हार को जीत में कैसे बदलें?
सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे लोग जो गरीब इलाक़ों या झुग्गी- ला बस्तियों में काम करते हैं, उनका कहना है कि इन दयनीय लोगोंकी उम्र, धार्मिक आस्था, शिक्षा और पृष्ठभूमियाँ अलग-अलग होती हैं। इनमें से कई नागरिक आश्चर्यजनक रूप से युवा होते हैं। कई बूढ़े होते हैं। कुछ कॉलेज ग्रैजुएट होते हैं, कुछ बिलकुल अशिक्षित होते हैं। कई शादी-शुदा होते हैं, कई कुंवारे होते हैं। परंतु गरीबी के दलदल में रहने वाले सभी असफल लोगों में एक बात समान होती है : हर व्यक्ति हारा हुआ है, पिटा हुआ है, चोट खाया हुआ है। हर एक ने जीवन में ऐसी
समस्याओं को झेला है जिनके आगे वह घुटने टेक चुका है। वह आपको उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के बारे में बताने के लिए उत्सुक है, व्यग्र है जो उसकी जिंदगी का वॉटरलू साबित हुई।
मानवीय अनुभव की ये दास्तानें “मेरी पत्नी मेरा घर छोड़कर भाग गई।" से लेकर “मैंने अपना सब कुछ गँवा दिया था और मेरे पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं बची थी" से लेकर “मैंने दो-एक काम ऐसे किए जिससे मेरा सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया और मैं यहाँ चला आया।"
जब हम स्किड रो यानी असफलता के दलदल से ऊपर चलकर मिस्टर और मिसेज़ औसत व्यक्ति के इलाके में पहुंचते हैं, तो हम जीवनस्तर में स्पष्ट अंतर देख सकते हैं। परंतु हम एक बार फिर यह देखते हैं कि मिस्टर औसत व्यक्ति भी अपनी औसत परिस्थितियों के लिए मूलतः वही कारण बताते हैं जो मिस्टर असफल ने बताए थे। अंदर से, मिस्टर औसत व्यक्ति हारा हुआ महसूस करते हैं। जिन परिस्थितियों से वे चोट खाए हैं, उनके घाव अब भी नहीं भरे हैं। अब वे अति सावधान हो गए हैं। अब वे रुक-रुककर चलते हैं, सीना तानकर नहीं चलते।
विजयी सेनापति की तरह सिर उठाकर नहीं चलते, बल्कि हारे हुए असंतुष्ट सिपाही की तरह सिर झुकाकर चलते हैं। वे हारा हुआ महसूस करते हैं परंतु वे अपनी औसत ज़िंदगी की सज़ा काटने की कोशिश करते हैं जिसके लिए वे अपनी “तक़दीर" को दोष देते हैं।
इस व्यक्ति ने भी हार के सामने समर्पण कर दिया है, परंतु इसने यह समर्पण तार्किक रूप से, अच्छे ढंग से, सामाजिक रूप से “स्वीकृत" तरीके से किया है।
अब जब हम सफलता की कम भीड़ वाली दुनिया में ऊपर चढ़ते हैं,तो हम देखते हैं कि यहाँ भी हर तरह की पृष्ठभूमि से आए लोग मौजूद हैं। कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिज़ हों या प्रसिद्ध मंत्री या सरकारी अधिकारी, हर क्षेत्र के चोटी के लोगों को देखने पर हम पाते हैं कि ये लोग ग़रीब घरों, अमीर घरों, बिखरे हुए परिवारों, मज़दूर परिवारों, खेतिहर घरों, और झोपड़ियों से यानी हर पृष्ठभूमि से आए हैं। समाज का नेतृत्व करने वाले ये लोग हर उस कठिन परिस्थिति को झेल चुके हैं जिसकी कल्पना हम कर सकते हैं।
हर मामले में मिस्टर असफल, मिस्टर औसत और मिस्टर सफल में समानता हो सकती है- उम्र, बुद्धि, पृष्ठभूमि, राष्ट्रीयता या कोई और चीज़ जो आपके दिमाग में आए। इन सभी बातों में इन लोगों में कोई अंतर नहीं होता। परंतु इनमें एक बड़ा फ़र्क होता है। उन लोगों का हार के बारे में नज़रिया अलग-अलग होता है।
जब मिस्टर असफल गिर जाते हैं, तो वे दुबारा नहीं उठ पाते। वे वहीं पड़े रहते हैं; कराहते हुए, अपनी चोट को सहलाते हुए। मिस्टर औसत अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं और रेंगने लगते हैं और जब वे थोड़ी दूर पहुँच जाते हैं तो फिर उठकर दूसरी दिशा में दौड़ लगा देते हैं ताकि वे दुबारा न गिरें।
परंतु मिस्टर सफल जब गिरते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भिन्न होती है। वे तत्काल उठ खड़े होते हैं, सबक़ सीखते हैं, गिरने की बात भूल जाते
हैं और ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगते हैं।
मेरा एक करीबी दोस्त बहुत ही सफल मैनेजमेंट सलाहकार है। जब आप उसके ऑफिस में कदम रखते हैं तो आपको सचमुच ऐसा लगता है जैसे आप किसी पॉश इलाके में आ गए हैं। फ़र्नीचर इतना शानदार होता है, गलीचे इतने आलीशान, ग्राहक इतने महत्वपूर्ण और माहौल इतना व्यस्त कि आप पहली ही नज़र में यह अनुमान लगा सकते हैं कि उसकी कंपनी बहुत सफल और समृद्ध होगी।
कोई आलोचक यह कह सकता है, “इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति आसानी से बना सकता है।" परंतु आलोचक ग़लत है। इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति ने नहीं बनाया। यह माहौल किसी प्रतिभाशाली या अमीर या खुशकिस्मत व्यक्ति ने भी नहीं बनाया। यह माहौल सिर्फ़ (सिर्फ़ शब्द के प्रयोग में मुझे संकोच होता है क्योंकि सिर्फ का मतलब आपको बहुत थोड़ा लग सकता है) एक लगनशील व्यक्ति ने बनाया, जिसने कभी यह नहीं सोचा कि वह हार गया है।
इस समृद्ध और प्रतिष्ठित कंपनी के पीछे उस व्यक्ति की कहानी है जिसने ऊपर आने के लिए संघर्ष किया : बिज़नेस के शुरुआती छह महीनों में ही उसने अपनी 10 साल की बचत गँवा दी। वह कई महीनों तक अपने ऑफ़िस में ही रहा क्योंकि उसके पास किराए के घर के लिए पैसे नहीं थे। उसने कई "अच्छी” नौकरियों का प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि वह चाहता था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करे। जितनी बार उसके संभावित ग्राहकों ने उसे 'हाँ' कहा, उससे सौ गुना ज़्यादा लोगों ने 'ना' कहा।
सफल होने के लिए उसने सात साल कड़ी मेहनत की, परंतु मैंने इस दौरान एक बार भी उसके मुँह से शिकायत नहीं सुनी। वह कहता था, “डेव, मैं सीख रहा हूँ। इस बिज़नेस में काफ़ी प्रतियोगिता है और चूंकि यह अप्रत्यक्ष बिज़नेस है इसलिए इसे बेचना मुश्किल है। परंतु मैं अब सीख रहा हूँ।"
और उसने इसे सीख ही लिया।
एक बार मैंने अपने दोस्त से कहा कि इस अनुभव से उसकी काफ़ी ऊर्जा बाहर निकल जाती होगी। परंतु उसका जवाब था, "नहीं, यह मेरे अंदर से कुछ निकाल नहीं रहा है, बल्कि मेरे अंदर कुछ भर रहा है।"
हू इज़ हू इन अमेरिका में लोगों की जीवनियाँ पढ़ें और आप पाएँगे कि जो लोग बहुत सफल हुए हैं, उन्हें कई बार असफलता झेलनी पड़ी है। सफल लोगों के इस अभिजात्य समूह ने विरोध सहन किया, लोगों के ताने सहे, राह में बाधाएँ और तकलीफें झेली, असफलताओं का दौर झेला, व्यक्तिगत दुर्भाग्य सहा।
महान लोगों की जीवनियाँ पढ़ें, और आप यहाँ भी पाएंगे कि ये सभी लोग किसी न किसी मोड़ पर अपनी असफलताओं के सामने घुटने टेक सकते थे।
या इसके बजाय ऐसा करें। अपनी कंपनी के प्रेसिडेंट की पृष्ठभूमि जानें या अपने शहर के मेयर की या किसी ऐसे व्यक्ति को चुन लें जिसे आप सचमुच सफल मानते हों। जब आप गहराई में जाएँगे, तो आप पाएँगे कि इस व्यक्ति ने बहुत बड़ी, असली बाधाएँ पार की हैं और तब जाकर वह सफल हुआ है।
विना विरोध, मुश्किलों और असफलताओं के बड़ी सफलता हासिल करना संभव नहीं है। परंतु यह संभव है कि आप इन असफलताओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा बना लें। आइए देखें कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।
मैंने व्यावसायिक एयरलाइनों के आँकड़े देखे जिनके मुताबिक़ लगभग 10 बिलियन मील की उड़ान में केवल एक दुर्घटना होती है। हवाई यात्रा आजकल बहुत ज़्यादा सुरक्षित है। दुर्भाग्य से, इसके बावजूद हवाई दुर्घटनाएँ होती हैं। परंतु जब कोई दुर्घटना होती है, तो 'सिविल एरोनॉटिक्स एडमिनिस्ट्रेशन' (सी.ए.ए.) तत्काल जाँच शुरू कर देता है कि दुर्घटना का कारण क्या था। मीलों दूर तक फैले मलबे को इकट्ठा किया जाता है। विशेषज्ञों का समूह यह विचार करता है कि क्या हुआ होगा जिस वजह से यह दुर्घटना हुई। गवाह और ज़िंदा बचे लोगों से बातचीत की जाती है। जाँच कई हफ्ते, कई महीने तक चलती है जब तक कि इस सवाल का जवाब न मिल जाए, “यह दुर्घटना क्यों हुई?"
एक बार सी.ए.ए. को जवाब मिल जाता है, तो तत्काल ऐसे कदम उठाए जाते हैं कि फिर कभी इस तरह की दुर्घटना न होने पाए। अगर दुर्घटना किसी तकनीकी खराबी के कारण हुई थी, तो उसी तरह के दूसरे जहाज़ों में उस तकनीकी दोष को दूर किया जाता है। अगर कोई यंत्र दोषपूर्ण होता है, तो उसमें सुधार किया जाता है। आधुनिक हवाई जहाज़ में हज़ारों सुरक्षा यंत्र सी.ए.ए. की इसी तरह की जाँचों के परिणामस्वरूप तैयार हुए हैं।
सी.ए.ए. के अध्ययन से हवाई यात्राएं पहले से ज्यादा सुरक्षित होती जाती हैं। असफलताओं से सीखने की प्रेरणा इसी को कहते हैं।
डॉक्टर्स भी असफलताओं के सहारे बेहतर स्वास्थ्य और लंबे जीवन को सुनिश्चित करते हैं। अक्सर जब कोई मरीज़ किसी अनजान कारण से मरता है तो डॉक्टर यह जानने के लिए पोस्टमॉर्टम करते हैं कि उसकी मौत का कारण क्या था। इस तरह वे मानव शरीर की कार्यप्रणाली के बारे में ज्यादा जान पाते हैं और कई दूसरे लोगों की ज़िंदगियाँ बचा पाते हैं।
मेरा एक दोस्त सेल्स एक्जीक्यूटिव है जो हर महीने अपने सेल्समैनों को यह बताने के लिए एक मीटिंग करता है कि वे कोई महत्वपूर्ण बिक्री क्यों नहीं कर पाए। ग्राहक और सेल्समैन के बीच की पूरी वार्ता का विश्लेषण किया जाता है और यह सीखा जाता है कि किस तरह भविष्य में ऐसी गलतियां न की जाएँ जिनसे असफलता मिली।
यही सफल फुटबॉल कोच भी करते हैं, जो जितने मैच हारते हैं. उससे कहीं ज्यादा मैच जीतते हैं। वे भी अपनी टीम के साथ हर मैच का विश्लषण करते हैं और खिलाड़ियों को उनकी गलतियाँ बताते हैं। कई कोच तो हर मैच की वीडियो फिल्म भी बनवाते हैं ताकि टीम अपनी आँखों के सामने अपनी गलत चालों को देख सकें। इसका उद्देश्य है। टीम अगला मैच बेहतर खेले।
सी.ए.ए. के अधिकारी, सफल सेल्स एक्जीक्यूटिब्ज़, डॉक्टर, फुटबॉल कोच और हर क्षेत्र के प्रोफेशनल्स सफलता के इस सिद्धांत का अनुसरण करते हैं : हर असफलता से कुछ न कुछ बचा लो।
जब हम असफल होते हैं तो हम भावनात्मक रूप से इतने दःखी और विचलित हो जाते हैं कि हम उससे सबक सीखना भूल जाते हैं।
प्रोफ़ेसर जानते हैं कि फेल होने के बाद विद्यार्थी की प्रतिक्रिया से ही सफलता की उसकी संभावना पता चलती है। जब मैं डेट्रॉयट में 'वेन स्टेट यूनिवर्सिटी' में प्रोफेसर था, तो मैंने एक सीनियर विद्यार्थी को फेल कर दिया था। मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। इससे विद्यार्थी को गहरा धक्का लगा। उसने ग्रैजुएशन के बाद की योजनाएँ बना ली थीं और इस कारण उसकी हँसी उड़ना तय थी। उसके पास दो विकल्प थे: या तो वह एक साल और पढ़कर परीक्षा पास करे या फिर वह बिना डिग्री लिए कॉलेज छोड़कर चला जाए।
मुझे आशा थी कि अपनी असफलता पर विद्यार्थी निराश होगा. शायद वह उत्तेजित भी हो। जब मैंने उसे यह समझाया कि वह असफल क्यों हुआ था, तो उसने यह माना कि उसने इस बार ठीक से पढ़ाई नहीं की थी।
“परंतु,” उसने कहा, “मेरा पिछला रिकॉर्ड तो ठीक-ठाक है। आपने उसे ध्यान में क्यों नहीं रखा?"
मैंने उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि हम हर साल का अलग-अलग मूल्यांकन करते हैं। मैंने यह भी जोड़ा कि कठोर शैक्षणिक नियमों के चलते नंबर तभी बढ़ाए जा सकते हैं जब जाँचने वाले प्रोफ़ेसर ने कोई गलती की हो।
जब विद्यार्थी को यह पता चला कि उसके नंबर बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, तो वह काफ़ी गुस्सा हो गया। उसने कहा, "प्रोफेसर, मैं आपको इस शहर के 50 लोगों के नाम गिना सकता हूँ जो बेहद सफल हैं पर वे कभी कॉलेज नहीं गए, न ही उनके पास कोई डिग्री है। ग्रैजुएशन की डिग्री का महत्व ही क्या है? परीक्षा में थोड़े खराब नंबर मिलने के कारण क्या मुझे मेरी डिग्री नहीं मिलेगी?
"भगवान का शुक्र है," उसने आगे कहा, "बाहर की दुनिया में लोग आप जैसे प्रोफ़ेसरों की तरह नहीं सोचते।"
इस टिप्पणी के बाद मैं 45 सेकंड तक रुका। (मैंने यह सीखा है कि जब आपकी आलोचना हो, तो वाकयुद्ध से बचने का एक अच्छा तरीका जवाब देने में देरी करना है।)



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