफ़ एक बड़ा क़दम आगे बढ़ाते हैं।

          लोग दूसरे लोगों से क्यों डरते हैं ? जब दूसरे लोग हमारे आस-पास होते हैं तो हम इतना आत्म-चेतन क्यों हो जाते हैं ? हमारे संकोच की क्या वजह होती है? हम इस बारे में क्या कर सकते हैं?

         दूसरे लोगों का डर एक बड़ा डर होता है। परंतु इसे जीतने का भी एक तरीक़ा है। अगर आप उसे “सही पहलू" से देखने की आदत डाल लें तो आप लोगों के डर को जीत सकते हैं।

         मेरे एक सफल बिज़नेस मित्र ने मुझे बताया कि किस तरह उसने लोगों के बारे में सही नज़रिया सीखा। उसका उदाहरण सचमुच दिलचस्प है।

         “द्वितीय विश्वयुद्ध में सेना में जाने से पहले मैं हर एक के सामने झिझकता था, हर एक से डरता था। आप सोच भी नहीं सकते मैं उस समय कितना शर्मीला और संकोची हुआ करता था। मुझे लगता था बाक़ी लोग मुझसे बहुत ज़्यादा स्मार्ट हैं। मैं अपनी शारीरिक और
मानसिक कमियों को लेकर चिंता किया करता था। मैं सोचा करता था कि मेरा जन्म ही असफल होने के लिए हुआ है।

        "फिर क़िस्मत से मैं सेना में चला गया और वहाँ जाने के बाद मेरे दिल से लोगों का डर निकल गया। 1942 और 1943 के दौरान जब सेना में लोगों को भर्ती किया जा रहा था, तो मुझे भर्ती केंद्रों पर मेडिकल ऑफ़िसर के रूप में तैनात किया गया। मैंने इन लोगों के परीक्षण म सहयोग किया। मैं इन रंगरूटों को जितना देखता था. मेरे मन से लागा का डर उतना ही कम होता जाता था।

          “सैकड़ों की तादाद में लोग खड़े हुए थे. सभी पूरे कपड़े उतार हुए। थे और सभी लगभग एक-से दिख रहे थे। हाँ. इनमें से कुछ माटयार कुछ दुबले, कुछ लंबे थे और कुछ नाटे. परंत वे सभी परेशान थे, सभी अकेलापन अनुभव कर रहे थे। कुछ समय पहले यही लोग युवा
एक्जीक्यूटिव हुआ करते थे। कुछ समय पहले इनमें से कुछ किसान थे, कछ सेल्समेन थे, कुछ ब्लू कालर कर्मचारी थे, और कुछ यूँ ही सड़कों पर खाक छाना करते थे। कुछ दिन पहले ये लोग अलग-अलग काम किया करते थे। परंतु भर्ती केंद्र पर वे सारे लोग एक-से दिख रहे थे।

         तब मैंने एक महत्वपूर्ण बात सोची। मैंने पाया कि लोग ज़्यादातर मामलों में एक-से होते हैं। लोगों में समानताएँ ज़्यादा होती हैं, और असमानताएँ कम होती हैं। मैंने पाया कि सामने वाला आदमी भी मेरे जैसा ही है। उसे भी अच्छा खाना पसंद है, उसे भी अपने परिवार और
दोस्तों की याद आती है, वह भी तरक्की करना चाहता है, उसके पास भी समस्याएँ हैं और वह भी आराम करना चाहता है। इसलिए, अगर सामने वाला मेरे जैसा ही है, तो उससे डरने की कोई वजह ही नहीं है।"

अब, मैं आपसे पूछता हूँ। क्या यह बात काम की नहीं है? अगर सामने वाला मेरे जैसा ही है, तो उससे डरने की कोई वजह ही नहीं है।

            लोगों को सही नज़रिए से देखने के दो तरीके ये हैं :

          1. सामने वाले व्यक्ति को संतुलित दृष्टि से देखें। लोगों के साथ व्यवहार करते समय इन दो बातों का ध्यान रखें : पहली बात तो यह कि सामने वाला व्यक्ति महत्वपूर्ण है। निश्चित रूप से वह महत्वपूर्ण है। हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। परंतु यह भी याद रखें कि आप भी महत्वपूर्ण हैं। तो जब आप किसी व्यक्ति से मिलें तो ऐसा सोचें, “हम दो महत्वपूर्ण लोग मिलकर किसी आपसी लाभ या रुचि के विषय पर चर्चा कर रहे हैं।"

         कुछ महीने पहले, एक बिज़नेस एक्जीक्यूटिव ने फोन पर मुझे बताया कि उसने मेरे सुझाए एक युवक को नौकरी पर रख लिया है। "आपको पता है मुझे उसकी किस बात ने प्रभावित किया," मेरे दोस्त न कहा। “कौन सी बात ने?" मैंने पूछा। "मुझे उसका आत्मविश्वास बेहद पसंद आया। ज्यादातर उम्मीदवार तो कमरे में घुसते समय डरे और सहमे या उन्होंने मुझे उस तरह के जवाब दिए जो उनकी राय में मैं सता पाहता था। एक तरीके से ज्यादातर उम्मीदवार भिखारियों की तरह व्यवहार कर रहे थे- उन्हें आप कुछ भी दे सकते थे और उन्हें आपसे किसी ख़ास चीज़ की उम्मीद नहीं थी।

         “परंतु जी. का व्यवहार इन सबसे अलग था। उसने मेरे प्रति सम्मान दिखाया, परंतु इसके साथ ही साथ महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसने अपने प्रति भी सम्मान दिखाया। मैंने उससे जितने सवाल पूछे. उसने भी मुझसे तक़रीबन उतने ही सवाल पूछे। वह कोई चूहा नहीं है। वह असली मर्द है और मैं उसके आत्मविश्वास से बहुत प्रभावित हुआ।"

           आपसी महत्व का रवैया आपको परिस्थिति को देखने का संतुलित रवैया देता है। सामने वाला व्यक्ति आपकी नज़र में आपसे ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं बन पाता।

          हो सकता है सामने वाला व्यक्ति बहुत बड़ा, बहुत महत्वपूर्ण दिख रहा हो। परंतु याद रखें, है तो वह भी एक इंसान ही। उसके पास भी तो वही रुचियाँ, इच्छाएँ और समस्याएँ होंगी जो आपके पास हैं।

        2. समझने का रवैया विकसित करें। जो लोग आपको नीचा दिखाना चाहते हैं, आपके पर कतरना चाहते हैं, आपकी टाँग खींचना चाहते हैं, आपकी बुराई करना चाहते हैं। ऐसे लोगों की इस दुनिया में कोई कमी नहीं है। अगर आप इनका सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो यह लोग आपके आत्मविश्वास में बड़े-बड़े छेद कर देंगे और आपको ऐसा लगेगा जैसे आप पूरी तरह हार चुके हैं। आपको ऐसे वयस्क हमलावर के विरुद्ध ढाल चाहिए, उस हमलावर के लिए जो अपनी पूरी ताकत से आप पर चढ़ाई करने के लिए कमर कसे बैठा है।

            कुछ महीने पहले मेम्फिस होटल की रिज़र्वेशन डेस्क पर मैंने सीखा कि इस तरह के लोगों का सामना किस तरह से किया जा सकता है। 

           शाम के 5 बजे थे और होटल में नए अतिथियों का रजिस्ट्रेशन किया जा रहा था। मेरे सामने वाले आदमी ने क्लर्क को अपना नाम बताया। क्लर्क ने कहा, “यस सर, आपके लिए एक बढ़िया सिंगल रूम बुक किया हुआ है।"

           "सिंगल,” वह आदमी गुस्से से चिल्लाया, "मैंने तो डबल बेड रूम  का ऑर्डर दिया था।"

           क्लर्क ने विनम्रता से जवाब दिया, “मैं देख लेता हूँ, सर।" उसने अपनी फ़ाइल निकाली और उसमें देखकर कहा, "माफ़ कीजिए, सर। आपके टेलीग्राम में साफ़ लिखा हुआ था कि सिंगल रूम चाहिए। अगर खाली होता तो मैं आपको खुशी-खुशी डबल बेडरूम दे देता परंतु हमारे पास अभी कोई डबल बेडरूम ख़ाली नहीं है।"

           क्रुद्ध ग्राहक चिल्लाया, “भाड़ में जाए कि टेलीग्राम में क्या लिखा है, मुझे तो डबल बेडरूम ही चाहिए।"

           फिर उसने इस लहज़े में बात करना शुरू कर दिया “तुम नहीं जानते मैं कौन हूँ" और उसके बाद वह यहाँ तक आ गया “मैं तुम्हें देख लूँगा। मैं तुम्हें नौकरी से निकलवा दूंगा। मैं तुम्हें यहाँ नहीं रहने दूंगा।"

शाब्दिक आक्रमण की इस बौछार को विनम्रता से सहन करते हुए क्लर्क ने कहा, “सर, माफ़ कीजिए, हमने आपके निर्देशों का पालन किया है।" 

आख़िरकार ग्राहक जो अब आगबबूला हो चुका था बोला, "चाहे मुझे सबसे बढ़िया कमरा भी मिल जाए, तो भी अब मैं इस होटल में कभी नहीं ठहरूँगा,” और यह कहकर वह होटल से बाहर निकल गया।

          मैं डेस्क पर पहुँचा और मैं सोच रहा था कि क्लर्क इस बदतमीज़ी भरे व्यवहार के कारण विचलित होगा। परंतु मुझे हैरत हुई जब उसने मेरा स्वागत मधुर आवाज़ में “गुड ईवनिंग, सर" कहकर किया। जब वह मेरे रजिस्ट्रेशन की कार्यवाही पूरी कर रहा था, तो मैंने उससे कहा, “मुझे आपका तरीक़ा पसंद आया। आपका अपनी भावनाओं पर ज़बर्दस्त नियंत्रण है।"

         “सर,” क्लर्क ने कहा, “मैं इस तरह के आदमी पर गुस्सा नहीं हो सकता। वह वास्तव में मुझ पर गुस्सा नहीं हो रहा था। मैं तो सिर्फ एक बलि का बकरा था। शायद उस बेचारे को अपनी पत्नी से कोई समस्या होगी, या उसका बिज़नेस चौपट हो रहा होगा या हो सकता है वह हीन भावना से ग्रस्त हो और यह उसके लिए एक सुनहरा अवसर था जब वह अपनी शक्ति सिद्ध कर सके। मैं वह आदमी था जिस पर वह अपने दिल की भड़ास निकाल सकता था।"

क्लर्क ने बाद में यह जोड़ दिया, “अंदर से शायद वह बहुत भला आदमी होगा। ज्यादातर लोग होते हैं।"

            लिफ्ट की तरफ बढ़ते समय मैं उसके शब्दों को दुहरा रहा था "अंदर से शायद वह बहुत भला आदमी होगा। ज़्यादातर लोग होते हैं।"

           जब भी कोई आप पर आक्रमण करे, तो आप इन दो वाक्यों को याद कर लें। अपने गुस्से पर काबू रखें। इस तरह की स्थितियों में जीतने का यही तरीका होता है कि सामने वाले को अपने दिल की भड़ास निकाल लेनेदे और फिर इस घटना को भूल जाएँ।

            कई साल पहले विद्यार्थियों की परीक्षा की कॉपी जाँचते समय एक कॉपी को देखकर मुझे हैरत हुई। इस विद्यार्थी ने पूरे साल समूह चर्चाओं और पिछले टेस्ट्स में यह साबित किया था कि उसमें प्रतिभा थी, जबकि उसकी परीक्षा की कॉपी कुछ और ही कह रही थी। मुझे ऐसा अनुमान था कि वह कक्षा में सबसे ज़्यादा नंबर लाएगा। इसके बजाय उसके नंबर परीक्षा में सबसे कम आ रहे थे। जैसा में इस तरह के मामले में किया करता था, मैंने अपनी सेक्रेटरी से कहा कि वह उस विद्यार्थी को मेरे ऑफिस में एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करने के लिए बुलवाए।


           जल्दी ही पॉल डब्ल्यू. वहाँ आया। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी बुरे दौर से गुजर रहा था। उसके बैठने के बाद मैंने उससे कहा, “क्या हुआ, पॉल? तुमने परीक्षा में जिस तरह लिखा है, उस तरह की मुझे तुमसे उम्मीद नहीं थी।"


           पॉल पशोपेश में था। उसने अपने पैरों की तरफ़ देखते हुए जवाब दिया, “सर, जब मैंने देखा कि आपने मुझे नकल करते हुए देख लिया है। तो इसके बाद मेरी हालत ख़राब हो गई। मैं कोई सवाल ठीक से नहीं कर पाया। ईमानदारी से कहूँ तो मैंने ज़िंदगी में पहली बार नक़ल की थी। में अच्छे नंबरों से पास होना चाहता था, इसलिए मैंने सोचा क्यों न। बेईमानी का सहारा ले लूँ ?"


वह बुरी तरह परेशान दिख रहा था। परंतु एक बार जब उसने बोलना शुरू कर दिया, तो फिर वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था।"मुझे लगता है अब आप मुझे कॉलेज से निकाल देंगे। यूनिवर्सिटी का नियम तो यही है कि अगर कोई विद्यार्थी किसी भी तरह की बेईमानी करेगा, तो उसे हमेशा के लिए कॉलेज से निष्कासित किया जा सकता है।"


          यहाँ पर पॉल ने यह बताना शुरू कर दिया कि कॉलेज से निकाले जाने के बाद उसके परिवार की इज़्ज़त ख़ाक में मिल जाएगी, उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी और इसके अलावा और भी बहुत सारे बुरे परिणाम होंगे।आख़िरकार मैंने उससे कहा, “अब बस भी करो। शांत बैठ जाओ। मैं तुम्हें कुछ बता दूं। मैंने तुम्हें नक़ल करते हुए नहीं देखा। जब तक तुमने मुझे इसके बारे में नहीं बताया, तब तक मुझे यह अंदाज़ा ही नहीं था कि समस्या यह थी। मुझे दुःख है, पॉल, कि तुमने नक़ल की।”


         फिर मैंने आगे कहा, “पॉल, मुझे बताओ कि तुम अपनी यूनिवर्सिटी के अनुभव से क्या सीखना चाहते हो?"


          अब वह थोड़ा शांत हो चुका था और एक पल रुकने के बाद उसने जवाब दिया, “डॉक्टर, मुझे लगता है कि मेरा असली लक्ष्य तो जीने का तरीक़ा सीखना है, परंतु मुझे लगता है कि मैं अपने लक्ष्य को हासिल करने में बुरी तरह असफल हो चुका हूँ।"


           "हम कई तरीकों से सीखते हैं,” मैंने कहा। “मुझे लगता है तुम इस अनुभव से सफलता का असली सबक सीख सकते हो।" 


        "जब तुमने अपनी पर्ची से नक़ल की, तो तुम्हारी अंतरात्मा तुम्हें कचोटने लगी। इससे तुममें अपराधबोध की भावना जाग गई और तुम्हारा आत्मविश्वास ख़त्म हो गया। जैसा तुमने कहा इसके बाद तुम्हारी हालत ख़राब हो गई।


          “ज्यादातर बार होता यह है, पॉल, कि सही और गलत का मसला हम नैतिक या धार्मिक दृष्टिकोण से देखते हैं। अब इस बात को समझ लो, मैं यहाँ तुम्हें भाषण नहीं दे रहा हूँ, न ही तुम्हें सही और गलत काम के बारे में कोई प्रवचन देने के मूड में हूँ। परंतु यह ज़रूरी है कि हम इसके व्यावहारिक पहलू पर नज़र डालें। जब तुम कोई ऐसा काम करते हो जो तुम्हारी अंतरात्मा के खिलाफ़ होता है, तो तुममें अपराधबोध आ जाता है और इस अपराधबोध के कारण तुम्हारी सोचने की क्षमता खत्म हो जाती है। आप ठीक तरह से नहीं सोच सकते क्योंकि आपका दिमाग


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Tuesday, August 20, 2019

CHAPTER 3.1 विश्वास जगाएँ, डर भगाएँ

                      विश्वास जगाएँ, डर भगाएँ



         जब हम डरे होते हैं तो हमारे दोस्त हमें समझाते हैं, “यह तुम्हारे मन का वहम है। चिंता मत करो। डरने की कोई बात नहीं है।"



         परंतु आप और हम जानते हैं कि डर की इस किस्म की दवा से काम नहीं चलता है। इस तरह की तसल्ली से हमें कुछ मिनट या कुछ घंटे का ही आराम मिलता है। “यह तुम्हारे मन का वहम है" वाले उपचार से विश्वास नहीं जागता, न ही डर का इलाज होता है।



          हाँ, डर वास्तविक होता है। और इसे जीत ने से पहले हमें यह मानना ही पड़ेगा कि इसका अस्तित्व होता है।



          आजकल इंसान के ज़्यादातर डर मनोवैज्ञानिक होते हैं। चिंता, तनाव, उलझन, संत्रास- यह सभी हमारी नकारात्मक, अनुशासनहीन कल्पना के कारण पैदा होते हैं। परंतु सिर्फ यह जानने से कि डर कैसे पैदा होता है, उस डर का इलाज नहीं हो जाता। जब डॉक्टर यह पता लगा लेता है कि आपके शरीर में कहीं पर कोई इन्फेक्शन है, तो उसका काम वहीं पर पूरा नहीं हो जाता। इसके बाद वह इन्फेक्शन का इलाज भी करता है। 



          “यह तुम्हारे मन का वहम है" वाला पुराना विचार यह मानता है। कि डर का वास्तव में अस्तित्व होता ही नहीं है। परंतु ऐसा नहीं है। डर का अस्तित्व होता है। डर असली है। डर सफलता का नंबर एक दुश्मन है। डर लोगों को अवसर का लाभ उठाने से रोकता है। डर लोगों को शारीरिक रूप से कमज़ोर बना देता है। डर लोगों को बीमार बना देता है। डर लोगों की जिंदगी को छोटा कर देता है। आप जब बोलना चाहते हैं, तो डर आपके मुँह को बंद रखता है।



         डर - अनिश्चितता, आत्मविश्वास का अभाव - के ही कारण हमारी। अर्थव्यवस्था में मंदियाँ आती हैं। डर के ही कारण करोड़ों लोग इतना कम हासिल कर पाते हैं और जीवन का इतना कम आनंद ले पाते हैं।



          वास्तव में डर एक शक्तिशाली भावना है। किसी न किसी रूप में डर लोगों को वह हासिल करने से रोकता है जो वे जीवन में हासिल करना चाहते हैं।



          हर तरह और हर आकार का डर मनोवैज्ञानिक इन्फेक्शन का एक रूप है। हम अपने मानसिक इन्फेक्शन को भी उसी तरीके से दूर कर सकते हैं जिस तरह हम अपने शारीरिक इन्फेक्शन को दूर करते हैं- यानी उसका इलाज करके।



          इसके लिए सबसे पहले हमें उपचार के पहले की तैयारी करनी होगी। यह जानना होगा कि आत्मविश्वास आसमान से आकर हमारे दिमाग़ में नहीं घुसता, बल्कि हासिल किया जाता है, विकसित किया जाता है। कोई भी व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ पैदा नहीं होता। जिन लोगो में आत्मविश्वास प्रचुरता में होता है,जिन्होंने चिंता को जीत लिया है, जो हर जगह और हर कहीं बेफ़िक्री से आते-जाते हैं, उन्होंने यह आत्मविश्वास धीरे-धीरे हासिल किया है।



    आप भी ऐसा ही कर सकते हैं। यह अध्याय आपको बताएगा, कैसे।



द्वितीय विश्वयुद्ध में नेवी ने यह फैसला किया कि इसके सभी नए रंगरूटों को तैरना आना चाहिए। इसके पीछे यह विचार था कि तैरना आने से किसी डूबते आदमी की जान बचाई जा सकती है।



          जिन लोगों को तैरना नहीं आता था, उनके लिए तैरने की आयोजित की गईं। मैंने इस तरह के एक प्रशिक्षण को देखा। सतही पर यह देखना मज़ेदार था कि इतने बड़े-बड़े, जवान, और स्वर कुछ फुट गहरे पानी में कूदने से घबरा रहे थे। इन लोगों को 61 स्टैंड से पानी में कूदना था और पानी सिर्फ 8 फुट गहरा था। हालाँकि आस-पास बहुत से विशेषज्ञ तैराक खड़े थे और जान का कोई जोखिम नहीं था, फिर भी ये वयस्क लोग बुरी तरह आतंकित थे।



        गहराई से सोचने पर यह दुःखद प्रसंग था। उनका डर वास्तविक था। परंतु उनमें और हार के डर के बीच में केवल एक ही चीज़ आड़े आ रही थी, और वह थी नीचे के पानी में छलाँग। एक से ज्यादा बार मैंने देखा कि इन युवकों को बोर्ड से “अनपेक्षित" धक्का दे दिया गया। और इसका परिणाम यह हुआ कि पानी से उनका डर हमेशा के लिए दूर हो गया।



          हज़ारों भूतपूर्व नेवी के जवान इस घटना से परिचित होंगे। इस घटना से हमें यह शिक्षा मिलती है : काम करने से डर दूर होता है। दुविधा में रहने या अनिर्णय की स्थिति में रहने से या काम टालने से हमारा डर बढ़ता है।



          इसे अभी हाल अपनी सफल नियमों की पुस्तिका में लिख लें। काम करने से डर दूर होता है।



         काम करने से डर सचमुच दूर होता है। कुछ महीनों पहले चालीस साल का एक परेशानहाल एक्जीक्यूटिव मुझसे मिलने आया। वह एक बड़े रिटेलिंग संगठन में महत्वपूर्ण पद पर था।



          चिंतित स्वर में उसने मुझे बताया, “मुझे डर है कि मेरी नौकरी छूट जाएगी। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे थोड़े से दिन बचे हैं।"



        “क्यों?" मैंने पूछा।



         "सभी बातें मेरे ख़िलाफ़ हैं। मेरे विभाग की बिक्री के आँकड़े पिछले साल से 7 प्रतिशत कम हैं। यह बहुत बुरा है, ख़ासकर तब जब हमारे स्टोर की सेल पिछले साल की तुलना में 6 प्रतिशत बढ़ी है। मैंने हाल ही में कुछ ग़लत फैसले लिए हैं और मुझे कई बार मीटिंग में यह संकेत दिया गया है कि मैं कंपनी की प्रगति के साथ-साथ प्रगति नहीं कर पा रहा हूँ।



          “मुझे इतना बुरा अनुभव पहले कभी नहीं हुआ। मेरी पकड़ ढीली होती जा रही है और यह सबको साफ़ दिख रहा है। मेरे कर्मचारियों को भी इस बात का एहसास है। मेरे सेल्समेन भी यह देख सकते हैं। दूसरे एक्जीक्यूटिव भी यह जानते हैं कि मैं ढलान पर नीचे फिसल रहा हूँ। एक साथी एक्जीक्यूटिव ने तो पिछली मीटिंग में यहाँ तक सुझाव दिया कि मेरा कुछ काम उसके डिपार्टमेंट को सौंप दिया जाए, 'ताकि स्टोर के लिए कुछ लाभ कमाया जा सके।' मैं एक ऐसा डूबता हुआ आदमी हूँ, जिसे बहुत सारे लोग डूबता हुआ देख रहे हैं और उसके डूबने का इंतज़ार कर रहे हैं।"



           एक्जीक्यूटिव ने अपनी दुर्दशा पर बोलना जारी रखा। आखिरकार मैंने उसे बीच में रोककर उससे पूछ ही लिया, "तो आप इस बारे में क्या कर रहे हैं ? आप स्थिति को सुधारने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं ?"



         _“मैं इसमें कर ही क्या सकता हूँ?" उसने जवाब दिया, "मैं सिर्फ यही उम्मीद कर रहा हूँ कि सब कुछ ठीक हो जाए।"



           इस पर मैंने कहा, “परंतु क्या उम्मीद करने से ही सब कुछ ठीक हो जाएगा?" फिर बिना उसे जवाब देने का मौक़ा दिए मैंने उससे अगला सवाल पूछा :



           "क्यों न उम्मीद करने के साथ-साथ आप कुछ प्रयास भी करें?"



          "कैसे?" उसने कहा।



         “आपके मामले में दो तरह के काम किए जा सकते हैं। पहला तो यह कि आप अपनी सेल्स को बढ़ाकर दिखाएँ। हमें यहीं से शरू करना होगा। कोई न कोई वजह तो होगी जिसके कारण आपकी सेल्स कम हो रही है। उस वजह का पता लगाएँ। हो सकता है कि आपको अपना पुराना माल निकालने के लिए स्पेशल सेल लगानी पड़े, ताकि आप नया माल ख़रीद सकें। शायद आपको अपने डिस्प्ले काउन्टर्स को अलग तरीके से जमाना चाहिए। शायद आपको अपने सेल्समैनों में ज्यादा उत्साह भरना चाहिए। मैं यह तो नहीं बता सकता कि किस तरह आपका सेल्स वॉल्यूम बढ़ सकता है, परंतु यह किसी न किसी तरह तो बढ़ ही सकता है। और इसके अलावा आप अपने मैनेजर से भी बात करके देख लें। हो सकता है कि वे आपको नौकरी से निकालने वाले हों, परंतु अगर आप उनकी सलाह लेंगे तो वे आपको समस्या को सुलझाने के लिए  निश्चित रूप से ज़्यादा मोहलत दे देंगे। स्टोर के लिए आपका विकल्प हुँढना बहुत मुश्किल होगा बशर्ते कि टॉप मैनेजमेंट को यह लगे कि आप समस्या को सुलझाने का गंभीर प्रयास कर रहे हैं।"



         मैं आगे कहता रहा, “इसके बाद आप अपने कर्मचारियों से, अपने अधीनस्थों से बात करें। डूबते हुए आदमी की तरह व्यवहार करना छोड़ दें। अपने आस-पास के लोगों को यह एहसास होने दें कि आपमें अभी जान बाक़ी है।”



         एक बार फिर उसकी आँखों में हिम्मत लौट आई थी। फिर उसने पछा, "आपने कहा था कि में दो क़दम उठा सकता है। दूसरा क़दम क्या
है?"



          "दूसरा क़दम यह है, जिसे आप बीमा योजना कह सकते हैं, कि आप किसी दूसरे स्टोर में अपने लिए ऐसी जगह ढूँढ़कर रखें जहाँ आपको यहाँ से ज़्यादा तनख्वाह मिल सके।



         “अगर आप सकारात्मक कार्य करेंगे तो मुझे नहीं लगता कि आपको इसकी ज़रूरत पड़ेगी। आपकी कर्मठता से आपके सेल्स आँकड़े निश्चित रूप से सुधर जाएँगे। फिर भी एक-दो विकल्प रहना हमेशा ज़्यादा अच्छा होता है। याद रखें, बेरोज़गार आदमी के लिए नौकरी हासिल करना बहुत मुश्किल होता है, जबकि पहले से नौकरी कर रहे आदमी के लिए नौकरी हासिल करना बेरोज़गार की तुलना में दस गुना ज़्यादा आसान होता है।"



            दो दिन पहले यही एक्जीक्यूटिव मुझसे मिलने आया।



          “आपसे चर्चा के बाद मैं काम में जुट गया। मैंने बहुत से बदलाव किए, परंतु सबसे बड़ा बदलाव मैंने अपने सेल्समैनों के रवैए में किया। पहले मैं सप्ताह में एक बार मीटिंग लिया करता था, अब मैं हर सुबह मीटिंग लेता हूँ। मैंने इन सभी लोगों में उत्साह भर दिया है। ऐसा लगता है कि मेरे जोश को देखकर उनमें भी हौसला आ गया है। जब उन्होंने देखा कि मुझमें जान बाक़ी है, तो उन्होंने भी ज्यादा मेहनत करने का फैसला कर लिया। ऐसा लगता है जैसे वे सिर्फ इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि मैं आगे बढ़ने में पहल करूँ।



        “अब सब कुछ ठीक चल रहा है। पिछले हफ्ते मेरी बिक्री पिछले साल की तुलना में ज्यादा हुई है और यह स्टोर की औसत बिक्री से भी काफ़ी अच्छी है।



         “ओह, बहरहाल,” उसने कहा, “मैं आपको एक और अच्छी ख़बर सुनाना चाहता हूँ। मुझे दो वैकल्पिक नौकरियों के प्रस्ताव मिले हैं। निश्चित रूप से इससे मैं खुश हूँ परंतु मैंने दोनों को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि यहाँ पर सब कुछ एक बार फिर ठीक-ठाक हो गया है।” 



           जब हम कठिन समस्याओं का सामना करते हैं, तो हम तब तक दलदल में फँसे रहते हैं जब तक कि हम कर्म नहीं करते। आशा से शुरुआत होती है। परंतु जीतने के लिए आशा के साथ-साथ कर्म की भी ज़रूरत होती है।



           कर्म के सिद्धांत पर अमल करें। अगली बार जब भी आपको डर लगे, चाहे डर छोटा हो या बड़ा, अपने आपको सँभालें। फिर इस सवाल का जवाब ढूँढ़ें : किस तरह के काम से मैं अपने डर को जीत सकता हूँ?



         अपने डर का कारण खोज लें। फिर उचित कदम उठाएँ।



          डर और उनके उपचार के कुछ उदाहरण नीचे बताए गए हैं।







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