Saturday, October 5, 2019

CHAPTER 11.2 हर को जीत में कैसे बदले?

        फिर मैंने अपने विद्यार्थी से कहा, “तुम्हारी ज्यादातर बातें सही हैं। ऐसे कई बेहद सफल लोग हैं जिनके पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं है,या जिन्होंने इस डिग्री का नाम तक नहीं सुना है। और यह तुम्हारे लिए भी संभव है कि तुम बिना डिग्री के जीवन में सफल हो जाओ। पूरे जीवन के हिसाब से देखा जाए, तो तुम्हारे फेल होने का तुम्हारे जीवन की सफलता या असफलता से कोई सीधा संबंध नहीं है। परंतु फेल होने के प्रति तुम्हारे रवैए से बहुत फ़र्क पड़ सकता है।"

“वह कैसे?" उसने पूछा।

        मैंने जवाब दिया, "बाहर की दुनिया में भी लोग आपको उसी तरह नंबर देते हैं, जैसे हम लोग देते हैं। वहाँ भी इसी बात का महत्व होता है। कि आप अपने काम को कितनी अच्छी तरह करते हैं। बाहर की दुनिया में भी कोई आपको घटिया काम करने के लिए प्रमोशन नहीं देगा, न ही आपकी तनख्वाह बढ़ाएगा।"

        मैं एक बार फिर रुका ताकि उसे पूरी बात समझ में आ जाए।

      फिर मैंने कहा, "क्या मैं तुम्हें एक सुझाव दूं? अभी तुम बहुत निराश हो। मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हें कैसा लग रहा होगा। और अगर इस बात पर तुम उत्तेजित हुए हो, तो मैंने उसका बिलकुल भी बुरा नहीं माना है। मैं चाहता हूँ तुम इस अनुभव को सकारात्मक तरीके से लो। यह तुम्हें एक बहुत महत्वपूर्ण सबक़ सिखा सकता है : अगर आप अच्छा काम नहीं करेंगे, तो आप वहाँ नहीं पहुँच पाएँगे, जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं। इस सबक़ को सीख लो और आज से पाँच साल बाद जाकर तुम्हें यह एहसास होगा कि यह तुम्हारे द्वारा सीखी गई जीवन की सबसे बहुमूल्य शिक्षाओं में से एक है।"

      मैं यह जानकर खुश हुआ कि कुछ ही दिनों बाद उस विद्यार्थी ने एक बार फिर कॉलेज में एडमीशन ले लिया। इस बार वह बहुत ही अच्छे नंबरों से पास हुआ। इसके बाद, वह ख़ास तौर पर मुझसे मिलने आया और उसने मुझे बताया कि हमारी पहले वाली मुलाक़ात ने उस पर गहरा असर डाला था और उसने उस चर्चा से बहुत कुछ सीखा था।

“आपके कोर्स में फेल हो जाने से मैंने बहुत कुछ सीखा,” उसने कहा।“यह अजीब लगेगा, प्रोफ़ेसर, परंतु अब मैं खुश हूँ कि मैं पहली बार में पास नहीं हुआ।"

       हम हार को जीत में बदल सकते हैं। सबक सीखो, उसे अपने जीवन में उतारो, पराजय की तरफ़ पीछे मुड़कर देखो और मुस्कराओ।

       फ़िल्मों के शौकीन लोग महान अभिनेता बैरीमोर को कभी नहीं भूल पाएँगे। 1936 में बैरीमोर के नितंब में फ्रैक्चर हो गया। यह फ्रैक्चर कभी ठीक नहीं हो पाया। कई लोगों को लगा कि मिस्टर बैरीमोर की ज़िंदगी ख़त्म हो गई। परंतु नहीं, मिस्टर बैरीमोर को ऐसा नहीं लगा। उन्होंने इस बाधा को दूर करके अपने अभिनय की सफलता से भी बड़ी सफलता का रास्ता बना लिया। अगले 18 सालों तक दर्द के बावजूद उन्होंने व्हील चेयर पर बैठे-बैठे दर्जनों सफल भूमिकाओं में अभिनय किया।

       15 मार्च, 1945 को डब्ल्यू. कॉल्विन विलियम्स फ़्रांस में एक टैंक के पीछे चल रहे थे। टैंक एक बारूदी सुरंग से टकराया, उसमें विस्फोट हुआ और इससे मिस्टर विलियम्स हमेशा के लिए अंधे हो गए।

       परंतु यह दुर्घटना मिस्टर विलियम्स को पादरी और सलाहकार बनने के अपने लक्ष्य का पीछा करने से नहीं रोक पाई। जब उन्होंने कॉलेज से ग्रैजुएशन कर लिया (और वह भी ऑनर्स के साथ), तो विलियम्स ने कहा कि उनके विचार से उनका अंधापन “उनके चुने गए करियर में एक वरदान साबित होगा। मैं कभी बाहरी चीज़ों को देखकर निर्णय नहीं लँगा। इसलिए मैं हमेशा व्यक्ति को दूसरा मौक़ा दूंगा। मेरे अंधेपन से मुझे यह लाभ भी होगा कि कोई व्यक्ति कैसा भी दिखे, मैं सबके साथ एक जैसा व्यवहार करूँगा। में इस तरह का इंसान बनना चाहता हूँ जिसके पास कोई भी आ सके और बेझिझक आकर अपने दिल की बात कह सके।" 

       क्या यह एक शानदार उदाहरण नहीं है कि किस तरह एक कर, कटु हार को जीत में बदला जा सकता है?

       हार केवल एक मानसिक स्थिति है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

       मेरा एक दोस्त स्टॉक मार्केट में सफल और प्रसिद्ध निवेशक है। वह अपने निवेश के हर निर्णय को अपने अतीत के अनुभवों के आधार पर लेता है। एक बार उसने मुझे बताया, “जब मैंने 15 साल पहले निवेश करना शुरू किया तो मेरे हाथ कई बार जले। ज़्यादातर शुरुआती लोगों
की तरह, मैं भी फटाफट अमीर बनना चाहता था। परंतु इसके बजाय मैं जल्दी ही दीवालिया हो गया। परंतु इसके बावजूद मैंने हार नहीं मानी। मुझे अर्थव्यवस्था की मूलभूत शक्ति का ज्ञान था ओर मैं यह जानता था कि लंबे समय में अच्छी तरह चुने गए शेयरों में निवेश करना समझदारीपूर्ण होता है।

          "तो मैंने अपने शुरुआती बुरे निवेशों को अपनी शिक्षा की कीमत मान लिया।" वह हँसते हुए कहता है।

       दूसरी तरफ़, मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो एक-दो मूर्खतापूर्ण निवेश करने के बाद 'शेयर-विरोधी' बन जाते हैं। अपनी गलतियों का विश्लेषण करने के बजाय और एक अच्छी संस्था से जुड़ने के बजाय, वे इस ग़लत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने का मतलब है जुआ खेलना, एक ऐसा जुआ, जिसमें देर-सबेर हर व्यक्ति हारता है।

        हर असफलता से कुछ न कुछ बचाने का फैसला करें। अगली बार जब नौकरी या घर में कोई गड़बड़ हो, तो शांत हो जाएँ और यह पता लगाएँ कि गड़बड़ कहाँ शुरू हुई थी। इससे आप उसी ग़लती को दुबारा करने से बच सकते हैं।

        अगर हम कुछ सीखें, तो असफल होना भी फायदेमंद साबित हो सकता है।

        हम इंसान भी अजीब होते हैं। अपनी सफलताओं का श्रेय तो हम पूरा लेना चाहते हैं। जब हम जीतते हैं, तो हम पूरी दुनिया को इस बारे में बताना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है कि हम लोगों के मुँह से यह सुनना चाहें, “यही वह व्यक्ति है जिसने इतना बड़ा काम किया।”

        परंतु अपनी असफलता का श्रेय व्यक्ति तत्काल किसी दूसरे के मत्थे मढ़ देता है। जब सामान नहीं बिकता, तो सेल्समैन ग्राहकों को दोष देते हैं। अफ़सरों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे गलत काम होने पर कर्मचारियों या दूसरे अफ़सरों को दोष दें। घरेलू लड़ाइयों और समस्याओं के लिए पति अपनी पत्नियों को दोष देते हैं और पत्नियाँ अपने पतियों को।

        यह तो सच है कि इस जटिल संसार में दूसरे लोग हमें धक्का मारकर गिरा सकते हैं परंतु यह भी सच है कि ज्यादातर हम खुद ही अपने आपको गिराते हैं। हम अपनी व्यक्तिगत कमियों व ग़लतियों के कारण हारते हैं।

        सफलता के लिए खुद को इस तरह तैयार करें। अपने आपको याद दिलाएँ कि आप आदर्श और पूर्ण मनुष्य बनना चाहते हैं, जितना बनना इंसान के लिए संभव है। अपने आपको एक टेस्ट ट्यूब में रखकर निष्पक्ष दृष्टि से खुद का और अपनी स्थिति का मूल्यांकन करें। यह देखें कि क्या आपमें ऐसी कोई कमज़ोरी है जिसके बारे में आप जानते न हों। अगर आपमें ऐसी कमज़ोरी है, तो उसे सुधारने के लिए कदम उठाएँ। कई लोग खुद को देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे सुधार की संभावना देखने में असफल हो जाते हैं।

          महान मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा स्टार, रिसे स्टीवन्स ने रीडर्स डाइजेस्ट (जुलाई 1955) में कहा कि उसे सबसे अच्छी सलाह अपने जीवन के सबसे दुःखद क्षण में मिली।

        अपने करियर की शुरुआत में, मिस स्टीवन्स मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा “ऑडीशन्स ऑफ़ द एयर" में असफल हो गईं। हारने के बाद मिस स्टीवन्स कड़वाहट से भरी हुई थीं। “मैं यह सुनना चाहती थी," उसने कहा, “कि मेरी आवाज़ वास्तव में दूसरी लड़की से सचमुच बेहतर थी, कि निर्णायकों का फ़ैसला ग़लत था, कि मैं इसलिए नहीं जीत पाई, क्योंकि मेरे पास सही जुगाड़ नहीं थीं।"

         परंतु मिस स्टीवन्स की टीचर ने उसे कोई झूठी सांत्वना नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने मिस स्टीवन्स से कहा, "देखो बेटा, अपनी गलतियों का सामना करने की हिम्मत जुटाओ।"

         "हालाँकि मैं आत्म-दया के शब्द सुनना चाहती थी," मिस स्टीवन्स ने कहा, “परंतु अपनी टीचर के शब्द बार-बार मेरे कानों में गूंजते रहे। उस रात उन शब्दों ने मुझे जगा दिया। मैं तब तक नहीं सो पाई जब तक कि मैंने अपनी कमियों का सामना नहीं कर लिया। अँधेरे में लेटे-लेटे मैंने खुद से पूछा, 'मैं क्यों असफल हुई ?' 'मैं अगली बार किस तरह जीत सकती हूँ?' और मैंने माना कि मेरी आवाज़ की रेंज सचमुच उतनी अच्छी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए, कि मुझे और भाषाएँ सीखनी चाहिए, कि मुझे और ज़्यादा भूमिकाएँ सीखनी चाहिए।"

        मिस स्टीवन्स ने आगे बताया कि किस तरह अपनी कमियों का सामना करने से उसे न सिर्फ स्टेज पर सफलता मिली, बल्कि अपनी ग़लतियों को मानने से उसके ज्यादा दोस्त भी बने और वह ज़्यादा लोकप्रिय भी हुई।

      खुद का अच्छा आलोचक होना अच्छी बात है, बशर्ते कि आलोचना रचनात्मक हो। इससे आपको व्यक्तिगत शक्ति और योग्यता बढ़ाने में मदद मिलती है, जो सफलता के लिए बहुत ज़रूरी है। दूसरों को दोष देना विध्वंसात्मक है। सामने वाले की ग़लती “साबित" करने से आपको कुछ भी हासिल नहीं होता।

      रचनात्मक रूप से खुद की आलोचना करें। अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने में न हिचकिचाएँ। सच्चे प्रोफेशनल बनें। वे अपनी ग़लतियों और कमजोरियों को ढूँढ़ते हैं, फिर उन्हें दूर करते हैं। इसी कारण वे सफल प्रोफेशनल बनते हैं।

       परंतु अपनी ग़लतियाँ सिर्फ इसलिए न ढूँढें ताकि आप खुद के सामने यह बहाना बना सकें, “यह एक और कारण है जिससे मैं असफल होता हूँ।"

        इसके बजाय अपनी ग़लतियों को इस तरह से देखें, “यह एक और तरीका है जिससे मैं जीत सकता हूँ।"

        महान अल्बर्ट हबार्ड ने एक बार कहा था, “असफल व्यक्ति वह होता है जिसने बड़ी ग़लतियाँ की तो हैं, परंतु जो अपने अनुभव से कुछ नहीं सीख पाया।"

      अक्सर हम अपनी असफलता के लिए क़िस्मत को दोष देते हैं। हम कहते हैं, "अरे, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है," और फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं। परंतु ज़रा रुकें और सोचें। गेंद की उछाल की भी कोई न कोई वजह होती है। गेंद बिना कारण के यूँ ही किसी दिशा
में नहीं उछलती। गेंद का उछाल तीन कारणों से निर्धारित होता है : एक तो गेंद, फिर जिस तरीके से इसे फेंका जाता है, और तीसरे जिस सतह से यह टकराती है। निश्चित भौतिक नियम गेंद की उछाल का कारण तय करते हैं, इसका क़िस्मत से कोई लेना-देना नहीं होता।

         मान लें कि सी.ए.ए. एक रिपोर्ट जारी करे और कहे, "हमें खेद है। कि हवाई जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया, परंतु हम क्या करें, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है।"

       आप कहेंगे कि अब सी.ए.ए. को बदल देना चाहिए। या अगर कोई डॉक्टर किसी रिश्तेदार से कहे, "मुझे खेद है कि मैं उसे बचा नहीं पाया। मैं नहीं जानता कि ऐसा कैसे हुआ। यह तो किस्मत की बात थी।"

       जब आप या आपका कोई दूसरा रिश्तेदार बीमार होगा, तो आप उस डॉक्टर के पास नहीं जाएंगे।

        गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है' वाली शैली हमें कुछ नहीं सिखाती। जब हम अगली बार उसी तरह की परिस्थिति का सामना करते हैं। तो हम वही ग़लती करने से सिर्फ इसलिए नहीं बच पाते, क्योंकि हमने अपनी पिछली ग़लती से सबक़ नहीं सीखा था। वह फुटबॉल कोच जो शनिवार का मैच हार जाने के बाद अपनी टीम से कहता है, “चिंता मत करो, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है" अपनी टीम की ग़लतियाँ ढूँढ़ने में मदद नहीं कर रहा है, जिससे अगले शनिवार को होने वाले मैच में उन ग़लतियों को सुधारा जा सके।

       डियरबॉर्न, मिशीगन के मेयर ऑरविल हबार्ड 17 सालों से लगातार मेयर हैं और देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नगरीय प्रशासकों में से एक हैं।

        डियरबॉर्न के मेयर बनने के दस साल पहले मिस्टर हबार्ड भी "बदकिस्मती” का बहाना बना सकते थे और राजनीति छोड़ सकते थे।

लगातार विजेता बनने के पहले, ऑरविल हबार्ड तीन बार "बदकिस्मत" रहे थे क्योंकि उन्हें मेयर पद के लिए नामांकित ही नहीं किया गया था। तीन बार उन्होंने स्टेट सीनेटर के लिए नामांकन हासिल करने की कोशिश की थी, परंतु वे असफल हुए। एक बार तो वे काँग्रेस के लिए नामांकन की दौड़ से ही बाहर हो गए थे।

परंतु ऑरविल हबार्ड ने अपनी पराजयों का अध्ययन किया। उन्होंने

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CHAPTER 11.1 हार को जीत में कैसे बदलें?

              हार को जीत में कैसे बदलें?


        सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे लोग जो गरीब इलाक़ों या झुग्गी- ला बस्तियों में काम करते हैं, उनका कहना है कि इन दयनीय लोगोंकी  उम्र, धार्मिक आस्था, शिक्षा और पृष्ठभूमियाँ अलग-अलग होती हैं। इनमें से कई नागरिक आश्चर्यजनक रूप से युवा होते हैं। कई बूढ़े होते हैं। कुछ कॉलेज ग्रैजुएट होते हैं, कुछ बिलकुल अशिक्षित होते हैं। कई शादी-शुदा होते हैं, कई कुंवारे होते हैं। परंतु गरीबी के दलदल में रहने वाले सभी असफल लोगों में एक बात समान होती है : हर व्यक्ति हारा हुआ है, पिटा हुआ है, चोट खाया हुआ है। हर एक ने जीवन में ऐसी
समस्याओं को झेला है जिनके आगे वह घुटने टेक चुका है। वह आपको उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के बारे में बताने के लिए उत्सुक है, व्यग्र है जो उसकी जिंदगी का वॉटरलू साबित हुई।

        मानवीय अनुभव की ये दास्तानें “मेरी पत्नी मेरा घर छोड़कर भाग गई।" से लेकर “मैंने अपना सब कुछ गँवा दिया था और मेरे पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं बची थी" से लेकर “मैंने दो-एक काम ऐसे किए जिससे मेरा सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया और मैं यहाँ चला आया।"

         जब हम स्किड रो यानी असफलता के दलदल से ऊपर चलकर मिस्टर और मिसेज़ औसत व्यक्ति के इलाके में पहुंचते हैं, तो हम जीवनस्तर में स्पष्ट अंतर देख सकते हैं। परंतु हम एक बार फिर यह देखते हैं कि मिस्टर औसत व्यक्ति भी अपनी औसत परिस्थितियों के लिए मूलतः वही कारण बताते हैं जो मिस्टर असफल ने बताए थे। अंदर से, मिस्टर औसत व्यक्ति हारा हुआ महसूस करते हैं। जिन परिस्थितियों से वे चोट खाए हैं, उनके घाव अब भी नहीं भरे हैं। अब वे अति सावधान हो गए हैं। अब वे रुक-रुककर चलते हैं, सीना तानकर नहीं चलते।
विजयी सेनापति की तरह सिर उठाकर नहीं चलते, बल्कि हारे हुए असंतुष्ट सिपाही की तरह सिर झुकाकर चलते हैं। वे हारा हुआ महसूस करते हैं परंतु वे अपनी औसत ज़िंदगी की सज़ा काटने की कोशिश करते हैं जिसके लिए वे अपनी “तक़दीर" को दोष देते हैं।

        इस व्यक्ति ने भी हार के सामने समर्पण कर दिया है, परंतु इसने यह समर्पण तार्किक रूप से, अच्छे ढंग से, सामाजिक रूप से “स्वीकृत" तरीके से किया है।

        अब जब हम सफलता की कम भीड़ वाली दुनिया में ऊपर चढ़ते हैं,तो हम देखते हैं कि यहाँ भी हर तरह की पृष्ठभूमि से आए लोग मौजूद हैं। कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिज़ हों या प्रसिद्ध मंत्री या सरकारी अधिकारी, हर क्षेत्र के चोटी के लोगों को देखने पर हम पाते हैं कि ये लोग ग़रीब घरों, अमीर घरों, बिखरे हुए परिवारों, मज़दूर परिवारों, खेतिहर घरों, और झोपड़ियों से यानी हर पृष्ठभूमि से आए हैं। समाज का नेतृत्व करने वाले ये लोग हर उस कठिन परिस्थिति को झेल चुके हैं जिसकी कल्पना हम कर सकते हैं।

        हर मामले में मिस्टर असफल, मिस्टर औसत और मिस्टर सफल में समानता हो सकती है- उम्र, बुद्धि, पृष्ठभूमि, राष्ट्रीयता या कोई और चीज़ जो आपके दिमाग में आए। इन सभी बातों में इन लोगों में कोई अंतर नहीं होता। परंतु इनमें एक बड़ा फ़र्क होता है। उन लोगों का हार के बारे में नज़रिया अलग-अलग होता है।

        जब मिस्टर असफल गिर जाते हैं, तो वे दुबारा नहीं उठ पाते। वे वहीं पड़े रहते हैं; कराहते हुए, अपनी चोट को सहलाते हुए। मिस्टर औसत अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं और रेंगने लगते हैं और जब वे थोड़ी दूर पहुँच जाते हैं तो फिर उठकर दूसरी दिशा में दौड़ लगा देते हैं ताकि वे दुबारा न गिरें।

        परंतु मिस्टर सफल जब गिरते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भिन्न होती है। वे तत्काल उठ खड़े होते हैं, सबक़ सीखते हैं, गिरने की बात भूल जाते

हैं और ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगते हैं।

       मेरा एक करीबी दोस्त बहुत ही सफल मैनेजमेंट सलाहकार है। जब आप उसके ऑफिस में कदम रखते हैं तो आपको सचमुच ऐसा लगता है जैसे आप किसी पॉश इलाके में आ गए हैं। फ़र्नीचर इतना शानदार होता है, गलीचे इतने आलीशान, ग्राहक इतने महत्वपूर्ण और माहौल इतना व्यस्त कि आप पहली ही नज़र में यह अनुमान लगा सकते हैं कि उसकी कंपनी बहुत सफल और समृद्ध होगी।

        कोई आलोचक यह कह सकता है, “इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति आसानी से बना सकता है।" परंतु आलोचक ग़लत है। इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति ने नहीं बनाया। यह माहौल किसी प्रतिभाशाली या अमीर या खुशकिस्मत व्यक्ति ने भी नहीं बनाया। यह माहौल सिर्फ़ (सिर्फ़ शब्द के प्रयोग में मुझे संकोच होता है क्योंकि सिर्फ का मतलब आपको बहुत थोड़ा लग सकता है) एक लगनशील व्यक्ति ने बनाया, जिसने कभी यह नहीं सोचा कि वह हार गया है।

        इस समृद्ध और प्रतिष्ठित कंपनी के पीछे उस व्यक्ति की कहानी है जिसने ऊपर आने के लिए संघर्ष किया : बिज़नेस के शुरुआती छह महीनों में ही उसने अपनी 10 साल की बचत गँवा दी। वह कई महीनों तक अपने ऑफ़िस में ही रहा क्योंकि उसके पास किराए के घर के लिए पैसे नहीं थे। उसने कई "अच्छी” नौकरियों का प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि वह चाहता था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करे। जितनी बार उसके संभावित ग्राहकों ने उसे 'हाँ' कहा, उससे सौ गुना ज़्यादा लोगों ने 'ना' कहा।

        सफल होने के लिए उसने सात साल कड़ी मेहनत की, परंतु मैंने इस दौरान एक बार भी उसके मुँह से शिकायत नहीं सुनी। वह कहता था, “डेव, मैं सीख रहा हूँ। इस बिज़नेस में काफ़ी प्रतियोगिता है और चूंकि यह अप्रत्यक्ष बिज़नेस है इसलिए इसे बेचना मुश्किल है। परंतु मैं अब सीख रहा हूँ।"

      और उसने इसे सीख ही लिया।
  

      एक बार मैंने अपने दोस्त से कहा कि इस अनुभव से उसकी काफ़ी ऊर्जा बाहर निकल जाती होगी। परंतु उसका जवाब था, "नहीं, यह मेरे अंदर से कुछ निकाल नहीं रहा है, बल्कि मेरे अंदर कुछ भर रहा है।"

        हू इज़ हू इन अमेरिका में लोगों की जीवनियाँ पढ़ें और आप पाएँगे कि जो लोग बहुत सफल हुए हैं, उन्हें कई बार असफलता झेलनी पड़ी है। सफल लोगों के इस अभिजात्य समूह ने विरोध सहन किया, लोगों के ताने सहे, राह में बाधाएँ और तकलीफें झेली, असफलताओं का दौर झेला, व्यक्तिगत दुर्भाग्य सहा।

        महान लोगों की जीवनियाँ पढ़ें, और आप यहाँ भी पाएंगे कि ये सभी लोग किसी न किसी मोड़ पर अपनी असफलताओं के सामने घुटने टेक सकते थे।

        या इसके बजाय ऐसा करें। अपनी कंपनी के प्रेसिडेंट की पृष्ठभूमि जानें या अपने शहर के मेयर की या किसी ऐसे व्यक्ति को चुन लें जिसे आप सचमुच सफल मानते हों। जब आप गहराई में जाएँगे, तो आप पाएँगे कि इस व्यक्ति ने बहुत बड़ी, असली बाधाएँ पार की हैं और तब जाकर वह सफल हुआ है।

         विना विरोध, मुश्किलों और असफलताओं के बड़ी सफलता हासिल करना संभव नहीं है। परंतु यह संभव है कि आप इन असफलताओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा बना लें। आइए देखें कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।

       मैंने व्यावसायिक एयरलाइनों के आँकड़े देखे जिनके मुताबिक़ लगभग 10 बिलियन मील की उड़ान में केवल एक दुर्घटना होती है। हवाई यात्रा आजकल बहुत ज़्यादा सुरक्षित है। दुर्भाग्य से, इसके बावजूद हवाई दुर्घटनाएँ होती हैं। परंतु जब कोई दुर्घटना होती है, तो 'सिविल एरोनॉटिक्स एडमिनिस्ट्रेशन' (सी.ए.ए.) तत्काल जाँच शुरू कर देता है कि दुर्घटना का कारण क्या था। मीलों दूर तक फैले मलबे को इकट्ठा किया जाता है। विशेषज्ञों का समूह यह विचार करता है कि क्या हुआ होगा जिस वजह से यह दुर्घटना हुई। गवाह और ज़िंदा बचे लोगों से बातचीत की जाती है। जाँच कई हफ्ते, कई महीने तक चलती है जब तक कि इस सवाल का जवाब न मिल जाए, “यह दुर्घटना क्यों हुई?"

         एक बार सी.ए.ए. को जवाब मिल जाता है, तो तत्काल ऐसे कदम उठाए जाते हैं कि फिर कभी इस तरह की दुर्घटना न होने पाए। अगर दुर्घटना किसी तकनीकी खराबी के कारण हुई थी, तो उसी तरह के दूसरे जहाज़ों में उस तकनीकी दोष को दूर किया जाता है। अगर कोई यंत्र दोषपूर्ण होता है, तो उसमें सुधार किया जाता है। आधुनिक हवाई जहाज़ में हज़ारों सुरक्षा यंत्र सी.ए.ए. की इसी तरह की जाँचों के परिणामस्वरूप तैयार हुए हैं।

       सी.ए.ए. के अध्ययन से हवाई यात्राएं पहले से ज्यादा सुरक्षित होती जाती हैं। असफलताओं से सीखने की प्रेरणा इसी को कहते हैं।

        डॉक्टर्स भी असफलताओं के सहारे बेहतर स्वास्थ्य और लंबे जीवन को सुनिश्चित करते हैं। अक्सर जब कोई मरीज़ किसी अनजान कारण से मरता है तो डॉक्टर यह जानने के लिए पोस्टमॉर्टम करते हैं कि उसकी मौत का कारण क्या था। इस तरह वे मानव शरीर की कार्यप्रणाली के बारे में ज्यादा जान पाते हैं और कई दूसरे लोगों की ज़िंदगियाँ बचा पाते हैं।

           मेरा एक दोस्त सेल्स एक्जीक्यूटिव है जो हर महीने अपने सेल्समैनों को यह बताने के लिए एक मीटिंग करता है कि वे कोई महत्वपूर्ण बिक्री क्यों नहीं कर पाए। ग्राहक और सेल्समैन के बीच की पूरी वार्ता का विश्लेषण किया जाता है और यह सीखा जाता है कि किस तरह भविष्य में ऐसी गलतियां न की जाएँ जिनसे असफलता मिली।

          यही सफल फुटबॉल कोच भी करते हैं, जो जितने मैच हारते हैं. उससे कहीं ज्यादा मैच जीतते हैं। वे भी अपनी टीम के साथ हर मैच का विश्लषण करते हैं और खिलाड़ियों को उनकी गलतियाँ बताते हैं। कई कोच तो हर मैच की वीडियो फिल्म भी बनवाते हैं ताकि टीम अपनी आँखों के सामने अपनी गलत चालों को देख सकें। इसका उद्देश्य है। टीम अगला मैच बेहतर खेले।

          सी.ए.ए. के अधिकारी, सफल सेल्स एक्जीक्यूटिब्ज़, डॉक्टर, फुटबॉल कोच और हर क्षेत्र के प्रोफेशनल्स सफलता के इस सिद्धांत का अनुसरण करते हैं : हर असफलता से कुछ न कुछ बचा लो।

          जब हम असफल होते हैं तो हम भावनात्मक रूप से इतने दःखी और विचलित हो जाते हैं कि हम उससे सबक सीखना भूल जाते हैं।

        प्रोफ़ेसर जानते हैं कि फेल होने के बाद विद्यार्थी की प्रतिक्रिया से ही सफलता की उसकी संभावना पता चलती है। जब मैं डेट्रॉयट में 'वेन स्टेट यूनिवर्सिटी' में प्रोफेसर था, तो मैंने एक सीनियर विद्यार्थी को फेल कर दिया था। मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। इससे विद्यार्थी को गहरा धक्का लगा। उसने ग्रैजुएशन के बाद की योजनाएँ बना ली थीं और इस कारण उसकी हँसी उड़ना तय थी। उसके पास दो विकल्प थे: या तो वह एक साल और पढ़कर परीक्षा पास करे या फिर वह बिना डिग्री लिए कॉलेज छोड़कर चला जाए।

        मुझे आशा थी कि अपनी असफलता पर विद्यार्थी निराश होगा. शायद वह उत्तेजित भी हो। जब मैंने उसे यह समझाया कि वह असफल क्यों हुआ था, तो उसने यह माना कि उसने इस बार ठीक से पढ़ाई नहीं की थी।

       “परंतु,” उसने कहा, “मेरा पिछला रिकॉर्ड तो ठीक-ठाक है। आपने उसे ध्यान में क्यों नहीं रखा?"

        मैंने उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि हम हर साल का अलग-अलग मूल्यांकन करते हैं। मैंने यह भी जोड़ा कि कठोर शैक्षणिक नियमों के चलते नंबर तभी बढ़ाए जा सकते हैं जब जाँचने वाले प्रोफ़ेसर ने कोई गलती की हो।

        जब विद्यार्थी को यह पता चला कि उसके नंबर बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, तो वह काफ़ी गुस्सा हो गया। उसने कहा, "प्रोफेसर, मैं आपको इस शहर के 50 लोगों के नाम गिना सकता हूँ जो बेहद सफल हैं पर वे कभी कॉलेज नहीं गए, न ही उनके पास कोई डिग्री है। ग्रैजुएशन की डिग्री का महत्व ही क्या है? परीक्षा में थोड़े खराब नंबर मिलने के कारण क्या मुझे मेरी डिग्री नहीं मिलेगी?

        "भगवान का शुक्र है," उसने आगे कहा, "बाहर की दुनिया में लोग आप जैसे प्रोफ़ेसरों की तरह नहीं सोचते।"

        इस टिप्पणी के बाद मैं 45 सेकंड तक रुका। (मैंने यह सीखा है कि जब आपकी आलोचना हो, तो वाकयुद्ध से बचने का एक अच्छा तरीका जवाब देने में देरी करना है।)

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Friday, October 4, 2019

CHAPTER 10.3 काम में जुड़ने की यह दो प्रयोग करें।

                           यह दो प्रयोग करें

      1. छोटे परंतु कष्टदायक कामों को करने के लिए मशीनी तरीके का इस्तेमाल करें। उस काम के बुरे पहलुओं के बारे में सोचने के बजाय आप बिना सोचे उस काम को करना शुरू कर दें।

       शायद ज़्यादातर महिलाओं को बर्तन साफ़ करना सबसे कष्टदायक काम लगता होगा। मेरी माँ भी इसका अपवाद नहीं थीं। परंतु उन्होंने इस काम को फुर्ती से निबटाने का मशीनी तरीक़ा ईजाद कर लिया था, ताकि इसके बाद वे अपना मनचाहा काम कर सकें।

        जब वे डायनिंग टेबल से जाती थीं, तो वे मशीनी अंदाज़ में बर्तन इकट्ठे कर लेती थीं और उन्हें साफ़ करना शुरू कर देती थीं। कुछ ही मिनटों में उनका काम ख़त्म हो जाता था। क्या यह तरीका बर्तन "सिंक में जमा करते रहने” और उन्हें देख-देखकर चिंता करने से बेहतर नहीं
 है ?

        आज यह करके देखें : एक ऐसा काम चुन लें जो आपको नापसंद है। फिर, बिना उस बारे में सोचे, या बिना उससे डरे, उस काम को कर दें। नापसंदगी के छोटे-छोटे कामों को करने का यही तरीक़ा सबसे प्रभावी है।

     2. अगला कदम यह है कि आप विचार करने, योजनाएँ बनाने,समस्याएँ सुलझाने और दूसरे दिमागी कामों के लिए भी मशीनी तरीके का इस्तेमाल करें। आप मूड बनने का इंतज़ार करें, इसके बजाय बेहतर यही है कि आप बैठ जाएँ और अपने मूड को बना लें।

       यहाँ एक खास तकनीक दी जा रही है, जो आपकी काफ़ी मदद करेगी। पेंसिल और काग़ज़ का इस्तेमाल करें। पाँच सेंट की छोटी सी पेंसिल दुनिया का सबसे महान एकाग्रता यंत्र है। अगर मुझे एक बहुत शानदार, साउंड प्रफ़ ऑफ़िस और पेंसिल-कागज़ में से किसी एक को चुनना हो, तो मैं यक़ीनन पेंसिल और कागज़ को चुनूँगा। पेंसिल और कागज़ से आप अपने दिमाग को किसी समस्या से बाँध सकते हैं।

        जब आप किसी विचार को कागज़ पर लिखते हैं, तो आपका पूरा ध्यान अपने आप उस विचार पर केंद्रित होता है। ऐसा इसलिए होता है। क्योंकि आपका दिमाग एक साथ दो काम नहीं कर सकता। एक ही समय पर आपका दिमाग एक विचार को सोचे और दूसरे विचार को लिखे, यह नहीं हो सकता। और जब आप काग़ज़ पर कुछ लिखते हैं, तो आप दरअसल अपने दिमाग पर "लिख" रहे हैं। परीक्षणों से यह साबित हो चुका है कि अगर आप काग़ज़ पर लिखकर कोई चीज़ याद करते हैं, तो वह आपको लंबे समय तक और ज़्यादा अच्छी तरह याद रहती है।

          और एक बार आप एकाग्रता के लिए पेंसिल और काग़ज़ की इस तकनीक में पारंगत हो जाएँ, तो फिर आप शोरगुल के माहौल में भी सोच सकेंगे। जब आप सोचना चाहें, लिखना शुरू कर दें या डायग्राम बनाना शुरू कर दें। अपने मूड को बनाने का यह बेहतरीन तरीक़ा है।

         अब मैं आपको सफलता का जादुई फ़ॉर्मूला बताना चाहता हूँ। कल, अगले सप्ताह, बाद में, और किसी दिन, फिर किसी समय- यह सभी असफलता के शब्द कभी नहीं के पर्यायवाची हैं। बहुत सारे अच्छे सपने कभी सच नहीं हो पाते क्योंकि हम यही कहते रह जाते हैं, “मैं इसे किसी दिन शुरू करूँगा।" जबकि हमें यह कहना चाहिए, “मैं इसे अभी शुरू करता हूँ।"

           एक उदाहरण लें, पैसे बचाने का। हर व्यक्ति मानता है कि पैसे बचाना एक अच्छी बात है। परंतु यह अच्छी बात है, इसका यह मतलब नहीं है कि सभी लोग योजनाबद्ध तरीके से बचत करते हैं और निवेश करते हैं। कई लोगों का बचत करने का इरादा तो होता है परंतु बहुत कम लोग अपने इरादों पर अमल कर पाते हैं।

           एक युवा दंपति ने इस तरह बचत करना शुरू किया। बिल की तनख्वाह 1000 डॉलर थी, परंतु वह और उसकी पत्नी जेनेट हर माह 1000 डॉलर खर्च भी कर डालते थे। दोनों ही बचत करना चाहते थे, परंतु कोई न कोई ऐसा कारण आ जाता था जिससे वे कभी बचत नहीं कर पाए। सालों तक वे सोचते रहे, “जब मेरी तनख्वाह बढ़ेगी, तब हम बचत करना शुरू करेंगे।” “जब हमारी अमुक चीज़ की किस्तें ख़त्म हो जाएँगी, तब हम बचत करना शुरू करेंगे।” “अगले महीने,” “अगले साल।"

        आख़िरकार जेनेट को बचत करने की अपनी असफलता पर गुस्सा आ गया। उसने बिल से कहा, "देखो बिल, हम कभी बचत कर पाएँगे या नहीं।” बिल ने जवाब दिया, “हाँ, हमें करना तो है परंतु हम अभी कर ही क्या सकते हैं ?"

         परंतु इस बार जेनेट करो-या-मरो वाले मूड में थी। "हम सालों से बचत करने की सोच रहे हैं। हम इसलिए नहीं बचा पाते, क्योंकि हमने यह सोच रखा है कि हमसे बचत नहीं होगी। इसके बजाय अब हम यह सोचना शुरू कर दें कि हम बचत कर सकते हैं। मैंने आज एक विज्ञापन देखा जिसमें लिखा है कि अगर हम हर महीने 100 डॉलर भी बचाते हैं, तो 15 सालों में हमारे पास 18000 डॉलर जमा हो जाएँगे, और उसके साथ ही हमें 6600 डॉलर ब्याज भी मिलेगा। विज्ञापन में यह भी लिखा था कि खर्च करने के बाद बचत करना मुश्किल होता है, जबकि बचत करने के बाद तनख्वाह ख़र्च करना आसान होता है। अगर तुम साथ दो, तो मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी तनख्वाह का दस प्रतिशत हम शुरू में ही बचत खाते में डाल देंगे। अगर महीने के आखिर में हमें फाके भी करने पड़ें तो मैं उसके लिए तैयार हूँ। बिल, इस तरह अगर हम ठान लें, तो हम बचत कर सकते हैं।"

        बिल और जेनेट को कुछ महीनों तक तो मुश्किल आई, परंतु जल्दी ही उन्होंने अपने नए बजट के हिसाब से आसानी से घर चलाना सीख लिया। अब बचत करने में भी उनको उतना ही मज़ा आता है, जितना उन्हें पहले “ख़र्च करने” में आता था।

       किसी दोस्त को चिट्ठी लिखना चाहते हैं ? अभी लिख दें। आपके पास एक विचार आया है कि आपका बिज़नेस किस तरह बढ़ सकता है? उस विचार को अभी प्रस्तुत कर दें। बेंजामिन फ्रेंकलिन की सलाह याद रख, “कल पर वह काम न टालें, जिसे आप आज कर सकते हैं।"

याद रखें, अभी काम करने का तरीक़ा सफलता का तरीक़ा है, जबकि फिर किसी दिन या फिर कभी काम करने की सोच असफलता का तरीक़ा है।

एक दिन मैं अपनी पुरानी बिज़नेस मित्र से मिलने गया। वह एक कॉन्फ्रेंस से अभी हाल लौटी थी। जब मैंने उसे देखा तो मैंने महसूस किया कि वह किसी बात से परेशान थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह काफ़ी निराश थी। और मेरा अनुमान सही था।

        उसने आते ही कहा, “मैंने आज सुबह मीटिंग की क्योंकि मैं चाहती थी कि कंपनी की पॉलिसी में जो बदलाव प्रस्तावित है, उसके बारे में कुछ मदद मिल सके। परंतु मुझे किस तरह की मदद मिली? मेरे साथ छह लोग मीटिंग में थे और केवल एक ही व्यक्ति ने अपने विचारों का योगदान दिया। दो और लोगों ने कहा, परंतु उन्होंने सिर्फ मेरे शब्दों को दोहरा दिया। ऐसा लग रहा था जैसे मैं पत्थर से सिर फोड़ रही थी। मैं यह नहीं जान पाई कि प्रस्तावित पॉलिसी परिवर्तन के बारे में उन लोगों की क्या राय थी।

        “दरअसल,” उसने आगे कहा, “होना यह चाहिए था कि हर व्यक्ति मुझे यह बताता कि वह क्या सोचता था। आख़िरकार, इससे उन सभी को प्रभावित होना था।"

         मेरी मित्र को मीटिंग में कोई मदद नहीं मिली। परंतु अगर आप मीटिंग ख़त्म होने के बाद हॉल में जाते, तो आपको उन्हीं चुप्पे लोगों के मुँह से इस तरह की टिप्पणियाँ सुनने को मिल जातीं, “मेरी इच्छा तो हुई थी कि मैं कुछ कह दूँ...” “किसी ने यह क्यों नहीं कहा कि...", "मुझे नहीं लगता...” "हमें आगे बढ़ना चाहिए..." अक्सर पत्थर टाइप के यह लोग जो मीटिंग रूम में चुपचाप बैठे रहते हैं, मीटिंग के बाद बहुत बोलते हैं, जब उनके बोलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब वक्त निकल जाता है, तो वे जागते हैं और सक्रिय होते हैं।

       बिज़नेस मीटिंग में लोग आपकी राय, आपके विचार जानना चाहते हैं। जो व्यक्ति अपनी राय को अपने दिमाग की तिजोरी में ही बंद रखता है, वह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारता है।

        "बोलने की" आदत डालें। हर बार जब आप बोलने के लिए खड़े होते हैं, आपका आत्मविश्वास बढ़ता जाता है। अपने रचनात्मक विचारों के साथ आगे आएँ।

        हम सभी जानते हैं कि कॉलेज के विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी किस तरह करते हैं। जो नाम के एक विद्यार्थी ने भी एक शाम को बहुत पढ़ने का फैसला किया, क्योंकि अगले दिन उसकी परीक्षा थी। यहाँ यह बताया गया है कि उसके फैसले का क्या हुआ और उसकी शाम किस तरह गुज़री।

        जो शाम को 7 बजे पढ़ने के लिए तैयार था, परंतु उसका डिनर कुछ भारी हो गया था, इसलिए उसने सोचा कि वह कुछ देर टीवी देख ले। कुछ देर करते-करते उसने एक घंटे तक टीवी देखा क्योंकि सीरियल उसे पसंद आ गया था। 8 बजे वह अपनी टेबल पर बैठ गया, लेकिन तत्काल ही उठ गया क्योंकि उसे अचानक याद आ गया कि उसे अपनी गर्लफ्रेंड को फ़ोन करना है। इसमें 40 मिनट लग गए (उसने पूरे दिन उससे बात नहीं की थी)। किसी का फ़ोन आ गया, जिसमें 20 मिनट लग गए। अपनी डेस्क पर आते-आते जो की इच्छा हुई कि वह पिंग पॉन्ग खेल ले। इसमें एक और घंटा बर्बाद हो गया। पिंग पॉन्ग खेलने के बाद उसे पसीना आ गया था, इसलिए वह नहा भी लिया। नहाने के बाद उसे भूख लगी, क्योंकि पिंग पॉन्ग और नहाने के बाद भूख लगना स्वाभाविक था।

       और इस तरह उसकी शाम बर्बाद हो गई। उसके इरादे तो अच्छे थे, परंतु वह इरादों पर अमल नहीं कर पाया। आखिरकार एक बजे रात को उसने अपनी पुस्तक खोली, परंतु उसे इतनी नींद आ रही थी कि वह कछ समझ नहीं पा रहा था। आखिरकार उसने नींद के आगे हार मान ली। अगली सुबह उसने अपने प्रोफेसर को बताया, "मुझे लगता है कि आप मुझे अच्छे नंबर देंगे। मैंने इस परीक्षा के लिए सुबह दो बजे तक पढ़ाई की है।”

        जो कार्य करने में नहीं जुटा क्योंकि उसने कार्य करने की तैयारी में बहुत समय बर्बाद कर दिया। और जो ही “ज्यादा तैयारी" का एकमात्र शिकार नहीं है। जो नाम का सेल्समैन, या एक्जीक्यूटिव, या प्रोफेशनल वर्कर, जोसेफाइन नाम की हाउसवाइफ़ - यह सभी इसी तरह की तैयारी करते हैं। कोई भी महत्वपूर्ण काम शुरू करने से पहले वे इसीलिए गपशप करते हैं, कॉफ़ी पीते हैं, पेंसिल तेज़ करते हैं, पढ़ते हैं, मेज़ साफ़ करते हैं, टीवी देखते हैं और कई ऐसी चीजें करते हैं जिनमें फ़ालतू समय बर्बाद होता है।

       परंतु इस आदत को दूर करने का एक तरीका है। अपने आपसे यह कहें, “मैं अभी शुरू करने की हालत में हूँ। काम टालने से मुझे कोई फायदा नहीं होगा। मैं तैयारी में जितना समय और ऊर्जा बर्बाद करूँगा, उसका इस्तेमाल में काम करने में कर सकता हूँ।"

        मशीन के पुर्जे बनाने वाली कंपनी के एक बॉस ने अपने सेल्स एक्जीक्यूटिव्ज़ से यह कहा, “इस बिज़नेस में हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जिनके पास दमदार विचार हों और उनमें अपने विचारों पर अमल करने का दम भी हो। हमारी कंपनी का हर काम बेहतर तरीके से हो सकता है, चाहे उत्पादन हो. मार्केटिंग हो या कोई अन्य क्षेत्र हो। मैं यह नहीं कहना चाहता कि हम अभी ख़राब काम कर रहे हैं। हम अच्छा काम कर रहे हैं। परंतु हर सफल कंपनी की तरह, हमें नए सामानों, नए बाज़ारों, नए विचारों और नए उपायों की ज़रूरत है। हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो पहल करें। वही हमारी टीम के कप्तान बनने क़ाबिल हैं।"

         पहल करना कर्म करने का एक खास पहलू है। पहल करने का मतलब है बिना किसी के कहे कोई महत्वपूर्ण काम करना। पहल करने वाला व्यक्ति हर बिज़नेस और प्रोफ़ेशन में अलग दिख जाता है, और उसकी आमदनी भी काफ़ी होती है।

        मुझे एक दवाई बनाने वाली कंपनी का व्यक्ति मिला। वह मार्केटिंग रिसर्च का डायरेक्टर था। उसने मुझे बताया कि वह इस पद पर कैसे पहुँचा। पहल की शक्ति का यह एक अच्छा सबूत है।

       “पाँच साल पहले मेरे मन में एक विचार आया," उसने मुझे बताया। “मैं तब एक मिशनरी सेल्समैन की तरह काम कर रहा था, जो होलसेलर्स से मिला करता था। मैंने यह पाया कि हमारे पास अपने ग्राहकों के बारे में आँकड़ों की कमी थी। मैंने कंपनी के हर व्यक्ति से इस बारे में बात की। मैंने उन्हें बताया कि हमें मार्केट रिसर्च की ज़रूरत है। पहले तो सबने मेरी बात अनसुनी कर दी, क्योंकि मैनेजमेंट को इसका महत्व समझ में नहीं आया।

        "परंतु मुझे पक्का विश्वास था कि हमारी कंपनी में मार्केटिंग रिसर्च होनी चाहिए, इसलिए मैंने पहल करने का फैसला कर लिया। मैंने मैनेजमेंट की अनुमति के बाद 'फैक्ट्स ऑफ़ ड्रग मार्केटिंग' नाम की एक मासिक रिपोर्ट तैयार की। मैंने हर जगह से जानकारी इकट्ठी की। मैं ऐसा हर महीने करता रहा और जल्दी ही मैनेजमेंट और दूसरे सेल्समैनों को यह समझ आ गया कि मैं जो कर रहा हूँ, वह सचमुच महत्वपूर्ण है। इसके बाद वे भी इस काम में दिलचस्पी लेने लगे। अपनी रिसर्च शुरू करने के एक साल बाद मुझे अपनी नियमित नौकरी से हटा दिया गया और मुझसे कहा गया कि मैं सिर्फ अपने विचारों को विकसित करने पर पूरा ध्यान हूँ।

       "बाक़ी बातें तो साधारण तरीके से हुई। आज मेरे पास दो सहयोगी, एक सेक्रेटरी, और तीन गुना ज्यादा तनख्वाह है।"

       लीडर बनने की कला विकसित करने के लिए यहाँ पर दो अभ्यास दिए गए हैं:

     1. संघर्ष करने वाला बनें। जब आप ऐसी कोई बात सोचें जो आपके हिसाब से की जानी चाहिए तो आप तत्काल उस विचार को उठा लें और फिर उसके लिए संघर्ष शुरू कर दें।

       मेरे पड़ोस में ही एक नई कॉलोनी बन रही थी जो लगभग दो तिहाई बन चुकी थी, परंतु इसके बाद उसका विस्तार ठप्प हो गया। कुछ ऐसे परिवार वहाँ रहने आ गए थे जो लापरवाह लोग थे। इससे कई अच्छे परिवारों को उस जगह से अपने मकान बेचकर जाना पड़ा। जैसा अक्सर होता है, परवाह करने वाले लोगों को भी लापरवाह लोगों की सोहबत का असर हुआ और पूरी कॉलानी ही लापरवाह हो गई। परंतु हैरी एल. ऐसा नहीं हुआ। वह माहौल की परवाह करता था और उसने फैसला किया कि वह इसे अच्छी कॉलोनी बनाने के लिए संघर्ष करेगा।

         हैरी ने अपने कुछ दोस्तों से बात की। उसने बताया कि यह कॉलोनी एक बेहतरीन कॉलोनी बन सकती है परंतु इसके लिए प्रयास करने होंगे वरना यह थर्ड क्लास कॉलोनी बनकर रह जाएगी। हैरी के उत्साह और पहल का स्वागत हुआ। जल्दी ही वहाँ पर साफ़-सफ़ाई शुरू हो गई। बगीचे की योजना पर काम शुरू हो गया। वृक्षारोपण अभियान शुरू किया गया। बच्चों के लिए खेल का मैदान बन गया। स्विमिंग पूल भी बन गया लापरवाह परिवार भी उत्साही समर्थक बन गए। पूरी कॉलोनी में एक नई जान आ गई थी। अब वहाँ से निकलने पर दिल खुश हो जाता है। इससे यह पता चलता है कि संघर्ष करने वाला व्यक्ति चाहे, तो नरक को भी स्वर्ग में बदल सकता है।

        क्या आपको ऐसा लगता है कि आपके बिज़नेस में एक नया डिपार्टमेंट बनना चाहिए, या आपकी कंपनी को बाज़ार में एक नया सामान लाना चाहिए या किसी और तरीके से तरक्क़ी करनी चाहिए? अगर आपको ऐसा लगता है, तो उस विचार के लिए संघर्ष करें। क्या आपको लगता है कि आपके चर्च को नई इमारत की ज़रूरत है ? अगर हाँ, तो इसके लिए पहल और संघर्ष करें। क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चों के स्कूल में कंप्यूटर लगने चाहिए? अगर हाँ, तो इसके लिए पहल करें और ऐसा संभव बनाएँ।

        और आप यह बात जान लें : हालाँकि हर संघर्ष शुरुआत में एक व्यक्ति का संघर्ष ही होता है, परंतु अगर विचारों में दम हो, तो जल्दी ही बहुत से लोग आपके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। 

        कर्मठ और संघर्षशील व्यक्ति बनें।

      2. स्वयंसेवी बनें। हममें से हर एक के जीवन में ऐसा मौक़ा आया होगा जब हम किसी संस्था में स्वयंसेवा करना चाहते होंगे, परंतु हमने ऐसा नहीं किया। कारण क्या था? डर। यह डर नहीं कि हम काम नहीं कर पाएँगे, बल्कि यह डर कि लोग क्या कहेंगे। यह डर कि लोग हम पर हँसेंगे, हमें जुगाडू कहेंगे, हमें महत्वाकांक्षी समझेंगे - यही डर बहुत से लोगों को आगे बढ़ने से रोकता है।

        यह स्वाभाविक है कि आप लोगों का समर्थन, उनकी तारीफ़ चाहे  परंतु खुद से पूछे, “मैं किन लोगों की तारीफ़ चाहता हूँ : उन लोगों का जो मुझ पर ईर्ष्या के कारण हँसते हैं या उन लोगों की जो कर्मठता से काम करके सफल होते हैं ?" सही विकल्प क्या है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है।

         स्वयसैवी अलग दिख जाता है। उसकी तरफ़ खास तवज्जो दी जा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह स्वयंसेवा करके अपनी विशष योग्यता और महत्वाकांक्षा को सबके सामने ले आता है। निश्चित रूप से स्वयंसेवक को विशेष काम सौंपे जाएंगे।

       आप बिज़नेस, मिलिट्री या अपने समुदाय के जिन लीडर्स को जानते हों, उनके बारे में सोचें। क्या वे कर्मठ लगते हैं या वे निठल्ले लगते हैं? 

      दस में से दसों लीडर कर्मठ होंगे, ऐसे लोग होंगे जो काम पूरा करके दिखाते हैं। वह व्यक्ति जो हाशिए पर खड़ा रहता है, वह व्यक्ति जो दुःखी होता रहता है, वह निठल्ला होता है, जो सिर्फ इसलिए वहीं रह जाता है क्योंकि वह कर्म के मैदान में नहीं उतरता। जो विचार करता है और उस पर अमल करता है, उस कर्मठ व्यक्ति के पीछे कई लोग आ जाते हैं और वह लीडर बन जाता है।

       जो व्यक्ति काम करता है, लोग उस पर विश्वास करते हैं। वे मान लेते हैं कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है।

      मैंने किसी की तारीफ़ इस बात के लिए नहीं सुनी, “वह व्यक्ति किसी को डिस्टर्ब नहीं करता," "वह व्यक्ति काम नहीं करता,” या “जब तक उसे बताया न जाए, वह कुछ नहीं करता।"

       क्या आपने इन बातों के लिए किसी की तारीफ़ होते देखी है ?

      कर्म की आदत को बढ़ावा दें

इन मुख्य बिंदुओं का अभ्यास करें :

1. “कर्मठ" बनें। काम करने वाला बनें। “काम टालने वाला” न बनें।

2. परिस्थितियों के आदर्श होने का इंतज़ार न करें। वे कभी आदर्श नहीं होंगी। भविष्य की बाधाओं और कठिनाइयों की उम्मीद करें और जब वे आएँ, तब आप उन्हें सुलझाने का तरीका खोजें।

3. याद रखें, केवल विचारों से सफलता नहीं मिलती। विचारों का मूल्य तभी है, जब आप उन पर अमल करें।

4. डर भगाने और आत्मविश्वास हासिल करने के लिए कर्म करें। जिस काम से आप डरते हों, वह करें और आपका डर भाग जाएगा।

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Thursday, October 3, 2019

CHAPTER 10.2 काम में जुटने की आदद डालो और समस्या दूर करने का तरीका


       आप इस समस्या को कैसे दूर कर सकते हैं ? यहाँ दो तरीके सुझाए जा रहे हैं जो आपकी इस आदत को दूर कर देंगे:

1. भविष्य में आने वाली कठिनाइयों का अनुमान लगाएँ। हर नए काम में जोखिम, समस्या और अनिश्चितताएँ होती हैं। मान लें कि आप कार से शिकागो से लॉस एंजेल्स जाना चाहते हैं, और आप तब तक चलना शुरू नहीं करेंगे, जब तक कि आपको इस बात की पूरी गारंटी न मिल जाए कि रास्ते में कोई बाधा नहीं आएगी, आपकी गाड़ी ख़राब नहीं होगी, मौसम ख़राब नहीं होगा, कोई शराबी ड्राइवर आपको तंग नहीं करेगा, और किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं होगा, तो क्या होगा? आप कब चलना शुरू करेंगे? कभी नहीं! इसी यात्रा की तैयारी आप इस तरह से भी कर सकते हैं कि आप यात्रा का नक्शा साथ रख लें, अपनी कार को चेक करा लें, और इस तरह पूरी सावधानी बरतें। परंतु आप सारे ख़तरों को न तो भाँप सकते हैं, न ही उन्हें ख़त्म कर सकते हैं।

     2. जब समस्याएँ और बाधाएँ आएँ, तब उनसे निबटें। सफल व्यक्ति की योग्यता इस बात से नहीं जाँची जाती कि वह काम शुरू करने के पहले ही सारी बाधाओं को हटा देता है, बल्कि इस बात से जाँची जाती है कि जब भी उसकी राह में बाधाएँ आती हैं, वह उनसे निबटने के तरीके खोज लेता है। बिज़नेस, शादी, या किसी भी अन्य चीज़ में आप पुलों को तभी पार कर सकते हैं, जबकि आप पुल पर हों।

हम सभी समस्याओं के ख़िलाफ़ बीमा पॉलिसी नहीं खरीद सकते।

         अपने विचारों के बारे में कुछ करने का मन बना लें। पाँच या छह साल पहले एक बहुत ही योग्य प्रोफ़ेसर ने मुझे बताया कि वे एक पुस्तक लिखने की योजना बना रहे हैं। वे कुछ दशक पहले के एक विवादास्पद व्यक्ति की जीवनी लिखना चाहते थे। उनके विचार न सिर्फ रोचक थे. बल्कि शानदार थे। उनमें दम था. लोगों को मंत्रमग्ध करने की क्षमता थी।प्रोफ़ेसर को पता था कि वह क्या कहना चाहते थे और उन्हें अपनी बात किस तरह कहनी चाहिए। इस पुस्तक के पूरा होने पर उन्हें अंदरूनी संतोष तो मिलता ही, साथ ही प्रतिष्ठा और पैसा भी काफ़ी मिलता।

        पिछले साल मैं उसी मित्र से फिर मिला और मैंने अनजाने में उससे यह पूछ लिया कि क्या उसकी पुस्तक पूरी हो गई। (यह मूर्खतापूर्ण सवाल था क्योंकि इससे मैंने उसके पुराने घाव को कुरेद दिया था।)

        नहीं, वह पुस्तक नहीं लिख पाया। कुछ समय तक तो वह यही सोचता रहा कि वह इसका क्या कारण बताए। आखिरकार उसने कहा कि वह बेहद व्यस्त था, उसके पास दूसरी “ज़िम्मेदारियाँ" थीं और इसलिए उसे पुस्तक लिखने की फुरसत ही नहीं मिली।

         वास्तव में प्रोफ़ेसर ने इस विचार को अपने मानसिक क़ब्रिस्तान में गहरे दफ़ना दिया था। उसने अपने दिमाग में नकारात्मक विचारों को बढ़ने दिया था। उसने यह कल्पना कर ली थी कि उसे पुस्तक लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और उसे कई त्याग भी करने होंगे। उसने उन सभी कारणों पर विचार कर लिया था जिनके कारण उसकी योजना असफल हो सकती थी।

        विचार महत्वपूर्ण हैं। हम इस बात को अच्छी तरह समझ लें। अगर हमें कुछ भी बनाना है या सुधारना है तो उसकी पहली शर्त यह है कि हमारे पास विचार हों। सफलता उस व्यक्ति के दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती जिसके पास विचार नहीं होते।

       परंतु हम इस बिंदु को अच्छी तरह से समझ लें। केवल विचारों का ही महत्व नहीं होता। विचारों का महत्व तभी होता है जब उन पर अमल किया जाए। अगर आपके मन में यह विचार आता है कि आप अपने बिज़नेस को किस तरह बढ़ाएँ, तो केवल विचार करने भर से आपका बैंक बैलेंस नहीं बढ़ जाता।

       हर दिन हज़ारों लोग अच्छे विचारों को दफनाते रहते हैं क्योंकि उनमें उन पर अमल करने की हिम्मत नहीं होती।

      और इसके बाद, उन विचारों के भूत उन्हें सताने के लिए आ जाते हैं। इन दो विचारों को अपने दिमाग में गहरे बैठ जाने दें। पहली बात तो यह, कि अपने विचारों पर अमल करके उन्हें मूल्यवान बनाएँ। चाहे विचार कितना ही अच्छा हो, यदि आप उस पर अमल नहीं करेंगे तो
आपको ज़रा भी लाभ नहीं होगा।

         दूसरी बात यह है कि अपने विचारों पर अमल करें और मन की शांति हासिल करें। किसी ने एक बार कहा था कि सबसे दुःखद शब्द हैं : काश मैंने ऐसा किया होता! हर दिन आप किसी न किसी को ऐसी बात करते सुनते होंगे, “अगर मैं 1952 में इस बिज़नेस में गया होता, तो आज मैं लाखों में खेल रहा होता।" या "मुझे लगता था कि ऐसा ही होगा। काश मैंने उस वक्त अपने दिल की बात सुनी होती!" अगर अच्छे विचार पर अमल न किया जाए, तो उससे काफ़ी मनोवैज्ञानिक पीड़ा भी होती है। परंतु अगर अच्छे विचार पर अमल किया जाए तो उससे हमें मानसिक शांति मिलती है।

     क्या आपके पास कोई अच्छा विचार है? तो फिर देर किस बात की है, उस पर अमल करें। काम करके डर का इलाज करें औरआत्मविश्वास हासिल करें। यह याद रखने लायक बात है। काम करने से आपका आत्मविश्वास बढ़ता और प्रबल होता है। काम न करने से डर बढ़ता और प्रबल होता है। इसलिए डर को दूर करने के लिए, उस काम को कर दें। अपने डर को बढ़ाने के लिए- इंतज़ार करते रहें, काम को टालते रहें, बाद में करने की सोचें।

        एक बार मैंने एक युवा पैराटूपर इन्स्ट्रक्टर के मुँह से सुना, “कूदने में कोई दिक्कत नहीं है। कुदने के पहले इंतज़ार करते वक्त मुश्किल आती है। जब कूदने का समय आता है तो मैं हमेशा यह कोशिश करता हूँ कि लोगों को ज़्यादा सोचने का मौक़ा न मिले। कई बार ऐसा हुआ है कि किसी प्रशिक्षु ने इस बारे में ज़्यादा सोच लिया कि उसके साथ क्या बुरा हो सकता है और यह सोचकर वह घबरा गया। अगर हम उसे अगली ट्रिप में कूदने के लिए तैयार नहीं कर पाए, तो वह ज़िंदगी में कभी पैराट्रपर नहीं बन सकेगा। आत्मविश्वास उसे तभी मिलेगा जब वह कूद जाएगा। जब तक वह कूदने से बचता रहेगा, उसे टालता रहेगा तब तक वह डरता ही रहेगा।"

          इंतज़ार करना विशेषज्ञों को भी नर्वस कर देता है। टाइम मैग्ज़ीन में लिखा गया था कि एडवर्ड आर. मरो, जो देश के बेहतरीन न्यूज़रीडर हैं, जब टेलीविज़न पर आने वाले होते हैं तो वे काफ़ी नर्वस हो जाते हैं और उन्हें पसीना आने लगता है। परंतु एक बार वे काम में जुट जाते हैं। तो फिर उनका डर काफूर हो जाता है। कई अभिनेता भी इसी तरह की प्रक्रिया से गुज़रते हैं। सभी इस बारे में एकमत हैं कि स्टेज के डर का एक ही इलाज है स्टेज पर उतरना या कर्म करना। जनता के सामने मंच पर आ जाने के बाद डर, चिंता, तनाव सब दूर हो जाता है।

          कर्म से डर दूर हो जाता है। एक बार हम अपने दोस्त के घर गए जहाँ उसका पाँच साल का बच्चा सोने के आधे घंटे बाद ही जाग गया और रोने लगा। बच्चे ने एक डरावनी फिल्म देखी थी और उसे यह डर लग रहा था कि राक्षस आकर उसे उठा ले जाएगा। बच्चे के पिता ने उसे समझाया। उसके समझाने का तरीका सचमुच लाजवाब था। उसने यह नहीं कहा, "फ़िक्र मत करो, बेटे, कोई भी तुम्हें कहीं उठाकर नहीं ले जाएगा। चुपचाप सो जाओ।" इसके बजाय उसने सकारात्मक कार्य किया। उसने बच्चे के सामने सारी खिड़कियों की जाँच की और इससे बच्चे को यह विश्वास हो गया कि सभी खिड़कियाँ अच्छी तरह बंद हैं। इसके बाद उसने बच्चे की प्लास्टिक की बंदूक उसके पास की टेबल पर रख दी और कहा, “बिली, वैसे अगर तुम्हें कोई दिक़्क़त आए, तो यह बंदूक तुम्हारे पास ही रखी है।" अब जाकर छोटे बच्चे को चैन मिला, उसका डर दूर हुआ और चार मिनट बाद ही वह गहरी नींद में सो गया।

         कई डॉक्टर लोगों को हानिरहित निष्क्रिय “दवाइयाँ” इसलिए देते हैं। ताकि उनके मन को संतोष रहे। लोग डॉक्टर से नींद की गोली माँगते हैं, डॉक्टर उन्हें झूठ-मूठ की नींद की गोली पकड़ा देता है। लोगों को गोली निगलने के बाद ऐसा लगता है कि उन्हें अच्छी नींद आती है, हालाँकि गोली में कोई दवाई नहीं थी, इसके बावजूद उन पर इसका मनोवैज्ञानिक असर होता है और उन्हें अपनी तबीयत ज़्यादा अच्छी महसूस होती है।

         यह स्वाभाविक है कि हमें किसी न किसी तरह का डर सताए। इसका सामना करने के आम तरीके कई बार आपको कारगर नहीं लगेंगे। मैं कई सेल्समैनों से मिला हूँ जिन्होंने डर का इलाज करने की कोशिश की है जैसे उन्होंने ग्राहक के घर के चारों तरफ़ तीन चक्कर लगाए हैं या एक कॉफ़ी ज्यादा पी है। परंतु इन चीज़ों से समस्या हल नहीं होती। इस तरह के डर को दूर करने का- हाँ, बल्कि किसी भी तरह के डर को दूर करने का एकमात्र तरीक़ा यह है कि उस काम को कर दिया जाए।

         अगर आपको किसी को फ़ोन करने में डर लगता है, तो आप फ़ोन कर दीजिए और आपका डर ग़ायब हो जाएगा। अगर आप इसे टालते जाएँगे तो आपके लिए फ़ोन करना दिनोंदिन मुश्किल होता जाएगा।

       डॉक्टर के पास चेकअप करवाने के लिए जाने में आपको घबराहट होती है ? जाइए और आपकी चिंता दूर हो जाएगी। हो सकता है कि आपको कोई गंभीर बीमारी न हो. और अगर हो भी, तो कम से कम आपको यह तो पता चल जाएगा कि आप किस हाल में हैं। अगर आप
अपने चेकअप को टालते रहेंगे तो आपका डर बढ़ता जाएगा और एक न एक दिन आप सचमुच इसी डर और चिंता के कारण बीमार पड़ जाएंगे।

         अगर आपको अपने बॉस के साथ किसी समस्या पर चर्चा करने में डर लगता हो, तो चर्चा कर लें और आप पाएंगे कि आपकी चिंताएँ चुटकियों में दूर हो गई हैं।

       आत्मविश्वास जगाएँ। कर्म करके डर को दूर भगाएँ।

     अपने मानसिक इंजन को चालू करें- मशीनी तरीके से

एक युवक लेखक बनना चाहता था, परंतु उसने जो कुछ लिखा था वह सफल लेखन नहीं कहा जा सकता था। इस लेखक ने मेरे सामने यह स्वीकार किया, “मेरी समस्या यह है कि कई बार पूरा दिन या पूरा हफ्ता निकल जाता है और मैं एक पेज भी नहीं लिख पाता।

       उसने कहा, “लेखन रचनात्मक कार्य है। इसके लिए आपको प्रेरणा मिलनी चाहिए। आपका मूड होना चाहिए।"

       यह सच है कि लेखन रचनात्मक होता है, परंतु मैं आपको एक सफल लेखक की बात बताना चाहता हूँ जिसने कहा था कि यही वह "राज़" की बात है जिसके कारण वह इतना सफल लेखन कर पाया।

“मैं 'दिमाग को मजबूर करने वाली' तकनीक का इस्तेमाल करता हूँ। मेरे पास हर काम की डेडलाइन मौजूद होती है और मैं प्रेरणा के आसमान से उतरने का इंतज़ार नहीं कर सकता। मैं मूड के सही होने का इंतज़ार भी नहीं कर सकता। मुझे मूड बनाना पड़ता है। यह रहा मेरा तरीक़ा। मैं अपनी टेबल-कुर्सी पर बैठ जाता हूँ। फिर मैं अपनी पेंसिल उठाकर लिखने बैठ जाता हूँ। जो भी मन में आता है, मैं लिखने लगता हूँ। मैं हाथ चलाता हूँ और कुछ समय बाद मुझे पता ही नहीं चलता कि कब मेरा मस्तिष्क सही दिशा में चला जाता है और मुझे प्रेरणा मिल जाती है और मेरा सचमुच ही लिखने का मूड बन जाता है।"

        “कई बार, जब मैं नहीं लिख रहा होता हूँ तब भी मेरे दिमाग में अचानक ज़ोरदार विचार आ जाते हैं, परंतु ऐसे विचार मेरे लिए बोनस की तरह हैं। ज्यादातर अच्छे विचार मेरे दिमाग़ में तभी आते हैं जब मैं काम करने बैठ जाता हूँ।"

       कर्म होने के पहले कर्म करना पड़ता है। यह प्रकृति का नियम है। कोई भी चीज़ अपने आप शुरू नहीं होती, वे यंत्र भी नहीं जिनका आप रोज़ाना इस्तेमाल करते हैं।

       आपके घर में ऑटोमेटिक एयरकंडीशनर होगा, परंतु आपको अपना मनचाहा तापमान तो चुनना ही पड़ता है (कर्म करना पड़ता है)। आपकी कार अपने आप गियर बदल लेती है, परंतु उससे पहले आपको सही लीवर दबाना पड़ता है। यही सिद्धांत दिमाग के कर्म के बारे में भी सही है। आपको अपने दिमाग को सही गियर में लाना होगा, तभी यह आपके लिए सही काम करेगा।

        एक युवा सेल्स-मैनेजर ने बताया कि वह किस तरह अपने सेल्समैनों को “मशीनी तरीके" से दिन शुरू करने का प्रशिक्षण देता है।

        "हर सेल्समैन जानता है कि घर-घर जाकर सामान बेचने वाले सेल्समैनों को कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हर सेल्समैन को सुबह की पहली बिक्री से डर लगता है। वह जानता है कि उसका दिन भारी गुज़रेगा, इसलिए वह पहले घर का दरवाज़ा खटखटाने से बचता रहता है। वह दो कप कॉफ़ी ज़्यादा पीता है, वह अड़ोस-पड़ोस में फ़ालतू घूमता रहता है और दर्जनों बेकार काम करता है सिर्फ इसलिए कि वह पहले घर का दरवाज़ा खटखटाने से बच सके।

        “मैं हर नए व्यक्ति को इस तरह सिखाता हूँ। मैं उसे बताता हूँ कि शुरू करने का एक ही तरीक़ा होता है और वह है शुरू करना। काम को टालो मत। उसके बारे में ज्यादा सोचो मत। बस शुरू कर दो। अपनी गाड़ी खड़ी करो। अपना सैंपल केस निकालो। दरवाज़े तक जाओ। घंटी बजाओ। मुस्कराओ। 'गुड मॉर्निंग' कहो। और अपनी बात मशीनी तरीके से ग्राहक के सामने रखो और इसके बारे में न तो ज़्यादा चिंता करो, न ही सोचो। इस तरह दिन शुरू करने से आपकी हिचक दूर हो जाती है। दूसर-तीसरे घर के दरवाजे के सामने पहुँचते-पहँचते आपका दिमाग पेना हो जाएगा और आपकी प्रस्तुतियाँ अपने आप प्रभावी हो जाएंगी।"

         एक व्यक्ति ने कहा था कि जिंदगी की सबसे बड़ी समस्या गर्म बिस्तर से निकलकर ठंडे कमरे में आना थी। और उसकी बात में दम था। आप जितनी देर तक बिस्तर पर पड़े रहेंगे और सोचते रहेंगे कि बाहर निकलना कितना कष्टदायक है, ऐसा करना आपके लिए उतना ही मुश्किल होता जाएगा। इस तरह की सीधी-सादी सी बात में भी, जिसमें आपको अपनी चादर हटाकर अपने पैरों को फ़र्श पर रखना है, आपको डर लगता है।

       संदेश स्पष्ट है। जो लोग दुनिया में कुछ कर गुज़रते हैं वे इस बात का इंतज़ार नहीं करते कि कब उनका मूड सही होगा; बल्कि वे मूड को सही करने की सामर्थ्य रखते हैं।

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Wednesday, October 2, 2019

CHAPTER 10.1 काम में जुटने की आदत डालें

              काम में जुटने की आदत डालें

       हर क्षेत्र के दिग्गज इस बात पर सहमत हैं: ऊँची पोस्ट के लिए योग्य (व्यक्ति नहीं मिलते। जैसी कहावत है, चोटी पर हमेशा काफ़ी जगह खाली रहती है। एक एक्जीक्यूटिव का कहना था कि बहुत सारे लोगों में तकनीकी काबिलियत तो होती है, परंतु उनमें सफलता के एक मूलभूत तत्व की कमी रहती है। वह तत्व है काम पूरा करना या परिणाम देना। 

        हर बड़े काम में - चाहे वह बिज़नेस चलाना हो, ऊँचे स्तर की सेल्समैनशिप हो, विज्ञान, सेना या सरकार हो - आपको एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत पड़ती है जो न सिर्फ सोचता हो, बल्कि काम भी करता हो। जब भी अफ़सर किसी महत्वपूर्ण कर्मचारी को नियुक्त करते हैं तो वे अक्सर इस तरह के सवाल पूछते हैं, “क्या वह यह काम कर पाएगा?" "क्या वह पूरा काम कर सकता है ?” “क्या वह खुद ही काम में जुटा रहेगा या उसे बार-बार याद दिलाना पड़ेगा?" "क्या वह काम पूरा करेगा या सिर्फ बातें ही करता रहेगा?"

    
        इन सारे सवालों का लक्ष्य एक ही है : यह पता लगाना कि क्या वह व्यक्ति कर्मठ है, क्या वह व्यक्ति काम का है।

         उत्कृष्ट विचार ही पर्याप्त नहीं होते। एक साधारण विचार पर भी अगर अमल किया जाए और उसे विकसित किया जाए तो उसके अच्छे परिणाम निकलते हैं। दूसरी तरफ़, अगर आपके पास सर्वश्रेष्ठ विचार भी हो और आप उस पर अमल नहीं कर पाएँ, तो वह बेकार है क्योंकि वह आपके दिमाग में ही पैदा होता है और वहीं मर जाता है।

         महान व्यापारी जॉन वानामेकर अक्सर कहा करते थे, “कोई भी चीज़ सिर्फ़ सोच लेने भर से नहीं हो जाती।"

         इस बारे में विचार करें। इस दुनिया की हर चीज़, उपग्रह और गगनचुंबी इमारतों से लेकर बेबी फूड तक, सिर्फ एक विचार था जिस पर किसी ने मेहनत की है।

         जब आप सफल और असफल दोनों तरह के लोगों का अध्ययन करते हैं, तो आप पाएँगे कि आप उन्हें दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं। सफल लोग “कर्मठ" होते हैं। औसत व्यक्ति साधारण होता है, जबकि असफल लोग “निठल्ले" होते हैं।

        हम दोनों समूहों के अध्ययन से सफलता का सिद्धांत खोज सकते हैं। मिस्टर कर्मठ काम करने वाले होते हैं। वे काम शुरू करते हैं, उसे पूरा करते हैं और उनके दिमाग में विचार और योजनाएँ होती हैं। मिस्टर निठल्ले एक “अकर्मण्य" व्यक्ति होते हैं। वे काम को टालते रहते हैं जब तक कि वे यह साबित न कर दें कि वह काम उन्हें क्यों नहीं करना चाहिए, या वह काम वे क्यों नहीं कर सकते, या जब तक काम का वक़्त ही न निकल जाए।

          मिस्टर कर्मठ और मिस्टर निठल्ले के बीच का अंतर अनगिनत चीज़ों में दिखता है। मिस्टर कर्मठ छुट्टियाँ मनाने की योजना बनाते हैं। वे छुट्टियाँ मनाकर आ जाते हैं। मिस्टर निठल्ले छुट्टियाँ मनाने की सोचते हैं। परंतु वे उसे “अगले" साल तक के लिए टाल देते हैं। मिस्टर क. निर्णय लेते हैं कि उन्हें नियमित रूप से चर्च जाना चाहिए। और वह ऐसा करते हैं। मिस्टर नि. सोचते हैं कि चर्च जाना एक अच्छा विचार है, परंतु वे ऐसा करने से किसी न किसी कारण से बचते रहते हैं। मिस्टर क. महसूस करते हैं कि उन्हें किसी की उपलब्धि पर उसे बधाई देनी चाहिए। वे चिट्ठी लिख देते हैं। मिस्टर नि. को चिट्ठी लिखने से बचने का कोई बहाना मिल जाता है और वे चिट्ठी कभी नहीं लिख पाते।

       यह अंतर बड़ी चीजों में भी साफ़ दिखाई देता है। मिस्टर क. अपना खुद का बिज़नेस खड़ा करना चाहते हैं। वे ऐसा कर लेते हैं। मिस्टर नि. भी खुद का बिज़नेस खड़ा करना चाहते हैं, परंतु उन्हें समय रहते ही कोई ऐसा “बेहतरीन" बहाना मिल जाता है जिसके कारण वे कभी ऐसा नहीं कर पाते। मिस्टर क., 40 साल की उम्र में, किसी नए काम में हाथ डालने का फ़ैसला करते हैं। वे ऐसा सफलतापूर्वक कर लेते हैं। यही विचार मिस्टर नि. के मन में आता है, परंतु वे इस बात पर सोचते ही रहते हैं और कभी कुछ कर नहीं पाते।

         इन दोनों व्यक्तियों यानी कि मिस्टर कर्मठ और मिस्टर निठल्ले के बीच का अंतर हर तरह के व्यवहार में भी साफ़ झलकता है। मिस्टर क. जो काम करना चाहते हैं वे उसे करके दिखा देते हैं और इसके फलस्वरूप उन्हें आत्मविश्वास, अंदरूनी सुरक्षा की भावना, आत्मनिर्भरता और ज्यादा आमदनी इत्यादि चीजें मिलती हैं। मिस्टर नि. कभी भी अपना मनचाहा काम नहीं कर पाते, क्योंकि वे काम करना शुरू ही नहीं करते। इसके फलस्वरूप उनका आत्मविश्वास कम होता जाता है, उनकी आत्मनिर्भरता समाप्त हो जाती है और वे औसत दर्जे की ज़िंदगी जीने के लिए विवश रहते हैं।

        मिस्टर कर्मठ कछ करते हैं। मिस्टर निठल्ले “करना तो चाहते हैं, पर कभी कुछ शुरू नहीं कर पाते।”

         हर व्यक्ति कर्मठ बनना चाहता है। इसलिए आइए काम शुरू करने और फिर उसे पूरा करने की आदत डालें।

        बहुत से निठल्ले लोग इस तरह के इसलिए बने क्योंकि वे इस बात का इंतज़ार करते हैं कि परिस्थितियाँ पूरी तरह आदर्श होनी चाहिए और जब तक ऐसा नहीं होता वे वहीं रुके रहते हैं। आदर्श स्थिति या पूर्णता बहुत अच्छी बात है। परंतु यह भी सच है कि कोई भी इंसानी चीज़ पूरी तरह आदर्श या पूर्ण नहीं होती है, न ही हो सकती है। इसलिए अगर आप आदर्श स्थिति का इंतज़ार करेंगे. तो शायद आपको हमेशा इंतज़ार करना पड़ेगा।

        नीचे तीन उदाहरण दिए गए हैं, जिनमें बताया गया है कि तीन लोगों ने अपनी "स्थितियों" का सामना किस तरह किया।

उदाहरण एक : जी. एन. ने शादी क्यों नहीं की

मिस्टर जी. एन. लगभग चालीस साल के उच्च-शिक्षित अकाउंटेंट हैं और शिकागो में रहते हैं। जी. एन. की शादी करने की बड़ी इच्छा है। वे प्रेम,  साहचर्य, घर, बच्चे चाहते हैं। जी. एन. कई बार शादी के बहुत करीब आ गए थे, एक बार तो उनकी शादी को सिर्फ एक दिन बचा था। परंतु हर बार जब भी शादी की तारीख़ करीब आती थी, उन्हें कोई न कोई ऐसा बहाना मिल जाता था जिसके कारण वह उस लड़की से शादी करने से इंकार कर देते थे। ("भगवान का शुक्र है कि में वह गलती करने से बाल-बाल बच गया।")

        इसका एक दिलचस्प उदाहरण यह है। दो साल पहले, जी. एन, ने सोचा कि आखिरकार उसे सही लड़की मिल गई है। वह आकर्षक, खुशमिज़ाज और बुद्धिमान थी। परंतु जी. एन. को यह सुनिश्चित करना था कि इस लड़की के साथ शादी करना पूरी तरह सही होगा। जब वे एक शाम को शादी की योजना पर चर्चा कर रहे थे, तो लड़की ने कुछ ऐसी बातें कहीं, जिनसे जी. एन. को चिंता होने लगी।

        तो, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह सही लड़की से शादी करने जा रहा है, जी. एन. ने चार पेज का एक एग्रीमेंट लिखा, जिस पर लड़की को शादी से पहले साइन करने थे। इस एग्रीमेंट में कुछ शर्त थीं, और टाइप किया हुआ यह दस्तावेज़ जीवन के हर पहलू के बारे में था। धर्म वाले खंड में कुछ शर्ते थीं : वे कौन से चर्च में जाएँगे, वे कितनी बार चर्च जाएँगे, वे कितना दान देंगे। दूसरे खंड में बच्चों की योजना बनाई गई थी। उनके कितने बच्चे होंगे और कब होंगे।

         पूरे विस्तार से जी. एन. ने यह रूपरेखा बना ली थी कि उनके किस तरह के दोस्त होंगे, उसकी भावी पत्नी किस तरह की नौकरी करेगी, वे लोग कहाँ रहेंगे, किस तरह उनकी आमदनी खर्च की जाएगी। दस्तावेज़ के अंत में, जी. एन. ने आधे पेज में उन आदतों को लिखा जो लड़की को या तो छोड़नी पड़ेंगी या सीखनी पड़ेंगी। इनमें धूम्रपान, शराबखोरी, मेकअप, मनोरंजन इत्यादि थे।

         जब जी. एन. की भावी दुल्हन ने उसका यह अल्टीमेटम देखा तो उसने वही किया जो आप और हम सोच रहे हैं। उसने एक नोट लगाकर इसे वापस भिजवा दिया, “हर एक के लिए सामान्य विवाह की यह शत ही काफ़ी है 'कि अच्छे और बुरे वक्त में हम साथ-साथ रहेंगे और यह मेरे लिए भी पर्याप्त है। अब मुझसे शादी की बात भूल जाएँ।"

          जब जी. एन. मुझे अपना अनुभव सुना रहा था तो उसने चिंतित होकर कहा, 'अब आप बताएं, एग्रीमेंट लिखकर मैंने क्या गलती कर दी? आखिर शादी एक बड़ा फैसला है। आपको यह फैसला बहत सोच-समझकर करना चाहिए।'

         परंतु जी. एन. ग़लत था। आप बहुत ज़्यादा सोच-समझकर चलेंगे, बहत ज्यादा सावधान रहेंगे तो शादी ही क्या, आप दुनिया के हर क्षेत्र में असफल रहेंगे। आपकी अपेक्षाएं आसमान छू रही होंगी। जी. एन. का शादी के बारे में भी वही नज़रिया था जो अपनी नौकरी के बारे में था, अपनी बचत, अपने दोस्तों या किसी और चीज़ के बारे में था।

           समस्याएँ पैदा होने से पहले ही उन्हें पूरी तरह ख़त्म कर देने की योग्यता सफल व्यक्ति में नहीं पाई जाती, परंतु समस्याएँ पैदा होने के बाद उन्हें सुलझाने की योग्यता हर सफल व्यक्ति में पाई जाती है। अगर हम कोई काम शुरू करने से पहले सारी उम्र इंतज़ार नहीं करना चाहते तो बेहतर होगा कि हम पूर्णता के साथ समझदारीपूर्ण समझौता करने के इच्छुक रहें। पुलों को तभी पार करें, जब वे आएँ। यह सलाह काफ़ी समय से दी जा रही है और यह अब भी उतनी ही सही है जितनी कि यह दो सौ साल पहले सही थी।

   उदाहरण दो : जे. एम. नए घर में क्यों रहता है

  हर बड़ा निर्णय लेते समय, मस्तिष्क खुद के साथ युद्ध करता है- काम करें या न करें, करें कि न करें। यहाँ पर ऐसे युवक की कहानी है जिसने काम करने का फैसला किया और इससे उसे बहुत फायदा हुआ।

        जे. एम. की स्थिति भी लाखों-करोड़ों युवकों जैसी है। वह अभी पच्चीस साल का है और उसकी पत्नी और एक बच्चा है और उसकी आमदनी ख़ास नहीं है।

        मिस्टर और मिसेज़ जे. एम. एक छोटे अपार्टमेंट में रहा करते थे। नया घर दोनों का सपना था। वे चाहते थे कि उनके पास ज़्यादा जगह हो, आस-पास का माहौल ज़्यादा अच्छा हो, बच्चों के लिए खेलने का मैदान हो और अपनी खुद की जायदाद हो।

        परंतु नया घर खरीदने में एक बाधा थी- नकद भुगतान। एक दिन जब जे. एम. अगले महीने के मकान किराए का चेक काट रहा था तो उसे बहुत कोफ्त हुई। जितना मकान किराया वह दे रहा था, वह तो नए मकान की क़िस्त के बराबर रकम थी।

        जे. एम. ने अपनी पत्नी से कहा, “क्या तुम अगले हफ्ते नया घर ख़रीदना पसंद करोगी?" पत्नी ने पूछा, “आज तुम्हें हो क्या गया है ? क्यों मज़ाक कर रहे हो? तुम जानते हो हम अभी घर नहीं खरीद सकते। नकद देने के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं ? डाउन-पेमेंट हम कहाँ से देंगे?" ।

         परंतु जे. एम. का इरादा पक्का था। “हमारी तरह के लाखों लोग होंगे जो किसी न किसी दिन नया घर खरीदने के सपने देखते होंगे, परंतु उनमें आधे से ज़्यादा लोग कभी भी अपने सपनों का घर नहीं खरीद पाते। कोई न कोई चीज़ आकर उन्हें रोक देती होगी। हम घर खरीदेंगे। मैं नहीं जानता कि हम डाउन-पेमेंट कहाँ से लाएँगे, परंतु हम किसी न किसी तरह ऐसा कर लेंगे।"

        अगले हफ्ते उन्हें एक ऐसा घर मिल गया जो उन्हें पसंद था। घर छोटा परंतु बढ़िया था, और उन्हें सिर्फ 1200 डॉलर का डाउनपेमेंट देना था। अब समस्या थी 1200 डॉलर इकटठे करना। जे. एम. जानता था कि उसे क़र्ज़ में इतनी बड़ी रकम नहीं मिलेगी।

        परंतु जहाँ चाह, वहाँ राह। अचानक, जे. एम. ने इस समस्या पर काफ़ी सोच-विचार किया। क्यों न बिल्डर से बात की जाए और 1200 डॉलर एकमुश्त देने के बजाय किस्तों में दिया जाए? जे. एम. ने बिल्डर से बात की। पहले तो बिल्डर नहीं माना, परंतु जे. एम. जब जुटा रहा, तो बिल्डर राज़ी हो गया। बिल्डर जे. एम. को 1200 डॉलर का लोन देने के लिए तैयार हो गया। अब जे. एम. को हर महीने 100 डॉलर और। ब्याज का इंतज़ाम करना था।

        पति-पत्नी दोनों ने हिसाब लगाया और हर महीने अपने खर्च में 25 डॉलर की कटौती करने का फैसला किया। परंतु अब भी समस्या यह थी। कि 75 डॉलर कहाँ से आएँगे, जो हर महीने किस्त देने के लिए ज़रूरी होंगे।

       तभी जे. एम. के दिमाग में एक विचार आया। अगली सुबह वह अपने बॉस से मिलने गया। उसने उन्हें बताया कि स्थिति क्या है। बॉस यह जानकर खुश हुए कि जे. एम. घर खरीद रहा है।

        फिर जे. एम. ने कहा, “सर, मुझे इसके लिए हर महीने 75 डॉलर चाहिए। मैं जानता हूँ कि आप मेरी तनख्वाह तभी बढ़ाएँगे जब आप मुझे इस काबिल समझेंगे। मैं अभी तो आपसे सिर्फ पैसा कमाने का अवसर चाहता हूँ। इस ऑफ़िस में ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जो मैं सप्ताहांत में आकर कर सकता हूँ। क्या ऐसा संभव है कि इससे मेरी समस्या सुलझ जाएगी?"

        जे. एम. की गंभीरता और महत्वाकांक्षा देखकर बॉस प्रभावित हुए। हर सप्ताहांत में दस घंटे अतिरिक्त काम करने के बदले में वे जे. एम. को इतनी राशि देने के लिए तैयार हो गए और फिर मिस्टर और मिसेज़ जे. एम. अपने नए घर में रहने के लिए चले गए।

1. जे. एम. के मन में काम करने का दृढ़ संकल्प था, जिससे उसे लक्ष्य की प्राप्ति में सहयोग मिला।

2. जे. एम. नए विश्वास से भर गया। इसके बाद अगर उसके सामने कोई बड़ी परिस्थिति आती है, तो उसके लिए कर्मठता दिखाना आसान होगा।

3. जे. एम. ने अपनी पत्नी और अपने बच्चों को उनके सपनों का घर दिलवा दिया। अगर उसने आदर्श स्थितियों का इंतजार किया होता, घर खरीदने को टाला होता, तो हो सकता था कि वे लोग कभी अपने खुद के घर में नहीं रह पाते।

उदाहरण तीन : सी. डी. अपना खुद का बिज़नेस शुरू करना चाहता था, परंतु...

मिस्टर सी. डी. भी इसी तरह का एक उदाहरण है जो हमें बताता है कि अगर कोई काम शुरू करने से पहले आदर्श परिस्थितियों का इंतजार करता है तो उसका परिणाम क्या होता है।

दूसरे विश्वयुद्ध के कुछ ही समय बाद सी. डी. को अमेरिकन पोस्ट ऑफ़िस डिपार्टमेंट के कस्टम्स डिवीज़न में नौकरी मिल गई। उसे काम पसंद था। परंतु पाँच साल बाद वह अपनी नौकरी से उकता गया। वही काम करते-करते वह ऊब गया था, रोज़ काम के बँधे-बँधाए घंटे, कम
तनख्वाह और ऐसा सीनियॉरिटी सिस्टम जिसमें तरक्क़ी की गुंजाइश कम ही थी।

       तभी उसके मन में एक विचार आया। उसे इस बात का काफ़ी ज्ञान हो चुका था कि सफल आयात कैसे किया जा सकता है। क्यों न वह कम क़ीमत के तोहफ़े और खिलौने आयात करने का बिज़नेस शुरू करे? सी. डी. कई सफल आयातकों को जानता था जिनके पास इस बिज़नेस का उसके जितना ज्ञान नहीं था।

      अपना बिज़नेस शुरू करने का विचार उसके मन में दस साल पहले आया था। परंतु आज भी वह कस्टम्स ऑफ़िस में ही काम कर रहा है।

      क्यों? होता यह था कि जब भी सी. डी. शुरू करने वाला होता था, कोई न कोई ऐसी समस्या आ जाती थी जिसके कारण वह आख़िरी कदम नहीं उठा पाता था। पैसे की कमी, आर्थिक मंदी, बच्चे का जन्म, टेम्पररी सुरक्षा की आवश्यकता, व्यापार पर प्रतिबंध, और इसी तरह के कई बहाने इंतज़ार करने और काम टालने के लिए इस्तेमाल किए गए।

       सच्चाई तो यह है कि सी. डी. ने खुद को मिस्टर निठल्ले बन जाने दिया। वह चाहता था कि वह आदर्श परिस्थितियों में ही काम शुरू करे। चूँकि परिस्थितियाँ कभी आदर्श नहीं हुईं, इसलिए सी. डी. का काम कभी शुरू नहीं हो पाया।

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Monday, September 30, 2019

CHAPTER 9.3 लोगो के बारे में अच्छा सोचे और याह छोटी तकनीक बड़ी काम कीहै

       लोगो के बारे में अच्छा सोचे और याह छोटी                             तकनीक बड़ी काम कीहै



     “यह छोटी सी तकनीक बड़े काम की है। चूंकि मैं उसे पसंद करता हूँ, इसलिए वह भी मुझे देर-सबेर पसंद करने लगता है। जल्दी ही मैं मेज़ पर उसके सामने बैठने के बजाय उसकी बग़ल में बैठा होता हूँ और हम उसकी बीमा योजना बना रहे होते हैं। वह मुझ पर विश्वास करता है। क्योंकि अब मैं उसका दोस्त बन चुका हूँ।

       “हालाँकि हमेशा मुझे पहली नज़र में ही पसंद नहीं किया जाता, परंतु मैंने पाया है कि जब तक मैं सामने वाले को पसंद करता हूँ, तब तक इस बात की संभावना रहती है कि वह भी मुझे पसंद करने लगेगा और हमारा बिज़नेस पक्का हो जाएगा।

       मेरे दोस्त ने आगे कहा, “अभी पिछले ही हफ्ते में एक सख़्त ग्राहक से तीसरी बार मिला। वह मुझे दरवाज़े पर ही मिल गया और मेरे कुछ कहने से पहले ही वह मुझ पर काफ़ी गर्म हुआ। वह अपनी बात लगातार कहता रहा और उसने मुझे कुछ बोलने का मौक़ा ही नहीं दिया। आख़िरकार उसने अपनी बात यह कहते हुए ख़त्म की, 'अब मैं आपकी सूरत भी नहीं देखना चाहता।'

      “जब उसने इतना कह दिया, तो मैंने उसकी आँखों में 5 सेकंड तक देखा, और फिर सच्चे दिल से धीमे से कहा, 'परंतु मिस्टर एस., मैं तो आज आपके दोस्त की हैसियत से मिलने आया हूँ।'

       “और कल ही उसने मुझसे 10,000 डॉलर की पॉलिसी ख़रीद ली।"

        सॉल पोक को शिकागो का अप्लायंस किंग कहा जाता है। 21 साल पहले कुछ नहीं से शुरू करने वाले सॉल पोक शिकागो में आजकल एक साल में 60 मिलियन डॉलर से ज़्यादा का सामान बेचते हैं।

        सॉल पोक अपने बिज़नेस की सफलता का श्रेय ख़रीदारों के प्रति उनके व्यवहार को देते हैं। वे कहते हैं, “ग्राहकों के साथ उसी तरह से बर्ताव करना चाहिए जैसे वे हमारे घर आए मेहमान हों।"

       क्या यह लोगों के बारे में सोचने का सही नज़रिया नहीं है? और क्या हम सफलता के इस फॉर्मूले को अपने जीवन में नहीं उतार सकते ? ग्राहको के साथ उसी तरह का बर्ताव करें, जैसे वे आपके घर आए मेहमान हों।

         यह तकनीक बिज़नेस के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी काम आती है। ग्राहकों की जगह कर्मचारी रख लें और आपको यह सूत्र मिलेगा, "कर्मचारियों के साथ उसी तरह से बर्ताव करें जैसे वे आपके घर आए मेहमान हों।" अपने कर्मचारियों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करें और आपको बदले में बहुत अच्छा सहयोग मिलेगा, बहुत अच्छा टीमवर्क। अपने चारों तरफ़ के लोगों के बारे में बहुत अच्छा सोचें और बदले में आपको इसके बहुत अच्छे परिणाम मिलेंगे।

        इस पुस्तक के शुरुआती संस्करण का रिव्यू करने वाले मेरे एक दोस्त ने यह सूत्र पढ़ने के बाद मुझसे कहा, "यह लोगों को पसंद करने और उनका सम्मान करने का सकारात्मक परिणाम है। मैं आपको अपने एक दोस्त की सच्ची कहानी सुनाना चाहता हूँ जिससे यह साबित होता है कि अगर आप लोगों को नापसंद करते हैं तो आपको उसके परिणाम किस तरह भुगतने पड़ते हैं।"

         उसके अनुभव में दम था। ज़रा देखें!

         "मेरी फ़र्म को एक कॉन्ट्रैक्ट मिला था। हमें सॉफ्ट ड्रिंक बॉटलिंग करने वाली एक छोटी कंपनी को परामर्श सेवाएँ देनी थीं। कॉन्ट्रैक्ट काफ़ी बड़ा था, लगभग 9,500 डॉलर का। हमारा ग्राहक बहुत पढ़ा-लिखा नहीं था। उसका बिज़नेस भी ठीक नहीं चल रहा था और पिछले कुछ सालों में उसने बड़ी भारी ग़लतियाँ की थीं।

       "कॉन्ट्रैक्ट मिलने के तीन दिन बाद मैं अपने सहयोगी के साथ उस कंपनी के प्लांट में गया जो हमारे ऑफ़िस से 45 मिनट दूर था। आज तक मैं नहीं जानता कि बातें किस तरह शुरू हुईं, परंतु किसी न किसी कारण हम लोग अपने ग्राहक के नकारात्मक गुणों पर बात करने लगे।

       “हम उसकी मूर्खता पर हँस रहे थे, जिस वजह से उसने अपनी राह में दिक्कतें खडी कर लीं। उसने अपनी समस्याओं के बारे में हमसे सलाह लेने के बजाय अपनी बुद्धि पर भरोसा किया था, और उसी का नतीजा था कि आज उसके बिज़नेस का भट्टा बैठ चुका है।

         “मुझे अपनी कही हुई एक बात ख़ास तौर पर याद है- 'केवल एक " ही मिस्टर एफ़ को गिरने से रोक रही है- और वह है उनका मोटापा।' मेरे सहयोगी ने भी इस चर्चा में अपना योगदान दिया। और उसके लड़के को देखो। उसकी उम्र लगभग 35 साल होगी, परंतु अपने काम के बारे में उसकी एकमात्र योग्यता यह है कि उसे अंग्रेज़ी बोलना आता है।'

         "रास्ते भर हम सिर्फ अपने ग्राहक की बुराई करते रहे और यह सोचते रहे कि वह कितना मूर्ख था।

           तो, उस दोपहर हमारी चर्चा बहुत ठंडी साबित हुई। अब जब मैं पीछे मुड़कर सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि शायद हमारा ग्राहक यह समझ गया था कि उसके बारे में हमारी सोच नकारात्मक थी। उसने सोचा होगा : 'ये लोग सोचते हैं कि मैं मूर्ख हूँ या नासमझ हूँ और वे मुझसे चिकनी-चुपड़ी बातें करके मुझसे पैसे ऐंठना चाहते हैं।'

         “दो दिन बाद मुझे इस ग्राहक की दो लाइनों की चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था, 'मैंने फैसला किया है कि मैं आपकी परामर्श सेवाओं का लाभ नहीं उठाना चाहता। अगर आज की तारीख तक आपकी सेवाओं का कोई भुगतान मुझे करना हो, तो कृपया अपना बिल भिजवा दें।'

        "40 मिनट के नकारात्मक विचारों की क़ीमत हमें इस तरह चुकानी पड़ी कि हमारे हाथ से 9,500 डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट चला गया। इससे भी ज़्यादा दुःखद बात यह थी कि हमारे भूतपूर्व ग्राहक ने एक महीने बाद शहर के बाहर की एक फ़र्म की परामर्श सेवाएँ ले लीं।

        “अगर हमने उसके अच्छे गुणों पर अपना ध्यान केंद्रित किया होता तो हमने अपने ग्राहक को नहीं खोया होता। और उसमें अच्छे गुण थे। ज़्यादातर लोगों में होते हैं।"

         आप एक काम करें जिसमें आपको मज़ा भी आएगा और साथ ही साथ आप सफलता का यह मूलभूत सिद्धांत भी सीख सकेंगे। अगले दो दिनों तक आप जितनी चर्चाएँ सुन सकते हों, सुनें। दो बातों पर ध्यान दें: चर्चा के दौरान कौन ज़्यादा बोल रहा है और कौन ज़्यादा सफल है।

         मैंने यह प्रयोग सैकड़ों बार किया है और इसके बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ: वह व्यक्ति जो सबसे ज्यादा बोलता है और वह व्यक्ति जो सबसे ज्यादा सफल होता है; वे दोनों व्यक्ति शायद ही कभी एक होते हैं।

शायद इसका अपवाद भी नहीं होता। व्यक्ति जितना सफल होता है, वह चर्चा में उतना ही ज़्यादा उदार होता है, यानी कि वह सामने वाले को अपने बारे में बातें करने देता है, अपने विचार, अपनी उपलब्धियाँ, अपने परिवार, अपनी नौकरी, अपनी समस्याओं के बारे में बातें करने देता है।

       चर्चा की उदारता दो तरह से आपको ज़्यादा सफल बनाती है :

1. चर्चा की उदारता से आपके दोस्त बनते हैं।

2. चर्चा की उदारता से आपको लोगों के बारे में ज्यादा जानने का मौका मिलता है।

        याद रखें : आम आदमी दुनिया में किसी भी चीज़ से ज़्यादा खुद के बारे में बातें करना पसंद करता है। जब आप उसे इस बात का मौक़ा देते हैं, तो वह आपको पसंद करने लगता है। चर्चा में उदारता दिखाना दोस्त बनाने का सबसे आसान और अचूक तरीक़ा है।

        और चर्चा में उदारता का दूसरा लाभ भी महत्वपूर्ण है, जिसमें आप लोगों के बारे में ज्यादा जान जाते हैं। जैसा हमने पहले अध्याय में कहा है, हम अपनी सफलता की प्रयोगशाला में लोगों का अध्ययन करते हैं। हम उनके बारे में, उनकी विचार प्रक्रिया, उनके अच्छे और बुरे गुणों के बारे में, वे कोई काम क्यों और कैसे करते हैं, इस बारे में जितना ज्यादा जान लेते हैं, हमें उतना ही लाभ होता है क्योंकि इस जानकारी से हम उन्हें प्रभावित करने के तरीके आसानी से ढूँढ़ सकते हैं।

          मैं आपको एक उदाहरण देना चाहूँगा।

       बाक़ी विज्ञापन एजेंसियों की ही तरह, न्यूयॉर्क की एक एड्वर्टाइज़िंग एजेंसी भी जनता को यह बताया करती थी कि जनता को इसके विज्ञापन में बताई चीजें क्यों खरीदनी चाहिए। परंतु यह एजेंसी एक काम और करती थी। यह अपने विज्ञापन लिखने वालों को हर साल एक सप्ताह के लिए दुकान में सेल्समैन के काम पर रखती थी, ताकि वे वहाँ पर उनके द्वारा विज्ञापित चीज़ों के बारे में लोगों के विचार सुन सकें। सुनने से ही उन्हें इस बात की प्रेरणा मिलती थी कि वे बेहतर, ज़्यादा असरदार विज्ञापन लिख सकें।

          कई प्रगतिशील कंपनियाँ अपने उन कर्मचारियों का आखिरी इंटरव्य लेती हैं जो काम छोड़कर जा रहे हैं। इसका कारण यह नहीं होता है कि वे कर्मचारी को वहाँ पर रोकने का प्रयास करती हैं, बल्कि यह जानना होता है कि वे काम छोड़कर क्यों जा रहे हैं। कंपनी के कर्मचारियों के साथ संबंध सुधारने में यह इंटरव्यू बहुत काम आता है। सुनने से फायदा होता है।

        सुनना सेल्समैन के लिए भी फायदेमंद होता है। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अच्छा सेल्समैन वह होता है जो “अच्छा वक्ता” हो या "तेज़ बोलने वाला” हो। परंतु, सेल्स मैनेजरों पर अच्छे वक्ता का उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि एक अच्छे श्रोता का पड़ता है, एक ऐसा व्यक्ति जो सवाल पूछ सकता है और उसके अपेक्षित जवाब हासिल कर सकता है।

            चर्चा में बोलने की बागडोर न थामे रहें। सुनें, दोस्त बनाएँ और सीखें।

           सामने वाले व्यक्ति के साथ चर्चा में शिष्टाचार सबसे अच्छा ट्रैक्विलाइज़र होता है। आप दूसरे लोगों के लिए जो छोटी-छोटी चीजें करते हैं, वे बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। अगर आपका लोगों के बारे में सोचने का नज़रिया सही हो, तो आपकी बहुत सी कुंठाएँ और आपका तनाव निश्चित रूप से कम हो जाएँगे। जब आप शांति से विचार करेंगे, तो आप पाएंगे कि आपके तनाव का कारण दूसरे लोगों के प्रति नकारात्मक भावनाएँ ही हैं। इसलिए दूसरे लोगों के प्रति अपनी सोच को सकारात्मक बनाएँ और यह खोजें कि यह संसार कितना अद्भुत है।

            लोगों के बारे में सही नज़रिए का असली इम्तहान तब आता है जब चीजें हमारे हिसाब से नहीं होतीं। आपको कैसा लगता है जब आपकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को प्रमोशन मिल जाता है ? या जब आप अपने क्लब के चुनाव में हार जाते हैं? या जब आपके काम की आलोचना होती है ? याद रखें : हारने के बाद आप किस तरह से सोचते हैं. इसी बात से तय होता है कि आप कितने समय बाद जीतेंगे।

           अपनी असफलता के बाद लोगों के बारे में सही तरीके से सोचने की पैरवी बेंजामिन फ़ेयरलेस ने की है। बहुत गरीब माहौल में बड़े होने के बाद मिस्टर फ़ेयरलेस युनाइटेड स्टेट्स स्टील कॉरपोरेशन के चीफ़ एक्जीक्यूटिव बन गए। लाइफ़ मैग्ज़ीन (15 अक्टूबर, 1956) में उनका यह उद्धरण छपा था:

        “सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप घटनाओं को किस तरह लेते हैं। उदाहरण के तौर पर, मैं अपने किसी टीचर से कभी नहीं चिढ़ा। हालाँकि हर विद्यार्थी की तरह मुझे भी डाँट पड़ती थी, पर मैं सोचता था कि मुझे मेरी ग़लती के कारण ही डाँट पड रही है और
अनुशासित बनना मेरे लिए अच्छी बात थी। मैंने अपने हर बॉस को भी पसंद किया है। मैंने हमेशा यह कोशिश की है कि मैं उन्हें खुश रखू और वे जितना चाहते हैं, मैं उससे ज़्यादा काम करूँ।

        "ऐसा नहीं है, कि मुझे कभी निराशा नहीं हुई। कई बार मेरी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को प्रमोशन दे दिया गया। परंतु मैंने यह कभी नहीं सोचा कि मैं 'ऑफ़िस की राजनीति' का शिकार था या मेरे प्रति किसी का पूर्वाग्रह था या मेरे बॉस का फ़ैसला ग़लत था। दुःखी होने, झल्लाने और नौकरी छोड़ देने के बजाय मैंने तार्किक दृष्टि से विचार किया। निश्चित रूप से दूसरा व्यक्ति प्रमोशन के लिए मुझसे ज़्यादा योग्य था। जब प्रमोशन का अगला मौक़ा आएगा, तब तक मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ कि मैं उस योग्य बन जाऊँ ? साथ ही मैं कभी अपने आप पर भी नाराज़ नहीं हुआ कि मैं क्यों असफल हुआ था। मैंने कभी हीन भावना से पीड़ित होने में अपना समय बर्बाद नहीं किया।"

        जब भी कोई बात बिगड़ जाए, तो बेंजामिन फ़ेयरलेस को याद करें। सिर्फ दो काम करें :

       1. खुद से पूछे, “जब प्रमोशन का अगला मौक़ा आएगा, तब तक मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ कि मैं उस योग्य बन जाऊँ ?"

       2. निराश या हताश होने में समय और ऊर्जा बर्बाद न करें। अपने आपको न कोसें। अगली बार जीतने की योजना बनाएँ।

संक्षेप में, आप इन सिद्धांतों को अमल में लाएँ

     1. अपने आपको हल्का रखें ताकि लोग आपको आसानी से ऊपर उठा सकें। लोगों के प्रिय बनें। लोकप्रिय बनें। इससे उनका समर्थन भी हासिल होता है और आपके सफल होने में सहयोग भी मिलता है।

        2. दोस्ती बनाने में पहल करें। हर मौके पर सामने वाले को अपना परिचय दें। यह सुनिश्चित कर लें कि आप सामने वाले का सही नाम जान लें और यह भी सुनिश्चित कर लें कि वह आपका नाम ठीक से जान ले। आप अपने जिन नए दोस्तों को बेहतर जानना चाहते हों, उन्हें चिट्ठी
लिखें या फ़ोन करें।

       3. हर इंसान अलग होता है और हर इन्सान की सीमाएँ होती हैं, इस बात को स्वीकार करें। किसी भी व्यक्ति से पूर्णता की उम्मीद न करें। याद रखें, हर व्यक्ति को अलग होने का अधिकार है। और हाँ, सुधारक बनने की कोशिश न करें।

       4. चैनल पी, यानी कि अच्छे विचारों के स्टेशन को बराबर सुनते रहें। किसी व्यक्ति की अच्छाइयों और तारीफ़ के काबिल गुणों को खोजते रहें, उसकी बुराइयों को ढूँढ़ने में अपना समय बर्बाद न करें। इसके अलावा, दूसरे लोगों को अपनी सकारात्मक सोच को नकारात्मक सोच में बदलने का मौका न दें। लोगों के बारे में सकारात्मक चिंतन करें- और आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।

       5. चर्चा में उदार बनें। सफल लोगों की तरह बनें। दूसरे लोगों को बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। दूसरे व्यक्ति को अपने विचार, अपनी उपलब्धियों के बारे में बातें करने का पूरा मौक़ा दें।

      6. हर समय शिष्टाचार निभाएँ। इससे लोगों को अच्छा लगता है। इससे आपको भी अच्छा लगेगा।

       7. जब भी आप असफल हों, तो अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोष न दें। याद रखें : हारने के बाद आप किस तरह से सोचते हैं, इसी बात से तय होता है कि आप कितने समय बाद जीतेंगे।

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