Tuesday, September 10, 2019

CHAPTER. 4.3. अच्छे भाषण के लिए क्या ज़रूरी होता है?

        


   1. अच्छे भाषण के लिए क्या ज़रूरी होता है?

हर व्यक्ति चाहता है कि वह सबके सामने बढ़िया बोल सके। परंतु ज्यादातर लोगों की यह चाहत पूरी नहीं हो पाती। ज्यादातर लोग घाटया वक्ता होते हैं।

           क्यों? इसका कारण सीधा-सा है। ज्यादातर लोग बोलते समयबड़ी, महत्वपूर्ण बातों के बजाय छोटी, घटिया बातों पर ध्यान देते हैं। चर्चा की तैयारी करते समय ज़्यादातर लोग खुद को मानसिक निदेश देते रहते हैं, “मुझे सीधे खड़े रहना चाहिए," "इधर-उधर नहीं हिलना है और अपने हाथों का प्रयोग नहीं करना है,” “जनता को यह पता न चलने दें कि आप नोट्स की मदद ले रहे हैं," “याद रखें, ग्रामर की ग़लती न होने दें," "इस बात का ध्यान रखें कि आपकी टाई सीधी रहे," “ज़ोर से बोलें, पर ज़्यादा ज़ोर से नहीं।” इत्यादि।

          अब जब वक्ता बोलने के लिए खड़ा होता है तो क्या होता है ? वह डरा हुआ होता है क्योंकि उसने अपने दिमाग में एक सूची बना ली है कि उसे क्या चीजें नहीं करनी चाहिए। क्या मैंने कोई गलती कर दी है ?' संक्षेप में, वह फ्लॉप हो जाता है। वह इसलिए फ्लॉप होता है क्योंकि उसने एक अच्छे वक्ता के छोटे, घटिया, तुलनात्मक रूप से महत्वहीन गुणों पर ध्यान केंद्रित किया है और अच्छे वक्ता के बड़े गुणों पर ध्यान केंद्रित नहीं किया है : जिस बारे में आप बोलने जा रहे हैं, उसका ज्ञान और दूसरे लोगों को बताने की उत्कट इच्छा।

            अच्छे वक्ता का असली इम्तहान इस बात में नहीं होता कि वह सीधा खड़ा होता है या नहीं, वह ग्रामर में गलतियाँ करता है या नहीं, बल्कि इस बात में होता है कि वह जनता तक अपनी बात अच्छी तरह से पहुँचा पाता है या नहीं। हमारे ज़्यादातर चोटी के वक्ताओं में कई सारे दोष होते हैं, कइयों की तो आवाज़ ही खराब है। अमेरिका के बहुत से प्रसिद्ध वक्ताओं को तो अगर भाषण देने की परीक्षा में बिठाया जाए कि "क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए" तो उनमें से कई तो फेल हो जाएँगे।

          परंतु इन सभी सफल सार्वजनिक वक्ताओं में एक बात पाई जाती है। उनके पास कहने को कुछ होता है और उनमें दूसरे लोगों को अपनी बात बताने की प्रबल इच्छा होती है।

         छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देकर जनता में सफलता से बोलने की कला को प्रभावित न होने दें।

2. झगड़े की वजह क्या होती है?

कभी आपने खुद से यह सवाल किया है कि आख़िर झगड़े की वजह क्या होती है? 99 प्रतिशत मामलों में झगड़े छोटी-छोटी, महत्वहीन बातों से शुरू होते हैं, जैसे : जॉन थोड़ा थका हुआ, तनाव में घर लौटता है। डिनर में उसे मज़ा नहीं आता और वह शिकायत करने लगता है। उसकी पत्नी जोन का दिन भी अच्छा नहीं गुज़रा, इसलिए वह आत्मरक्षा में कह देती है, "इस बजट में मैं इससे अच्छा खाना कैसे बनाऊँ ?" या "अगर हमारे पास बाक़ी सबकी तरह नया गैस स्टोव हो, तो मैं इससे बेहतर खाना पका सकती हूँ।" इससे जॉन का गर्व आहत हो जाता है और वह बदले में जोन पर हमला कर देता है, "देखो, जोन, सवाल पैसे की कमी का नहीं है, सवाल इस बात का है कि तुम्हें घर चलाना आता ही नहीं है।" 

             और फिर लड़ाई शुरू हो जाती है! जब तक शांति स्थापित होती है, तब तक दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर तरह-तरह के आरोप लगा चुके होते हैं। एक-दूसरे के माँ-बाप, सेक्स, पैसे, शादी से पहले के वादे, शादी के बाद के वादे और इसी तरह के दूसरे मामलों को बीच में लाया जाता है। दोनों ही दल युद्ध में तनावग्रस्त और नर्वस होते हैं। दोनों के मतभेद पूरी तरह नहीं सुलझ पाते और दोनों को ही अपनी अगली लड़ाई में इस्तेमाल करने के लिए नए हथियार मिल जाते हैं। छोटी-छोटी चीज़ों की वजह से, छोटे चिंतन की वजह से ज़्यादातर झगड़े होते हैं। इसलिए झगड़ों से अगर आप बचना चाहते हैं, तो आपको छोटे चिंतन से बचना होगा।

           यहाँ एक आज़माई हुई तकनीक बताई जा रही है। किसी की शिकायत करने से पहले, उस पर आरोप लगाने से पहले, उसे डाँटने से पहले, आत्मरक्षा में उस पर हमला करने से पहले, खुद से पूछे, “क्या यह वास्तव में महत्वपूर्ण है ?" ज़्यादातर मामला महत्वपूर्ण होता ही नहीं है और आप झगड़े से बच जाते हैं।

           खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है कि उसकी सिगरेट की राख बिखर गई या उसने टूथपेस्ट का ढक्कन नहीं लगाया या वह शाम को देर से घर लौटा?"

           "क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है कि उसने थोड़ा पैसा उड़ा दिया है या उसने कुछ ऐसे लोगों को घर पर बुलवा लिया है जिन्हें मैं पसंद नहीं करता?"

           जब आप नकारात्मक क्रिया करने वाले हों, तो खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?" इस सवाल में जादू है और यह आपके घर का माहौल सुधार सकता है। यह ऑफ़िस में भी काम करता है। जब आपके सामने वाला ड्राइवर आपके सामने कट मारता है तो यह ट्रैफिक में भी काम करता है। यह जिंदगी की किसी भी ऐसी परिस्थिति में काम करता है जिसमें झगड़े का अंदेशा हो।

  3. जॉन को सबसे छोटा ऑफ़िस मिला और वह बर्बाद हो गया

     .   कुछ साल पहले, मैंने देखा कि छोटे चिंतन के कारण किस तरह एक आदमी का एड्वर्टाइज़िंग के क्षेत्र में अच्छी संभावनाओं वाला करियर तबाह हो गया।

              विज्ञापन कंपनी में समान पदों पर कार्यरत चार युवा एक्जीक्यूटिब्ज़ को नए ऑफ़िस दिए गए। तीन ऑफ़िस तो आकार-प्रकार एवं साज-सज्जा में एक-से थे, परंतु चौथा ऑफ़िस थोड़ा छोटा था। 

             जे.एम. को चौथा ऑफ़िस दिया गया। इससे उसका गर्व आहत हआ। तत्काल उसे महसूस हुआ कि उसके साथ भेदभाव किया गया है। नकारात्मक चिंतन, गुस्सा, कड़वाहट, ईर्ष्या ने उसके दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया। जे.एम. को लगने लगा कि लोग उसे कम योग्य समझते हैं। परिणाम यह हुआ कि जे.एम. अपने साथी एक्जीक्यूटिब्ज़ के प्रति शत्रुता.रखने लगा। सहयोग करने के बजाय वह उनके प्रयासों को विफल करने.की कोशिश करने लगा। माहौल बिगड़ता गया। तीन महीने बाद जे.एम. का व्यवहार इतना ख़राब हो गया कि मैनेजमेंट के पास उसे हटाने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचा।

             एक छोटी-सी बात पर बुरा मानने के कारण जे.एम. का करियर तबाह हो गया। भेदभाव के बारे में सोचने की उसे इतनी जल्दी थी कि वह यह नहीं देख पाया कि कंपनी तेज़ी से विकास कर रही थी और ऑफ़िस में जगह की कमी थी। उसने यह नहीं सोचा कि जिस एक्जीक्यूटिव ने ऑफ़िस बाँटे थे, उसे तो यह भी नहीं पता था कि कौन-सा ऑफ़िस छोटा है और कौन-सा बड़ा। सिवाय जे.एम. के कंपनी में और किसी भी आदमी को ऐसा नहीं लगा कि उसके छोटे ऑफ़िस से उसकी इज़्ज़त घट गई हो।

            महत्वहीन बातों पर छोटी सोच से आप आहत हो सकते हैं जैसे आपका नाम डिपार्टमेंट की सूची में सबसे आखिर में लिख दिया जाए या आपको ऑफ़िस के किसी मेमो की चौथी कार्बन कॉपी दी जाए। बड़ा सोचें और इन छोटी-छोटी बातों का बुरा मानना छोड़ दें।

4. हकलाने के बावजूद सफलता पाई जा सकती है

एक सेल्स एक्जीक्यूटिव ने मुझे बताया कि अगर सेल्समैन में दूसरे गुण हो, तो सेल्समैनशिप में हकलाने के बावजूद सफलता पाई जा सकती है।

            "मेरा एक दोस्त भी सेल्स एक्जीक्यूटिव है और वह मज़ाकिया स्वभाव का है। कुछ महीने पहले मेरे इस मज़ाकिया दोस्त के पास एक युवक आया और उससे सेल्समैन की नौकरी माँगी। इस युवक को हकलाने की आदत थी और मेरे दोस्त ने फैसला किया कि वह मेरे साथ मज़ाक कर सकता है। इसलिए मेरे दोस्त ने इस हकलाने वाले उम्मीदवार से कहा कि उसे तो सेल्समैन की ज़रूरत नहीं है, परंतु उसके एक दोस्त (यानी कि मुझे) को एक सेल्समैन की ज़रूरत है। फिर उसने मुझे फोन किया और मुझसे उस युवक की इतनी तारीफ़ कर दी कि मुझे कहना ही पड़ा. 'उसे अभी मेरे पास भेज दो!'

          "तीस मिनट बाद वह युवक मेरे सामने खड़ा था। उसके तीन शब्द बोलने से पहले ही मैं समझ गया कि मेरे दोस्त ने उसे मेरे पास क्यों भेजा था, 'मैं-मैं-मैं ज-ज-जैक आर.' उसने कहा, 'मिस्टर एक्स ने मुझे आपके पास नौ-नौकरी के लिए भे-भेजा है।' हर शब्द बोलने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ रहा था। मैंने खुद से सोचा, 'यह आदमी एक डॉलर के नोट को वॉल स्ट्रीट में 90 सेंट में भी नहीं बेच पाएगा।' मुझे अपने दोस्त पर गुस्सा आया, परंतु मुझे उस युवक से सच्ची हमदर्दी भी थी इसलिए मैंने सोचा कि कम से कम उससे कुछ विनम्र प्रश्न तो पूछ लिए जाएँ ताकि मैं कोई अच्छा-सा बहाना बना सकूँ कि मैं उसे काम पर क्यों नहीं रख सकता।

            “चर्चा के दौरान मैंने पाया कि यह आदमी काम का था। उसमें बुद्धि थी। उसमें आत्मविश्वास था, परंतु इसके बावजूद मैं इस तथ्य को नहीं पचा पाया कि वह हकलाता था। आखिरकार मैंने उससे इंटरव्यू का आख़िरी सवाल करने का फैसला किया, 'आपने यह कैसे सोचा कि आप इस जॉब में सफल हो पाएँगे?'

            उसने जवाब दिया, "मैं तेज़ी से सीख सकता हूँ. मैं-मैं-मैं लोगों को पसंद करता हूँ, मैं-मैं-मैं सोचता हूँ कि आपकी कंपनी अच्छी है और मैं-मैं-मैं पैसे कमाना चाहता हूँ। अभी मे-मे-मेरे साथ हकलाने की समस्या है, परंतु इससे मु-मु-मुझे कोई परेशानी नहीं है, इसलिए मु-मु-मुझे नहीं लगता कि इससे किसी और को भी कोई परेशानी होगी।”

“उसके जवाब ने मुझे बता दिया कि उसके पास सेल्समैन बनने की सचमुच महत्वपूर्ण योग्यता थी। मैंने तत्काल उसे मौक़ा देने का फैसला कर लिया और आपको यह जानकर हैरत होगी कि वह एक सफल सेल्समैन बन चुका हैं|

            अगर बाक़ी बड़ी योग्यताएँ हों, तो बोलने वाले व्यवसाय में हकलाने की आदत भी आपकी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती। 
      

             इन तीन उपायों का अभ्यास करें ताकि आप छोटी-छोटी बातों के बारे में सकारात्मक रूप से सोच सकें :

           1. अपनी नज़र बड़े लक्ष्य पर लगाए रखें। कई बार हम उस सेल्समैन की तरह होते हैं जो सामान बेचने में असफल रहने के बाद अपने मैनेजर को बताता है, "परंतु मैंने ग्राहक के सामने साबित कर दिया कि वह ग़लती पर था।" बेचने में बड़ा लक्ष्य सामान बेचना होता है, बहस में जीतना नहीं होता।

           शादी में बड़ा लक्ष्य शांति, सुख, खुशी होता है- बहस में जीतना नहीं होता या यह कहना नहीं होता, "मैं तुम्हें यह बात पहले ही बता सकता था।"

            कर्मचारियों के साथ काम करते समय, बड़ा लक्ष्य उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करना होता है- छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें नीचा दिखाना नहीं होता।

           पड़ोसियों के साथ बड़ा लक्ष्य आपसी सम्मान और दोस्ती होता है- यह देखना नहीं होता कि उनका कुत्ता कभी-कभार रात में भौंकता है, इसलिए उस कुत्ते को जंगल में छोड़ देना चाहिए।

           मिलिट्री की भाषा में कहा जाए तो संग्राम में हारकर युद्ध जीतना बेहतर होता है, संग्राम को जीतकर युद्ध हारना अच्छा नहीं होता।

             अपनी नज़र को बड़े लक्ष्य पर जमाए रखें।

         2. खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?" नकारात्मक रूप से उत्तेजित होने के बजाय अपने आप से पूछे, "क्या यह मामला इतना महत्वपूर्ण है कि मैं इस बारे में इतनी चिंता करूँ?" अगर आप खुद से यह सवाल पूछेगे तो आप छोटे-छोटे मामलों पर कुंठित होने से बच सकते हैं। अगर हम झगड़े की परिस्थितियों में खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?" तो हम कम से कम 90 प्रतिशत झगड़ों से बच सकते हैं।

           3. छोटेपन के जाल में न फँसें। भाषण देते समय समस्याएँ पैदा करने के बजाय समस्याएँ सुलझाएँ। कर्मचारियों को सलाह देते समय उन्हीं बातों पर ध्यान केंद्रित करें, जो महत्वपूर्ण हैं, जिनसे फ़र्क पड़ता है। सतही मुद्दों में उलझकर न रह जाएँ। महत्वपूर्ण चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करें।

अपनी सोच का आकार नापने के लिए यह टेस्ट दें

नीचे बाएँ कॉलम में कुछ आम स्थितियाँ दी गई हैं। बीच वाले और दाएँ कॉलम में यह तुलना की गई है कि इसी स्थिति का सामना छोटे चिंतक और बड़े चिंतक किस तरह करते हैं। खुद ही देख लें। फिर फ़ैसला करें कि जहाँ मैं जाना चाहता हूँ वहाँ मैं किस रास्ते पर चलकर पहुँच सकता हूँ ? छोटे चिंतन से या बड़े चिंतन से?

एक ही परिस्थिति का सामना दो तरीक़ों से किया जा सकता है। फ़ैसला आपके हाथ में है।




याद रखें, बड़ी सोच से हर तरह से फ़ायदा होता है!

1. अपने आपको सस्ते में न बेचें। खुद के कम मूल्यांकन का अपराध कभी न करें। अपने गुणों, अपनी योग्यताओं पर ध्यान केंद्रित करें। यह जान लें, आप जितना समझते हैं. आप उससे कहीं बेहतर हैं।

2. बड़े चिंतक की शब्दावली का प्रयोग करें। बड़े, चमकीले, आशावादी शब्दों का प्रयोग करें। ऐसे शब्दों का प्रयोग करें जिनसे विजय, आशा, सुख, आनंद के भाव निकलते हों। ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें जिनसे असफलता, हार, दुःख के निराशाजनक चित्र बनते हों।

3. अपनी दृष्टि को विस्तार दें। सिर्फ यह न देखें कि क्या है, बल्कि यह भी देखें कि क्या होसकता है। चीज़ों, लोगों और खुद का मूल्य बढ़ानेका अभ्यास करें।

4. अपनी नौकरी के बारे में बड़ा दृष्टिकोण रखें। सोचें, सचमुच सोचें कि आपकी वर्तमान नौकरी महत्वपूर्ण है। आप अपनी वर्तमान नौकरी के बारे में क्या सोचते हैं इसी बात पर आपका अगला प्रमोशन निर्भर करता है।

5. छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठें। अपने ध्यान को बड़े लक्ष्यों पर लगाएँ। छोटे मामलों में उलझने के बजाय खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?"

          बड़ा सोचकर बड़े बन जाएँ!

Share:

0 comments:

Post a Comment

Recommended Business Books

Buy Books

Featured Post

CHAPTER 13.6 सोचें तो लीडर की तरह

      साम्यवाद के कूटनीतिक रूप से चतुर कई लीडर्स - लेनिन, स्तालिन और कई अन्य - भी काफ़ी समय तक जेल में रहे, ताकि बिना किसी बाहरी चिंता क...