Saturday, October 5, 2019

CHAPTER 11.2 हर को जीत में कैसे बदले?

        फिर मैंने अपने विद्यार्थी से कहा, “तुम्हारी ज्यादातर बातें सही हैं। ऐसे कई बेहद सफल लोग हैं जिनके पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं है,या जिन्होंने इस डिग्री का नाम तक नहीं सुना है। और यह तुम्हारे लिए भी संभव है कि तुम बिना डिग्री के जीवन में सफल हो जाओ। पूरे जीवन के हिसाब से देखा जाए, तो तुम्हारे फेल होने का तुम्हारे जीवन की सफलता या असफलता से कोई सीधा संबंध नहीं है। परंतु फेल होने के प्रति तुम्हारे रवैए से बहुत फ़र्क पड़ सकता है।"

“वह कैसे?" उसने पूछा।

        मैंने जवाब दिया, "बाहर की दुनिया में भी लोग आपको उसी तरह नंबर देते हैं, जैसे हम लोग देते हैं। वहाँ भी इसी बात का महत्व होता है। कि आप अपने काम को कितनी अच्छी तरह करते हैं। बाहर की दुनिया में भी कोई आपको घटिया काम करने के लिए प्रमोशन नहीं देगा, न ही आपकी तनख्वाह बढ़ाएगा।"

        मैं एक बार फिर रुका ताकि उसे पूरी बात समझ में आ जाए।

      फिर मैंने कहा, "क्या मैं तुम्हें एक सुझाव दूं? अभी तुम बहुत निराश हो। मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हें कैसा लग रहा होगा। और अगर इस बात पर तुम उत्तेजित हुए हो, तो मैंने उसका बिलकुल भी बुरा नहीं माना है। मैं चाहता हूँ तुम इस अनुभव को सकारात्मक तरीके से लो। यह तुम्हें एक बहुत महत्वपूर्ण सबक़ सिखा सकता है : अगर आप अच्छा काम नहीं करेंगे, तो आप वहाँ नहीं पहुँच पाएँगे, जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं। इस सबक़ को सीख लो और आज से पाँच साल बाद जाकर तुम्हें यह एहसास होगा कि यह तुम्हारे द्वारा सीखी गई जीवन की सबसे बहुमूल्य शिक्षाओं में से एक है।"

      मैं यह जानकर खुश हुआ कि कुछ ही दिनों बाद उस विद्यार्थी ने एक बार फिर कॉलेज में एडमीशन ले लिया। इस बार वह बहुत ही अच्छे नंबरों से पास हुआ। इसके बाद, वह ख़ास तौर पर मुझसे मिलने आया और उसने मुझे बताया कि हमारी पहले वाली मुलाक़ात ने उस पर गहरा असर डाला था और उसने उस चर्चा से बहुत कुछ सीखा था।

“आपके कोर्स में फेल हो जाने से मैंने बहुत कुछ सीखा,” उसने कहा।“यह अजीब लगेगा, प्रोफ़ेसर, परंतु अब मैं खुश हूँ कि मैं पहली बार में पास नहीं हुआ।"

       हम हार को जीत में बदल सकते हैं। सबक सीखो, उसे अपने जीवन में उतारो, पराजय की तरफ़ पीछे मुड़कर देखो और मुस्कराओ।

       फ़िल्मों के शौकीन लोग महान अभिनेता बैरीमोर को कभी नहीं भूल पाएँगे। 1936 में बैरीमोर के नितंब में फ्रैक्चर हो गया। यह फ्रैक्चर कभी ठीक नहीं हो पाया। कई लोगों को लगा कि मिस्टर बैरीमोर की ज़िंदगी ख़त्म हो गई। परंतु नहीं, मिस्टर बैरीमोर को ऐसा नहीं लगा। उन्होंने इस बाधा को दूर करके अपने अभिनय की सफलता से भी बड़ी सफलता का रास्ता बना लिया। अगले 18 सालों तक दर्द के बावजूद उन्होंने व्हील चेयर पर बैठे-बैठे दर्जनों सफल भूमिकाओं में अभिनय किया।

       15 मार्च, 1945 को डब्ल्यू. कॉल्विन विलियम्स फ़्रांस में एक टैंक के पीछे चल रहे थे। टैंक एक बारूदी सुरंग से टकराया, उसमें विस्फोट हुआ और इससे मिस्टर विलियम्स हमेशा के लिए अंधे हो गए।

       परंतु यह दुर्घटना मिस्टर विलियम्स को पादरी और सलाहकार बनने के अपने लक्ष्य का पीछा करने से नहीं रोक पाई। जब उन्होंने कॉलेज से ग्रैजुएशन कर लिया (और वह भी ऑनर्स के साथ), तो विलियम्स ने कहा कि उनके विचार से उनका अंधापन “उनके चुने गए करियर में एक वरदान साबित होगा। मैं कभी बाहरी चीज़ों को देखकर निर्णय नहीं लँगा। इसलिए मैं हमेशा व्यक्ति को दूसरा मौक़ा दूंगा। मेरे अंधेपन से मुझे यह लाभ भी होगा कि कोई व्यक्ति कैसा भी दिखे, मैं सबके साथ एक जैसा व्यवहार करूँगा। में इस तरह का इंसान बनना चाहता हूँ जिसके पास कोई भी आ सके और बेझिझक आकर अपने दिल की बात कह सके।" 

       क्या यह एक शानदार उदाहरण नहीं है कि किस तरह एक कर, कटु हार को जीत में बदला जा सकता है?

       हार केवल एक मानसिक स्थिति है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

       मेरा एक दोस्त स्टॉक मार्केट में सफल और प्रसिद्ध निवेशक है। वह अपने निवेश के हर निर्णय को अपने अतीत के अनुभवों के आधार पर लेता है। एक बार उसने मुझे बताया, “जब मैंने 15 साल पहले निवेश करना शुरू किया तो मेरे हाथ कई बार जले। ज़्यादातर शुरुआती लोगों
की तरह, मैं भी फटाफट अमीर बनना चाहता था। परंतु इसके बजाय मैं जल्दी ही दीवालिया हो गया। परंतु इसके बावजूद मैंने हार नहीं मानी। मुझे अर्थव्यवस्था की मूलभूत शक्ति का ज्ञान था ओर मैं यह जानता था कि लंबे समय में अच्छी तरह चुने गए शेयरों में निवेश करना समझदारीपूर्ण होता है।

          "तो मैंने अपने शुरुआती बुरे निवेशों को अपनी शिक्षा की कीमत मान लिया।" वह हँसते हुए कहता है।

       दूसरी तरफ़, मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो एक-दो मूर्खतापूर्ण निवेश करने के बाद 'शेयर-विरोधी' बन जाते हैं। अपनी गलतियों का विश्लेषण करने के बजाय और एक अच्छी संस्था से जुड़ने के बजाय, वे इस ग़लत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने का मतलब है जुआ खेलना, एक ऐसा जुआ, जिसमें देर-सबेर हर व्यक्ति हारता है।

        हर असफलता से कुछ न कुछ बचाने का फैसला करें। अगली बार जब नौकरी या घर में कोई गड़बड़ हो, तो शांत हो जाएँ और यह पता लगाएँ कि गड़बड़ कहाँ शुरू हुई थी। इससे आप उसी ग़लती को दुबारा करने से बच सकते हैं।

        अगर हम कुछ सीखें, तो असफल होना भी फायदेमंद साबित हो सकता है।

        हम इंसान भी अजीब होते हैं। अपनी सफलताओं का श्रेय तो हम पूरा लेना चाहते हैं। जब हम जीतते हैं, तो हम पूरी दुनिया को इस बारे में बताना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है कि हम लोगों के मुँह से यह सुनना चाहें, “यही वह व्यक्ति है जिसने इतना बड़ा काम किया।”

        परंतु अपनी असफलता का श्रेय व्यक्ति तत्काल किसी दूसरे के मत्थे मढ़ देता है। जब सामान नहीं बिकता, तो सेल्समैन ग्राहकों को दोष देते हैं। अफ़सरों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे गलत काम होने पर कर्मचारियों या दूसरे अफ़सरों को दोष दें। घरेलू लड़ाइयों और समस्याओं के लिए पति अपनी पत्नियों को दोष देते हैं और पत्नियाँ अपने पतियों को।

        यह तो सच है कि इस जटिल संसार में दूसरे लोग हमें धक्का मारकर गिरा सकते हैं परंतु यह भी सच है कि ज्यादातर हम खुद ही अपने आपको गिराते हैं। हम अपनी व्यक्तिगत कमियों व ग़लतियों के कारण हारते हैं।

        सफलता के लिए खुद को इस तरह तैयार करें। अपने आपको याद दिलाएँ कि आप आदर्श और पूर्ण मनुष्य बनना चाहते हैं, जितना बनना इंसान के लिए संभव है। अपने आपको एक टेस्ट ट्यूब में रखकर निष्पक्ष दृष्टि से खुद का और अपनी स्थिति का मूल्यांकन करें। यह देखें कि क्या आपमें ऐसी कोई कमज़ोरी है जिसके बारे में आप जानते न हों। अगर आपमें ऐसी कमज़ोरी है, तो उसे सुधारने के लिए कदम उठाएँ। कई लोग खुद को देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे सुधार की संभावना देखने में असफल हो जाते हैं।

          महान मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा स्टार, रिसे स्टीवन्स ने रीडर्स डाइजेस्ट (जुलाई 1955) में कहा कि उसे सबसे अच्छी सलाह अपने जीवन के सबसे दुःखद क्षण में मिली।

        अपने करियर की शुरुआत में, मिस स्टीवन्स मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा “ऑडीशन्स ऑफ़ द एयर" में असफल हो गईं। हारने के बाद मिस स्टीवन्स कड़वाहट से भरी हुई थीं। “मैं यह सुनना चाहती थी," उसने कहा, “कि मेरी आवाज़ वास्तव में दूसरी लड़की से सचमुच बेहतर थी, कि निर्णायकों का फ़ैसला ग़लत था, कि मैं इसलिए नहीं जीत पाई, क्योंकि मेरे पास सही जुगाड़ नहीं थीं।"

         परंतु मिस स्टीवन्स की टीचर ने उसे कोई झूठी सांत्वना नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने मिस स्टीवन्स से कहा, "देखो बेटा, अपनी गलतियों का सामना करने की हिम्मत जुटाओ।"

         "हालाँकि मैं आत्म-दया के शब्द सुनना चाहती थी," मिस स्टीवन्स ने कहा, “परंतु अपनी टीचर के शब्द बार-बार मेरे कानों में गूंजते रहे। उस रात उन शब्दों ने मुझे जगा दिया। मैं तब तक नहीं सो पाई जब तक कि मैंने अपनी कमियों का सामना नहीं कर लिया। अँधेरे में लेटे-लेटे मैंने खुद से पूछा, 'मैं क्यों असफल हुई ?' 'मैं अगली बार किस तरह जीत सकती हूँ?' और मैंने माना कि मेरी आवाज़ की रेंज सचमुच उतनी अच्छी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए, कि मुझे और भाषाएँ सीखनी चाहिए, कि मुझे और ज़्यादा भूमिकाएँ सीखनी चाहिए।"

        मिस स्टीवन्स ने आगे बताया कि किस तरह अपनी कमियों का सामना करने से उसे न सिर्फ स्टेज पर सफलता मिली, बल्कि अपनी ग़लतियों को मानने से उसके ज्यादा दोस्त भी बने और वह ज़्यादा लोकप्रिय भी हुई।

      खुद का अच्छा आलोचक होना अच्छी बात है, बशर्ते कि आलोचना रचनात्मक हो। इससे आपको व्यक्तिगत शक्ति और योग्यता बढ़ाने में मदद मिलती है, जो सफलता के लिए बहुत ज़रूरी है। दूसरों को दोष देना विध्वंसात्मक है। सामने वाले की ग़लती “साबित" करने से आपको कुछ भी हासिल नहीं होता।

      रचनात्मक रूप से खुद की आलोचना करें। अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने में न हिचकिचाएँ। सच्चे प्रोफेशनल बनें। वे अपनी ग़लतियों और कमजोरियों को ढूँढ़ते हैं, फिर उन्हें दूर करते हैं। इसी कारण वे सफल प्रोफेशनल बनते हैं।

       परंतु अपनी ग़लतियाँ सिर्फ इसलिए न ढूँढें ताकि आप खुद के सामने यह बहाना बना सकें, “यह एक और कारण है जिससे मैं असफल होता हूँ।"

        इसके बजाय अपनी ग़लतियों को इस तरह से देखें, “यह एक और तरीका है जिससे मैं जीत सकता हूँ।"

        महान अल्बर्ट हबार्ड ने एक बार कहा था, “असफल व्यक्ति वह होता है जिसने बड़ी ग़लतियाँ की तो हैं, परंतु जो अपने अनुभव से कुछ नहीं सीख पाया।"

      अक्सर हम अपनी असफलता के लिए क़िस्मत को दोष देते हैं। हम कहते हैं, "अरे, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है," और फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं। परंतु ज़रा रुकें और सोचें। गेंद की उछाल की भी कोई न कोई वजह होती है। गेंद बिना कारण के यूँ ही किसी दिशा
में नहीं उछलती। गेंद का उछाल तीन कारणों से निर्धारित होता है : एक तो गेंद, फिर जिस तरीके से इसे फेंका जाता है, और तीसरे जिस सतह से यह टकराती है। निश्चित भौतिक नियम गेंद की उछाल का कारण तय करते हैं, इसका क़िस्मत से कोई लेना-देना नहीं होता।

         मान लें कि सी.ए.ए. एक रिपोर्ट जारी करे और कहे, "हमें खेद है। कि हवाई जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया, परंतु हम क्या करें, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है।"

       आप कहेंगे कि अब सी.ए.ए. को बदल देना चाहिए। या अगर कोई डॉक्टर किसी रिश्तेदार से कहे, "मुझे खेद है कि मैं उसे बचा नहीं पाया। मैं नहीं जानता कि ऐसा कैसे हुआ। यह तो किस्मत की बात थी।"

       जब आप या आपका कोई दूसरा रिश्तेदार बीमार होगा, तो आप उस डॉक्टर के पास नहीं जाएंगे।

        गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है' वाली शैली हमें कुछ नहीं सिखाती। जब हम अगली बार उसी तरह की परिस्थिति का सामना करते हैं। तो हम वही ग़लती करने से सिर्फ इसलिए नहीं बच पाते, क्योंकि हमने अपनी पिछली ग़लती से सबक़ नहीं सीखा था। वह फुटबॉल कोच जो शनिवार का मैच हार जाने के बाद अपनी टीम से कहता है, “चिंता मत करो, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है" अपनी टीम की ग़लतियाँ ढूँढ़ने में मदद नहीं कर रहा है, जिससे अगले शनिवार को होने वाले मैच में उन ग़लतियों को सुधारा जा सके।

       डियरबॉर्न, मिशीगन के मेयर ऑरविल हबार्ड 17 सालों से लगातार मेयर हैं और देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नगरीय प्रशासकों में से एक हैं।

        डियरबॉर्न के मेयर बनने के दस साल पहले मिस्टर हबार्ड भी "बदकिस्मती” का बहाना बना सकते थे और राजनीति छोड़ सकते थे।

लगातार विजेता बनने के पहले, ऑरविल हबार्ड तीन बार "बदकिस्मत" रहे थे क्योंकि उन्हें मेयर पद के लिए नामांकित ही नहीं किया गया था। तीन बार उन्होंने स्टेट सीनेटर के लिए नामांकन हासिल करने की कोशिश की थी, परंतु वे असफल हुए। एक बार तो वे काँग्रेस के लिए नामांकन की दौड़ से ही बाहर हो गए थे।

परंतु ऑरविल हबार्ड ने अपनी पराजयों का अध्ययन किया। उन्होंने

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