Thursday, September 12, 2019

CHAPTER 5.2 नए विचारों का स्वागत करें और पुराने विचारो को नष्ट करे




         1. नए विचारों का स्वागत करें। इन विचार-शत्रुओं को नष्ट करें। “यह काम नहीं करेगा," "इसे किया ही नहीं जा सकता," "यह बेकार है,” और “यह मूर्खतापूर्ण है।"

         मेरा एक सफल दोस्त एक बीमा कंपनी में अच्छे पद पर है। उसने मुझसे कहा, "मैं इस बात का दावा नहीं करता कि मैं इस बिज़नेस में सबसे स्मार्ट आदमी हूँ। परंतु मुझे लगता है कि मैं बीमा उद्योग में सबसे अच्छा स्पंज हूँ। मैं सारे अच्छे विचारों को सोख लेता हूँ।"

         2. प्रयोगशील व्यक्ति बनें। बँधे-बँधाए रुटीन को तोड़ें। नए रेस्तराँओं में जाएँ, नई पुस्तकें पढ़ें, नए थिएटर में जाएँ, नए दोस्त बनाएँ, किसी दिन अलग रास्ते से काम पर जाएँ, इस साल अलग ढंग से छुट्टियाँ मनाएँ, इस सप्ताह के अंत में कुछ नया और अलग करें।

          अगर आप डिस्ट्रीब्यूशन का काम करते हैं, तो प्रॉडक्शन, अकाउंटिंग, फ़ाइनैन्स और बिज़नेस के दूसरे पहलुओं को सीखने में रुचि लें। इससे आपकी सोच व्यापक होगी और आप ज्यादा ज़िम्मेदारी उठाने काबिल बन सकेंगे।

         3. प्रगतिशील बनें, प्रगतिविरोधी न बनें। ऐसा न कहें, “मैं जहाँ नौकरी करता था, वहाँ यह काम इस तरीके से होता था, इसलिए हमें यहाँ भी इसे उसी तरीके से करना चाहिए" बल्कि यह कहें, “जहाँ मैं नौकरी करता था, वहाँ पर यह काम इस तरीके से होता था। इसे बेहतर तरीके से किस तरह किया जा सकता है ?" पीछे ले जाने वाली बातें न सोचें, प्रगति का विरोध न करें। आगे ले जाने वाली बातें सोचें, प्रगतिशील तरीके से सोचें। सिर्फ इसलिए कि, बचपन में आप सुबह पेपर बाँटने या। गाय का दूध निकालने के लिए 5:30 बजे उठ जाते थे, आप अपने बच्चा। से ऐसा करने की उम्मीद नहीं रख सकते।

         कल्पना कीजिए क्या होगा अगर फ़ोर्ड मोटर कंपनी का मैनेजमेंट यह साच ले, “इस साल हमने ऑटोमोबाइल के इतिहास में सर्वोच्च, सर्वोत्कृष्ट सर्वश्रेष्ठ कार बना ली है। इससे आगे सधार हो पाना संभव नहीं है। इसलिए सभी इंजीनियरिंग प्रयोग और डिज़ाइनिंग के प्रयोग अब हमेशा के लिए बंद किए जाते हैं।" फ़ोर्ड कॉरपोरेशन जैसी दिग्गज कंपनी भी इस तरीके का रवैया अपनाकर अपना बिज़नेस चौपट कर लेगी।

          सफल बिज़नेस कंपनियों की तरह ही सफल लोग भी खुद से यह सवाल पूछते हैं, “मैं किस तरह अपने प्रदर्शन की क्वालिटी सुधार सकता हूँ? मैं किस तरह इस काम को बेहतर कर सकता हूँ?"

         मिसाइल बनाने से लेकर बच्चे पालने तक के सभी मानवीय कामों में पूर्णता संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि हर काम में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। सफल लोग इस बात को जानते हैं और वे हमेशा बेहतर तरीके खोजते रहते हैं। (नोट : सफल व्यक्ति यह नहीं पूछता, “क्या इसे बेहतर तरीके से किया जा सकता है ?" वह जानता है कि यह संभव है। इसलिए वह यह सवाल पूछता है, “इसे बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता है ?")

          कुछ महीने पहले, मेरी एक भूतपूर्व छात्रा ने बिज़नेस में उतरने के चार साल के भीतर ही अपना चौथा हार्डवेयर स्टोर खोल लिया। यह बहुत बड़ी बात थी। मैं जानता था कि उस महिला ने केवल 3,500 डॉलर की छोटी सी पूँजी से बिज़नेस शुरू किया था, उसे दूसरे प्रतियोगियों की ज़बरदस्त प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा था और उसे बिज़नेस में उतरे हुए अभी ज़्यादा समय भी नहीं हुआ था।

          स्टोर खुलने के कुछ समय बाद ही उसे बधाई देने के लिए मैं उसके स्टोर में गया।

         मैंने उससे बातों-बातों में पूछा कि जब बाक़ी के व्यापारी एक स्टोर तक ठीक से नहीं चला पा रहे हैं, तो वह किस तरह तीन स्टोर्स सफलतापूर्वक चला रही है और उसने चौथा स्टोर भी शुरू कर दिया है।

         "स्वाभाविक है," उसने जवाब दिया, “मैं इसके लिए मेहनत करती हूँ परंतु जल्दी उठने और देर तक मेहनत करने के कारण ही मैं चार स्टोर्स खोलने में सफल नहीं हुई हूँ। मेरे बिज़नेस में ज़्यादातर लोग कड़ी मेहनत करते हैं। मैं अपनी सफलता के लिए जिस बात को इसका सबसे ज़्यादा श्रेय देना चाहूँगी वह है मेरा बनाया हुआ 'साप्ताहिक सुधार कार्यक्रम।"

         “साप्ताहिक सुधार कार्यक्रम? यह वाक्य सुनने में अच्छा लगता है। परंतु यह साप्ताहिक सुधार कार्यक्रम क्या है ?" मैंने पूछा।

         "इसमें कोई बड़ी बात नहीं है," उसने कहा, "यह सिर्फ एक योजना है जिसमें हर हफ्ते अपने प्रदर्शन को सुधारने के तरीकों पर मैं विचार करती हूँ।

           “भविष्य में ज़्यादा सफल होने के लिए मैंने अपने काम को चार भागों में बाँट लिया है : ग्राहक, कर्मचारी, माल और प्रमोशन। पूरे सप्ताह मैं नोट्स बनाती हूँ और अपने दिमाग में आने वाले हर उस विचार को लिख लेती हूँ कि मैं किस तरह अपने बिज़नेस को सुधार सकती हूँ।

            "फिर हर सोमवार को मैं सुबह चार घंटे अपने लिखे विचारों को पढ़ती हूँ और यह तय करती हूँ कि किन विचारों का प्रयोग मैं अपने बिज़नेस में कर सकती हूँ।

           “इस चार घंटे के समय में मैं अपने काम का कड़ा मूल्यांकन करती हूँ। मैं सिर्फ इतना ही नहीं चाहती कि मेरे स्टोर में ज़्यादा ग्राहक आएँ। इसके बजाय मैं खुद से पूछती हूँ, 'ज़्यादा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए मैं और क्या कर सकती हूँ ?' 'मैं किस तरह नियमित, वफ़ादार ग्राहकों को बढ़ा सकती हूँ?"

          फिर उसने मुझे उन छोटे-छोटे उपायों के बारे में बताया जिनके कारण उसके तीन स्टोर सफल हुए थे : माल जमाने का तरीक़ा; सुझाव देकर सामान बेचने की कला, जिसमें वह अपने ग्राहकों को दो या तीन ऐसे सामान भी ख़रीदवा देती थी जिन्हें खरीदने के इरादे से वे उसके स्टोर में नहीं घुसे थे; हड़ताल के समय अपने बेकाम ग्राहकों के लिए उधार देने की स्कीम; प्रतियोगिताएँ और ईनाम जो उसने मंदी के दौर में बिक्री बढ़ाने के लिए शुरू किए थे।

        “मैं खुद से पूछती हूँ, 'मैं अपने बिज़नेस को सुधारने के लिए क्या कर सकती हूँ ?' और इसके जवाब में मेरे दिमाग में बहत से विचार आत हैं। मैं आपको सिर्फ एक उदाहरण बताना चाहती हैं। चार हफ्ते पहले मन सोचा कि मैं अपने स्टोर में छोटे बच्चों को आकर्षित करने के लिए कुछ करूँ। मैंने सोचा कि अगर छोटे बच्चे स्टोर में आना चाहेंगे, तो उनके माँ-बाप अपने आप मेरे स्टोर से सामान खरीदने लगेंगे। मैं इस बारे में सोचती रही और एक योजना बनाई : मैंने चार से आठ साल की उम्र के बच्चों के लिए छोटे-छोटे खिलौने लाइन से रखवा दिए। खिलौनों को रखने में ज्यादा जगह नहीं लगी थी और बच्चे इन्हें धड़ाधड़ खरीद रहे थे, जिससे मुझे बहुत फायदा हुआ। परंतु इससे भी बड़ा फायदा यह हुआ कि इन खिलौनों के कारण मेरे स्टोर में ज़्यादा ग्राहक आने लगे हैं।

           “यक़ीन कीजिए,” उसने आगे कहा, “मेरा साप्ताहिक सुधार कार्यक्रम सचमुच काम करता है। मैं सिर्फ अपने आपसे यह सवाल पूछती हूँ, 'मैं किस तरह अपने काम को सुधार सकती हूँ ?' और मुझे जवाब अपने आप मिल जाते हैं। ऐसा दिन शायद ही कोई होता हो जब मेरे दिमाग़ में ज़्यादा मुनाफा कमाने की कोई योजना न आती हो।

         “और मैंने सफल बिज़नेस के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात सीखी है, जो हर बिज़नेसमैन को सीखनी चाहिए।"

          “वह क्या?" मैंने पूछा।

         "सिर्फ यह। आप बिज़नेस शुरू करते समय कितना जानते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होता। परंतु आप बिज़नेस शुरू करने के बाद कितना सीखते हैं और अपने आपको कितना सुधारते हैं, यह बेहद महत्वपूर्ण होता है।"

           बड़ी सफलता उन्हीं लोगों का दरवाज़ा खटखटाती है जो लगातार खुद के सामने और दूसरों के सामने ऊँचे लक्ष्य रखते हैं, जो अपनी कार्यक्षमता सुधारना चाहते हैं, जो कम लागत पर बेहतर माल देना चाहते हैं, जो कम प्रयास में ज्यादा काम करना चाहते हैं। ऊँची सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है जिसका रवैया होता है मैं-इसे-बेहतर-तरीके-से- कर-सकता-हूँ।

          जनरल इलेक्ट्रिक का स्लोगन है : प्रगति हमारा सबसे महत्वपूर्ण प्रॉडक्ट है।

        क्यों न आप भी प्रगति को अपना सबसे महत्वपूर्ण प्रॉडक्ट बनाएँ।

        मैं-इसे-बेहतर-तरीके-से-कर-सकता-हूँ वाली फिलॉसफी जादू की तरह काम करती है। जब आप खुद से पूछते हैं, "मैं इसे किस तरह सुधार सकता हूँ?" तो आपका रचनात्मक बल्ब जल उठता है और आपके दिमाग में काम करने के बेहतर तरीके अपने आप आने लगते हैं।

          यहाँ एक दैनिक अभ्यास दिया जा रहा है जिसकी मदद से आप मैं-इसे बेहतर तरीके-से-कर-सकता-हूँ रवैए की शक्ति को पहचान सकते हैं और विकसित कर सकते हैं।

         हर दिन काम शुरू करने से पहले 10 मिनट यह सोचें, “आज मैं अपने काम को किस तरह सुधार सकता हूँ, पहले से बेहतर कर सकता हूँ?" पूछे, “आज मैं अपने कर्मचारियों का उत्साह किस तरह बढ़ा सकता हूँ?" "आज मैं अपने ग्राहकों के लिए क्या ख़ास काम कर सकता हूँ?" “मैं अपनी व्यक्तिगत कार्यक्षमता किस तरह बढ़ा सकता हूँ?"

           यह अभ्यास आसान भी है और बड़े काम का भी। इसे आज़माकर देखें और आप पाएंगे कि इसके रचनात्मक तरीक़ों का उपयोग करने पर आप बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।

         जब भी मैं और मेरी पत्नी एक दंपति से मिलने जाया करते थे, हमारी चर्चा “कामकाजी महिलाओं" के बारे में होने लगती थी। शादी से पहले श्रीमती एस. नौकरी करती थीं और उन्हें नौकरी करना अच्छा लगता था।

         "परंतु अब," वे कहा करती थीं, “अब मेरे दो बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं, मुझे घर सँभालना पड़ता है और खाना बनाना पड़ता है। अब मेरे पास नौकरी करने का समय ही नहीं है।"

         फिर एक रविवार की शाम को मिस्टर और मिसेज़ एस. अपन बच्चों के साथ कहीं से आ रहे थे। उनकी कार का एक्सीडेंट हो गया। किसी और को तो कोई ख़ास चोट नहीं आई, लेकिन मिस्टर एस. की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई और वे हमेशा के लिए अपंग हो गए। अब मिसेज़ एस. के पास नौकरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

         जब हमने उस दुर्घटना के कुछ महीनों बाद मिसेज़ एस. को देखा, तो हम यह देखकर दंग रह गए कि उन्होंने अपनी नई जिम्मेदारियों को बखूबी सँभाल लिया था।

         “आप जानते हैं," उन्होंने कहा, "छह महीने पहले मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि में घर सँभालने के साथ-साथ फल टाइम नौकरी भी कर पाऊँगी। परंतु एक्सीडेंट के बाद मैंने यह फैसला किया कि मुझे समय निकालना ही पड़ेगा। यकीन मानिए, मेरी कार्यक्षमता पहले से 100 प्रतिशत ज़्यादा बढ़ चुकी है। में ऐसे बहुत से काम किया करती थी, जो महत्वपूर्ण नहीं थे और जिन्हें करने की कोई जरूरत नहीं थी। फिर मैंने यह भी जाना कि मेरे बच्चे मेरी मदद कर सकते थे और वे मेरी मदद करना चाहते थे। मैंने समय बचाने के दर्जनों तरीके ढूँढ लिए- स्टोर के कम चक्कर लगाना, कम टीवी देखना, टेलीफ़ोन पर कम बात करना, समय को कम बर्बाद करना।"

            इस अनुभव से हमें एक सीख मिलती है : काम करने की क्षमता एक मानसिक स्थिति है। हम कितना ज्यादा काम कर सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी क्षमताओं के बारे में क्या सोचते हैं। जब आपको सचमुच विश्वास होता है कि आप ज्यादा काम कर सकते हैं, तो आपका दिमाग रचनात्मक तरीके से सोचता है और आपको रास्ता दिखा देता है।

          एक युवा बैंक एक्जीक्यूटिव ने “काम करने की क्षमता" के बारे में अपना अनुभव मुझे सुनाया।

         "हमारी बैंक का एक एक्जीक्यूटिव अचानक नौकरी छोड़कर चला गया। इससे हमारे डिपार्टमेंट में समस्या पैदा हो गई। जो आदमी गया था. उसका काम महत्वपूर्ण था और उसके काम को किए बिना बैंक का काम नहीं चल सकता था। यह काम इतना अर्जेन्ट था कि इसे टाला भी नहीं जा सकता था।

         "उसके जाने के एक दिन बाद, बैंक के वाइस प्रेसिडेंट यानी कि मेरे विभाग के इन्चार्ज ने मुझे बुलाया। उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरे विभाग के बाक़ी दो लोगों से पूछा था कि जब तक कि कोई दूसरा आदमी काम पर न रखा जाए, तब तक क्या वे उस आदमी के काम को सँभाल सकते हैं। दोनों ने ही सीधे तो मना नहीं किया, परंतु दोनों का ही कहना था कि उनके पास काम का पहले से ही बहुत बोझ है। इतना काम है कि उन्हें सिर उठाने तक की फुरसत नहीं मिलती। मैं सोच रहा था कि क्या आप कुछ समय के लिए यह अतिरिक्त काम कर लेंगे?'

         "मेरी परी नौकरी में मैंने यह सीखा है कि जो भी चीज़ अवसर की तरह दिखे, उसे ठुकराना नहीं चाहिए। इसलिए मैं तत्काल राज़ी हो गया और मैंने वादा किया कि मैं अपना काम तो करूँगा ही, दूसरे आदमी का काम भी सँभाल लूँगा। वाइस प्रेसिडेन्ट यह सुनकर खुश हो गया।

         “मैं उसके ऑफ़िस से बाहर निकलते समय सोच रहा था कि मैंने अपने ऊपर कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले ली है। मैं भी अपने विभाग के बाक़ी दो लोगों की तरह बहुत व्यस्त था, परंतु मैंने उनकी तरह अतिरिक्त काम से जी नहीं चुराया था। मेरा दृढ़ निश्चय था कि मैं दोनों काम एक साथ करने का कोई न कोई रास्ता ढूँढ़ ही निकालूंगा। मैंने उस दोपहर अपना काम ख़त्म किया और जब ऑफ़िस बंद हो गया तो मैंने बैठकर विचार किया कि किस तरह मैं अपनी कार्यक्षमता बढा सकता है। मैंने एक पेंसिल ली और अपने हर विचार को लिखना शुरू कर दिया।

          “और आप जानते हैं, मेरे दिमाग में बहुत से अच्छे विचार आने लगे। जैसे, अपनी सेक्रेटरी से यह कहना कि वह मेरे लिए आने वाले सामान्य टेलीफ़ोन कॉल हर दिन एक निश्चित समय ही मुझे ट्रांसफर किया करे। वह किसी निश्चित समय ही बाहर जाने वाले टेलीफ़ोन कॉल लगाया करे। मैंने अपनी चर्चा की अवधि को भी 15 मिनट से घटाकर 10 मिनट कर लिया। मैं अपने सभी डिक्टेशन हर दिन एक ही बार में देने लगा। मैंने यह भी पाया कि मेरी सेक्रेटरी मेरी मदद कर सकती थी और मेरे बदले में कई काम सँभाल सकती थी।

          "मैं यह काम पिछले दो साल से कर रहा था, और सच कहूँ, तो मुझे यह जानकर इतनी हैरत हुई कि मैं अब तक कितनी कम क्षमता से काम कर रहा था।

         “एक हफ्ते के समय में ही मैं पहले से दुगुने पत्र डिक्टेट करने लगा, पहले से 50 प्रतिशत ज़्यादा फ़ोन कॉल करने और सुनने लगा, पहले से 50 प्रतिशत ज़्यादा मीटिंगों में भाग लेने लगा- और यह सब बिना तनाव
के करने लगा।

         "इसी तरह दो सप्ताह और गुज़र गए। वाइस-प्रेसिडेन्ट ने मुझे बलवाया। उन्होंने मेरी तारीफ़ की कि मैंने इस अतिरिक्त ज़िम्मेदारी को इतनी अच्छी तरह सँभाला है। उन्होंने आगे कहा कि वे एक आदमी की तलाश कर रहे थे और इसके लिए वे बैंक के अंदर और बाहर कई लोगों को परख चुके थे। परंतु उन्हें अब तक सही आदमी नहीं मिला था। फिर उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने बैंक की एक्जीक्यूटिव कमेटी के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि इन दो कामों को मिलाकर एक ही आदमी को सौंप दिया जाए, उन्होंने इस काम के लिए मुझे चुना है और उन्होंने यह प्रस्ताव भी रखा कि मेरी तनख्वाह काफ़ी बढ़ा दी जाए। कमेटी ने उनकी बात मान ली और मुझे हर तरह से फायदा हुआ।

          “मैंने यह साबित कर दिया कि मेरी क्षमता उतनी ही होती है, जितनी क्षमता का विश्वास मेरे मन में होता है। मैं उतना ही काम कर सकता हूँ, जितना काम करने की मैं ठान लेता हूँ।"

           काम करने की क्षमता एक मानसिक स्थिति है।

          हर दिन तेज़ी से आगे बढ़ती बिज़नेस की दुनिया में यही होता है। बॉस किसी कर्मचारी को बुलाता है और बताता है कि कोई विशेष काम करना है। फिर वह कहता है, “मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पास पहले से ही बहुत काम है, परंतु क्या तुम उसके साथ यह काम भी कर पाओगे?"
अक्सर कर्मचारी जवाब देता है, “मुझे अफ़सोस है, परंतु मुझ पर पहले से ही काम का बहुत ज्यादा बोझ है। काश मैं इस काम को कर सकता, परंतु मेरे पास इस काम को करने के लिए समय ही नहीं है।"

           इन परिस्थितियों में बॉस को कर्मचारी की बात का बुरा तो नहीं लगता, क्योंकि यह “अतिरिक्त काम” है। परंतु बॉस महसूस करता है। कि इस काम को करना तो है ही, इसलिए वह ऐसे कर्मचारी की तलाश करता है जिस पर बाक़ी लोगों जितना ही काम का बोझ है, परंतु जो
यह समझता है कि वह यह अतिरिक्त ज़िम्मेदारी निभा सकता है। और यही कर्मचारी सफलता में बाक़ी सबसे आगे निकल जाता है।

        बिज़नेस में, घर में, समाज में, सफल तालमेल होता है - अपने काम को लगातार बेहतर तरीके से करते रहें (अपने काम की क्वालिटी सुधारें) और आप जितना पहले करते थे, उससे ज़्यादा करें (अपने काम की क्वांटिटी बढ़ाएँ)।

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Wednesday, September 11, 2019

CHAPTER 5.1 रचनात्मक तरीके से कैसे सोचें और सपने देखें?

       रचनात्मक तरीके से कैसे सोचें और सपने देखें?


       सबसे पहले तो रचनात्मक सोच को लेकर फैली एक ग़लतफ़हमी को दूर कर लें। न जाने क्यों विज्ञान, इंजीनियरिंग, साहित्य और कला को ही रचनात्मक काम माना जाता है। ज्यादातर लोगों की नज़र में रचनात्मक सोच का अर्थ होता है बिजली या पोलियो वैक्सीन की खोज, या उपन्यास लिखना रंगीन टेलीविज़न काआविष्कार करना।

        निश्चित रूप से ये तमाम उपलब्धियाँ रचनात्मक सोच का परिणाम हैं। अंतरिक्ष को इंसान इसीलिए जीत पाया, क्योंकि उसने रचनात्मक सोच का सहारा लिया। हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि रचनात्मक सोच का संबंध केवल कुछ ख़ास व्यवसायों से नहीं होता, न ही अति बुद्धिमान लोगों से इसका कोई विशेष संबंध होता है।

         फिर, रचनात्मक सोच क्या है?

         कम आमदनी वाला परिवार अपने बच्चे को किसी मशहूर यूनिवर्सिटी में भेजने की योजना बनाता है। यह रचनात्मक सोच है।

        कोई परिवार अपने आस-पास की बहुत बुरी जगह को सबसे सुंदर जगह में बदल देता है। यह रचनात्मक सोच है।

        कोई पादरी ऐसी योजना बनाता है जिससे रविवार शाम की उपस्थिति दुगुनी हो जाती है। यह रचनात्मक सोच है।

           अगर आप रिकॉर्ड-कीपिंग को आसान बनाने के तरीके ढूँढ़ते हैं. “असंभव” ग्राहक को सामान बेचने के तरीके ढूँढ़ते हैं, रचनात्मक रूप से बच्चों को व्यस्त रखते हैं, ऐसा उपाय करते हैं कि आपके कर्मचारी दिल लगाकर काम करें, या आप किसी “निश्चित" झगड़े को रोक लेते हैं- ये सभी व्यावहारिक जीवन में रचनात्मक सोच के उदाहरण हैं।

          रचनात्मक सोच का अर्थ है किसी भी काम को करने के नए, सधरे हुए तरीके खोजना। हर जगह सफलता इसी बात में छुपी होती है कि आप चीज़ों को बेहतर तरीके से करने के उपाय किस तरह खोजते हैं. फिर चाहे वह सफलता घर में हो, काम-धंधे में हो या समाज में हो। आइए देखते हैं कि हम अपनी रचनात्मक सोच की योग्यता को किस तरह विकसित कर सकते हैं और इसकी आदत कैसे डाल सकते हैं।

          कदम एक : विश्वास करें कि काम किया जा सकता है। एक मूलभूत सत्य जान लें- किसी भी काम को करने के लिए पहले आपको यह विश्वास करना होगा कि इसे किया जा सकता है। एक बार आप यह सोच लें कि यह काम संभव है तो फिर आप उसे करने का तरीक़ा भी सोच ही लेंगे।

          प्रशिक्षण देते समय मैं रचनात्मक सोच के इस पहलू को समझाने के लिए अक्सर यह उदाहरण देता हूँ। मैं लोगों से पूछता हूँ, “आपमें से कितने लोगों को यह लगता है कि 30 साल बाद हम जेलविहीन समाज में रह सकेंगे?"

          हमेशा समूह के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती नज़र आई हैं। उन्हें हमेशा यही लगा कि शायद उन्होंने ग़लत सुन लिया है या फिर मैं गंभीर किस्म का मज़ाक कर रहा हूँ। इसलिए थोड़ा ठहरने के बाद मैं फिर पूछता हूँ, "आपमें से कितने लोगों को यह लगता है कि 30 साल बाद हम जेलविहीन समाज में रह सकेंगे?"

          एक बार यह पक्का हो जाने के बाद कि मैं मज़ाक नहीं कर रहा। हूँ, कोई न कोई इस तरह की बात कहता है, “आप यह कहना चाहते हैं कि 30 साल बाद सभी हत्यारे, चोर-उचक्के और बलात्कारी जेल में बंद रहने के बजाय सड़कों पर खुले आम घूमेंगे। आप जानते हैं इसका नतीजा क्या होगा? हममें से कोई भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। हमारे समाज का काम जेल के बिना चल ही नहीं सकता।"

       तभी दूसरे लोग भी बोलने लगते हैं।

      “अगर जेलें न हों, तो हमारी कानून व्यवस्था ठप्प हो जाएगी।"

       "कुछ लोग तो पैदाइशी अपराधी होते हैं।"

       "जितनी हैं, हमें उससे ज़्यादा जेलों की ज़रूरत है।"

       "क्या आपने आज सुबह के अखबार में हत्या की वह खबर पढ़ी थी?"

       और लोग बोलते जाते हैं, एक के बाद एक अच्छे कारण बताते हैं कि हमारे समाज में जेलों का होना क्यों ज़रूरी है। एक आदमी ने तो यहाँ तक सुझाव दिया कि हमारे समाज में जेलें इसलिए होनी चाहिए ताकि पुलिस और जेल के संतरियों की नौकरी बची रह सके।

       मैं दस मिनट तक लोगों को यह “सिद्ध" करने देता हूँ कि जेलों को समाप्त क्यों नहीं किया जाना चाहिए, इसके बाद मैं उनसे कहता हूँ, 'मैंने आपसे पूछा था कि जेलों को ख़त्म क्यों करना चाहिए। यह सवाल पूछने के पीछे मेरा एक ख़ास मक़सद था।

      “आपमें से हर एक ने मुझे यही तर्क दिए हैं कि जेलों को ख़त्म क्यों नहीं किया जाना चाहिए। अब आप मेहरबानी करके मुझ पर एक एहसान करें। आप कुछ मिनट तक अपने दिमाग पर ज़ोर डालकर यह यक़ीन कर लें कि हम जेलों को ख़त्म कर सकते हैं।"

        प्रयोग में दिलचस्पी लेते हुए लोग कहते हैं, “ठीक है, सिर्फ मज़े के लिए, सिर्फ प्रयोग के लिए ऐसा करने में हमें क्या दिक्कत हो सकती है?" फिर मैं पूछता हूँ, “अब हम यह मान लेते हैं कि हम जेलों को ख़त्म करना चाहते हैं, परंतु हम किस तरह से शुरुआत करेंगे?"

        पहले तो सुझाव धीमे-धीमे आते हैं। कोई थोड़ा झिझकते हुए कहता है, “अगर ज़्यादा युवा केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो अपराधों को कम किया सकता है।"

         थोड़ी ही देर में पूरा समूह, जो दस मिनट पहले तक इस विचार पूरी तरह ख़िलाफ़ था, अब सच्चे उत्साह से काम में जुट जाता है।

          "अपराध कम करने के लिए हमें गरीबी दूर करने के उपाय सोना होंगे। ज़्यादातर अपराध गरीबी के कारण होते हैं।"

         "अनुसंधान के ज़रिए अपराध करने से पहले ही संभावित अपरा का पता लगाया जाना चाहिए।"

          "कुछ तरह के अपराधियों के इलाज के लिए मेडिकल ऑपरेशन किए जाने चाहिए।"

           “कानून के रखवालों को सुधार के रचनात्मक तरीके सिखाने चाहिए।"

          ये उन 78 विचारों में से कुछ हैं जो मुझे सुनने को मिले। मेरा प्रयोग यह था कि किस तरह जेलविहीन समाज का निर्माण किया जा सकता है।

जब आप विश्वास करते हैं, तो आपका दिमाग तरीके ढूँढ़ ही लेता है।

   इस प्रयोग का सिर्फ एक संदेश है : जब आप यह विश्वास करते हैं कि कोई काम असंभव है, तो आपका दिमाग आपके सामने यह सिद्ध कर देता है कि यह क्यों असंभव है। परंतु जब आप विश्वास करते हैं, सचमुच विश्वास करते हैं कि कोई काम किया जा सकता है, तो आपका दिमाग आपके लिए काम में जुट जाता है और तरीके ढूँढने में आपकी मदद करता है।

        यह विश्वास कि कोई काम किया जा सकता है, रचनात्मक समाधानों का रास्ता खोल देता है। यह विश्वास कि कोई काम नहीं किया जा सकता, असफल व्यक्तियों की सोच है। यह बात सारी परिस्थितियों पर लागू होती है, चाहे वे परिस्थितियाँ छोटी हों या बड़ी। जिन राजनीतिक नेताओं का यह विश्वास नहीं होता कि स्थाई विश्व शांति संभव है, वे शांति स्थापित करने में असफल हो जाएँगे क्योंकि उनके दिमाग शांति स्थापित करने के रचनात्मक उपाय नहीं ढूँढ़ पाएंगे। जिन अर्थशास्त्रियों का विश्वास है कि बिजनेस में मंदी अपरिहार्य है, वे बिज़नेस चक्र को हराने के रचनात्मक तरीके कभी विकसित नहीं कर पाएँगे।

          इसी तरीके से, अगर आपको विश्वास हो, तो आप किसी भी व्यक्ति को पसंद करने के तरीके खोज सकते हैं।

        अगर आपको विश्वास हो, तो आप अपनी व्यक्तिगत समस्याओं का हल ढूँढ़ सकते हैं।

        अगर आपको विश्वास हो, तो आप नए, बड़े घर को खरीदने का तरीका खोज सकते हैं।

        विश्वास रचनात्मक शक्तियों को मुक्त करता है। अविश्वास इन पर ब्रेक लगा देता है।

        विश्वास करें और आप सोचना शुरू कर देंगे- रचनात्मक रूप से।

        अगर आप उसके काम में रुकावट न डालें, तो आपका दिमाग काम करने के उपाय खोज लेगा। दो साल पहले एक युवक ने मुझसे एक अच्छी सी नौकरी खोजने में मदद माँगी। वह किसी मेल ऑर्डर कंपनी के क्रेडिट विभाग में क्लर्क था और उसे लग रहा था कि वहाँ पर उसका भविष्य उज्जवल नहीं है। हमने उसके पिछले रिकॉर्ड के बारे में बात की और यह चर्चा की कि वह क्या करना चाहता था। उसके बारे में कुछ जानने के बाद मैंने कहा, "मैं आपकी प्रशंसा करता हूँ कि आप बेहतर नौकरी की सीढ़ी पर ऊपर की तरफ़ चढ़ना चाहते हैं। परंतु आजकल ऐसी नौकरी हासिल करने के लिए कॉलेज की डिग्री होना ज़रूरी है। आपने अभी बताया है कि आपने तीन सेमिस्टर पूरे कर लिए हैं। मैं आपको यही सलाह दूंगा कि आप अपने कॉलेज कीशिक्षा को पूरा कर लें। आप दो सालों में ऐसा कर सकते हैं। फिर मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपको आपकी मनचाही नौकरी मिल जाएगी, और उसी कंपनी में मिल जाएगी जिसमें आप चाहते हैं।"

         "मैं जानता हूँ,” उसने जवाब दिया, "कि कॉलेज की शिक्षा ज़रूरी है। परंतु मेरे लिए कॉलेज की पढ़ाई पूरी करना असंभव है।"

               “असंभव ? क्यों?" मैंने पूछा।

         "एक कारण तो यह है," उसने बताया, “मैं चौबीस साल का हूँ। इसके अलावा मेरी पत्नी को दो महीने में दूसरा बच्चा होने वाला है। हमारा खर्च अभी ही जैसे-तैसे चल रहा है। मुझे नौकरी तो करनी ही पड़ेगी और इसलिए मेरे पास पढ़ने के लिए समय नहीं बचेगा। यह असंभव है, बिलकुल असंभव है।"

         इस युवक ने खुद को विश्वास दिला दिया था कि कॉलेज की पढाई पूरी करना उसके लिए असंभव था।

        फिर मैंने उससे कहा, “अगर तुम्हारा विश्वास है कि तुम्हारे लिए कॉलेज की पढाई पूरी करना असंभव है, तो यह सचमुच असंभव है। परंत इसी तर्क से. अगर तुम यह विश्वास कर लो कि तुम पढ़ाई पूरी कर सकते हो, तो कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकल आएगा।

          “अब मैं चाहता हूँ कि तुम यह करो। अपना मन बना लो कि तुम कॉलेज जा रहे हो। इस विचार को अपनी सोच पर हावी हो जाने दो। फिर सोचो. सचमच सोचो. कि तम ऐसा किस तरह कर सकते हो और अपने परिवार का खर्च चलाते हुए यह किस तरह संभव है। दो सप्ताह बाद आना और मुझे बताना कि तुम्हारे दिमाग में किस तरह के विचार आए।"

          मेरा युवा मित्र दो सप्ताह बाद आया।

         “मैंने आपकी कही बातों पर काफ़ी सोचा,” उसने कहा। “मैंने कॉलेज जाने का फैसला कर लिया है। हालाँकि मैंने विस्तार से इस बारे में नहीं सोचा है, परंतु मुझे लगता है कि कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकल आएगा।" 

           और रास्ता निकल आया।

        उसे ट्रेड एसोसिएशन की तरफ़ से स्कॉलरशिप मिल गई जिससे उसकी ट्यूशन फ़ी, पुस्तकों का और बाक़ी ख़र्च निकल गया। उसने अपनी नौकरी के समय को इस तरह से करवा लिया जिससे वह कक्षाओं में भाग ले सके। उसके उत्साह को देखकर और बेहतर जिंदगी की संभावना का देखकर उसकी पत्नी ने भी उसका पूरा साथ दिया। उन दोनों ने मिलकर अपने पैसों और समय का बजट सफलतापूर्वक बना ही लिया।

          पिछले महीने उसे उसकी डिग्री मिल गई और अब वह एक बड़े कॉरपोरेशन में मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में काम कर रहा है।

                जहाँ चाह, वहाँ राह। 

         विश्वास करें कि यह हो सकता है। यह रचनात्मक सोच की पहली आवश्यकता है। यहाँ दो सुझाव दिए जा रहे हैं जिनकी मदद से आप अपना आत्मविश्वास बढ़ा सकते हैं और अपनी रचनात्मक सोच की शक्ति को विकसित कर सकते हैं:

         1. अपने शब्दकोश से असंभव शब्द को बाहर निकाल फेंकें। इस शब्द को कभी अपने दिमाग में या जुबान पर न लाएँ। असंभव असफलता का शब्द है। जब आप कहते हैं “यह असंभव है" तो आपके दिमाग में ऐसे विचार आ जाते हैं जो साबित कर देते हैं कि आप सही
सोच रहे हैं।

         2. किसी ऐसे काम के बारे में सोचें जिसे आप पहले कभी करना चाहते हों, परंतु उस समय आपको यह असंभव लगा हो। अब ऐसे कारणों की सूची बनाएँ कि ऐसा किस तरह संभव हो सकता है। हममें से कई लोग अपनी इच्छाओं को कोड़े मारते हैं और उन्हें हरा देते हैं क्योंकि पूरे समय हम यही सोचते रहते हैं कि हम कोई काम क्यों नहीं कर पाएँगे जबकि हमें सोचना यह चाहिए कि हम कोई काम क्यों कर सकते हैं और किस तरह से कर सकते हैं।

         हाल ही में मैंने अखबार में यह पढ़ा कि ज़्यादातर राज्यों में काउंटियों की संख्या ज़रूरत से ज्यादा है। लेख में संकेत किया गया था कि ज़्यादातर काउंटियों की सीमाएँ सदियों पुरानी हैं, उस ज़माने की हैं जब वाहन नहीं थे और जब यात्रा घोड़े और बग्घी से हुआ करती थी। परंतु आजकल काफ़ी तेज़ वाहन चलने लगे हैं और सड़कें भी अच्छी हैं, इसलिए अब यह उचित है कि तीन या चार काउंटियों को मिलाकर एक काउंटी बना दी जाए। इससे बहुत सी परेशानियाँ कम हो जाएँगी और जनता पर टैक्स का बोझ भी कम हो जाएगा।

          लेखक ने कहा कि उसके विचार से उसके दिमाग में एक शानदार विचार आया था, इसलिए उसने 30 लोगों से इंटरव्यू लिया और इस बार में उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। परिणाम- उनमें से एक आदमी ने भी यह नहीं कहा कि विचार में दम था, हालाँकि यह बात तो तय थी कि ऐसा होने पर उन्हें कम कीमत पर बेहतर स्थानीय सरकार मिल जाती।

          यह पारंपरिक सोच का एक उदाहरण है। पारंपरिक तरीके से सोचने वाले व्यक्ति के दिमाग को लकवा मार गया है। वह तर्क देता है। “ऐसा सदियों से होता आ रहा है। इसलिए यह अच्छा ही होगा और इसे ऐसे ही बने रहने देना चाहिए। बदलने का जोखिम क्यों उठाया जाए ?"

       "औसत" लोग हमेशा प्रगति से चिढ़ते हैं। कई लोगों ने तो मोटरगाड़ी का विरोध इस आधार पर किया था कि प्रकृति ने इंसान को पैदल चलने या घोड़े की सवारी करने के लिए बनाया था। कई लोगों को हवाईजहाज़ का विचार इसलिए पसंद नहीं आया था क्योंकि इंसान को पक्षियों के लिए "आरक्षित" क्षेत्र में दखल देने का कोई “अधिकार" नहीं था। बहुत से “यथास्थितिवादी" (status-quoers) अब भी मानते हैं कि इंसान की जगह अंतरिक्ष में नहीं है।

         एक चोटी के मिसाइल विशेषज्ञ ने हाल ही में इस तरह की सोच का जवाब दिया। डॉ. वॉन ब्रॉन का कहना है, "मनुष्य की जगह वहीं है, जहाँ मनुष्य जाना चाहता है।"

       1900 के आस-पास एक सेल्स एक्जीक्यूटिव ने सेल्स मैनेजमेंट का एक “वैज्ञानिक" सिद्धांत खोजा। इसका काफ़ी प्रचार हुआ और इसे पाठ्यपुस्तकों तक में शामिल कर लिया गया। यह सिद्धांत था - हर माल बेचने का एक सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा होता है। सर्वश्रेष्ठ तरीका खोज लो। और फिर उससे इधर-उधर मत हिलो।

      इस आदमी की कंपनी की किस्मत अच्छी थी, जो सही वक्त पर नए। मैनेजमेंट ने आकर डूबती हुई कंपनी को दीवालिया होने से बचा लिया। इस अनुभव के विपरीत क्रॉफ़ोर्ड एच. ग्रीनवॉल्ट की फिलॉसफी देख।। ग्रीनवॉल्ट एक बहुत बड़ी कंपनी के प्रेसिडेन्ट हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी म अपने लेक्चर में उन्होंने कहा, “एक अच्छा काम कई तरीकों से किया ज सकता है - और जितने आदमी हों, उतने ही तरीके हो सकते हैं।"

            सच तो यह है कि किसी भी काम को करने का कोई एक ही सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा नहीं होता। घर सजाने का. लॉन को लैंडस्केप करने का, या माल बेचने का या बच्चे पालने का या स्टीक पकाने का कोई एक सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा नहीं होता। जितने रचनात्मक मस्तिष्क होंगे, उतने ही सर्वश्रेष्ठ तरीके हो सकते हैं।

            कोई भी चीज़ बर्फ में नहीं उगती। अगर हम अपने दिमाग पर परंपरा की बर्फ जमने दें, तो नए विचार नहीं पनप सकते। इस प्रयोग को जल्दी ही करें। नीचे दिए गए विचार किसी को सुनाएँ और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखें।

1. डाकतार विभाग काफ़ी समय से सरकारी एकाधिकार में है, क्यों न इसे प्राइवेट कंपनियों के हवाले कर दिया जाए।

2. राष्ट्रपति के चुनाव हर चार साल की जगह दो या छह साल में होने चाहिए।

3. रिटेल स्टोर्स के खुलने का समय सुबह 9 बजे से शाम साढ़े पाँच बजे के बजाय शाम को 1 बजे से 8 बजे तक होना चाहिए।

4. रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 70 साल कर देनी चाहिए।

           ये विचार दमदार हैं या नहीं, व्यावहारिक हैं या नहीं, यह बात महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि कोई व्यक्ति इन पर क्या प्रतिक्रिया देता है। अगर वह इन विचारों पर हँसता है और उस पर गौर ही नहीं करता (और शायद 95 प्रतिशत लोग इस पर हँसेंगे) तो इस बात की संभावना है कि वह परंपरा के लक़वे से ग्रस्त है। परंतु बीस में से एक व्यक्ति यह कहेगा, “यह एक दिलचस्प विचार है। मुझे इसके बार में विस्तार से बताएँ।" और इस व्यक्ति में एक ऐसा दिमाग होगा जो रचनात्मक तरीके से सोच सकता है।

रचनात्मक सोच की सबसे बड़ी दुश्मन है- पारंपरिक सोच। जो भी व्यक्ति रचनात्मक तरीके से सफल होना सीखना चाहता है, उसे इस बारे में सावधान रहना चाहिए। पारंपरिक सोच आपके दिमाग पर बर्फ की तह जमा देती है आपकी प्रगति को रोक देती है, आपकी रचनात्मक शक्ति को विकसित नहीं देती| पारंपरिक सोच से जुझने के तीन तरीके हैं|

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Tuesday, September 10, 2019

CHAPTER. 4.3. अच्छे भाषण के लिए क्या ज़रूरी होता है?

        


   1. अच्छे भाषण के लिए क्या ज़रूरी होता है?

हर व्यक्ति चाहता है कि वह सबके सामने बढ़िया बोल सके। परंतु ज्यादातर लोगों की यह चाहत पूरी नहीं हो पाती। ज्यादातर लोग घाटया वक्ता होते हैं।

           क्यों? इसका कारण सीधा-सा है। ज्यादातर लोग बोलते समयबड़ी, महत्वपूर्ण बातों के बजाय छोटी, घटिया बातों पर ध्यान देते हैं। चर्चा की तैयारी करते समय ज़्यादातर लोग खुद को मानसिक निदेश देते रहते हैं, “मुझे सीधे खड़े रहना चाहिए," "इधर-उधर नहीं हिलना है और अपने हाथों का प्रयोग नहीं करना है,” “जनता को यह पता न चलने दें कि आप नोट्स की मदद ले रहे हैं," “याद रखें, ग्रामर की ग़लती न होने दें," "इस बात का ध्यान रखें कि आपकी टाई सीधी रहे," “ज़ोर से बोलें, पर ज़्यादा ज़ोर से नहीं।” इत्यादि।

          अब जब वक्ता बोलने के लिए खड़ा होता है तो क्या होता है ? वह डरा हुआ होता है क्योंकि उसने अपने दिमाग में एक सूची बना ली है कि उसे क्या चीजें नहीं करनी चाहिए। क्या मैंने कोई गलती कर दी है ?' संक्षेप में, वह फ्लॉप हो जाता है। वह इसलिए फ्लॉप होता है क्योंकि उसने एक अच्छे वक्ता के छोटे, घटिया, तुलनात्मक रूप से महत्वहीन गुणों पर ध्यान केंद्रित किया है और अच्छे वक्ता के बड़े गुणों पर ध्यान केंद्रित नहीं किया है : जिस बारे में आप बोलने जा रहे हैं, उसका ज्ञान और दूसरे लोगों को बताने की उत्कट इच्छा।

            अच्छे वक्ता का असली इम्तहान इस बात में नहीं होता कि वह सीधा खड़ा होता है या नहीं, वह ग्रामर में गलतियाँ करता है या नहीं, बल्कि इस बात में होता है कि वह जनता तक अपनी बात अच्छी तरह से पहुँचा पाता है या नहीं। हमारे ज़्यादातर चोटी के वक्ताओं में कई सारे दोष होते हैं, कइयों की तो आवाज़ ही खराब है। अमेरिका के बहुत से प्रसिद्ध वक्ताओं को तो अगर भाषण देने की परीक्षा में बिठाया जाए कि "क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए" तो उनमें से कई तो फेल हो जाएँगे।

          परंतु इन सभी सफल सार्वजनिक वक्ताओं में एक बात पाई जाती है। उनके पास कहने को कुछ होता है और उनमें दूसरे लोगों को अपनी बात बताने की प्रबल इच्छा होती है।

         छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देकर जनता में सफलता से बोलने की कला को प्रभावित न होने दें।

2. झगड़े की वजह क्या होती है?

कभी आपने खुद से यह सवाल किया है कि आख़िर झगड़े की वजह क्या होती है? 99 प्रतिशत मामलों में झगड़े छोटी-छोटी, महत्वहीन बातों से शुरू होते हैं, जैसे : जॉन थोड़ा थका हुआ, तनाव में घर लौटता है। डिनर में उसे मज़ा नहीं आता और वह शिकायत करने लगता है। उसकी पत्नी जोन का दिन भी अच्छा नहीं गुज़रा, इसलिए वह आत्मरक्षा में कह देती है, "इस बजट में मैं इससे अच्छा खाना कैसे बनाऊँ ?" या "अगर हमारे पास बाक़ी सबकी तरह नया गैस स्टोव हो, तो मैं इससे बेहतर खाना पका सकती हूँ।" इससे जॉन का गर्व आहत हो जाता है और वह बदले में जोन पर हमला कर देता है, "देखो, जोन, सवाल पैसे की कमी का नहीं है, सवाल इस बात का है कि तुम्हें घर चलाना आता ही नहीं है।" 

             और फिर लड़ाई शुरू हो जाती है! जब तक शांति स्थापित होती है, तब तक दोनों ही पक्ष एक-दूसरे पर तरह-तरह के आरोप लगा चुके होते हैं। एक-दूसरे के माँ-बाप, सेक्स, पैसे, शादी से पहले के वादे, शादी के बाद के वादे और इसी तरह के दूसरे मामलों को बीच में लाया जाता है। दोनों ही दल युद्ध में तनावग्रस्त और नर्वस होते हैं। दोनों के मतभेद पूरी तरह नहीं सुलझ पाते और दोनों को ही अपनी अगली लड़ाई में इस्तेमाल करने के लिए नए हथियार मिल जाते हैं। छोटी-छोटी चीज़ों की वजह से, छोटे चिंतन की वजह से ज़्यादातर झगड़े होते हैं। इसलिए झगड़ों से अगर आप बचना चाहते हैं, तो आपको छोटे चिंतन से बचना होगा।

           यहाँ एक आज़माई हुई तकनीक बताई जा रही है। किसी की शिकायत करने से पहले, उस पर आरोप लगाने से पहले, उसे डाँटने से पहले, आत्मरक्षा में उस पर हमला करने से पहले, खुद से पूछे, “क्या यह वास्तव में महत्वपूर्ण है ?" ज़्यादातर मामला महत्वपूर्ण होता ही नहीं है और आप झगड़े से बच जाते हैं।

           खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है कि उसकी सिगरेट की राख बिखर गई या उसने टूथपेस्ट का ढक्कन नहीं लगाया या वह शाम को देर से घर लौटा?"

           "क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है कि उसने थोड़ा पैसा उड़ा दिया है या उसने कुछ ऐसे लोगों को घर पर बुलवा लिया है जिन्हें मैं पसंद नहीं करता?"

           जब आप नकारात्मक क्रिया करने वाले हों, तो खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?" इस सवाल में जादू है और यह आपके घर का माहौल सुधार सकता है। यह ऑफ़िस में भी काम करता है। जब आपके सामने वाला ड्राइवर आपके सामने कट मारता है तो यह ट्रैफिक में भी काम करता है। यह जिंदगी की किसी भी ऐसी परिस्थिति में काम करता है जिसमें झगड़े का अंदेशा हो।

  3. जॉन को सबसे छोटा ऑफ़िस मिला और वह बर्बाद हो गया

     .   कुछ साल पहले, मैंने देखा कि छोटे चिंतन के कारण किस तरह एक आदमी का एड्वर्टाइज़िंग के क्षेत्र में अच्छी संभावनाओं वाला करियर तबाह हो गया।

              विज्ञापन कंपनी में समान पदों पर कार्यरत चार युवा एक्जीक्यूटिब्ज़ को नए ऑफ़िस दिए गए। तीन ऑफ़िस तो आकार-प्रकार एवं साज-सज्जा में एक-से थे, परंतु चौथा ऑफ़िस थोड़ा छोटा था। 

             जे.एम. को चौथा ऑफ़िस दिया गया। इससे उसका गर्व आहत हआ। तत्काल उसे महसूस हुआ कि उसके साथ भेदभाव किया गया है। नकारात्मक चिंतन, गुस्सा, कड़वाहट, ईर्ष्या ने उसके दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया। जे.एम. को लगने लगा कि लोग उसे कम योग्य समझते हैं। परिणाम यह हुआ कि जे.एम. अपने साथी एक्जीक्यूटिब्ज़ के प्रति शत्रुता.रखने लगा। सहयोग करने के बजाय वह उनके प्रयासों को विफल करने.की कोशिश करने लगा। माहौल बिगड़ता गया। तीन महीने बाद जे.एम. का व्यवहार इतना ख़राब हो गया कि मैनेजमेंट के पास उसे हटाने के सिवा कोई चारा ही नहीं बचा।

             एक छोटी-सी बात पर बुरा मानने के कारण जे.एम. का करियर तबाह हो गया। भेदभाव के बारे में सोचने की उसे इतनी जल्दी थी कि वह यह नहीं देख पाया कि कंपनी तेज़ी से विकास कर रही थी और ऑफ़िस में जगह की कमी थी। उसने यह नहीं सोचा कि जिस एक्जीक्यूटिव ने ऑफ़िस बाँटे थे, उसे तो यह भी नहीं पता था कि कौन-सा ऑफ़िस छोटा है और कौन-सा बड़ा। सिवाय जे.एम. के कंपनी में और किसी भी आदमी को ऐसा नहीं लगा कि उसके छोटे ऑफ़िस से उसकी इज़्ज़त घट गई हो।

            महत्वहीन बातों पर छोटी सोच से आप आहत हो सकते हैं जैसे आपका नाम डिपार्टमेंट की सूची में सबसे आखिर में लिख दिया जाए या आपको ऑफ़िस के किसी मेमो की चौथी कार्बन कॉपी दी जाए। बड़ा सोचें और इन छोटी-छोटी बातों का बुरा मानना छोड़ दें।

4. हकलाने के बावजूद सफलता पाई जा सकती है

एक सेल्स एक्जीक्यूटिव ने मुझे बताया कि अगर सेल्समैन में दूसरे गुण हो, तो सेल्समैनशिप में हकलाने के बावजूद सफलता पाई जा सकती है।

            "मेरा एक दोस्त भी सेल्स एक्जीक्यूटिव है और वह मज़ाकिया स्वभाव का है। कुछ महीने पहले मेरे इस मज़ाकिया दोस्त के पास एक युवक आया और उससे सेल्समैन की नौकरी माँगी। इस युवक को हकलाने की आदत थी और मेरे दोस्त ने फैसला किया कि वह मेरे साथ मज़ाक कर सकता है। इसलिए मेरे दोस्त ने इस हकलाने वाले उम्मीदवार से कहा कि उसे तो सेल्समैन की ज़रूरत नहीं है, परंतु उसके एक दोस्त (यानी कि मुझे) को एक सेल्समैन की ज़रूरत है। फिर उसने मुझे फोन किया और मुझसे उस युवक की इतनी तारीफ़ कर दी कि मुझे कहना ही पड़ा. 'उसे अभी मेरे पास भेज दो!'

          "तीस मिनट बाद वह युवक मेरे सामने खड़ा था। उसके तीन शब्द बोलने से पहले ही मैं समझ गया कि मेरे दोस्त ने उसे मेरे पास क्यों भेजा था, 'मैं-मैं-मैं ज-ज-जैक आर.' उसने कहा, 'मिस्टर एक्स ने मुझे आपके पास नौ-नौकरी के लिए भे-भेजा है।' हर शब्द बोलने के लिए उसे संघर्ष करना पड़ रहा था। मैंने खुद से सोचा, 'यह आदमी एक डॉलर के नोट को वॉल स्ट्रीट में 90 सेंट में भी नहीं बेच पाएगा।' मुझे अपने दोस्त पर गुस्सा आया, परंतु मुझे उस युवक से सच्ची हमदर्दी भी थी इसलिए मैंने सोचा कि कम से कम उससे कुछ विनम्र प्रश्न तो पूछ लिए जाएँ ताकि मैं कोई अच्छा-सा बहाना बना सकूँ कि मैं उसे काम पर क्यों नहीं रख सकता।

            “चर्चा के दौरान मैंने पाया कि यह आदमी काम का था। उसमें बुद्धि थी। उसमें आत्मविश्वास था, परंतु इसके बावजूद मैं इस तथ्य को नहीं पचा पाया कि वह हकलाता था। आखिरकार मैंने उससे इंटरव्यू का आख़िरी सवाल करने का फैसला किया, 'आपने यह कैसे सोचा कि आप इस जॉब में सफल हो पाएँगे?'

            उसने जवाब दिया, "मैं तेज़ी से सीख सकता हूँ. मैं-मैं-मैं लोगों को पसंद करता हूँ, मैं-मैं-मैं सोचता हूँ कि आपकी कंपनी अच्छी है और मैं-मैं-मैं पैसे कमाना चाहता हूँ। अभी मे-मे-मेरे साथ हकलाने की समस्या है, परंतु इससे मु-मु-मुझे कोई परेशानी नहीं है, इसलिए मु-मु-मुझे नहीं लगता कि इससे किसी और को भी कोई परेशानी होगी।”

“उसके जवाब ने मुझे बता दिया कि उसके पास सेल्समैन बनने की सचमुच महत्वपूर्ण योग्यता थी। मैंने तत्काल उसे मौक़ा देने का फैसला कर लिया और आपको यह जानकर हैरत होगी कि वह एक सफल सेल्समैन बन चुका हैं|

            अगर बाक़ी बड़ी योग्यताएँ हों, तो बोलने वाले व्यवसाय में हकलाने की आदत भी आपकी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती। 
      

             इन तीन उपायों का अभ्यास करें ताकि आप छोटी-छोटी बातों के बारे में सकारात्मक रूप से सोच सकें :

           1. अपनी नज़र बड़े लक्ष्य पर लगाए रखें। कई बार हम उस सेल्समैन की तरह होते हैं जो सामान बेचने में असफल रहने के बाद अपने मैनेजर को बताता है, "परंतु मैंने ग्राहक के सामने साबित कर दिया कि वह ग़लती पर था।" बेचने में बड़ा लक्ष्य सामान बेचना होता है, बहस में जीतना नहीं होता।

           शादी में बड़ा लक्ष्य शांति, सुख, खुशी होता है- बहस में जीतना नहीं होता या यह कहना नहीं होता, "मैं तुम्हें यह बात पहले ही बता सकता था।"

            कर्मचारियों के साथ काम करते समय, बड़ा लक्ष्य उनकी पूरी क्षमता का उपयोग करना होता है- छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें नीचा दिखाना नहीं होता।

           पड़ोसियों के साथ बड़ा लक्ष्य आपसी सम्मान और दोस्ती होता है- यह देखना नहीं होता कि उनका कुत्ता कभी-कभार रात में भौंकता है, इसलिए उस कुत्ते को जंगल में छोड़ देना चाहिए।

           मिलिट्री की भाषा में कहा जाए तो संग्राम में हारकर युद्ध जीतना बेहतर होता है, संग्राम को जीतकर युद्ध हारना अच्छा नहीं होता।

             अपनी नज़र को बड़े लक्ष्य पर जमाए रखें।

         2. खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?" नकारात्मक रूप से उत्तेजित होने के बजाय अपने आप से पूछे, "क्या यह मामला इतना महत्वपूर्ण है कि मैं इस बारे में इतनी चिंता करूँ?" अगर आप खुद से यह सवाल पूछेगे तो आप छोटे-छोटे मामलों पर कुंठित होने से बच सकते हैं। अगर हम झगड़े की परिस्थितियों में खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?" तो हम कम से कम 90 प्रतिशत झगड़ों से बच सकते हैं।

           3. छोटेपन के जाल में न फँसें। भाषण देते समय समस्याएँ पैदा करने के बजाय समस्याएँ सुलझाएँ। कर्मचारियों को सलाह देते समय उन्हीं बातों पर ध्यान केंद्रित करें, जो महत्वपूर्ण हैं, जिनसे फ़र्क पड़ता है। सतही मुद्दों में उलझकर न रह जाएँ। महत्वपूर्ण चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करें।

अपनी सोच का आकार नापने के लिए यह टेस्ट दें

नीचे बाएँ कॉलम में कुछ आम स्थितियाँ दी गई हैं। बीच वाले और दाएँ कॉलम में यह तुलना की गई है कि इसी स्थिति का सामना छोटे चिंतक और बड़े चिंतक किस तरह करते हैं। खुद ही देख लें। फिर फ़ैसला करें कि जहाँ मैं जाना चाहता हूँ वहाँ मैं किस रास्ते पर चलकर पहुँच सकता हूँ ? छोटे चिंतन से या बड़े चिंतन से?

एक ही परिस्थिति का सामना दो तरीक़ों से किया जा सकता है। फ़ैसला आपके हाथ में है।




याद रखें, बड़ी सोच से हर तरह से फ़ायदा होता है!

1. अपने आपको सस्ते में न बेचें। खुद के कम मूल्यांकन का अपराध कभी न करें। अपने गुणों, अपनी योग्यताओं पर ध्यान केंद्रित करें। यह जान लें, आप जितना समझते हैं. आप उससे कहीं बेहतर हैं।

2. बड़े चिंतक की शब्दावली का प्रयोग करें। बड़े, चमकीले, आशावादी शब्दों का प्रयोग करें। ऐसे शब्दों का प्रयोग करें जिनसे विजय, आशा, सुख, आनंद के भाव निकलते हों। ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें जिनसे असफलता, हार, दुःख के निराशाजनक चित्र बनते हों।

3. अपनी दृष्टि को विस्तार दें। सिर्फ यह न देखें कि क्या है, बल्कि यह भी देखें कि क्या होसकता है। चीज़ों, लोगों और खुद का मूल्य बढ़ानेका अभ्यास करें।

4. अपनी नौकरी के बारे में बड़ा दृष्टिकोण रखें। सोचें, सचमुच सोचें कि आपकी वर्तमान नौकरी महत्वपूर्ण है। आप अपनी वर्तमान नौकरी के बारे में क्या सोचते हैं इसी बात पर आपका अगला प्रमोशन निर्भर करता है।

5. छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठें। अपने ध्यान को बड़े लक्ष्यों पर लगाएँ। छोटे मामलों में उलझने के बजाय खुद से पूछे, “क्या यह सचमुच महत्वपूर्ण है ?"

          बड़ा सोचकर बड़े बन जाएँ!

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Sunday, September 8, 2019

CHAPTER 4.2. यह न देखें कि क्या है, यह देखें कि क्या हो सकता है

       यह न देखें कि क्या है, यह देखें कि क्या हो सकता है


बड़े चिंतक सिर्फ यही नहीं देखते कि क्या है, वे यह भी देख सकते हैं कि क्या हो सकता है। यहाँ पर चार उदाहरण दिए जा रहे हैं कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।

           1. रियल एस्टेट की कीमत कैसे बढ़ती है? एक बेहद सफल रिएल्टर, जो ग्रामीण इलाके की जायदाद का विशेषज्ञ है, का कहना है कि अगर हम भविष्य की कल्पना कर सकें, तो इससे हमें बहुत लाभ हो सकता है। जहाँ आज कुछ नहीं है, वहाँ कल क्या हो सकता है, इस बात की कल्पना करना हमें सीखना चाहिए।

            मेरे दोस्त ने कहा, "ग्रामीण इलाक़ा होने के कारण यहाँ ज्यादातर ज़मीन-जायदाद बहुत आकर्षक नहीं होती। मैं इसलिए सफल हुआ हूँ क्योंकि मैं अपने ग्राहकों को यह नहीं बताता कि उनके फ़ार्म की हालत अभी कैसी है।

         "मैं अपने पूरे सेल्स प्लान को इस बात के चारों तरफ़ बनाता हूँ कि यह फ़ार्म भविष्य में क्या बन सकता है। ग्राहक को अगर मैं सीधे तरीके से यह बताऊँ, 'इस फ़ार्म में इतने एकड़ जमीन, इतने एकड़ पेड़ हैं और यह शहर से इतने मील दूर है' तो इससे वह उत्साहित नहीं होगा और इसे कभी नहीं ख़रीदेगा। परंतु जब मैं उसे एक ऐसी योजना बताता हूँ कि वह इस फ़ार्म पर क्या-क्या कर सकता है, तो वह इस फ़ार्म को खुशी-खुशी खरीद लेता है। मैं आपको बताता हूँ कि मैं ऐसा किस तरह करता हूँ।"

            उसने अपना ब्रीफ़केस खोला और एक फ़ाइल निकाली। “यह फ़ार्म," उसने कहा, "अभी-अभी हमारे पास आया है। यह भी बाक़ी फ़ार्मों की तरह है। यह शहर से 43 मील की दूरी पर है। इसका घर टूटी-फूटी हालत में है और पिछले पांच साल से यहाँ खेती नहीं हुई है। अब मैं आपको यह बताता हूँ कि मैंने क्या किया है। मैंने इस जगह का पूरा अध्ययन करने के लिए पिछले सप्ताह यहाँ दो दिन गुज़ारे। मैंने इस पूरी जगह के कई चक्कर लगाए। मैंने पड़ोसी फ़ार्मों को भी देखा। मैंने वर्तमान और प्रस्तावित हाइवे प्लान के संदर्भ में भी फ़ार्म की लोकेशन को देखा। मैंने खुद से पूछा, 'यह फ़ार्म किस बड़े काम के लिए उपयुक्त है ?'

             "मुझे इसमें तीन संभावनाएँ दिखीं। मैंने तीनों की योजना बना ली।" उसने मुझे हर योजना दिखाई। हर योजना स्पष्ट थी और विस्तार से बनी थी। एक प्लान में सुझाव दिया गया था कि फ़ार्म को घुड़सवारी के अस्तबल में बदल दिया जाए। इस प्लान में बताया गया था कि विचार दमदार है : शहर बढ़ रहा है, लोग गाँव को ज्यादा पसंद करने लगे हैं,लोग मनोरंजन पर ज्यादा ख़र्च करने लगे हैं, सड़कें अच्छी हैं। इस पर में बताया गया था कि किस तरह यहाँ पर काफ़ी घोड़े रखे जा सकते है जिससे घुड़सवारी से काफ़ी आमदनी की जा सकती है। घुड़सवारी के अस्तबल का विचार काफ़ी अच्छा और प्रेरक था। योजना को स्पष्ट विस्तृत और दमदार होना चाहिए, मैं "देख" सकता था कि पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए एक दर्जन दंपति घुड़सवारी का आनंद ले रहे थे।'

           इसी तरीके से इस मेहनती सेल्समैन ने दूसरी विस्तृत योजना बनाई कि किस तरह इसे वृक्षों के फ़ार्म में बदला जा सकता है और तीसरी योजना थी कि यहाँ पर वृक्षों के फार्म के साथ-साथ पोल्ट्री फार्म भी शुरू किया जा सकता है।

           “अब, जब मैं अपने ग्राहकों से चर्चा करता हूँ तो मुझे उन्हें यह विश्वास नहीं दिलाना होता कि इसकी वर्तमान हालत में इस फ़ार्म को ख़रीदना एक अच्छा सौदा है। मैं उन्हें एक ऐसी तस्वीर दिखाता हूँ जिसमें फ़ार्म पैसा बनाने वाला व्यवसाय बन जाता है।

           “इससे मैं न सिर्फ़ ज़्यादा फ़ार्म बेच सकता हूँ और ज़्यादा तेज़ी से बेच सकता हूँ, बल्कि जायदाद बेचने के मेरे तरीके का एक और फायदा भी है। मैं अपने प्रतियोगियों से ज्यादा कीमत पर फ़ार्म बेच सकता हूँ। लोग ज़मीन और एक विचार के लिए जो क़ीमत देते हैं वह सिर्फ़ ज़मीन के लिए दी गई क़ीमत से स्वाभाविक तौर पर ज़्यादा होती है। इसी कारण ज़्यादातर लोग अपने फ़ार्मों को मेरे यहाँ से बेचना चाहते हैं और हर बिक्री पर मेरा कमीशन बढ़ता जाता है।'

          इसका संदेश यह है : वर्तमान में चीजें कैसी हैं, यह देखने के बजाय यह देखें कि वे भविष्य में कैसी हो सकती हैं। कल्पनाशक्ति से हर चीज़ ज़्यादा कीमती बन जाती है। बड़ा चिंतक हमेशा इस बात की कल्पना कर लेता है कि भविष्य में क्या किया जा सकता है। वह केवल वर्तमान में ही नहीं उलझा रहता।

         2. एक ग्राहक का कितना मूल्य होता है? एक डिपार्टमेंट स्टोर एक्जीक्यूटिव मैनेजरों की मीटिंग को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा, “हालाँकि मेरे विचार आपको पुराने जमाने के लगेंगे, परंतु मैं उस विचारधारा की है कि अगर आप अपने ग्राहकों से दोस्ताना, शालीन व्यवहार करेंगे तो वे बार-बार आपके पास आएंगे। एक दिन मैं अपने स्टोर में घूम रही थी। मैंने अपने सेल्समैन को एक ग्राहक से बहस करते सुना। ग्राहक गुस्से में बाहर चला गया।

         "इसके बाद, सेल्समैन ने दूसरे सेल्समैन से कहा, 'मैं 1.98 डॉलर के ग्राहक के पीछे अपना समय क्यों ख़राब करूँ। उसकी ज़रूरत के सामान के लिए पूरे स्टोर को क्यों छायूँ ? वह इस काबिल ही नहीं है।"

           “मैं वहाँ से चली आई," एक्जीक्यूटिव ने कहा, “परंतु मैं अपने दिमाग़ से उस बात को नहीं निकाल पाई। मैंने सोचा कि यह बहुत गंभीर मामला है जब हमारे सेल्समैन अपने ग्राहकों को 1.98 की श्रेणी में रखते हैं। मैंने तभी यह फैसला किया कि सोच के इस ढंग को बदलना होगा। जब मैं वापस अपने ऑफ़िस में पहुंची, तो मैंने अपने रिसर्च डायरेक्टर को बुलाया और उससे पूछा कि हमारे स्टोर में पिछले साल औसत ग्राहक ने कितने पैसे का माल ख़रीदा। उसने मुझे जो आँकड़ा बताया, उससे मुझे भी हैरत हुई। हमारे रिसर्च डायरेक्टर के आँकड़ों के हिसाब से औसत ग्राहक ने हमारे स्टोर से 362 डॉलर का सामान खरीदा।

          "इसके बाद मैंने अपने सुपरवाइज़र्स की मीटिंग बुलाई और उन्हें यह घटना बताई। फिर मैंने उन्हें यह बताया कि हमारे ग्राहक का मूल्य वास्तव में कितना है। एक बार मैंने जब इन लोगों को यह समझा दिया कि किसी ग्राहक को एक बार की खरीदारी के हिसाब से नहीं तौलना चाहिए बल्कि सालाना खरीदारी के हिसाब से तौलना चाहिए, तो हमारे स्टोर में ग्राहकों के प्रति दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया।”

         रिटेलिंग एक्जीक्यूटिव की यह बात किसी भी तरह के बिज़नेस पर लागू होती है। बार-बार के बिज़नेस में लाभ होता है। अक्सर, कई धंधों में शुरुआत में तो कोई लाभ ही नहीं होता। ग्राहकों की भविष्य की खरीद को देखें, यह न देखें कि वे वर्तमान में क्या खरीद रहे हैं।

         ग्राहकों को मूल्यवान समझने से वे बड़े, नियमित संरक्षकों में बदल जाते हैं। ग्राहकों को तुच्छ समझने से वे किसी दूसरी जगह से सामान खरीदने लगते हैं। एक विद्यार्थी ने एक बार मुझे यह महत्वपूर्ण घटना सुनाई और बताया कि वह एक रेस्तराँ में कभी नाश्ता क्यों नहीं करता |

          "एक दिन लंच के लिए,” विद्यार्थी ने कहा, “मैंने एक नए रेस्त में जाने का फैसला किया। यह रेस्तराँ दो सप्ताह पहले ही खुला था। और लिए अभी पैसा बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए मैं सुनिश्चित कर लेता हैं कि मैं जो खरीद रहा हूँ, उसकी कीमत क्या है। मीट सेक्शन के पास से गुज़रते समय मैंने टर्की को देखा और उस पर कीमत डली थी 39 सेंट।

            "जब मैं कैश रजिस्टर के पास गया, तो चेकर ने मेरी ट्रे को देखा और कहा “1.09' मैंने विनम्रता से उससे दुबारा चेक करने को कहा. क्योंकि मेरे हिसाब से बिल 99 सेंट का होना चाहिए था। मेरी तरफ़ घूरने के बाद उसने फिर से हिसाब जोड़ा। हिसाब में जो अंतर आ रहा था वह टर्की की कीमत के कारण था। उसने 39 सेंट की जगह मुझसे 49 सेंट लिए थे। फिर मैंने उसका ध्यान उस साइनबोर्ड की तरफ़ खींचा जिसमें लिखा हुआ था 39 सेंट।

            "इससे वह भड़क गई। 'मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि साइनबोर्ड पर क्या लिखा है। इसका दाम है 49 सेंट। देखिए। यह रही आज की मूल्य सूची। किसी ने शायद ग़लती से वहाँ पर साइनबोर्ड लगा दिया होगा। आपको 49 सेंट ही देने होंगे।'

            "फिर मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि मैंने टर्की ली ही इसलिए थी क्योंकि इसका मूल्य 39 सेंट था। अगर इसका मूल्य 49 सेंटहोता तो मैं इसकी जगह कोई दूसरी चीज़ ले लेता।

           "इसके बाद भी उसका जवाब था, 'चाहे जो हो, आपको 49 सेंट देने होंगे।' मैंने ऐसा ही किया क्योंकि मैं वहाँ खड़े रहकर तमाशा खड़ा नहीं करना चाहता था। परंतु मैंने उसी समय यह फैसला भी कर लिया कि मैं दुबारा उस रेस्तराँ में नहीं जाऊँगा। मैं हर साल लंच पर 250 डॉलर। खर्च करता हूँ और यह बात तो पक्की है कि मैं उस रेस्तराँ में एक पाई भी ख़र्च नहीं करूँगा।"

          यह छोटे नज़रिए का एक उदाहरण है। चेकर ने कीमत काछोटा-सा अंतर ही देखा, उसने संभावित 250 डॉलर की सेल नहीं देखी |

         3. अंधे दूध वाले का मामला। हैरत की बात है कि लोग किस तरह भावी संभावना के प्रति अंधे होते हैं। कुछ साल पहले एक युवा दूध वाला हमारे घर पर दूध के बिज़नेस के सिलसिले में आया। मैंने उसे समझाया कि हमारा दूध वाला अच्छा दूध देता है और हम उसकी सेवाओं से संतुष्ट हैं। फिर मैंने उसे सुझाव दिया कि वह पड़ोस की महिला से पूछ ले।

           इसके जवाब में उसने कहा, “मैंने पड़ोस की महिला से पहले ही बात कर ली है, परंतु वे लोग दो दिन में एक क्वार्ट दूध ही लेते हैं और मैं इतनी कम रक़म के लिए यहाँ रुकूँ यह फ़ायदे का सौदा नहीं होगा।"

           "शायद आपकी बात सही हो,” मैंने कहा, “परंतु जब आप मेरी पड़ोसन से बात कर रहे थे, तो आपने यह नहीं देखा कि उस घर में दूध की माँग एक-दो महीने में बढ़ने वाली है? उनके यहाँ बच्चा पैदा होने वाला है, जो निश्चित रूप से काफ़ी दूध पिएगा।"

           उस युवक ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे उसे घुसा मार दिया गया हो और फिर उसने कहा, “कोई इंसान कितना अंधा हो सकता है ?"

           कभी जो परिवार दो दिन में एक क्वार्ट दूध खरीदता था, आज वही परिवार दो दिन में 7 क्वार्ट दूध ख़रीदता है, परंतु वह दूध वाला भविष्यदर्शी नहीं था। उस छोटे बच्चे के अब दो छोटे भाई और एक छोटी बहन और हो चुके हैं। और मुझे जानकारी मिली है कि उनके यहाँ एक और बच्चा पैदा होने वाला है।

           हम कितने अंधे हो सकते हैं? इसलिए यह देखें कि क्या हो सकता है, सिर्फ यही न देखें कि क्या है।

           जो स्कूल टीचर जिमी के सिर्फ़ वर्तमान व्यवहार के बारे में सोचेगा वह यही सोचेगा कि जिमी बदतमीज़, पिछड़ा और गँवार है। परंतु अगर टीचर ऐसा सोचेगा तो इससे जिमी का विकास नहीं हो पाएगा। परंतु जो टीचर जिमी की संभावनाओं को देख सकेगा वही उसका विकास कर पाएगा।

          ज़्यादातर लोग 'स्किड रो' से गुज़रते समय केवल हारे हुए शराबियों को देख पाते हैं। परंतु कुछ निष्ठावान लोग 'स्किड रो' से गुज़रते समय एक सुधरे हुए नागरिक की संभावना को भी देख सकते हैं। और चूंकि वे भविष्य की संभावना को देख पाते हैं, इसलिए वे यहाँ पर एक सफल सुधार कार्यक्रम शुरू कर पाते हैं।

           4. कौन सी चीज़ आपका मूल्य तय करती है ? कुछ सप्ताह पहले एक प्रशिक्षण सत्र के बाद एक युवक मुझसे मिलने आया और उसने मुझसे कहा कि वह मेरे साथ कुछ मिनट बात करना चाहता है। मैं इस युवक को जानता हूँ। इसकी उम्र अभी 26 साल है और यह बहुत ही गरीब घर से आया था। इसके अलावा मैं यह भी जानता था कि इसके शुरुआती वयस्क जीवन में इस पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा था। मैं यह भी जानता था कि वह ठोस भविष्य के लिए खुद को तैयार करने का सच्चा प्रयास कर रहा था।

            कॉफ़ी पीते हुए हमने उसकी तकनीकी समस्या का हल ढूँढ लिया और फिर हमारी चर्चा इस तरफ़ मुड गई कि किस तरह गरीब लोग भविष्य के प्रति आशावादी नज़रिया रख सकते हैं। उसकी बातों ने इस सवाल का सीधा और बढ़िया जवाब दे दिया।

             “मेरे पास बैंक में 200 डॉलर हैं। क्लर्क की मेरी नौकरी में तनख्वाह ज़्यादा नहीं है और न ही यह कोई ज़िम्मेदारी वाली नौकरी है। मेरी कार चार साल पुरानी है और मैं अपनी पत्नी के साथ दूसरी मंज़िल के एक छोटे-से अपार्टमेंट में रहता हूँ।

             “परंतु, प्रोफ़ेसर,” उसने कहा, "मैंने तय कर लिया है कि मेरे पास जो नहीं है, उसे मैं अपनी राह में बाधा नहीं बनने दूंगा।"

            मैं उसकी बात पूरी तरह नहीं समझ पाया इसलिए मैंने उसे विस्तार से उसका पूरा मतलब समझाने के लिए कहा।

            “देखिए,” उसने कहा, “मैं काफ़ी समय से लोगों का अध्ययन कर रहा हूँ और मैंने यह पाया है : जो लोग गरीब होते हैं वे अपने वर्तमान को देखते हैं। वे सिर्फ अपने वर्तमान को ही देख पाते हैं। वे भविष्य को नहीं देख पाते, वे सिर्फ अपने घटिया वर्तमान को ही देख पाते हैं। 

             “मेरे पड़ोसी का उदाहरण लें। वह लगातार रोता रहता है कि उसकी तनख्वाह कम है, उसकी छत लगातार टपकती रहती है, प्रमोशन किसी दूसरे व्यक्ति को मिल जाते हैं, डॉक्टर के बिल लगातार बढ़त जा रहे हैं। वह लगातार खुद को याद दिलाता रहता है कि वह गरीब है और इसलिए वह यह मान लेता है कि वह हमेशा ग़रीब ही बना रहेगा। वह इस तरह व्यवहार कर रहा है जैसे उसे जिंदगी भर उसी टूटे-फूटे अपार्टमेंट में रहने की सज़ा मिली हो।"

            मेरा दोस्त अपने दिल की बात बोल रहा था और एक पल रुकने के बाद उसने आगे कहा, “अगर मैं अपने वर्तमान की तरफ़ देखें - पुरानी कार, कम तनख्वाह, सस्ता अपार्टमेंट और हैमबर्गर का भोजन - तो मैं भी जल्दी ही निराश हो जाऊँगा। मैं देखूगा कि मेरी हस्ती कुछ नहीं है और मैं जिंदगी भर बिना हस्ती वाला आदमी बना रहूँगा।

            "परंतु मैं अपने भविष्य की कल्पना करता हूँ। मैं यह देखता हूँ कि मैं कुछ साल बाद क्या बन सकता हूँ। मैं अपने आपको क्लर्क के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक्जीक्यूटिव के रूप में देखता हूँ। मैं अपने छोटे अपार्टमेंट को नहीं देखता हूँ, बल्कि मैं बढ़िया नए उपनगरीय घर को देखता हूँ। और जब मैं अपने भविष्य को इस तरह से देखता हूँ तो मैं ज़्यादा बड़ा अनुभव करता हूँ और बड़ा सोच पाता हूँ। और मेरे पास
इस बात का बहुत अनुभव है कि इससे फायदा होता है।"

           क्या यह खुद को मूल्यवान बनाने की बढ़िया योजना नहीं है ? यह युवक वास्तव में अच्छी जिंदगी की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रहा है। उसने सफलता के इस मूलभूत सिद्धांत को अपने जीवन में उतार लिया है : आपके पास क्या नहीं है, यह महत्वपूर्ण नहीं होता। इसके बजाय यह महत्वपूर्ण होता है कि आपके पास भविष्य में क्या होगा।

            दुनिया हम पर कीमत का जो टैग लगाती है वह उस टैग के अनुरूप ही होता है जो हम खुद पर लगाते हैं।

             यहाँ आपको यह बताया जा रहा है कि आप किस तरह अपने भविष्य की शक्ति को विकसित कर सकते हैं, यानी आप अपनी संभावनाओं को किस तरह देख सकते हैं। मैं इन्हें “मूल्य बढ़ाने वाले अभ्यास" कहता हूँ।

              1. चीज़ों का मूल्य बढ़ाने का अभ्यास करें। रियल एस्टेट का उदाहरण याद करें। खुद से पूछे, “किस तरह मैं इस कमरे या इस घर या इस बिज़नेस का मूल्य बढ़ा सकता हूँ?" चीज़ों का मूल्य बढ़ाने के लिए विचार खोजें। कोई भी चीज़ चाहे वह खाली प्लॉट हो, घर हो या बिजनेसहो, उसका मूल्य वही होता है जो उसके प्रयोग के विचार में छुपा होता है।

           2. लोगों का मूल्य बढ़ाने का अभ्यास करें। जब आप सफलता ही दनिया में ऊपर और ऊपर जाएँगे तो आपके पास ज़्यादातर काम “लोगों का विकास” करना होगा। खुद से पूछे, “मैं किस तरह अपने अधीनस्थों का 'मूल्य बढ़ा सकता हूँ?' मैं किस तरह उन्हें ज़्यादा प्रभावी बना सकता हूँ?" याद रखें, किसी व्यक्ति से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवाने के लिए आपको उसकी सर्वश्रेष्ठ क्षमताओं की कल्पना करनी होती है।

            3. खुद का मूल्य बढ़ाने का अभ्यास करें। खुद के साथ हर रोज़ एक इंटरव्यू रखें। खुद से पूछे, “आज मैं अपने आपको अधिक मूल्यवान बनाने के लिए क्या कर सकता हूँ?" अपने मूल्य की कल्पना अपने वर्तमान से न करें, इस बात से न करें कि आप आज क्या हैं, बल्कि अपने मूल्य की कल्पना अपने भविष्य से करें, इस बात से करें कि आप क्या बन सकते हैं। फिर उस संभावित मूल्य को हासिल करने के तरीके अपने आप आपके दिमाग में आ जाएँगे। कोशिश करके देखें।

मध्यम आकार की प्रिंटिंग कंपनी (60 कर्मचारी) के रिटायर्ड मालिक-मैनेजर ने मुझे बताया कि उसने अपना उत्तराधिकारी कैसे चुना।

           “पाँच साल पहले,” उसने कहा, “मुझे अकाउंटिंग और ऑफ़िस के बाक़ी काम के लिए अकाउंटेंट की ज़रूरत थी। मैंने हैरी नाम के 26 वर्षीय युवक को काम पर रख लिया। उसे प्रिंटिंग बिज़नेस की कोई समझ नहीं थी, परंतु उसके रिकॉर्ड से पता चलता था कि वह एक अच्छा अकाउंटेंट था। डेढ़ साल पहले जब मैं रिटायर हुआ तो हमने उसे अपनी कंपनी का प्रेसिडेंट और जनरल मैनेजर बना दिया।

             “जब मैं इस बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि हैरी में एक गुण। ऐसा था जो उसे बाक़ी सब लोगों से आगे कर देता था। हैरी पूरी कपना। में गंभीरता से सच्ची रुचि लेता था। वह सिर्फ चेक नहीं लिखता था, वह। सिर्फ रिकॉर्ड नहीं रखता था। जब भी वह देखता था कि वह बाकी । कर्मचारियों की मदद कर सकता था, वह तत्काल काम में जुट जाता था|

             "हेरी के आने के एक साल के भीतर हमारे कुछ कर्मचारा चल गए। हैरी मेरे पास एक फ्रिज-बेनिफ़िट प्रोग्राम लेकर आया और उसका कहना था कि इससे लागत कम आएगी। और इससे सचमुच लाभ हुआ।

           “हैरी ने और भी कई काम किए जिनसे सिर्फ उसके विभाग को नहीं, बल्कि पूरी कंपनी को फायदा हुआ। उसने हमारे उत्पादन विभाग का लागत अध्ययन तैयार किया और बताया कि किस तरह 30,000 डॉलर की नई मशीनों में निवेश करके हम ज्यादा लाभ कमा सकते हैं। एक बार हमारा माल नहीं बिक पा रहा था। हैरी हमारे सेल्स मैनेजर के पास गया और उनसे इस तरह की बात कही, 'मैं सेल्स के बारे में तो नहीं जानता, परंतु मैं आपकी मदद करने की कोशिश करूँगा।' और उसने ऐसा ही किया। हैरी के दिमाग़ में कई अच्छे विचार थे जिनकी वजह से हमारी बिक्री बढ़ गई।

           “जब भी कोई नया कर्मचारी कंपनी में आता था, हैरी उस आदमी की काफ़ी मदद करता था। हैरी पूरी कंपनी में सच्ची रुचि लेता था।

       “जब मैं रिटायर हुआ, तो हैरी ही मेरा उत्तराधिकारी बनने लायक था।

            “परंतु मुझे ग़लत मत समझना," मेरे दोस्त ने कहा, "हैरी ने उत्तराधिकारी बनने के लिए कोई कोशिश नहीं की। वह किसी के काम में अडंगा नहीं लगाता था। वह नकारात्मक रूप से आक्रामक नहीं था। वह लोगों की पीठ पीछे बुराई नहीं करता था और वह ऑर्डर भी नहीं देता था। वह सिर्फ मदद करता था। हैरी इस तरह बर्ताव करता था जैसे कंपनी में होने वाली हर चीज़ से उसे फ़र्क पड़ता था। उसने कंपनी के बिज़नेस को अपना बिज़नेस मान लिया था।"

             हैरी के उदाहरण से हम भी सीख सकते हैं। "मैं अपना काम कर रहा हूँ और यही काफ़ी है" वाला रवैया छोटी, नकारात्मक सोच है। बड़े चिंतक अपने आपको टीम के सदस्य के रूप में देखते हैं और अकेले नहीं, बल्कि टीम के साथ जीतते या हारते हैं। वे जितनी मदद कर सकते हैं, करते हैं, चाहे इसके बदले में उन्हें कोई सीधा लाभ हो रहा हो या न हो रहा हो। वह आदमी जो अपने डिपार्टमेंट के बाहर की हर समस्या को यह कहकर टाल देता है, “इससे मुझे कोई लेना-देना नहीं है, उसी डिपार्टमेंट के लोगों को इस बात की चिंता करने दो।" उसका रवैया उसे कभी लीडर नहीं बनवा सकता।

          इसका अभ्यास करें। बड़े चिंतक बनने का अभ्यास करें। कंपनी की रुचि को अपनी रुचि की तरह देखें। बड़ी कंपनियों में काम करने वाले बहुत कम लोग अपनी कंपनी में सच्ची, निःस्वार्थ रुचि लेते हैं। परंतु बहुत कम लोग ही बड़े चिंतक बनने के काबिल होते हैं। और इन्हीं थोड़े से लोगों को ज़्यादा ज़िम्मेदारी, ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरियाँ दी जाती हैं।

          बहुत से लोग अपनी उपलब्धि की राह में छोटी, घटिया, महत्वहीन चीज़ों को बाधा बना लेते हैं। हम इन चार उदाहरणों को देखें :

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Friday, September 6, 2019

CHAPTER 4.1. बड़ा कैसे सोचें?

                          बड़ा कैसे सोचें?

     हाल ही में मैंने एक बड़ी औद्योगिक कंपनी के रोज़गार विशेषज्ञ से। हा चर्चा की। यह विशेषज्ञ हर साल चार महीने कॉलेजों में जाकर वहाँ के प्रतिभाशाली सीनियर छात्रों को अपनी कंपनी के जूनियर एक्जीक्यूटिव प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चुनती थी। उसकी बातों से लगा जैसे वह छात्रों के रवैए से निराश थी।

          “मैं हर दिन 8 से 12 ऐसे कॉलेज सीनियर्स का इंटरव्यू लेती हूँ, जो हमारे साथ काम करना चाहते हैं। हम स्क्रीनिंग इंटरव्यू में जिस बात पर सबसे ज़्यादा ध्यान देते हैं, वह होती है उनकी प्रेरणा, उनका प्रयोजन। हम यह जानना चाहते हैं कि क्या यह आदमी कुछ साल बाद हमारे लिए बड़े प्रोजेक्ट कर सकता है, हमारे ब्रांच ऑफ़िस या फैक्टरी को सँभाल सकता है, या किसी और तरीके से कंपनी के लिए बड़ी ज़िम्मेदारी उठा सकता है।

          "मुझे यह कहना पड़ेगा कि मैं जिन लोगों से चर्चा करती हूँ, उनमें से ज़्यादातर सीनियर्स के व्यक्तिगत लक्ष्यों को देखकर मैं खुश नहीं हूँ। आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह 22 साल के लड़के हमारी बाक़ी किसी चीज़ से ज्यादा हमारे रिटायरमेंट प्लान में रुचि लेते हैं। उनका दूसरा पसंदीदा सवाल होता है, "क्या मुझे घूमने को मिलेगा?" उनमें से ज़्यादातर लोगों के लिए सफलता शब्द सुरक्षा का पर्यायवाची होता है। हम इस तरह के लोगों को अपनी कंपनी से जोड़ने का जोखिम क्यों उठाएँ?

          “आज के युवा बाक़ी बातों में तो इतने आधुनिक हो गए हैं, लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि वे अब भी अपने भविष्य के बारे में इतना संकुचित रवैया क्यों रखते हैं? हर दिन अवसर बढ़ते जा रहे हैं। वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षेत्रों में हमारा देश रिकॉर्ड तरक्की कर रहा है। हमारी जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है। अगर अमेरिका में तरक्की का कोई युग है, तो यही है।"

             अब अगर इतने सारे लोगों की सोच इतनी छोटी है, तो इसका मतलब यह हुआ कि अगर आप सचमुच बड़ा सोचते हैं तो आपके सामने बहुत कम प्रतियोगिता है और आपके लिए एक बहुत बड़े करियर का रास्ता खुला हुआ है।

             सफलता के मामले में लोगों को इंच या पौंड के हिसाब से नहीं नापा जाता, न ही उन्हें कॉलेज की डिग्रियों से या पारिवारिक पृष्ठभूमि के पैमाने से नापा जाता है। उन्हें तो उनकी सोच के आकार से नापा जाता है। आप कितना बड़ा सोचते हैं, यही आपकी उपलब्धियों के आकार को तय करता है। देखते हैं कि हम किस तरह अपनी सोच को बड़ा कर सकते हैं।

              कभी आपने खुद से पूछकर देखा है, “मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है?" शायद इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी खुद का मूल्यांकन कम करने की होती है- यानी कि खुद को सस्ते में बेचने की कमज़ोरी। आत्म-मूल्यांकन में कमी अनगिनत तरीकों से साफ़ दिखती है। जॉन अख़बार में एक नौकरी का विज्ञापन देखता है। वह इसी तरह की नौकरी करना चाहत है। परंतु वह इसके लिए कोई कोशिश नहीं करता क्योंकि वह सोचता है, "मैं इस नौकरी के लिए पर्याप्त योग्य नहीं हूँ, इसलिए कोशिश करने की मेहनत क्यों करूँ?" या जिम जोन के साथ डेटिंग पर जाना चाहता है, परंतु वह उससे नहीं पूछता क्योंकि उसे लगता है कि वह तैयार नहीं होगी।

              टॉम को लगता है कि मिस्टर रिचर्ड्स उसके माल के अच्छे ग्राहक हो सकते हैं, परंतु टॉम मिस्टर रिचर्ड्स से मिलने नहीं जाता। उसे। लगता है कि मिस्टर रिचर्ड्स जैसे बड़े आदमी उससे नहीं मिलेंगे। पीट नौकरी का आवेदन भर रहा है। उसमें एक प्रश्न पूछा जाता है, “आप शुरुआत में कितनी तनख्वाह चाहेंगे?" पीट एक छोटी-सी रकम लिख। देता है क्योंकि उसे लगता है कि वह इससे ज्यादा तनख्वाह के योग्य नहीं है, जबकि वह इससे ज़्यादा तनख्वाह पाना चाहता है।

              हज़ारों सालों से दार्शनिक हमें यह अच्छी सलाह देते आ रहे हैं : खुद को जानें। परंतु ज़्यादातर लोग इस सलाह का मतलब यह निकालते हैं कि खुद के नकारात्मक पहलू को जानें। ज्यादातर आत्म-मूल्यांकनों में लोग अपनी ग़लतियों, कमियों, अयोग्यताओं की लंबी सी मानसिक सूची बना लेते हैं।

           हमें अपनी कमियाँ पता हों; अच्छी बात है। इनसे हमें यह पता चलता है कि हमें इन क्षेत्रों में सुधार करना है। परंतु अगर हम सिर्फ अपने नकारात्मक पहलू को ही जान पाएँ तो हम परेशानी में फँस जाएँगे। हमारा मूल्य अपनी नज़रों में कम हो जाएगा।

          यहाँ एक अभ्यास दिया गया है जिससे आप अपने सच्चे आकार को नाप सकते हैं। मैंने इसे एक्जीक्यूटिब्ज़ और सेल्स पर्सनेल के अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आज़माया है। यह वाक़ई काम करता है।

        1. अपने पाँच प्रमुख गुणों को तय करें। किसी निष्पक्ष दोस्त की मदद लें - जैसे आपकी पत्नी, आपका सीनियर, आपका प्रोफ़ेसर - कोई समझदार व्यक्ति जो आपको सच्ची राय दे सके। (गुणों के उदाहरण हैं शिक्षा, अनुभव, तकनीकी योग्यता, हुलिया, संतुलित घरेलू जीवन, रवैया, व्यक्तित्व, लीडरशिप की योग्यता)।

        2. हर गुण के सामने अपने उन तीन परिचित व्यक्तियों के नाम लिख लें जो बेहद सफल हैं परंतु उनमें यह गुण उतनी मात्रा में नहीं है, जितनी मात्रा में यह गुण आपमें है।

         इस अभ्यास को पूरा कर लेने पर आप पाएँगे कि आप किसी न किसी बात में कई सफल लोगों से आगे हैं।

          ईमानदारी से आप एक ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं : आप जितना सोचते हैं, आप उससे बड़े हैं। इसलिए, आप अपनी सोच को भी अपने असली आकार के हिसाब से बना लें। उतना ही बड़ा सोचें जितने बड़े आप हैं! और कभी, खुद को सस्ते में न बेचें!

          जो व्यक्ति “अचल" शब्द के लिए “दुर्भेद्य' शब्द का प्रयोग करता है या "बचत” की जगह "मितव्ययिता" शब्द का प्रयोग करता है, उसके बारे में हम यह जान जाते हैं कि उसकी शब्दावली का दायरा बड़ा है। परंतु क्या उसके पास एक बड़े चिंतक की शब्दावली है? शायद नहीं। जो लोग कठिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो लोग ऐसे आलंकारिक वाक्यों का प्रयोग करते हैं जिन्हें समझने में आम लोगों को कठिनाई होती है वे दरअसल दिखावटी और घमंडी लोग होते हैं। और दिखावटी लोग आम तौर पर छोटे चिंतक होते हैं।

           किसी व्यक्ति की शब्दावली का महत्वपूर्ण पैमाना उसके शब्दों की संख्या या आकार नहीं है। असली महत्व की बात तो यह है कि उसके शब्दों का उस पर और सामने वाले पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

           यहाँ एक मूलभूत बात बताई जा रही है : हम शब्दों और वाक्यों में नहीं सोचते हैं। हम तस्वीरों और/या बिंबों में सोचते हैं। शब्द विचारों के लिए कच्चा माल हैं। जब इन्हें बोला जाता है या पढ़ा जाता है तो हमारा दिमागी कंप्यूटर इन शब्दों को अपने आप तस्वीरों में बदल लेता है। हर शब्द, हर वाक्य, आपके दिमाग में एक अलग तस्वीर बनाता है। अगर कोई यह कहता है, "जिम ने एक नया स्पलिट-लेवल ख़रीदा है." तो हमारे दिमाग में एक अलग तस्वीर बनती है। परंतु अगर आपको बताया जाता है, "जिम ने एक नया रैच हाउस ख़रीदा है" तो आपके दिमाग में दूसरी ही तस्वीर बनती है। हमारे दिमाग में अलग-अलग तस्वीरें अलग-अलग शब्दों की वजह से बनती हैं।

           इसे इस तरीके से देखें। जब आप बोलते हैं या लिखते हैं तो आप एक तरह से दूसरे लोगों के दिमाग में फ़िल्में दिखाने वाले प्रोजेक्टर का काम कर रहे हैं। और आप जिस तरह की फ़िल्म दिखाएँगे, सामने वाले पर आपका प्रभाव वैसा ही पड़ेगा।

           मान लीजिए आप लोगों को यह बताते हैं, “मुझे यह बताते हुए। दुःख हो रहा है कि हम असफल हो गए हैं।" इस वाक्य का उन लोगा। पर क्या असर होगा? वे लोग इन शब्दों में हार और निराशा और दुःख। के चित्र देखेंगे, जो “असफल" शब्द में छुपे हुए हैं। इसके बजाय अगर आप कहते हैं, “यह रहा एक नया उपाय, जिससे हम सफल हो सकते है, तो इससे उनका उत्साह बढ़ जाएगा और वे एक बार फिर कोशिश करने के लिए तैयार हो जाएंगे।

           मान लीजिए आप कहते हैं, “हमारे सामने एक समस्या है।" ऐसा कहने पर दूसरों के दिमाग में आप एक ऐसी तस्वीर बना देंगे जो सुलझाने में मश्किल और अप्रिय होगी। इसके बजाय यह कहें, “हमारे सामने एक चुनौती है।" और इस वाक्य से आप एक ऐसी मानसिक तस्वीर बना देते हैं जिसमें आनंद है, खेल है, करने के लिए कुछ अच्छा है।

   
             या किसी समूह से कहें, "हमने काफ़ी बड़ा ख़र्च कर डाला।” और लोगों को लगता है कि ख़र्च हुआ पैसा कभी वापस नहीं लौटेगा। निश्चित रूप से यह नकारात्मक वाक्य है। इसके बजाय यह कहें, “हमने काफ़ी बड़ा निवेश किया है," और लोग एक ऐसी तस्वीर बना लेंगे जिसमें बाद में लाभ लौटता हुआ दिखता है, और यह एक बहुत सुखद दृश्य होता है।

           मुद्दे की बात यह है : बड़े चिंतकों में अपने और दूसरों के मस्तिष्क में सकारात्मक, प्रगतिशील और आशावादी तस्वीरें बनाने की कला होती है। बड़ी सोच के लिए हमें ऐसे शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए जो बड़े, सकारात्मक मानसिक चित्र प्रदान कर सकें।

       नीचे बाएं हाथ के कॉलम में कुछ वाक्य दिए गए हैं जिनसे छोटे, नकारात्मक, निराशाजनक विचार उत्पन्न होते हैं। दाएँ हाथ के कॉलम में उसी परिस्थिति को बड़े, सकारात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।

       पढ़ते समय खुद से पूछे, “मैं किस तरह के मानसिक चित्र देख रहा हूँ?"



     

  बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित करने के चार तरीके

       यहाँ चार तरीके दिए जा रहे हैं, जिनकी मदद से आप बड़े चिंतक की शब्दावली विकसित कर सकते हैं।

           1. अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बड़े, सकारात्मक, आशावादी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें। जब कोई आपसे पूछता है, “आप आज कैसा महसूस कर रहे हैं ?" और आप उसे जवाब देते हैं, “मैं थका हुआ हूँ (मुझे सिरदर्द है, काश कि आज शनिवार होता, मेरा आज बहुत बुरा हाल है)" तो आप अपनी स्थिति को अपने ही हाथों ख़राब कर रहे हैं। इसका अभ्यास करें : यह एक बहुत आसान बात है, परंतु इसमें बहुत शक्ति है। जब भी कोई आपसे पूछे, “आप कैसे हैं ?" या “आप आज कैसा महसूस कर रहे हैं ?" तो जवाब में हमेशा कहें, “बहुत बढ़िया! धन्यवाद और आप कैसे हैं ?" या कहें “बेहतरीन" या "शानदार"। हर मौके पर कहें कि आप बढ़िया महसूस कर रहे हैं और आप सचमुच बढ़िया महसूस करने लगेंगे और ज्यादा बड़ा भी। एक ऐसे व्यक्ति बनें जो हमेशा बढ़िया महसूस करता है। इससे दोस्त बनते हैं।

          2. दूसरे लोगों का वर्णन करते समय चमकीले, खुशनुमा, सकारात्मक शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करें। यह नियम बना लें कि आप अपने सभी दोस्तों और सहयोगियों के लिए बड़े, सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करेंगे। जब आप किसी के साथ किसी तीसरे अनुपस्थित व्यक्ति के बारे में बात कर रहे हों, तो आप उसकी बड़े शब्दों में प्रशंसा करें, “हाँ, वह बढ़िया आदमी है।" "लोग कहते हैं उसका काम बहुत बढ़िया है।" इस बात का बहुत ध्यान रखें कि आप उसकी बुराई न करें या घटिया भाषा का इस्तेमाल न करें। देर सबेर तीसरे व्यक्ति को पता चल जाता है कि आपने क्या कहा था, और आपने जो बुराई की थी, वह आपको ही बुरा बना सकती है।

           3. दूसरों का उत्साह बढ़ाने के लिए सकारात्मक भाषा का प्रयोग करें। हर मौके पर लोगों की तारीफ़ करें। अपनी पत्नी या अपने पति की हर रोज़ तारीफ़ करें। अपने साथ काम करने वालों की रोज़ तारीफ़ करें। अगर सच्ची तारीफ़ की जाए, तो यह सफलता का औज़ार बन जाती है। इसका प्रयोग करें! इसका प्रयोग बार-बार, हर बार करें। लोगों के हुलिए, उनके काम, उनकी उपलब्धियों, उनके परिवार की तारीफ़ करें।

         4. दूसरों के सामने योजना प्रस्तुत करते समय सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करें। जब लोग इस तरह की बात सुनते हैं- “मैं आपको एक अच्छी खबर सुनाना चाहता हूँ। हमारे सामने एक सुनहरा अवसर है..." तो उनके दिमाग में आशा जाग जाती है। परंतु जब वे इस तरह की कोई बात सुनते हैं, "चाहे आप इसे पसंद करें या न करें, हमें यह काम करना है," तो दिमाग़ की फ़िल्म बोझिल, बोरिंग हो जाती है और वे भी इसी तरह के हो जाते हैं। जीत का वादा करें और उनकी आँखों में चमक आ जाएगी। जीत का वादा करें और आपको समर्थन हासिल हो जाएगा। महल बनाएँ, क़ब्र न खोदें!

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