Tuesday, October 8, 2019

CHAPTER 12.1 लक्ष्य बनाएँ, सफल बनें,

                 लक्ष्य बनाएँ, सफल बनें

इंसान ने जितनी भी तरक़्क़ी की है, लक्ष्य बनाकर की है। हमारे जितने भी आविष्कार हुए हैं, चाहे वे चिकित्सा के क्षेत्र में हों, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में हों, या किसी और क्षेत्र में हों, वे सभी इसी कारण संभव हुए हैं क्योंकि उन्हें हासिल करने का लक्ष्य बनाया गया था। बिज़नेस में सफलता भी अक्सर इसीलिए मिलती है क्योंकि उसे हासिल करने का टारगेट बनाया गया था। उपग्रह धरती के चारों तरफ़ अपने आप चक्कर नहीं लगा रहे हैं, बल्कि इसलिए चक्कर लगा रहे हैं क्योंकि वैज्ञानिकों ने
"अंतरिक्ष को जीतने" का लक्ष्य बनाया था।

        लक्ष्य का मतलब है उद्देश्य। लक्ष्य सपने से ज्यादा होता है, क्योंकि लक्ष्य का मतलब है सपने पर काम करना। लक्ष्य इससे ज़्यादा स्पष्ट होता है, “काश! मैं यह कर सकता!” लक्ष्य बहुत ही स्पष्ट होता है, “मैं इसकी तरफ़ बढ़ रहा हूँ।"

         जब तक लक्ष्य नहीं बनाया जाता, तब तक कुछ भी हासिल नहीं होता, तब तक उसकी तरफ़ क़दम नहीं बढ़ाए जा सकते। लक्ष्यों के बिना व्यक्ति जीवन में इधर-उधर भटकता रहता है। वह लड़खड़ाता रहता है और कभी यह नहीं जान पाता कि वह कहाँ जा रहा है, इसलिए वह कहीं भी नहीं पहुंच पाता।

         लक्ष्य सफलता के लिए उसी तरह ज़रूरी है, जिस तरह जीवन के लिए हवा ज़रूरी है। कोई भी बिना लक्ष्य के सफल नहीं हुआ। कोई भी बिना हवा के जीवित नहीं रहा। इसलिए आप अच्छी तरह अपने लक्ष्य को तय कर लें कि आप कहाँ पहुँचना चाहते हैं।

        डेव मॅहोने कभी एडवर्टाइजिंग एजेंसी में 25 डॉलर प्रति सप्ताह की नौकरी किया करते थे, 27 वर्ष की उम्र में वे एजेंसी के वाइस प्रेसिडेंट बन गए और 33 वर्ष की उम्र में वे गुड हयूमर कंपनी के प्रेसिडेंट बन गए। लक्ष्यों के बारे में उनका कहना था, “महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि आप कल क्या थे, या आप आज क्या हैं, बल्कि महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आप कल कहाँ पहुँचना चाहते हैं।"

        महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि आप कल क्या थे, या आप आज क्या हैं, बल्कि महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आप कल कहाँ पहुँचना चाहते हैं।

         अच्छी कंपनियां अगले 10 से 15 साल के लक्ष्य बनाकर चलती हैं। सफल बिज़नेसमैन को खद से यह सवाल पछना ही पड़ता है. “आज से दस साल बाद हम अपनी कंपनी को कहाँ देखना चाहते हैं ?" फिर वे उसके हिसाब से अपनी योजना बनाते हैं। नई मशीनें लगाई जाती हैं ताकि उत्पादन की क्षमता बढ़ सके, आज की ज़रूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि आज से 5 या 10 साल बाद की ज़रूरत के हिसाब से। ऐसे उत्पादों को विकसित करने के लिए शोध किया जाता है जो दस साल से पहले बाज़ार में नहीं उतर पाएँगे।

         आधुनिक कंपनियाँ भविष्य को क़िस्मत के भरोसे नहीं छोड़तीं। क्या आपको ऐसा करना चाहिए?

         हममें से हर व्यक्ति सफल कंपनियों से यह महत्वपूर्ण सबक़ सीख सकता है। हमें कम से कम 10 साल बाद तक की योजना बना लेनी चाहिए। आप दस साल बाद अपनी जो इमेज बनाना चाहते हैं, आपको सबसे पहले तो अभी वह इमेज सोच लेनी चाहिए। यह एक बेहद महत्वपूर्ण विचार है। कोई कंपनी जो अच्छी तरह भविष्य की योजना नहीं बनाती, वह यूँ ही चलती रहेगी (यह बीच में दीवालिया भी हो सकती है)। इसी तरह जो व्यक्ति लंबे लक्ष्य तय नहीं कर पाता, वह भी ज़िंदगी की भूलभुलैया में यूँ ही भटकता रहेगा। बिना लक्ष्यों के हमारा विकास नहीं होता।

       मैं आपको एक उदाहरण बताना चाहता हूँ कि लंबी दूरी के लक्ष्य से सफलता किस तरह मिलती है। अभी पिछले हफ्ते एक युवक (मैं उसे एफ़. बी. कहना चाहूँगा) अपने करियर की समस्या लेकर मेरे पास आया। एफ़. बी. सभ्य और समझदार दिख रहा था। वह कुँवारा था और उसने चार साल पहले ही अपना कॉलेज पूरा किया था।

          हमने उसके काम-काज, शिक्षा, उसकी योग्यताओं और उसकी सामान्य पृष्ठभूमि के बारे में चर्चा की। फिर मैंने उससे कहा, "आप मुझसे नौकरी बदलने के बारे में सलाह लेने आए हैं। आप किस तरह की नौकरी चाहते हैं ?"

          उसने कहा, “यही तो मैं आपसे पूछने आया हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं क्या करना चाहता हूँ।"

         उसकी समस्या बहुत ही आम समस्या है। परंतु मैंने महसूस किया कि इस व्यक्ति की मदद करने का यह तरीक़ा नहीं है कि मैं इसे कई संभावित नियोक्ताओं से मिलवा दूं। करियर चुनने में गलती करके उससे सीखना कोई अच्छा तरीक़ा नहीं है। चूंकि करियर की संभावनाएँ दर्जनों होती हैं, इसलिए सही नौकरी मिलने के अवसर भी दर्जनों में से एक होते हैं। मैं जानता था कि मुझे एफ़. बी. को यह एहसास कराना होगा कि किसी जगह अपना करियर बनाने से पहले उसे पहले यह जानना पड़ेगा कि उसकी मनचाही जगह कौन सी है।

       इसलिए मैंने कहा, “अब आप एक अलग नज़रिए से अपने करियर प्लान को देखें। क्या आप मुझे बताएँगे कि आज से दस साल बाद आप अपनी कैसी इमेज देखना चाहते हैं?"

       एफ़. बी. ने काफ़ी सोच-विचारकर कहा, “मैं समझता हूँ कि मैं वही चाहता हूँ जो हर व्यक्ति चाहता है : एक अच्छी सी नौकरी जिसमें अच्छी तनख्वाह मिलती हो और एक अच्छा सा घर। सच कहूँ, तो मैंने इसके बारे में ज़्यादा नहीं सोचा।"

        मैंने उसे आश्वस्त किया कि यह बिलकुल स्वाभाविक है। फिर मैंने उसे बताया कि करियर चुनने की उसकी शैली वैसी ही थी जैसे हम किसी एयरलाइन टिकट काउंटर पर जाएँ और कहें, “मुझे एक टिकट दे दीजिए।" टिकट बेचने वाले आपकी कोई मदद नहीं कर सकते जब तक कि आप उन्हें यह न बताएँ कि आप कहाँ जाना चाहते हैं। इसलिए मैंने कहा, “और मैं तब तक नौकरी ढूँढ़ने में आपकी मदद नहीं कर सकता जब तक कि आप मुझे यह न बता दें कि आप कहाँ पहुँचना चाहते हैं। आप और सिर्फ आप ही मुझे यह बता सकते हैं कि आपका लक्ष्य क्या है।"

        इससे एफ़. बी. सोचने पर मजबूर हो गया। अगले दो हफ्तों तक हमने अलग-अलग नौकरियों के अच्छे-बुरे पहलुओं पर विचार करने के बजाय लक्ष्य निर्धारित करने के बारे में विचार किया। एफ़. बी. ने करियर प्लानिंग का सबसे महत्वपूर्ण सबक सीख लिया : शुरू करने से पहले जान लें, आप कहाँ जाना चाहते हैं।

         सफल कंपनियों की तरह, आगे की योजना बनाएँ। एक तरह से आप भी किसी कंपनी की तरह हैं। आपकी योग्यताएँ, आपकी प्रतिभा, आपकी दक्षताएँ आपके “उत्पाद" हैं। आप अपने उत्पादों को विकसित करना चाहते हैं, ताकि आपको उनकी अधिकतम क़ीमत मिल सके। भविष्य की योजना बनाने से ऐसा करना संभव है।

       यहाँ दो क़दम सुझाए जा रहे हैं जो आपकी मदद करेंगे :

       पहले तो अपने भविष्य को तीन खंडों में बाँट दें : काम-धंधा, घर, और समाज। अपने जीवन को खंडों में बाँट देने से आप दुविधा में नहीं पड़ेंगे, आप आंतरिक संघर्ष की समस्या से बच सकेंगे और आप अपने भविष्य की पूरी तस्वीर देख सकेंगे।

       दूसरी बात, अपने आपसे इन सवालों के स्पष्ट, सुनिश्चित जवाब पूछे। मैं अपने जीवन में क्या हासिल करना चाहता हूँ? मैं क्या बनना चाहता हूँ? और किस चीज़ से मुझे संतुष्टि मिलेगी?

     मदद के लिए नीचे दी हुई प्लानिंग गाइड का प्रयोग करें।

आज से 10 साल बाद की मेरी इमेज : 10 साल की प्लानिंग गाइड

A. काम-धंधे का खंड : आज से 10 साल बाद :

     1. मैं कितनी आमदनी हासिल करना चाहता हूँ?

      2. मैं अपने पास कितनी ज़िम्मेदारी चाहता हूँ?

      3. मैं कितनी सत्ता, कितना अधिकार चाहता हूँ?

      4. अपने काम-धंधे से मैं कितनी प्रतिष्ठा चाहता हूँ?

B. घर का खंड : आज से 10 साल बाद :

      1. मैं अपने परिवार को किस तरह का जीवनस्तर देना चाहता हूँ ?

      2. मैं किस तरह के घर में रहना चाहता हूँ ?

      3. मैं किस तरह से छुट्टियाँ बिताना चाहता हूँ?

      4. अपने बच्चों के शुरुआती वयस्क सालों में मैं उनकी कितनी आर्थिक मदद करना चाहता हूँ?

C. सामाजिक खंड : आज से 10 साल बाद :

     1. मेरे पास किस तरह के दोस्त होने चाहिए?

      2. मैं किन सामाजिक समूहों से जुड़ना चाहता हूँ ?

      3. मैं किन संस्थाओं का लीडर बनना चाहता हूँ?

      4. मैं किन सामाजिक समस्याओं को दूर करने की पहल करना चाहता हूँ?

          कुछ साल पहले मेरे पुत्र ने जोर देकर कहा कि मैं उसके साथ मिलकर उसके कुत्ते के पिल्ले के लिए एक डॉगहाउस बनवाऊँ। मेरा पुत्र पीनट नाम के इस पिल्ले से बहुत प्रेम करता था और उसे इस पर नाज़ था। पुत्र का उत्साह देखकर मैं उसके लगातार आग्रह को ठुकरा नहीं
पाया। और इस तरह हम दोनों पीनट का घर बनाने में जुट गए। कारपेन्टरी की हम दोनों की समझ कुल मिलाकर ज़ीरो थी और जो घर बना, वह इस बात का सबूत था।

          कुछ समय बाद मेरा एक अच्छा दोस्त आया और हमारे उस डॉगहाउस को देखने के बाद उसने पूछा, “तुम लोगों ने पेड़ पर यह क्या लटका रखा है? कहीं, यह डॉगहाउस तो नहीं है?" मैंने हाँ में जवाब दिया। फिर उसने हमारी कुछ ग़लतियों की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित किया और अपनी पूरी बात को सारांश में इस तरह कहा, “तुम लोगों ने कोई योजना नहीं बनाई। आजकल कोई बिना ब्लूप्रिंट के डॉगहाउस नहीं बनाता।"

        और कृपया, जब भी आप अपने भविष्य की कल्पना करें, तो बड़ी कल्पना करने से न घबराएँ। आजकल लोगों को उनके सपनों के आकार के हिसाब से तौला जाता है। कोई भी व्यक्ति जितना हासिल करना चाहता है, उससे ज़्यादा हासिल नहीं कर पाता। इसलिए हमेशा अपने भविष्य के सपनों को बड़ा रखें।

        नीचे एक व्यक्ति के जीवन की योजना शब्दशः बताई गई है। इसे पढ़ें। किस तरह उसने अपने भावी "घर" का लक्ष्य बनाया है, यह देखें। जब उसने यह लिखा होगा, तब निश्चित रूप से वह अपने भविष्य के घर को देख रहा होगा।

        “मेरे घर का लक्ष्य गाँव में होगा। घर ‘सदर्न मैनॅर' स्टाइल का होगा, दोमंज़िला, सफ़ेद कॉलम इत्यादि। चारों तरफ़ फ्रेंसिंग होगी और शायद वहाँ पर फ़िशपॉन्ड भी होगा क्योंकि मेरी पत्नी और मुझे मछली पकड़ने का शौक़ है। हम अपने डॉबरमॅन के लिए जो घर बनाएँगे, वह घर के पिछवाड़े बनाएँगे। मैं हमेशा से चाहता हूँ कि मेरे घर में एक लंबा-सा ड्राइववे हो जिसके दोनों तरफ़ पेड़ लगे हों।

         “परंतु मैं जानता हूँ कि मकान और घर में अंतर होता है। ज़रूरी नहीं है कि हर मकान घर भी हो। मैं अपने मकान को घर बनाने की पूरी कोशिश करूँगा, यह ध्यान रखूगा कि यह खाने और सोने की जगह से ज़्यादा कुछ बने। हम अपनी योजना बनाते समय ईश्वर को भी नहीं भूले हैं। हम चर्च की गतिविधियों में एक निश्चित राशि दान में देंगे।

          “आज से दस साल बाद मैं अपने परिवार को दुनिया की सैर पर ले जाना चाहूँगा। इसके पहले कि हमारा परिवार शादी-ब्याह के कारण तितर-बितर हो जाए, मैं ऐसा करना चाहता हूँ। अगर हमारे पास एक साथ पूरी दुनिया की सैर पर जाने का समय नहीं होगा तो हम इसे चार-पाँच अलग-अलग छुट्टियों में बाँट लेंगे और हर साल दुनिया के एक हिस्से की यात्रा करेंगे। स्वाभाविक रूप से मेरे “घर के खंड" की ये सारी योजनाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मेरे “काम-धंधे के खंड"। में मझे कैसी सफलता मिलती है, इसलिए अगर मैं यह सब हासिल करना चाहता हूँ तो मुझे सफल होना ही पड़ेगा।"

       यह योजना पाँच साल पहले लिखी गई थी। तब उस व्यक्ति के पास दो छोटे स्टोर्स थे। आज वह पाँच स्टोर्स का मालिक है। और उसने देहात में 17 एकड़ ज़मीन भी ख़रीद ली है, जहाँ वह अपना घर बनाने जा रहा है। वह अपने लक्ष्य की तरफ़ लगातार बढ़ रहा है।

       आपके जीवन के तीनों खंड आपस में जुड़े हुए हैं। हर एक की सफलता किसी न किसी हद तक दूसरे पर निर्भर करती है। परंतु जो खंड बाक़ी सभी खंडों पर सबसे ज़्यादा प्रभाव डालता है, वह है आपका काम-धंधे वाला खंड। हज़ारों साल पहले जिस गुफामानव का घरेलू जीवन सबसे सुखद होता था और जिसे सर्वाधिक सामाजिक सम्मान मिलता था, वह शिकारी के रूप में सबसे सफल हुआ करता था। सामान्य तौर पर, यही बात आज भी सही है। हम अपने परिवारों को जो जीवनस्तर देते हैं और हमें जो सामाजिक सम्मान मिलता है वह काफ़ी हद तक काम-धंधे के खंड में हमारी सफलता के कारण मिलता है।

           कुछ समय पहले 'मैकिन्सी फ़ाउंडेशन फ़ॉर मैनेजमेंट रिसर्च' ने व्यापक सर्वेक्षण करवाया, ताकि यह जाना जा सके कि एक्जीक्यूटिव बनने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी गुण कौन सा है। बिज़नेस, सरकार, विज्ञान और धर्म के लीडर्स से सवाल पूछे गए। हर बार, अलग-अलग तरीकों से इन शोधकर्ताओं को एक ही जवाब मिला : एक्जीक्यूटिव की सबसे महत्वपूर्ण योग्यता उसकी आगे बढ़ने की प्रबल इच्छा होती है।

        जॉन वानामेकर की सलाह याद रखें, “कोई व्यक्ति जब तक अपने काम में अपने आपको झोंक नहीं देता, तब तक वह महान काम नहीं कर पाता।"

         अगर इसका सही दोहन किया जाए, तो प्रबल इच्छा में अनंत शक्ति है। इच्छा का अनुसरण करने की असफलता, वह न करना जो आप करना चाहते हैं, औसत दर्जे की ज़िंदगी या असफलता का रास्ता है।

       मुझे एक कॉलेज के अख़बार के बेहद प्रतिभाशाली युवा लेखक के साथ हुई चर्चा याद आती है। इस युवक में प्रतिभा थी। अगर किसी व्यक्ति में पत्रकारिता के करियर में सफल होने का माद्दा था, तो वह यही व्यक्ति था। उसके ग्रैजुएशन के कुछ समय पहले मैंने उससे पूछा, “डैन, तम अब क्या करोगे, पत्रकारिता के करियर में जाओगे?" डैन ने मेरी तरफ देखा और कहा, “अरे, नहीं। मुझे लिखना और रिपोर्टिंग करना बहुत पसंद है और मुझे कॉलेज के अख़बार में काम करने में बहुत मज़ा भी आता है। परंतु पत्रकारों की कमाई थोड़ी सी होती है और मैं भूखे नहीं मरना चाहता।"

        इसके बाद मैं पाँच साल तक डैन से नहीं मिला। फिर एक शाम को वह मुझे न्यू ऑर्लियन्स में मिला। डैन किसी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में असिस्टेंट पर्सनेल डायरेक्टर के रूप में काम कर रहा था। और उसने मझे जल्दी ही बता दिया कि वह अपने काम से संतुष्ट नहीं है, “मेरी तनख्वाह तो अच्छी है। मेरी कंपनी भी अच्छी है और जहाँ तक जॉब सिक्युरिटी का सवाल है वह मेरे पास है। परंतु इस काम में मेरा दिल नहीं लगता। अब मैं सोचता हूँ कि काश कॉलेज के बाद मैंने किसी प्रकाशक के यहाँ या किसी अख़बार में काम किया होता।"

         डैन के रवैए से बोरियत और अरुचि साफ़ झलक रही थी। वह हर चीज़ में बुराई देख रहा था। जब तक वह अपनी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता में नहीं जाएगा, उसे उसकी मनचाही सफलता हासिल नहीं हो पाएगी। सफलता में पूरे मन से प्रयास की ज़रूरत होती है और आप किसी काम में पूरा मन तभी लगा सकते हैं जब आप उसे पसंद करते हों।

    
          अगर डैन ने अपना मनपसंद काम किया होता, तो वह आज अख़बार की दुनिया में काफ़ी ऊपर होता। और लंबे समय में उसे आज से ज़्यादा पैसा और मानसिक संतोष मिल रहा होता।

अपने नापसंदगी के काम को छोड़कर अपना मनपसंद काम करना वैसा ही है जैसे 10 साल पुरानी कार में 500 हॉर्सपॉवर की मोटर लगा दी जाए।

         हम सभी में इच्छाएँ होती हैं। हम सभी सपने देखते हैं कि हम सचमुच क्या करना चाहते हैं। परंतु हममें से बहुत कम लोग ही वास्तव में अपनी इच्छाओं का कहना मानते हैं। इसके बजाय, हम अपनी इच्छाओं का गला घोंट देते हैं। सफलता की हत्या करने के लिए हम पाँच तरह के हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। इन हथियारों को नष्ट कर दें, क्योंकि ये हथियार खतरनाक हैं।

       1. खुद को नाक़ाबिल समझना। आपने दर्जनों लोगों को यह कहते सुना होगा, “मैं डॉक्टर (या एक्जीक्यूटिव या कमर्शियल आर्टिस्ट या बिज़नेसमैन) बनना चाहता हूँ, परंतु मैं ऐसा नहीं कर सकता।” “मुझमें इतनी प्रतिभा नहीं है।” “अगर मैंने कोशिश की तो मैं सफल नहीं हो
पाऊँगा।" "मेरे पास शिक्षा और/या अनुभव की कमी है।” कई युवक-युवतियाँ अयोग्यता की छुरी से अपनी इच्छा को मार डालते हैं।

       2. सुरक्षा की बीमारी। जो लोग कहते हैं, “मैं जहाँ हूँ वहीं सुरक्षित हूँ", वे अपने सपनों की हत्या करने में सुरक्षा के हथियार का इस्तेमाल करते हैं।

      3. प्रतियोगिता। “इस क्षेत्र में पहले से ही बहुत सारे लोग हैं," “यहाँ तो लोग एक के ऊपर एक खड़े हुए हैं," जैसे विचार भी इच्छा को तत्काल मार डालते हैं।

      4. माता-पिता के आदेश। मैंने सैकड़ों बच्चों को अपना करियर चुनते समय यह कहते सुना है, “मेरा मन तो दूसरा करियर चुनने का था, परंतु मेरे माता-पिता ने मुझसे यह करियर चुनने के लिए कहा, इसलिए मैंने इसे ही चुन लिया।" ज़्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को जान-बूझकर यह आदेश नहीं देते कि उन्हें क्या करना चाहिए। हर बुद्धिमान माता-पिता अपने बच्चों को ज़िंदगी में सफल देखना चाहते हैं। अगर बच्चा शांति से यह समझाए कि वह दूसरा करियर क्यों चुनना चाहता है, तो माता-पिता उसकी बात सुनेंगे और कोई तनाव पैदा नहीं होगा। क्योंकि बच्चे के करियर के बारे में माता-पिता और बच्चे दोनों का लक्ष्य एक ही है: सफलता।

         5. पारिवारिक ज़िम्मेदारी। “अगर मैंने पाँच साल पहले नौकरी बदली होती, तो अच्छा रहता परंतु अब मेरे पास परिवार है और इसलिए मैं अब कुछ नहीं कर सकता।" यह नज़रिया भी आपकी इच्छाओं की हत्या करने का हथियार है।

        इन हत्या के हथियारों को फेंक दें। याद रखें, पूरी शक्ति हासिल करने का इकलौता तरीक़ा, पूरी ताक़त से लक्ष्य की तरफ़ बढ़े चलने का एकमात्र उपाय यही है कि आप जो करना चाहते हैं, वही करें। इच्छा के सामने समर्पण कर दें और बदले में आपको ऊर्जा, उत्साह, मानसिक स्फूर्ति और बेहतर सेहत भी मिलेगी।

Share:

Monday, October 7, 2019

CHAPTER 11.3 हार को जीत में कैसे बदलें?

      परंतु ऑरविल हबार्ड ने अपनी पराजयों का अध्ययन किया। उन्होंने इसे अपनी राजनीतिक शिक्षा का हिस्सा माना। और आज वे स्थानीय सरकार के सबसे मॅझे हुए, सबसे अपराजेय राजनेताओं में से एक हैं।

     क़िस्मत को दोष देने के बजाय, अपनी असफलताओं का विश्लेषण करें। अगर आप हार जाते हैं, तो सीखें। ज्यादातर लोग जिंदगी में अपनी असफलताओं का विश्लेषण करते समय “बदकिस्मती", "दर्भाग्य" "क़िस्मत' या "तक़दीर" को दोष देते हैं। यह लोग बच्चों की तरह अपरिपक्व होते हैं और सहानुभूति की तलाश करते हैं। और चूँकि उन्हें अपनी ग़लती का एहसास ही नहीं होता, इसलिए वे ज़्यादा बड़े, ज्यादा मज़बूत और ज़्यादा आत्म-निर्भर होने के अवसर देखने में असफल रहते हैं।

          किस्मत को दोष देना बंद कर दें। क़िस्मत को दोष देने से कोई व्यक्ति वहाँ नहीं पहुंचा जहाँ वह पहुँचना चाहता था।

         मेरा एक दोस्त साहित्यिक सलाहकार, लेखक और आलोचक है। उसने मुझसे हाल ही में एक सफल लेखक के गुणों के बारे में चर्चा की।

         “बहुत से भावी लेखक," उसने बताया, "लिखने के बारे में गंभीर नहीं रहते। वे कुछ समय तक कोशिश करते हैं, परंतु जब उन्हें पता चलता है कि इसमें मेहनत करनी पड़ती है, असली काम करना पड़ता है, तो वे लिखना छोड़ देते हैं। मैं इन लोगों को नहीं झेल पाता क्योंकि ये लोग किसी शॉर्टकट की तलाश में रहते हैं, जबकि ऐसा कोई शॉर्टकट होता ही नहीं है।

         "परंतु,” उसने आगे कहा, "मैं यह नहीं कहना चाहता कि केवल लगन ही पर्याप्त होती है। वास्तव में केवल लगन काफ़ी नहीं होती।'

         “अभी हाल में एक ऐसे व्यक्ति से मिला जिसने 62 कहानियाँ लिखी हैं, परंतु उनमें से एक भी नहीं छपी। स्पष्ट रूप से, वह लेखक बनने के अपने लक्ष्य के प्रति लगनशील है। परंतु इस व्यक्ति के साथ समस्या यह है कि वह हर कहानी एक ही तरह से लिखता है। उसने अपनी कहानियों के लिए एक फ़ॉर्मूला बना लिया है। वह अपनी सामग्री के साथ कोई प्रयोग नहीं करता- उसके प्लॉट और पात्र, यहाँ तक कि उसकी शैली भी नहीं बदलती। मैं अब इस लेखक को यह सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ कि वह नई शैलियों और नई तकनीकों को सीखे। उसमें प्रतिभा है और अगर वह कुछ प्रयोगशीलता सीख ले, तो मुझे विश्वास है कि लेखक के रूप में वह सफल हो सकता है। परंतु जब तक वह ऐसा नहीं करता, तब तक उसे एक के बाद एक रिजेक्शन स्लिप मिलती रहेगी।"

        के साहित्यिक सलाहकार की सलाह अच्छी थी। हममें लगन होना चाहिए, परंतु लगन सफलता के तत्वों में से सिर्फ एक तत्व है। हम कोशिश कर सकते हैं. बार-बार लगातार कोशिश कर सकते हैं और इसके बावजूद हम असफल हो सकते हैं जब तक कि हममें लगन और
प्रयोगशीलता का तालमेल न हो।

         एडीसन के बारे में कहा जाता है कि वे अमेरिका के सर्वाधिक लगनशील वैज्ञानिकों में से एक थे। यह बताया गया है कि बिजली के बल्ब की खोज से पहले उन्होंने हज़ारों प्रयोग किए। परंतु यह ध्यान दें : एडीसन में लगन के साथ ही प्रयोगशीलता भी थी। वे बिजली के बल्ब को विकसित करने के अपने लक्ष्य में जुटे रहे। परंतु उन्होंने लगन के साथ प्रयोगशीलता को भी मिला दिया।

         एक ही दिशा में लगन से जुटे रहना सफलता की गारंटी नहीं है। परंतु लगन और प्रयोगशीलता के समन्वय से सफलता की गारंटी मिल जाती है।

         मैंने हाल ही में तेल खोजने की प्रक्रिया के बारे में एक लेख पढ़ा। इसमें लिखा गया था कि तेल का कुँआ खोदने से पहले तेल कंपनियाँ चट्टानों का सर्वे करती हैं। परंतु उनके वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद भी आठ में से सात कुँए सूखे निकलते हैं। तेल कंपनियाँ अपनी तेल की खोज में तो लगनशील रहती हैं, परंतु वे एक ही कुँए को मूर्खतापूर्ण गहराई तक खोदने में नहीं जुटी रहतीं। इसके बजाय जब कॉमन सेन्स से वे यह जान लेती हैं कि पुराने कुँए से तेल नहीं निकलेगा, तो वे एक नए कुँए को खोदने का प्रयोग करने लगती हैं।

         कई महत्वाकांक्षी लोग जीवन में प्रशंसनीय लगनशीलता और महत्वाकांक्षा के साथ जिंदगी भर जुटे रहते हैं, परंतु वे कभी इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि उनमें प्रयोगशीलता नहीं होती, वे नई शैलियों का प्रयोग नहीं कर पाते। अपने लक्ष्य को बनाए रखें। इसे एक इंच भी इधर-उधर न हिलाएँ। परंतु अपने सिर को किसी दीवार से भी न फोड़ें। अगर आपको परिणाम नहीं मिलते हैं, तो किसी दूसरे तरीके का इस्तेमाल करें।


        जिन लोगों में बुलडॉग जैसी लगनशीलता होती है, जो एक बार किसी चीज़ को पकड़ लेने पर उसे नहीं छोड़ते हैं, उनमें सफलता का एक मूलभूत तत्व होता है। यहाँ दो सुझाव दिए जा रहे हैं जिनसे आप प्रयोगशीलता सीख सकते हैं, और लगनशीलता के साथ इसके समन्वय के बाद आप आसानी से सफल हो सकते हैं।


        1. खुद को बताएँ, “कोई तरीका है।" विचारों में चुंबकीय शक्ति होती है। जैसे ही आप खुद को बताते हैं, "मैं हार गया हूँ। मैं इस समस्या से नहीं जीत सकता," आप नकारात्मक विचारों को आकर्षित करते हैं, और इनमें से प्रत्येक विचार आपको यह विश्वास दिलाता है कि आप सही हैं, कि आप वास्तव में हार चुके हैं।

        इसके बजाय यह विश्वास करें, “इस समस्या को सुलझाने का कोई तो रास्ता होगा।" और तत्काल आपके दिमाग में सकारात्मक विचार आने लगेंगे, जिससे आपको समस्या सुलझाने में मदद मिलेगी।

       "कोई न कोई तरीक़ा तो है" यह सोचना, यह विश्वास करना सचमुच महत्वपूर्ण है।

        विवाह परामर्शदाता भी विवाह को नहीं बचा सकते जब तक कि एक या दोनों जीवनसाथी यह न सोचें कि एक बार फिर साथ रहना संभव है। मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि कोई शराबी तब तक शराबी ही बना रहेगा जब तक कि उसे यह यक़ीन न हो जाए कि वह शराब की आदत को छोड़ सकता है।

       इस साल हज़ारों नई कंपनियाँ बनेंगी। पाँच साल बाद इनमें से बहुत कम कंपनियाँ ही बची रह पाएँगी। असफल होने वाली ज़्यादातर कंपनियाँ यही कहेंगी, “प्रतियोगिता बहुत ज़्यादा थी। हमारे पास छोड़ देने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं था।" असली समस्या यह है कि जब ज्यादातर लोगों के सामने मुश्किलें या बाधाएँ आती हैं, तो वे केवल पराजय के बारे में ही सोचते हैं और इसी कारण वे हार जाते हैं।


         जब आप मानते हैं कि कोई न कोई तरीक़ा तो होगा, तो आप अपने आप नकारात्मक ऊर्जा (चलिए, हम छोड़ देते हैं, हम हार मान लेते हैं) को सकारात्मक ऊर्जा (हमें आगे बढ़ना चाहिए, हमें जुटे रहना चाहिए) में बदल लेते हैं।

        कोई भी समस्या या मुश्किल तभी तक पहाड़ जैसी लगेगी, जब आप इसे पहाड़ जैसा समझेंगे। अगर आप मानते हैं कि यह नहीं सुलझ सकती, तो यह सचमुच नहीं सुलझेगी। यह विश्वास रखें कि यह सुलझ सकती है और इसके बाद आपके मन में इसके समाधान अपने आप आने लगेंगे। यह असंभव है, ऐसा कभी न तो सोचें, न ही कहें।

       2. पीछे हटें, और फिर से शुरू करें। अक्सर हम इतने लंबे समय तक किसी समस्या के इतने क़रीब रहते हैं कि हम नए समाधान या नई शैलियों को नहीं देख पाते।

         मेरे एक इंजीनियर दोस्त को एक नई एल्युमीनियम इमारत की डिज़ाइन बनाने का काम मिला। इस तरह की कोई चीज़ या इससे मिलती-जुलती कोई चीज़ या उसकी डिज़ाइन अब तक किसी ने नहीं बनाई थी। मैं इस दोस्त से कुछ दिन पहले मिला और मैंने उससे पूछा कि उसकी नई बिल्डिंग का क्या हाल है।

        "बहुत अच्छा नहीं," उसने जवाब दिया। "मुझे लगता है कि मैंने इन गर्मियों में अपने बगीचे में पर्याप्त समय नहीं दिया है। जब मैं लंबे समय तक डिज़ाइनिंग की कठिन समस्याओं में उलझा रहता हूँ, तो मुझे इससे बाहर निकलने की ज़रूरत होती है, क्योंकि बाहर निकलने के बाद ही मेरे मन में नए विचार आते हैं।"

         "आपको यह जानकर आश्चर्य होगा," उसने आगे कहा, "कई इंजीनियरिंग के विचार तो मेरे मन में तब आते हैं जब मैं पेड़ के करीब बैठकर घास पर पानी डाल रहा होता हूँ।"

        राष्ट्रपति आइज़नहॉवर से एक बार किसी पत्रकार वार्ता में पूछा गया कि वे इतनी छुट्टियाँ क्यों मनाते हैं। उनका जवाब उन लोगों के बहुत काम का है जो अपनी रचनात्मक योग्यता बढ़ाना चाहते हैं। आइज़नहॉवर ने कहा, "मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह जनरल मोटर चला रहा हो या देश, अपनी मेज़ पर बैठकर या ढेर सारे कागज़ों के बीच मुँह छिपाकर अपने काम को अच्छी तरह से कर सकता है। वास्तव में प्रेसिडेंट को अपना दिमाग़ फ़ालतू की चीज़ों से मुक्त रखना चाहिए। उसे मूलभूत सिद्धांतों और मुख्य मुद्दों पर अपना खुद का चिंतन करते रहना चाहिए... ताकि वह स्पष्ट सोच सके और बेहतर निर्णय ले सके।"

           मेरा एक भूतपूर्व बिज़नेस सहयोगी अपनी पत्नी के साथ हर महीने 72 घंटे की छुट्टियाँ मनाने शहर से बाहर जाता है। उसका मानना है कि इस तरह पीछे हटने और नए सिरे से शुरू करने से उसकी मानसिक क्षमता बढ़ जाती है और वह अपने ग्राहकों को अधिक लाभ पहुंचा पाता है। 

          जब आपकी राह में बाधा आए, तो पूरे प्रोजेक्ट को कूड़ेदान में न डाल दें। इसके बजाय, पीछे हटें, मानसिक रूप से खुद को तरोताज़ा कर लें। संगीत सुनें या टहलें या झपकी ले लें। इसके बाद जब आप उस समस्या का सामना करेंगे तो आपके कुछ सोचने से पहले ही आपके सामने इसका समाधान अपने आप आ जाएगा।

        बड़ी परिस्थितियों में भी अच्छे पहलू को देखना लाभदायक होता है। एक युवक ने मुझे बताया कि जब उसकी नौकरी छूटी तो उसने अच्छे पहलू को देखने पर ध्यान केंद्रित किया। उसने बताया, “मैं एक बड़ी क्रेडिट रिपोर्टिंग कंपनी के लिए काम कर रहा था। एक दिन मुझे नौकरी से हटाए जाने का नोटिस थमा दिया गया। मंदी का दौर चल रहा था और कंपनी उन कर्मचारियों को हटा रही थी, जो उसके लिए 'कम महत्वपूर्ण' थे।

          "नौकरी में मुझे तनख्वाह तो बहुत ज्यादा नहीं मिलती थी, परंतु फिर भी मेरे हिसाब से यह अच्छी थी। मुझे कई घंटे तक तो बहुत बुरा लगता रहा, परंतु फिर मैंने यह फैसला किया कि मैं इस बारे में सकारात्मक तरीके से सोचूंगा। दरअसल मुझे यह नौकरी ख़ास पसंद नहीं थी और अगर मैं यहीं बना रहता, तो मैं ज़्यादा तरक्क़ी नहीं कर सकता था। अब मैं कोई ऐसी नौकरी ढूँढ़ सकता जो मुझे पसंद हो। जल्दी ही मुझे मेरी मनचाही नौकरी मिल गई, और अच्छी बात तो यह थी कि यहाँ मेरी तनख्वाह भी ज्यादा थी। क्रेडिट कंपनी से निकाला जाना मेरे लिए बहुत अच्छा साबित हुआ।"

       याद रखें, आप किसी भी परिस्थिति में वही देखते हैं, जो आप देखना चाहते हैं। अच्छे पहलू को देखें और हार को जीत में बदल लें। अगर आप स्पष्ट दृष्टि विकसित कर लेते हैं, तो सारी चीजें आपके लिए अच्छा काम करेंगी।

                      संक्षेप में

सफलता और असफलता में फ़र्क इस बात का होता है कि असफलता, बाधा, निराशाजनक स्थितियों और हतोत्साहित करने वाली बातों के प्रतिआपका रवैया क्या है।

        हार को जीत में बदलने के लिए यह पाँच सिद्धांत काम में लाएँ:

1. असफलता का अध्ययन करें, ताकि आप सफलता की राह पर आगे बढ़ सकें। जब आप हारें, तो उस हार से सबक सीखें और फिर अगली बार जीतने की तैयारी करें।

2. अपने खुद के रचनात्मक आलोचक बनने का साहस रखें। अपनी गलतियाँ और कमज़ोरियाँ खोजें और फिर उन्हें सुधारें। इससे आप प्रोफ़ेशनल बन जाएँगे।

3. क़िस्मत को दोष देना बंद कर दें। हर असफलता का विश्लेषण करें। यह पता लगाएँ कि गलती कहाँ हुई थी। याद रखें, तक़दीर को दोष देने से कोई व्यक्ति वहाँ नहीं पहुंचा, जहाँ वह पहुँचना चाहता था।

4. लगनशीलता के साथ प्रयोगशीलता का समन्वय कर लें। अपने लक्ष्य को बनाए रखें, परंतु पत्थर की दीवार से अपना सिर न टकराते रहें। नई शैलियों का प्रयोग करें। प्रयोगशील बनें।

5. याद रखें, हर स्थिति का एक अच्छा पहलू होता है। इसे खोजें, अच्छे पहलू को देखें और आप एक बार फिर उत्साह से भर जाएँगे।

Share:

Saturday, October 5, 2019

CHAPTER 11.2 हर को जीत में कैसे बदले?

        फिर मैंने अपने विद्यार्थी से कहा, “तुम्हारी ज्यादातर बातें सही हैं। ऐसे कई बेहद सफल लोग हैं जिनके पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं है,या जिन्होंने इस डिग्री का नाम तक नहीं सुना है। और यह तुम्हारे लिए भी संभव है कि तुम बिना डिग्री के जीवन में सफल हो जाओ। पूरे जीवन के हिसाब से देखा जाए, तो तुम्हारे फेल होने का तुम्हारे जीवन की सफलता या असफलता से कोई सीधा संबंध नहीं है। परंतु फेल होने के प्रति तुम्हारे रवैए से बहुत फ़र्क पड़ सकता है।"

“वह कैसे?" उसने पूछा।

        मैंने जवाब दिया, "बाहर की दुनिया में भी लोग आपको उसी तरह नंबर देते हैं, जैसे हम लोग देते हैं। वहाँ भी इसी बात का महत्व होता है। कि आप अपने काम को कितनी अच्छी तरह करते हैं। बाहर की दुनिया में भी कोई आपको घटिया काम करने के लिए प्रमोशन नहीं देगा, न ही आपकी तनख्वाह बढ़ाएगा।"

        मैं एक बार फिर रुका ताकि उसे पूरी बात समझ में आ जाए।

      फिर मैंने कहा, "क्या मैं तुम्हें एक सुझाव दूं? अभी तुम बहुत निराश हो। मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हें कैसा लग रहा होगा। और अगर इस बात पर तुम उत्तेजित हुए हो, तो मैंने उसका बिलकुल भी बुरा नहीं माना है। मैं चाहता हूँ तुम इस अनुभव को सकारात्मक तरीके से लो। यह तुम्हें एक बहुत महत्वपूर्ण सबक़ सिखा सकता है : अगर आप अच्छा काम नहीं करेंगे, तो आप वहाँ नहीं पहुँच पाएँगे, जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं। इस सबक़ को सीख लो और आज से पाँच साल बाद जाकर तुम्हें यह एहसास होगा कि यह तुम्हारे द्वारा सीखी गई जीवन की सबसे बहुमूल्य शिक्षाओं में से एक है।"

      मैं यह जानकर खुश हुआ कि कुछ ही दिनों बाद उस विद्यार्थी ने एक बार फिर कॉलेज में एडमीशन ले लिया। इस बार वह बहुत ही अच्छे नंबरों से पास हुआ। इसके बाद, वह ख़ास तौर पर मुझसे मिलने आया और उसने मुझे बताया कि हमारी पहले वाली मुलाक़ात ने उस पर गहरा असर डाला था और उसने उस चर्चा से बहुत कुछ सीखा था।

“आपके कोर्स में फेल हो जाने से मैंने बहुत कुछ सीखा,” उसने कहा।“यह अजीब लगेगा, प्रोफ़ेसर, परंतु अब मैं खुश हूँ कि मैं पहली बार में पास नहीं हुआ।"

       हम हार को जीत में बदल सकते हैं। सबक सीखो, उसे अपने जीवन में उतारो, पराजय की तरफ़ पीछे मुड़कर देखो और मुस्कराओ।

       फ़िल्मों के शौकीन लोग महान अभिनेता बैरीमोर को कभी नहीं भूल पाएँगे। 1936 में बैरीमोर के नितंब में फ्रैक्चर हो गया। यह फ्रैक्चर कभी ठीक नहीं हो पाया। कई लोगों को लगा कि मिस्टर बैरीमोर की ज़िंदगी ख़त्म हो गई। परंतु नहीं, मिस्टर बैरीमोर को ऐसा नहीं लगा। उन्होंने इस बाधा को दूर करके अपने अभिनय की सफलता से भी बड़ी सफलता का रास्ता बना लिया। अगले 18 सालों तक दर्द के बावजूद उन्होंने व्हील चेयर पर बैठे-बैठे दर्जनों सफल भूमिकाओं में अभिनय किया।

       15 मार्च, 1945 को डब्ल्यू. कॉल्विन विलियम्स फ़्रांस में एक टैंक के पीछे चल रहे थे। टैंक एक बारूदी सुरंग से टकराया, उसमें विस्फोट हुआ और इससे मिस्टर विलियम्स हमेशा के लिए अंधे हो गए।

       परंतु यह दुर्घटना मिस्टर विलियम्स को पादरी और सलाहकार बनने के अपने लक्ष्य का पीछा करने से नहीं रोक पाई। जब उन्होंने कॉलेज से ग्रैजुएशन कर लिया (और वह भी ऑनर्स के साथ), तो विलियम्स ने कहा कि उनके विचार से उनका अंधापन “उनके चुने गए करियर में एक वरदान साबित होगा। मैं कभी बाहरी चीज़ों को देखकर निर्णय नहीं लँगा। इसलिए मैं हमेशा व्यक्ति को दूसरा मौक़ा दूंगा। मेरे अंधेपन से मुझे यह लाभ भी होगा कि कोई व्यक्ति कैसा भी दिखे, मैं सबके साथ एक जैसा व्यवहार करूँगा। में इस तरह का इंसान बनना चाहता हूँ जिसके पास कोई भी आ सके और बेझिझक आकर अपने दिल की बात कह सके।" 

       क्या यह एक शानदार उदाहरण नहीं है कि किस तरह एक कर, कटु हार को जीत में बदला जा सकता है?

       हार केवल एक मानसिक स्थिति है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

       मेरा एक दोस्त स्टॉक मार्केट में सफल और प्रसिद्ध निवेशक है। वह अपने निवेश के हर निर्णय को अपने अतीत के अनुभवों के आधार पर लेता है। एक बार उसने मुझे बताया, “जब मैंने 15 साल पहले निवेश करना शुरू किया तो मेरे हाथ कई बार जले। ज़्यादातर शुरुआती लोगों
की तरह, मैं भी फटाफट अमीर बनना चाहता था। परंतु इसके बजाय मैं जल्दी ही दीवालिया हो गया। परंतु इसके बावजूद मैंने हार नहीं मानी। मुझे अर्थव्यवस्था की मूलभूत शक्ति का ज्ञान था ओर मैं यह जानता था कि लंबे समय में अच्छी तरह चुने गए शेयरों में निवेश करना समझदारीपूर्ण होता है।

          "तो मैंने अपने शुरुआती बुरे निवेशों को अपनी शिक्षा की कीमत मान लिया।" वह हँसते हुए कहता है।

       दूसरी तरफ़, मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो एक-दो मूर्खतापूर्ण निवेश करने के बाद 'शेयर-विरोधी' बन जाते हैं। अपनी गलतियों का विश्लेषण करने के बजाय और एक अच्छी संस्था से जुड़ने के बजाय, वे इस ग़लत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने का मतलब है जुआ खेलना, एक ऐसा जुआ, जिसमें देर-सबेर हर व्यक्ति हारता है।

        हर असफलता से कुछ न कुछ बचाने का फैसला करें। अगली बार जब नौकरी या घर में कोई गड़बड़ हो, तो शांत हो जाएँ और यह पता लगाएँ कि गड़बड़ कहाँ शुरू हुई थी। इससे आप उसी ग़लती को दुबारा करने से बच सकते हैं।

        अगर हम कुछ सीखें, तो असफल होना भी फायदेमंद साबित हो सकता है।

        हम इंसान भी अजीब होते हैं। अपनी सफलताओं का श्रेय तो हम पूरा लेना चाहते हैं। जब हम जीतते हैं, तो हम पूरी दुनिया को इस बारे में बताना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है कि हम लोगों के मुँह से यह सुनना चाहें, “यही वह व्यक्ति है जिसने इतना बड़ा काम किया।”

        परंतु अपनी असफलता का श्रेय व्यक्ति तत्काल किसी दूसरे के मत्थे मढ़ देता है। जब सामान नहीं बिकता, तो सेल्समैन ग्राहकों को दोष देते हैं। अफ़सरों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे गलत काम होने पर कर्मचारियों या दूसरे अफ़सरों को दोष दें। घरेलू लड़ाइयों और समस्याओं के लिए पति अपनी पत्नियों को दोष देते हैं और पत्नियाँ अपने पतियों को।

        यह तो सच है कि इस जटिल संसार में दूसरे लोग हमें धक्का मारकर गिरा सकते हैं परंतु यह भी सच है कि ज्यादातर हम खुद ही अपने आपको गिराते हैं। हम अपनी व्यक्तिगत कमियों व ग़लतियों के कारण हारते हैं।

        सफलता के लिए खुद को इस तरह तैयार करें। अपने आपको याद दिलाएँ कि आप आदर्श और पूर्ण मनुष्य बनना चाहते हैं, जितना बनना इंसान के लिए संभव है। अपने आपको एक टेस्ट ट्यूब में रखकर निष्पक्ष दृष्टि से खुद का और अपनी स्थिति का मूल्यांकन करें। यह देखें कि क्या आपमें ऐसी कोई कमज़ोरी है जिसके बारे में आप जानते न हों। अगर आपमें ऐसी कमज़ोरी है, तो उसे सुधारने के लिए कदम उठाएँ। कई लोग खुद को देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे सुधार की संभावना देखने में असफल हो जाते हैं।

          महान मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा स्टार, रिसे स्टीवन्स ने रीडर्स डाइजेस्ट (जुलाई 1955) में कहा कि उसे सबसे अच्छी सलाह अपने जीवन के सबसे दुःखद क्षण में मिली।

        अपने करियर की शुरुआत में, मिस स्टीवन्स मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा “ऑडीशन्स ऑफ़ द एयर" में असफल हो गईं। हारने के बाद मिस स्टीवन्स कड़वाहट से भरी हुई थीं। “मैं यह सुनना चाहती थी," उसने कहा, “कि मेरी आवाज़ वास्तव में दूसरी लड़की से सचमुच बेहतर थी, कि निर्णायकों का फ़ैसला ग़लत था, कि मैं इसलिए नहीं जीत पाई, क्योंकि मेरे पास सही जुगाड़ नहीं थीं।"

         परंतु मिस स्टीवन्स की टीचर ने उसे कोई झूठी सांत्वना नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने मिस स्टीवन्स से कहा, "देखो बेटा, अपनी गलतियों का सामना करने की हिम्मत जुटाओ।"

         "हालाँकि मैं आत्म-दया के शब्द सुनना चाहती थी," मिस स्टीवन्स ने कहा, “परंतु अपनी टीचर के शब्द बार-बार मेरे कानों में गूंजते रहे। उस रात उन शब्दों ने मुझे जगा दिया। मैं तब तक नहीं सो पाई जब तक कि मैंने अपनी कमियों का सामना नहीं कर लिया। अँधेरे में लेटे-लेटे मैंने खुद से पूछा, 'मैं क्यों असफल हुई ?' 'मैं अगली बार किस तरह जीत सकती हूँ?' और मैंने माना कि मेरी आवाज़ की रेंज सचमुच उतनी अच्छी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए, कि मुझे और भाषाएँ सीखनी चाहिए, कि मुझे और ज़्यादा भूमिकाएँ सीखनी चाहिए।"

        मिस स्टीवन्स ने आगे बताया कि किस तरह अपनी कमियों का सामना करने से उसे न सिर्फ स्टेज पर सफलता मिली, बल्कि अपनी ग़लतियों को मानने से उसके ज्यादा दोस्त भी बने और वह ज़्यादा लोकप्रिय भी हुई।

      खुद का अच्छा आलोचक होना अच्छी बात है, बशर्ते कि आलोचना रचनात्मक हो। इससे आपको व्यक्तिगत शक्ति और योग्यता बढ़ाने में मदद मिलती है, जो सफलता के लिए बहुत ज़रूरी है। दूसरों को दोष देना विध्वंसात्मक है। सामने वाले की ग़लती “साबित" करने से आपको कुछ भी हासिल नहीं होता।

      रचनात्मक रूप से खुद की आलोचना करें। अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने में न हिचकिचाएँ। सच्चे प्रोफेशनल बनें। वे अपनी ग़लतियों और कमजोरियों को ढूँढ़ते हैं, फिर उन्हें दूर करते हैं। इसी कारण वे सफल प्रोफेशनल बनते हैं।

       परंतु अपनी ग़लतियाँ सिर्फ इसलिए न ढूँढें ताकि आप खुद के सामने यह बहाना बना सकें, “यह एक और कारण है जिससे मैं असफल होता हूँ।"

        इसके बजाय अपनी ग़लतियों को इस तरह से देखें, “यह एक और तरीका है जिससे मैं जीत सकता हूँ।"

        महान अल्बर्ट हबार्ड ने एक बार कहा था, “असफल व्यक्ति वह होता है जिसने बड़ी ग़लतियाँ की तो हैं, परंतु जो अपने अनुभव से कुछ नहीं सीख पाया।"

      अक्सर हम अपनी असफलता के लिए क़िस्मत को दोष देते हैं। हम कहते हैं, "अरे, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है," और फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं। परंतु ज़रा रुकें और सोचें। गेंद की उछाल की भी कोई न कोई वजह होती है। गेंद बिना कारण के यूँ ही किसी दिशा
में नहीं उछलती। गेंद का उछाल तीन कारणों से निर्धारित होता है : एक तो गेंद, फिर जिस तरीके से इसे फेंका जाता है, और तीसरे जिस सतह से यह टकराती है। निश्चित भौतिक नियम गेंद की उछाल का कारण तय करते हैं, इसका क़िस्मत से कोई लेना-देना नहीं होता।

         मान लें कि सी.ए.ए. एक रिपोर्ट जारी करे और कहे, "हमें खेद है। कि हवाई जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया, परंतु हम क्या करें, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है।"

       आप कहेंगे कि अब सी.ए.ए. को बदल देना चाहिए। या अगर कोई डॉक्टर किसी रिश्तेदार से कहे, "मुझे खेद है कि मैं उसे बचा नहीं पाया। मैं नहीं जानता कि ऐसा कैसे हुआ। यह तो किस्मत की बात थी।"

       जब आप या आपका कोई दूसरा रिश्तेदार बीमार होगा, तो आप उस डॉक्टर के पास नहीं जाएंगे।

        गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है' वाली शैली हमें कुछ नहीं सिखाती। जब हम अगली बार उसी तरह की परिस्थिति का सामना करते हैं। तो हम वही ग़लती करने से सिर्फ इसलिए नहीं बच पाते, क्योंकि हमने अपनी पिछली ग़लती से सबक़ नहीं सीखा था। वह फुटबॉल कोच जो शनिवार का मैच हार जाने के बाद अपनी टीम से कहता है, “चिंता मत करो, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है" अपनी टीम की ग़लतियाँ ढूँढ़ने में मदद नहीं कर रहा है, जिससे अगले शनिवार को होने वाले मैच में उन ग़लतियों को सुधारा जा सके।

       डियरबॉर्न, मिशीगन के मेयर ऑरविल हबार्ड 17 सालों से लगातार मेयर हैं और देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नगरीय प्रशासकों में से एक हैं।

        डियरबॉर्न के मेयर बनने के दस साल पहले मिस्टर हबार्ड भी "बदकिस्मती” का बहाना बना सकते थे और राजनीति छोड़ सकते थे।

लगातार विजेता बनने के पहले, ऑरविल हबार्ड तीन बार "बदकिस्मत" रहे थे क्योंकि उन्हें मेयर पद के लिए नामांकित ही नहीं किया गया था। तीन बार उन्होंने स्टेट सीनेटर के लिए नामांकन हासिल करने की कोशिश की थी, परंतु वे असफल हुए। एक बार तो वे काँग्रेस के लिए नामांकन की दौड़ से ही बाहर हो गए थे।

परंतु ऑरविल हबार्ड ने अपनी पराजयों का अध्ययन किया। उन्होंने

Share:

CHAPTER 11.1 हार को जीत में कैसे बदलें?

              हार को जीत में कैसे बदलें?


        सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे लोग जो गरीब इलाक़ों या झुग्गी- ला बस्तियों में काम करते हैं, उनका कहना है कि इन दयनीय लोगोंकी  उम्र, धार्मिक आस्था, शिक्षा और पृष्ठभूमियाँ अलग-अलग होती हैं। इनमें से कई नागरिक आश्चर्यजनक रूप से युवा होते हैं। कई बूढ़े होते हैं। कुछ कॉलेज ग्रैजुएट होते हैं, कुछ बिलकुल अशिक्षित होते हैं। कई शादी-शुदा होते हैं, कई कुंवारे होते हैं। परंतु गरीबी के दलदल में रहने वाले सभी असफल लोगों में एक बात समान होती है : हर व्यक्ति हारा हुआ है, पिटा हुआ है, चोट खाया हुआ है। हर एक ने जीवन में ऐसी
समस्याओं को झेला है जिनके आगे वह घुटने टेक चुका है। वह आपको उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के बारे में बताने के लिए उत्सुक है, व्यग्र है जो उसकी जिंदगी का वॉटरलू साबित हुई।

        मानवीय अनुभव की ये दास्तानें “मेरी पत्नी मेरा घर छोड़कर भाग गई।" से लेकर “मैंने अपना सब कुछ गँवा दिया था और मेरे पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं बची थी" से लेकर “मैंने दो-एक काम ऐसे किए जिससे मेरा सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया और मैं यहाँ चला आया।"

         जब हम स्किड रो यानी असफलता के दलदल से ऊपर चलकर मिस्टर और मिसेज़ औसत व्यक्ति के इलाके में पहुंचते हैं, तो हम जीवनस्तर में स्पष्ट अंतर देख सकते हैं। परंतु हम एक बार फिर यह देखते हैं कि मिस्टर औसत व्यक्ति भी अपनी औसत परिस्थितियों के लिए मूलतः वही कारण बताते हैं जो मिस्टर असफल ने बताए थे। अंदर से, मिस्टर औसत व्यक्ति हारा हुआ महसूस करते हैं। जिन परिस्थितियों से वे चोट खाए हैं, उनके घाव अब भी नहीं भरे हैं। अब वे अति सावधान हो गए हैं। अब वे रुक-रुककर चलते हैं, सीना तानकर नहीं चलते।
विजयी सेनापति की तरह सिर उठाकर नहीं चलते, बल्कि हारे हुए असंतुष्ट सिपाही की तरह सिर झुकाकर चलते हैं। वे हारा हुआ महसूस करते हैं परंतु वे अपनी औसत ज़िंदगी की सज़ा काटने की कोशिश करते हैं जिसके लिए वे अपनी “तक़दीर" को दोष देते हैं।

        इस व्यक्ति ने भी हार के सामने समर्पण कर दिया है, परंतु इसने यह समर्पण तार्किक रूप से, अच्छे ढंग से, सामाजिक रूप से “स्वीकृत" तरीके से किया है।

        अब जब हम सफलता की कम भीड़ वाली दुनिया में ऊपर चढ़ते हैं,तो हम देखते हैं कि यहाँ भी हर तरह की पृष्ठभूमि से आए लोग मौजूद हैं। कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिज़ हों या प्रसिद्ध मंत्री या सरकारी अधिकारी, हर क्षेत्र के चोटी के लोगों को देखने पर हम पाते हैं कि ये लोग ग़रीब घरों, अमीर घरों, बिखरे हुए परिवारों, मज़दूर परिवारों, खेतिहर घरों, और झोपड़ियों से यानी हर पृष्ठभूमि से आए हैं। समाज का नेतृत्व करने वाले ये लोग हर उस कठिन परिस्थिति को झेल चुके हैं जिसकी कल्पना हम कर सकते हैं।

        हर मामले में मिस्टर असफल, मिस्टर औसत और मिस्टर सफल में समानता हो सकती है- उम्र, बुद्धि, पृष्ठभूमि, राष्ट्रीयता या कोई और चीज़ जो आपके दिमाग में आए। इन सभी बातों में इन लोगों में कोई अंतर नहीं होता। परंतु इनमें एक बड़ा फ़र्क होता है। उन लोगों का हार के बारे में नज़रिया अलग-अलग होता है।

        जब मिस्टर असफल गिर जाते हैं, तो वे दुबारा नहीं उठ पाते। वे वहीं पड़े रहते हैं; कराहते हुए, अपनी चोट को सहलाते हुए। मिस्टर औसत अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं और रेंगने लगते हैं और जब वे थोड़ी दूर पहुँच जाते हैं तो फिर उठकर दूसरी दिशा में दौड़ लगा देते हैं ताकि वे दुबारा न गिरें।

        परंतु मिस्टर सफल जब गिरते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भिन्न होती है। वे तत्काल उठ खड़े होते हैं, सबक़ सीखते हैं, गिरने की बात भूल जाते

हैं और ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगते हैं।

       मेरा एक करीबी दोस्त बहुत ही सफल मैनेजमेंट सलाहकार है। जब आप उसके ऑफिस में कदम रखते हैं तो आपको सचमुच ऐसा लगता है जैसे आप किसी पॉश इलाके में आ गए हैं। फ़र्नीचर इतना शानदार होता है, गलीचे इतने आलीशान, ग्राहक इतने महत्वपूर्ण और माहौल इतना व्यस्त कि आप पहली ही नज़र में यह अनुमान लगा सकते हैं कि उसकी कंपनी बहुत सफल और समृद्ध होगी।

        कोई आलोचक यह कह सकता है, “इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति आसानी से बना सकता है।" परंतु आलोचक ग़लत है। इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति ने नहीं बनाया। यह माहौल किसी प्रतिभाशाली या अमीर या खुशकिस्मत व्यक्ति ने भी नहीं बनाया। यह माहौल सिर्फ़ (सिर्फ़ शब्द के प्रयोग में मुझे संकोच होता है क्योंकि सिर्फ का मतलब आपको बहुत थोड़ा लग सकता है) एक लगनशील व्यक्ति ने बनाया, जिसने कभी यह नहीं सोचा कि वह हार गया है।

        इस समृद्ध और प्रतिष्ठित कंपनी के पीछे उस व्यक्ति की कहानी है जिसने ऊपर आने के लिए संघर्ष किया : बिज़नेस के शुरुआती छह महीनों में ही उसने अपनी 10 साल की बचत गँवा दी। वह कई महीनों तक अपने ऑफ़िस में ही रहा क्योंकि उसके पास किराए के घर के लिए पैसे नहीं थे। उसने कई "अच्छी” नौकरियों का प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि वह चाहता था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करे। जितनी बार उसके संभावित ग्राहकों ने उसे 'हाँ' कहा, उससे सौ गुना ज़्यादा लोगों ने 'ना' कहा।

        सफल होने के लिए उसने सात साल कड़ी मेहनत की, परंतु मैंने इस दौरान एक बार भी उसके मुँह से शिकायत नहीं सुनी। वह कहता था, “डेव, मैं सीख रहा हूँ। इस बिज़नेस में काफ़ी प्रतियोगिता है और चूंकि यह अप्रत्यक्ष बिज़नेस है इसलिए इसे बेचना मुश्किल है। परंतु मैं अब सीख रहा हूँ।"

      और उसने इसे सीख ही लिया।
  

      एक बार मैंने अपने दोस्त से कहा कि इस अनुभव से उसकी काफ़ी ऊर्जा बाहर निकल जाती होगी। परंतु उसका जवाब था, "नहीं, यह मेरे अंदर से कुछ निकाल नहीं रहा है, बल्कि मेरे अंदर कुछ भर रहा है।"

        हू इज़ हू इन अमेरिका में लोगों की जीवनियाँ पढ़ें और आप पाएँगे कि जो लोग बहुत सफल हुए हैं, उन्हें कई बार असफलता झेलनी पड़ी है। सफल लोगों के इस अभिजात्य समूह ने विरोध सहन किया, लोगों के ताने सहे, राह में बाधाएँ और तकलीफें झेली, असफलताओं का दौर झेला, व्यक्तिगत दुर्भाग्य सहा।

        महान लोगों की जीवनियाँ पढ़ें, और आप यहाँ भी पाएंगे कि ये सभी लोग किसी न किसी मोड़ पर अपनी असफलताओं के सामने घुटने टेक सकते थे।

        या इसके बजाय ऐसा करें। अपनी कंपनी के प्रेसिडेंट की पृष्ठभूमि जानें या अपने शहर के मेयर की या किसी ऐसे व्यक्ति को चुन लें जिसे आप सचमुच सफल मानते हों। जब आप गहराई में जाएँगे, तो आप पाएँगे कि इस व्यक्ति ने बहुत बड़ी, असली बाधाएँ पार की हैं और तब जाकर वह सफल हुआ है।

         विना विरोध, मुश्किलों और असफलताओं के बड़ी सफलता हासिल करना संभव नहीं है। परंतु यह संभव है कि आप इन असफलताओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा बना लें। आइए देखें कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।

       मैंने व्यावसायिक एयरलाइनों के आँकड़े देखे जिनके मुताबिक़ लगभग 10 बिलियन मील की उड़ान में केवल एक दुर्घटना होती है। हवाई यात्रा आजकल बहुत ज़्यादा सुरक्षित है। दुर्भाग्य से, इसके बावजूद हवाई दुर्घटनाएँ होती हैं। परंतु जब कोई दुर्घटना होती है, तो 'सिविल एरोनॉटिक्स एडमिनिस्ट्रेशन' (सी.ए.ए.) तत्काल जाँच शुरू कर देता है कि दुर्घटना का कारण क्या था। मीलों दूर तक फैले मलबे को इकट्ठा किया जाता है। विशेषज्ञों का समूह यह विचार करता है कि क्या हुआ होगा जिस वजह से यह दुर्घटना हुई। गवाह और ज़िंदा बचे लोगों से बातचीत की जाती है। जाँच कई हफ्ते, कई महीने तक चलती है जब तक कि इस सवाल का जवाब न मिल जाए, “यह दुर्घटना क्यों हुई?"

         एक बार सी.ए.ए. को जवाब मिल जाता है, तो तत्काल ऐसे कदम उठाए जाते हैं कि फिर कभी इस तरह की दुर्घटना न होने पाए। अगर दुर्घटना किसी तकनीकी खराबी के कारण हुई थी, तो उसी तरह के दूसरे जहाज़ों में उस तकनीकी दोष को दूर किया जाता है। अगर कोई यंत्र दोषपूर्ण होता है, तो उसमें सुधार किया जाता है। आधुनिक हवाई जहाज़ में हज़ारों सुरक्षा यंत्र सी.ए.ए. की इसी तरह की जाँचों के परिणामस्वरूप तैयार हुए हैं।

       सी.ए.ए. के अध्ययन से हवाई यात्राएं पहले से ज्यादा सुरक्षित होती जाती हैं। असफलताओं से सीखने की प्रेरणा इसी को कहते हैं।

        डॉक्टर्स भी असफलताओं के सहारे बेहतर स्वास्थ्य और लंबे जीवन को सुनिश्चित करते हैं। अक्सर जब कोई मरीज़ किसी अनजान कारण से मरता है तो डॉक्टर यह जानने के लिए पोस्टमॉर्टम करते हैं कि उसकी मौत का कारण क्या था। इस तरह वे मानव शरीर की कार्यप्रणाली के बारे में ज्यादा जान पाते हैं और कई दूसरे लोगों की ज़िंदगियाँ बचा पाते हैं।

           मेरा एक दोस्त सेल्स एक्जीक्यूटिव है जो हर महीने अपने सेल्समैनों को यह बताने के लिए एक मीटिंग करता है कि वे कोई महत्वपूर्ण बिक्री क्यों नहीं कर पाए। ग्राहक और सेल्समैन के बीच की पूरी वार्ता का विश्लेषण किया जाता है और यह सीखा जाता है कि किस तरह भविष्य में ऐसी गलतियां न की जाएँ जिनसे असफलता मिली।

          यही सफल फुटबॉल कोच भी करते हैं, जो जितने मैच हारते हैं. उससे कहीं ज्यादा मैच जीतते हैं। वे भी अपनी टीम के साथ हर मैच का विश्लषण करते हैं और खिलाड़ियों को उनकी गलतियाँ बताते हैं। कई कोच तो हर मैच की वीडियो फिल्म भी बनवाते हैं ताकि टीम अपनी आँखों के सामने अपनी गलत चालों को देख सकें। इसका उद्देश्य है। टीम अगला मैच बेहतर खेले।

          सी.ए.ए. के अधिकारी, सफल सेल्स एक्जीक्यूटिब्ज़, डॉक्टर, फुटबॉल कोच और हर क्षेत्र के प्रोफेशनल्स सफलता के इस सिद्धांत का अनुसरण करते हैं : हर असफलता से कुछ न कुछ बचा लो।

          जब हम असफल होते हैं तो हम भावनात्मक रूप से इतने दःखी और विचलित हो जाते हैं कि हम उससे सबक सीखना भूल जाते हैं।

        प्रोफ़ेसर जानते हैं कि फेल होने के बाद विद्यार्थी की प्रतिक्रिया से ही सफलता की उसकी संभावना पता चलती है। जब मैं डेट्रॉयट में 'वेन स्टेट यूनिवर्सिटी' में प्रोफेसर था, तो मैंने एक सीनियर विद्यार्थी को फेल कर दिया था। मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। इससे विद्यार्थी को गहरा धक्का लगा। उसने ग्रैजुएशन के बाद की योजनाएँ बना ली थीं और इस कारण उसकी हँसी उड़ना तय थी। उसके पास दो विकल्प थे: या तो वह एक साल और पढ़कर परीक्षा पास करे या फिर वह बिना डिग्री लिए कॉलेज छोड़कर चला जाए।

        मुझे आशा थी कि अपनी असफलता पर विद्यार्थी निराश होगा. शायद वह उत्तेजित भी हो। जब मैंने उसे यह समझाया कि वह असफल क्यों हुआ था, तो उसने यह माना कि उसने इस बार ठीक से पढ़ाई नहीं की थी।

       “परंतु,” उसने कहा, “मेरा पिछला रिकॉर्ड तो ठीक-ठाक है। आपने उसे ध्यान में क्यों नहीं रखा?"

        मैंने उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि हम हर साल का अलग-अलग मूल्यांकन करते हैं। मैंने यह भी जोड़ा कि कठोर शैक्षणिक नियमों के चलते नंबर तभी बढ़ाए जा सकते हैं जब जाँचने वाले प्रोफ़ेसर ने कोई गलती की हो।

        जब विद्यार्थी को यह पता चला कि उसके नंबर बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, तो वह काफ़ी गुस्सा हो गया। उसने कहा, "प्रोफेसर, मैं आपको इस शहर के 50 लोगों के नाम गिना सकता हूँ जो बेहद सफल हैं पर वे कभी कॉलेज नहीं गए, न ही उनके पास कोई डिग्री है। ग्रैजुएशन की डिग्री का महत्व ही क्या है? परीक्षा में थोड़े खराब नंबर मिलने के कारण क्या मुझे मेरी डिग्री नहीं मिलेगी?

        "भगवान का शुक्र है," उसने आगे कहा, "बाहर की दुनिया में लोग आप जैसे प्रोफ़ेसरों की तरह नहीं सोचते।"

        इस टिप्पणी के बाद मैं 45 सेकंड तक रुका। (मैंने यह सीखा है कि जब आपकी आलोचना हो, तो वाकयुद्ध से बचने का एक अच्छा तरीका जवाब देने में देरी करना है।)

Share:

Friday, October 4, 2019

CHAPTER 10.3 काम में जुड़ने की यह दो प्रयोग करें।

                           यह दो प्रयोग करें

      1. छोटे परंतु कष्टदायक कामों को करने के लिए मशीनी तरीके का इस्तेमाल करें। उस काम के बुरे पहलुओं के बारे में सोचने के बजाय आप बिना सोचे उस काम को करना शुरू कर दें।

       शायद ज़्यादातर महिलाओं को बर्तन साफ़ करना सबसे कष्टदायक काम लगता होगा। मेरी माँ भी इसका अपवाद नहीं थीं। परंतु उन्होंने इस काम को फुर्ती से निबटाने का मशीनी तरीक़ा ईजाद कर लिया था, ताकि इसके बाद वे अपना मनचाहा काम कर सकें।

        जब वे डायनिंग टेबल से जाती थीं, तो वे मशीनी अंदाज़ में बर्तन इकट्ठे कर लेती थीं और उन्हें साफ़ करना शुरू कर देती थीं। कुछ ही मिनटों में उनका काम ख़त्म हो जाता था। क्या यह तरीका बर्तन "सिंक में जमा करते रहने” और उन्हें देख-देखकर चिंता करने से बेहतर नहीं
 है ?

        आज यह करके देखें : एक ऐसा काम चुन लें जो आपको नापसंद है। फिर, बिना उस बारे में सोचे, या बिना उससे डरे, उस काम को कर दें। नापसंदगी के छोटे-छोटे कामों को करने का यही तरीक़ा सबसे प्रभावी है।

     2. अगला कदम यह है कि आप विचार करने, योजनाएँ बनाने,समस्याएँ सुलझाने और दूसरे दिमागी कामों के लिए भी मशीनी तरीके का इस्तेमाल करें। आप मूड बनने का इंतज़ार करें, इसके बजाय बेहतर यही है कि आप बैठ जाएँ और अपने मूड को बना लें।

       यहाँ एक खास तकनीक दी जा रही है, जो आपकी काफ़ी मदद करेगी। पेंसिल और काग़ज़ का इस्तेमाल करें। पाँच सेंट की छोटी सी पेंसिल दुनिया का सबसे महान एकाग्रता यंत्र है। अगर मुझे एक बहुत शानदार, साउंड प्रफ़ ऑफ़िस और पेंसिल-कागज़ में से किसी एक को चुनना हो, तो मैं यक़ीनन पेंसिल और कागज़ को चुनूँगा। पेंसिल और कागज़ से आप अपने दिमाग को किसी समस्या से बाँध सकते हैं।

        जब आप किसी विचार को कागज़ पर लिखते हैं, तो आपका पूरा ध्यान अपने आप उस विचार पर केंद्रित होता है। ऐसा इसलिए होता है। क्योंकि आपका दिमाग एक साथ दो काम नहीं कर सकता। एक ही समय पर आपका दिमाग एक विचार को सोचे और दूसरे विचार को लिखे, यह नहीं हो सकता। और जब आप काग़ज़ पर कुछ लिखते हैं, तो आप दरअसल अपने दिमाग पर "लिख" रहे हैं। परीक्षणों से यह साबित हो चुका है कि अगर आप काग़ज़ पर लिखकर कोई चीज़ याद करते हैं, तो वह आपको लंबे समय तक और ज़्यादा अच्छी तरह याद रहती है।

          और एक बार आप एकाग्रता के लिए पेंसिल और काग़ज़ की इस तकनीक में पारंगत हो जाएँ, तो फिर आप शोरगुल के माहौल में भी सोच सकेंगे। जब आप सोचना चाहें, लिखना शुरू कर दें या डायग्राम बनाना शुरू कर दें। अपने मूड को बनाने का यह बेहतरीन तरीक़ा है।

         अब मैं आपको सफलता का जादुई फ़ॉर्मूला बताना चाहता हूँ। कल, अगले सप्ताह, बाद में, और किसी दिन, फिर किसी समय- यह सभी असफलता के शब्द कभी नहीं के पर्यायवाची हैं। बहुत सारे अच्छे सपने कभी सच नहीं हो पाते क्योंकि हम यही कहते रह जाते हैं, “मैं इसे किसी दिन शुरू करूँगा।" जबकि हमें यह कहना चाहिए, “मैं इसे अभी शुरू करता हूँ।"

           एक उदाहरण लें, पैसे बचाने का। हर व्यक्ति मानता है कि पैसे बचाना एक अच्छी बात है। परंतु यह अच्छी बात है, इसका यह मतलब नहीं है कि सभी लोग योजनाबद्ध तरीके से बचत करते हैं और निवेश करते हैं। कई लोगों का बचत करने का इरादा तो होता है परंतु बहुत कम लोग अपने इरादों पर अमल कर पाते हैं।

           एक युवा दंपति ने इस तरह बचत करना शुरू किया। बिल की तनख्वाह 1000 डॉलर थी, परंतु वह और उसकी पत्नी जेनेट हर माह 1000 डॉलर खर्च भी कर डालते थे। दोनों ही बचत करना चाहते थे, परंतु कोई न कोई ऐसा कारण आ जाता था जिससे वे कभी बचत नहीं कर पाए। सालों तक वे सोचते रहे, “जब मेरी तनख्वाह बढ़ेगी, तब हम बचत करना शुरू करेंगे।” “जब हमारी अमुक चीज़ की किस्तें ख़त्म हो जाएँगी, तब हम बचत करना शुरू करेंगे।” “अगले महीने,” “अगले साल।"

        आख़िरकार जेनेट को बचत करने की अपनी असफलता पर गुस्सा आ गया। उसने बिल से कहा, "देखो बिल, हम कभी बचत कर पाएँगे या नहीं।” बिल ने जवाब दिया, “हाँ, हमें करना तो है परंतु हम अभी कर ही क्या सकते हैं ?"

         परंतु इस बार जेनेट करो-या-मरो वाले मूड में थी। "हम सालों से बचत करने की सोच रहे हैं। हम इसलिए नहीं बचा पाते, क्योंकि हमने यह सोच रखा है कि हमसे बचत नहीं होगी। इसके बजाय अब हम यह सोचना शुरू कर दें कि हम बचत कर सकते हैं। मैंने आज एक विज्ञापन देखा जिसमें लिखा है कि अगर हम हर महीने 100 डॉलर भी बचाते हैं, तो 15 सालों में हमारे पास 18000 डॉलर जमा हो जाएँगे, और उसके साथ ही हमें 6600 डॉलर ब्याज भी मिलेगा। विज्ञापन में यह भी लिखा था कि खर्च करने के बाद बचत करना मुश्किल होता है, जबकि बचत करने के बाद तनख्वाह ख़र्च करना आसान होता है। अगर तुम साथ दो, तो मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी तनख्वाह का दस प्रतिशत हम शुरू में ही बचत खाते में डाल देंगे। अगर महीने के आखिर में हमें फाके भी करने पड़ें तो मैं उसके लिए तैयार हूँ। बिल, इस तरह अगर हम ठान लें, तो हम बचत कर सकते हैं।"

        बिल और जेनेट को कुछ महीनों तक तो मुश्किल आई, परंतु जल्दी ही उन्होंने अपने नए बजट के हिसाब से आसानी से घर चलाना सीख लिया। अब बचत करने में भी उनको उतना ही मज़ा आता है, जितना उन्हें पहले “ख़र्च करने” में आता था।

       किसी दोस्त को चिट्ठी लिखना चाहते हैं ? अभी लिख दें। आपके पास एक विचार आया है कि आपका बिज़नेस किस तरह बढ़ सकता है? उस विचार को अभी प्रस्तुत कर दें। बेंजामिन फ्रेंकलिन की सलाह याद रख, “कल पर वह काम न टालें, जिसे आप आज कर सकते हैं।"

याद रखें, अभी काम करने का तरीक़ा सफलता का तरीक़ा है, जबकि फिर किसी दिन या फिर कभी काम करने की सोच असफलता का तरीक़ा है।

एक दिन मैं अपनी पुरानी बिज़नेस मित्र से मिलने गया। वह एक कॉन्फ्रेंस से अभी हाल लौटी थी। जब मैंने उसे देखा तो मैंने महसूस किया कि वह किसी बात से परेशान थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह काफ़ी निराश थी। और मेरा अनुमान सही था।

        उसने आते ही कहा, “मैंने आज सुबह मीटिंग की क्योंकि मैं चाहती थी कि कंपनी की पॉलिसी में जो बदलाव प्रस्तावित है, उसके बारे में कुछ मदद मिल सके। परंतु मुझे किस तरह की मदद मिली? मेरे साथ छह लोग मीटिंग में थे और केवल एक ही व्यक्ति ने अपने विचारों का योगदान दिया। दो और लोगों ने कहा, परंतु उन्होंने सिर्फ मेरे शब्दों को दोहरा दिया। ऐसा लग रहा था जैसे मैं पत्थर से सिर फोड़ रही थी। मैं यह नहीं जान पाई कि प्रस्तावित पॉलिसी परिवर्तन के बारे में उन लोगों की क्या राय थी।

        “दरअसल,” उसने आगे कहा, “होना यह चाहिए था कि हर व्यक्ति मुझे यह बताता कि वह क्या सोचता था। आख़िरकार, इससे उन सभी को प्रभावित होना था।"

         मेरी मित्र को मीटिंग में कोई मदद नहीं मिली। परंतु अगर आप मीटिंग ख़त्म होने के बाद हॉल में जाते, तो आपको उन्हीं चुप्पे लोगों के मुँह से इस तरह की टिप्पणियाँ सुनने को मिल जातीं, “मेरी इच्छा तो हुई थी कि मैं कुछ कह दूँ...” “किसी ने यह क्यों नहीं कहा कि...", "मुझे नहीं लगता...” "हमें आगे बढ़ना चाहिए..." अक्सर पत्थर टाइप के यह लोग जो मीटिंग रूम में चुपचाप बैठे रहते हैं, मीटिंग के बाद बहुत बोलते हैं, जब उनके बोलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब वक्त निकल जाता है, तो वे जागते हैं और सक्रिय होते हैं।

       बिज़नेस मीटिंग में लोग आपकी राय, आपके विचार जानना चाहते हैं। जो व्यक्ति अपनी राय को अपने दिमाग की तिजोरी में ही बंद रखता है, वह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारता है।

        "बोलने की" आदत डालें। हर बार जब आप बोलने के लिए खड़े होते हैं, आपका आत्मविश्वास बढ़ता जाता है। अपने रचनात्मक विचारों के साथ आगे आएँ।

        हम सभी जानते हैं कि कॉलेज के विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी किस तरह करते हैं। जो नाम के एक विद्यार्थी ने भी एक शाम को बहुत पढ़ने का फैसला किया, क्योंकि अगले दिन उसकी परीक्षा थी। यहाँ यह बताया गया है कि उसके फैसले का क्या हुआ और उसकी शाम किस तरह गुज़री।

        जो शाम को 7 बजे पढ़ने के लिए तैयार था, परंतु उसका डिनर कुछ भारी हो गया था, इसलिए उसने सोचा कि वह कुछ देर टीवी देख ले। कुछ देर करते-करते उसने एक घंटे तक टीवी देखा क्योंकि सीरियल उसे पसंद आ गया था। 8 बजे वह अपनी टेबल पर बैठ गया, लेकिन तत्काल ही उठ गया क्योंकि उसे अचानक याद आ गया कि उसे अपनी गर्लफ्रेंड को फ़ोन करना है। इसमें 40 मिनट लग गए (उसने पूरे दिन उससे बात नहीं की थी)। किसी का फ़ोन आ गया, जिसमें 20 मिनट लग गए। अपनी डेस्क पर आते-आते जो की इच्छा हुई कि वह पिंग पॉन्ग खेल ले। इसमें एक और घंटा बर्बाद हो गया। पिंग पॉन्ग खेलने के बाद उसे पसीना आ गया था, इसलिए वह नहा भी लिया। नहाने के बाद उसे भूख लगी, क्योंकि पिंग पॉन्ग और नहाने के बाद भूख लगना स्वाभाविक था।

       और इस तरह उसकी शाम बर्बाद हो गई। उसके इरादे तो अच्छे थे, परंतु वह इरादों पर अमल नहीं कर पाया। आखिरकार एक बजे रात को उसने अपनी पुस्तक खोली, परंतु उसे इतनी नींद आ रही थी कि वह कछ समझ नहीं पा रहा था। आखिरकार उसने नींद के आगे हार मान ली। अगली सुबह उसने अपने प्रोफेसर को बताया, "मुझे लगता है कि आप मुझे अच्छे नंबर देंगे। मैंने इस परीक्षा के लिए सुबह दो बजे तक पढ़ाई की है।”

        जो कार्य करने में नहीं जुटा क्योंकि उसने कार्य करने की तैयारी में बहुत समय बर्बाद कर दिया। और जो ही “ज्यादा तैयारी" का एकमात्र शिकार नहीं है। जो नाम का सेल्समैन, या एक्जीक्यूटिव, या प्रोफेशनल वर्कर, जोसेफाइन नाम की हाउसवाइफ़ - यह सभी इसी तरह की तैयारी करते हैं। कोई भी महत्वपूर्ण काम शुरू करने से पहले वे इसीलिए गपशप करते हैं, कॉफ़ी पीते हैं, पेंसिल तेज़ करते हैं, पढ़ते हैं, मेज़ साफ़ करते हैं, टीवी देखते हैं और कई ऐसी चीजें करते हैं जिनमें फ़ालतू समय बर्बाद होता है।

       परंतु इस आदत को दूर करने का एक तरीका है। अपने आपसे यह कहें, “मैं अभी शुरू करने की हालत में हूँ। काम टालने से मुझे कोई फायदा नहीं होगा। मैं तैयारी में जितना समय और ऊर्जा बर्बाद करूँगा, उसका इस्तेमाल में काम करने में कर सकता हूँ।"

        मशीन के पुर्जे बनाने वाली कंपनी के एक बॉस ने अपने सेल्स एक्जीक्यूटिव्ज़ से यह कहा, “इस बिज़नेस में हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जिनके पास दमदार विचार हों और उनमें अपने विचारों पर अमल करने का दम भी हो। हमारी कंपनी का हर काम बेहतर तरीके से हो सकता है, चाहे उत्पादन हो. मार्केटिंग हो या कोई अन्य क्षेत्र हो। मैं यह नहीं कहना चाहता कि हम अभी ख़राब काम कर रहे हैं। हम अच्छा काम कर रहे हैं। परंतु हर सफल कंपनी की तरह, हमें नए सामानों, नए बाज़ारों, नए विचारों और नए उपायों की ज़रूरत है। हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो पहल करें। वही हमारी टीम के कप्तान बनने क़ाबिल हैं।"

         पहल करना कर्म करने का एक खास पहलू है। पहल करने का मतलब है बिना किसी के कहे कोई महत्वपूर्ण काम करना। पहल करने वाला व्यक्ति हर बिज़नेस और प्रोफ़ेशन में अलग दिख जाता है, और उसकी आमदनी भी काफ़ी होती है।

        मुझे एक दवाई बनाने वाली कंपनी का व्यक्ति मिला। वह मार्केटिंग रिसर्च का डायरेक्टर था। उसने मुझे बताया कि वह इस पद पर कैसे पहुँचा। पहल की शक्ति का यह एक अच्छा सबूत है।

       “पाँच साल पहले मेरे मन में एक विचार आया," उसने मुझे बताया। “मैं तब एक मिशनरी सेल्समैन की तरह काम कर रहा था, जो होलसेलर्स से मिला करता था। मैंने यह पाया कि हमारे पास अपने ग्राहकों के बारे में आँकड़ों की कमी थी। मैंने कंपनी के हर व्यक्ति से इस बारे में बात की। मैंने उन्हें बताया कि हमें मार्केट रिसर्च की ज़रूरत है। पहले तो सबने मेरी बात अनसुनी कर दी, क्योंकि मैनेजमेंट को इसका महत्व समझ में नहीं आया।

        "परंतु मुझे पक्का विश्वास था कि हमारी कंपनी में मार्केटिंग रिसर्च होनी चाहिए, इसलिए मैंने पहल करने का फैसला कर लिया। मैंने मैनेजमेंट की अनुमति के बाद 'फैक्ट्स ऑफ़ ड्रग मार्केटिंग' नाम की एक मासिक रिपोर्ट तैयार की। मैंने हर जगह से जानकारी इकट्ठी की। मैं ऐसा हर महीने करता रहा और जल्दी ही मैनेजमेंट और दूसरे सेल्समैनों को यह समझ आ गया कि मैं जो कर रहा हूँ, वह सचमुच महत्वपूर्ण है। इसके बाद वे भी इस काम में दिलचस्पी लेने लगे। अपनी रिसर्च शुरू करने के एक साल बाद मुझे अपनी नियमित नौकरी से हटा दिया गया और मुझसे कहा गया कि मैं सिर्फ अपने विचारों को विकसित करने पर पूरा ध्यान हूँ।

       "बाक़ी बातें तो साधारण तरीके से हुई। आज मेरे पास दो सहयोगी, एक सेक्रेटरी, और तीन गुना ज्यादा तनख्वाह है।"

       लीडर बनने की कला विकसित करने के लिए यहाँ पर दो अभ्यास दिए गए हैं:

     1. संघर्ष करने वाला बनें। जब आप ऐसी कोई बात सोचें जो आपके हिसाब से की जानी चाहिए तो आप तत्काल उस विचार को उठा लें और फिर उसके लिए संघर्ष शुरू कर दें।

       मेरे पड़ोस में ही एक नई कॉलोनी बन रही थी जो लगभग दो तिहाई बन चुकी थी, परंतु इसके बाद उसका विस्तार ठप्प हो गया। कुछ ऐसे परिवार वहाँ रहने आ गए थे जो लापरवाह लोग थे। इससे कई अच्छे परिवारों को उस जगह से अपने मकान बेचकर जाना पड़ा। जैसा अक्सर होता है, परवाह करने वाले लोगों को भी लापरवाह लोगों की सोहबत का असर हुआ और पूरी कॉलानी ही लापरवाह हो गई। परंतु हैरी एल. ऐसा नहीं हुआ। वह माहौल की परवाह करता था और उसने फैसला किया कि वह इसे अच्छी कॉलोनी बनाने के लिए संघर्ष करेगा।

         हैरी ने अपने कुछ दोस्तों से बात की। उसने बताया कि यह कॉलोनी एक बेहतरीन कॉलोनी बन सकती है परंतु इसके लिए प्रयास करने होंगे वरना यह थर्ड क्लास कॉलोनी बनकर रह जाएगी। हैरी के उत्साह और पहल का स्वागत हुआ। जल्दी ही वहाँ पर साफ़-सफ़ाई शुरू हो गई। बगीचे की योजना पर काम शुरू हो गया। वृक्षारोपण अभियान शुरू किया गया। बच्चों के लिए खेल का मैदान बन गया। स्विमिंग पूल भी बन गया लापरवाह परिवार भी उत्साही समर्थक बन गए। पूरी कॉलोनी में एक नई जान आ गई थी। अब वहाँ से निकलने पर दिल खुश हो जाता है। इससे यह पता चलता है कि संघर्ष करने वाला व्यक्ति चाहे, तो नरक को भी स्वर्ग में बदल सकता है।

        क्या आपको ऐसा लगता है कि आपके बिज़नेस में एक नया डिपार्टमेंट बनना चाहिए, या आपकी कंपनी को बाज़ार में एक नया सामान लाना चाहिए या किसी और तरीके से तरक्क़ी करनी चाहिए? अगर आपको ऐसा लगता है, तो उस विचार के लिए संघर्ष करें। क्या आपको लगता है कि आपके चर्च को नई इमारत की ज़रूरत है ? अगर हाँ, तो इसके लिए पहल और संघर्ष करें। क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चों के स्कूल में कंप्यूटर लगने चाहिए? अगर हाँ, तो इसके लिए पहल करें और ऐसा संभव बनाएँ।

        और आप यह बात जान लें : हालाँकि हर संघर्ष शुरुआत में एक व्यक्ति का संघर्ष ही होता है, परंतु अगर विचारों में दम हो, तो जल्दी ही बहुत से लोग आपके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। 

        कर्मठ और संघर्षशील व्यक्ति बनें।

      2. स्वयंसेवी बनें। हममें से हर एक के जीवन में ऐसा मौक़ा आया होगा जब हम किसी संस्था में स्वयंसेवा करना चाहते होंगे, परंतु हमने ऐसा नहीं किया। कारण क्या था? डर। यह डर नहीं कि हम काम नहीं कर पाएँगे, बल्कि यह डर कि लोग क्या कहेंगे। यह डर कि लोग हम पर हँसेंगे, हमें जुगाडू कहेंगे, हमें महत्वाकांक्षी समझेंगे - यही डर बहुत से लोगों को आगे बढ़ने से रोकता है।

        यह स्वाभाविक है कि आप लोगों का समर्थन, उनकी तारीफ़ चाहे  परंतु खुद से पूछे, “मैं किन लोगों की तारीफ़ चाहता हूँ : उन लोगों का जो मुझ पर ईर्ष्या के कारण हँसते हैं या उन लोगों की जो कर्मठता से काम करके सफल होते हैं ?" सही विकल्प क्या है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है।

         स्वयसैवी अलग दिख जाता है। उसकी तरफ़ खास तवज्जो दी जा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह स्वयंसेवा करके अपनी विशष योग्यता और महत्वाकांक्षा को सबके सामने ले आता है। निश्चित रूप से स्वयंसेवक को विशेष काम सौंपे जाएंगे।

       आप बिज़नेस, मिलिट्री या अपने समुदाय के जिन लीडर्स को जानते हों, उनके बारे में सोचें। क्या वे कर्मठ लगते हैं या वे निठल्ले लगते हैं? 

      दस में से दसों लीडर कर्मठ होंगे, ऐसे लोग होंगे जो काम पूरा करके दिखाते हैं। वह व्यक्ति जो हाशिए पर खड़ा रहता है, वह व्यक्ति जो दुःखी होता रहता है, वह निठल्ला होता है, जो सिर्फ इसलिए वहीं रह जाता है क्योंकि वह कर्म के मैदान में नहीं उतरता। जो विचार करता है और उस पर अमल करता है, उस कर्मठ व्यक्ति के पीछे कई लोग आ जाते हैं और वह लीडर बन जाता है।

       जो व्यक्ति काम करता है, लोग उस पर विश्वास करते हैं। वे मान लेते हैं कि वह जानता है कि वह क्या कर रहा है।

      मैंने किसी की तारीफ़ इस बात के लिए नहीं सुनी, “वह व्यक्ति किसी को डिस्टर्ब नहीं करता," "वह व्यक्ति काम नहीं करता,” या “जब तक उसे बताया न जाए, वह कुछ नहीं करता।"

       क्या आपने इन बातों के लिए किसी की तारीफ़ होते देखी है ?

      कर्म की आदत को बढ़ावा दें

इन मुख्य बिंदुओं का अभ्यास करें :

1. “कर्मठ" बनें। काम करने वाला बनें। “काम टालने वाला” न बनें।

2. परिस्थितियों के आदर्श होने का इंतज़ार न करें। वे कभी आदर्श नहीं होंगी। भविष्य की बाधाओं और कठिनाइयों की उम्मीद करें और जब वे आएँ, तब आप उन्हें सुलझाने का तरीका खोजें।

3. याद रखें, केवल विचारों से सफलता नहीं मिलती। विचारों का मूल्य तभी है, जब आप उन पर अमल करें।

4. डर भगाने और आत्मविश्वास हासिल करने के लिए कर्म करें। जिस काम से आप डरते हों, वह करें और आपका डर भाग जाएगा।

Share:

Thursday, October 3, 2019

CHAPTER 10.2 काम में जुटने की आदद डालो और समस्या दूर करने का तरीका


       आप इस समस्या को कैसे दूर कर सकते हैं ? यहाँ दो तरीके सुझाए जा रहे हैं जो आपकी इस आदत को दूर कर देंगे:

1. भविष्य में आने वाली कठिनाइयों का अनुमान लगाएँ। हर नए काम में जोखिम, समस्या और अनिश्चितताएँ होती हैं। मान लें कि आप कार से शिकागो से लॉस एंजेल्स जाना चाहते हैं, और आप तब तक चलना शुरू नहीं करेंगे, जब तक कि आपको इस बात की पूरी गारंटी न मिल जाए कि रास्ते में कोई बाधा नहीं आएगी, आपकी गाड़ी ख़राब नहीं होगी, मौसम ख़राब नहीं होगा, कोई शराबी ड्राइवर आपको तंग नहीं करेगा, और किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं होगा, तो क्या होगा? आप कब चलना शुरू करेंगे? कभी नहीं! इसी यात्रा की तैयारी आप इस तरह से भी कर सकते हैं कि आप यात्रा का नक्शा साथ रख लें, अपनी कार को चेक करा लें, और इस तरह पूरी सावधानी बरतें। परंतु आप सारे ख़तरों को न तो भाँप सकते हैं, न ही उन्हें ख़त्म कर सकते हैं।

     2. जब समस्याएँ और बाधाएँ आएँ, तब उनसे निबटें। सफल व्यक्ति की योग्यता इस बात से नहीं जाँची जाती कि वह काम शुरू करने के पहले ही सारी बाधाओं को हटा देता है, बल्कि इस बात से जाँची जाती है कि जब भी उसकी राह में बाधाएँ आती हैं, वह उनसे निबटने के तरीके खोज लेता है। बिज़नेस, शादी, या किसी भी अन्य चीज़ में आप पुलों को तभी पार कर सकते हैं, जबकि आप पुल पर हों।

हम सभी समस्याओं के ख़िलाफ़ बीमा पॉलिसी नहीं खरीद सकते।

         अपने विचारों के बारे में कुछ करने का मन बना लें। पाँच या छह साल पहले एक बहुत ही योग्य प्रोफ़ेसर ने मुझे बताया कि वे एक पुस्तक लिखने की योजना बना रहे हैं। वे कुछ दशक पहले के एक विवादास्पद व्यक्ति की जीवनी लिखना चाहते थे। उनके विचार न सिर्फ रोचक थे. बल्कि शानदार थे। उनमें दम था. लोगों को मंत्रमग्ध करने की क्षमता थी।प्रोफ़ेसर को पता था कि वह क्या कहना चाहते थे और उन्हें अपनी बात किस तरह कहनी चाहिए। इस पुस्तक के पूरा होने पर उन्हें अंदरूनी संतोष तो मिलता ही, साथ ही प्रतिष्ठा और पैसा भी काफ़ी मिलता।

        पिछले साल मैं उसी मित्र से फिर मिला और मैंने अनजाने में उससे यह पूछ लिया कि क्या उसकी पुस्तक पूरी हो गई। (यह मूर्खतापूर्ण सवाल था क्योंकि इससे मैंने उसके पुराने घाव को कुरेद दिया था।)

        नहीं, वह पुस्तक नहीं लिख पाया। कुछ समय तक तो वह यही सोचता रहा कि वह इसका क्या कारण बताए। आखिरकार उसने कहा कि वह बेहद व्यस्त था, उसके पास दूसरी “ज़िम्मेदारियाँ" थीं और इसलिए उसे पुस्तक लिखने की फुरसत ही नहीं मिली।

         वास्तव में प्रोफ़ेसर ने इस विचार को अपने मानसिक क़ब्रिस्तान में गहरे दफ़ना दिया था। उसने अपने दिमाग में नकारात्मक विचारों को बढ़ने दिया था। उसने यह कल्पना कर ली थी कि उसे पुस्तक लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी और उसे कई त्याग भी करने होंगे। उसने उन सभी कारणों पर विचार कर लिया था जिनके कारण उसकी योजना असफल हो सकती थी।

        विचार महत्वपूर्ण हैं। हम इस बात को अच्छी तरह समझ लें। अगर हमें कुछ भी बनाना है या सुधारना है तो उसकी पहली शर्त यह है कि हमारे पास विचार हों। सफलता उस व्यक्ति के दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती जिसके पास विचार नहीं होते।

       परंतु हम इस बिंदु को अच्छी तरह से समझ लें। केवल विचारों का ही महत्व नहीं होता। विचारों का महत्व तभी होता है जब उन पर अमल किया जाए। अगर आपके मन में यह विचार आता है कि आप अपने बिज़नेस को किस तरह बढ़ाएँ, तो केवल विचार करने भर से आपका बैंक बैलेंस नहीं बढ़ जाता।

       हर दिन हज़ारों लोग अच्छे विचारों को दफनाते रहते हैं क्योंकि उनमें उन पर अमल करने की हिम्मत नहीं होती।

      और इसके बाद, उन विचारों के भूत उन्हें सताने के लिए आ जाते हैं। इन दो विचारों को अपने दिमाग में गहरे बैठ जाने दें। पहली बात तो यह, कि अपने विचारों पर अमल करके उन्हें मूल्यवान बनाएँ। चाहे विचार कितना ही अच्छा हो, यदि आप उस पर अमल नहीं करेंगे तो
आपको ज़रा भी लाभ नहीं होगा।

         दूसरी बात यह है कि अपने विचारों पर अमल करें और मन की शांति हासिल करें। किसी ने एक बार कहा था कि सबसे दुःखद शब्द हैं : काश मैंने ऐसा किया होता! हर दिन आप किसी न किसी को ऐसी बात करते सुनते होंगे, “अगर मैं 1952 में इस बिज़नेस में गया होता, तो आज मैं लाखों में खेल रहा होता।" या "मुझे लगता था कि ऐसा ही होगा। काश मैंने उस वक्त अपने दिल की बात सुनी होती!" अगर अच्छे विचार पर अमल न किया जाए, तो उससे काफ़ी मनोवैज्ञानिक पीड़ा भी होती है। परंतु अगर अच्छे विचार पर अमल किया जाए तो उससे हमें मानसिक शांति मिलती है।

     क्या आपके पास कोई अच्छा विचार है? तो फिर देर किस बात की है, उस पर अमल करें। काम करके डर का इलाज करें औरआत्मविश्वास हासिल करें। यह याद रखने लायक बात है। काम करने से आपका आत्मविश्वास बढ़ता और प्रबल होता है। काम न करने से डर बढ़ता और प्रबल होता है। इसलिए डर को दूर करने के लिए, उस काम को कर दें। अपने डर को बढ़ाने के लिए- इंतज़ार करते रहें, काम को टालते रहें, बाद में करने की सोचें।

        एक बार मैंने एक युवा पैराटूपर इन्स्ट्रक्टर के मुँह से सुना, “कूदने में कोई दिक्कत नहीं है। कुदने के पहले इंतज़ार करते वक्त मुश्किल आती है। जब कूदने का समय आता है तो मैं हमेशा यह कोशिश करता हूँ कि लोगों को ज़्यादा सोचने का मौक़ा न मिले। कई बार ऐसा हुआ है कि किसी प्रशिक्षु ने इस बारे में ज़्यादा सोच लिया कि उसके साथ क्या बुरा हो सकता है और यह सोचकर वह घबरा गया। अगर हम उसे अगली ट्रिप में कूदने के लिए तैयार नहीं कर पाए, तो वह ज़िंदगी में कभी पैराट्रपर नहीं बन सकेगा। आत्मविश्वास उसे तभी मिलेगा जब वह कूद जाएगा। जब तक वह कूदने से बचता रहेगा, उसे टालता रहेगा तब तक वह डरता ही रहेगा।"

          इंतज़ार करना विशेषज्ञों को भी नर्वस कर देता है। टाइम मैग्ज़ीन में लिखा गया था कि एडवर्ड आर. मरो, जो देश के बेहतरीन न्यूज़रीडर हैं, जब टेलीविज़न पर आने वाले होते हैं तो वे काफ़ी नर्वस हो जाते हैं और उन्हें पसीना आने लगता है। परंतु एक बार वे काम में जुट जाते हैं। तो फिर उनका डर काफूर हो जाता है। कई अभिनेता भी इसी तरह की प्रक्रिया से गुज़रते हैं। सभी इस बारे में एकमत हैं कि स्टेज के डर का एक ही इलाज है स्टेज पर उतरना या कर्म करना। जनता के सामने मंच पर आ जाने के बाद डर, चिंता, तनाव सब दूर हो जाता है।

          कर्म से डर दूर हो जाता है। एक बार हम अपने दोस्त के घर गए जहाँ उसका पाँच साल का बच्चा सोने के आधे घंटे बाद ही जाग गया और रोने लगा। बच्चे ने एक डरावनी फिल्म देखी थी और उसे यह डर लग रहा था कि राक्षस आकर उसे उठा ले जाएगा। बच्चे के पिता ने उसे समझाया। उसके समझाने का तरीका सचमुच लाजवाब था। उसने यह नहीं कहा, "फ़िक्र मत करो, बेटे, कोई भी तुम्हें कहीं उठाकर नहीं ले जाएगा। चुपचाप सो जाओ।" इसके बजाय उसने सकारात्मक कार्य किया। उसने बच्चे के सामने सारी खिड़कियों की जाँच की और इससे बच्चे को यह विश्वास हो गया कि सभी खिड़कियाँ अच्छी तरह बंद हैं। इसके बाद उसने बच्चे की प्लास्टिक की बंदूक उसके पास की टेबल पर रख दी और कहा, “बिली, वैसे अगर तुम्हें कोई दिक़्क़त आए, तो यह बंदूक तुम्हारे पास ही रखी है।" अब जाकर छोटे बच्चे को चैन मिला, उसका डर दूर हुआ और चार मिनट बाद ही वह गहरी नींद में सो गया।

         कई डॉक्टर लोगों को हानिरहित निष्क्रिय “दवाइयाँ” इसलिए देते हैं। ताकि उनके मन को संतोष रहे। लोग डॉक्टर से नींद की गोली माँगते हैं, डॉक्टर उन्हें झूठ-मूठ की नींद की गोली पकड़ा देता है। लोगों को गोली निगलने के बाद ऐसा लगता है कि उन्हें अच्छी नींद आती है, हालाँकि गोली में कोई दवाई नहीं थी, इसके बावजूद उन पर इसका मनोवैज्ञानिक असर होता है और उन्हें अपनी तबीयत ज़्यादा अच्छी महसूस होती है।

         यह स्वाभाविक है कि हमें किसी न किसी तरह का डर सताए। इसका सामना करने के आम तरीके कई बार आपको कारगर नहीं लगेंगे। मैं कई सेल्समैनों से मिला हूँ जिन्होंने डर का इलाज करने की कोशिश की है जैसे उन्होंने ग्राहक के घर के चारों तरफ़ तीन चक्कर लगाए हैं या एक कॉफ़ी ज्यादा पी है। परंतु इन चीज़ों से समस्या हल नहीं होती। इस तरह के डर को दूर करने का- हाँ, बल्कि किसी भी तरह के डर को दूर करने का एकमात्र तरीक़ा यह है कि उस काम को कर दिया जाए।

         अगर आपको किसी को फ़ोन करने में डर लगता है, तो आप फ़ोन कर दीजिए और आपका डर ग़ायब हो जाएगा। अगर आप इसे टालते जाएँगे तो आपके लिए फ़ोन करना दिनोंदिन मुश्किल होता जाएगा।

       डॉक्टर के पास चेकअप करवाने के लिए जाने में आपको घबराहट होती है ? जाइए और आपकी चिंता दूर हो जाएगी। हो सकता है कि आपको कोई गंभीर बीमारी न हो. और अगर हो भी, तो कम से कम आपको यह तो पता चल जाएगा कि आप किस हाल में हैं। अगर आप
अपने चेकअप को टालते रहेंगे तो आपका डर बढ़ता जाएगा और एक न एक दिन आप सचमुच इसी डर और चिंता के कारण बीमार पड़ जाएंगे।

         अगर आपको अपने बॉस के साथ किसी समस्या पर चर्चा करने में डर लगता हो, तो चर्चा कर लें और आप पाएंगे कि आपकी चिंताएँ चुटकियों में दूर हो गई हैं।

       आत्मविश्वास जगाएँ। कर्म करके डर को दूर भगाएँ।

     अपने मानसिक इंजन को चालू करें- मशीनी तरीके से

एक युवक लेखक बनना चाहता था, परंतु उसने जो कुछ लिखा था वह सफल लेखन नहीं कहा जा सकता था। इस लेखक ने मेरे सामने यह स्वीकार किया, “मेरी समस्या यह है कि कई बार पूरा दिन या पूरा हफ्ता निकल जाता है और मैं एक पेज भी नहीं लिख पाता।

       उसने कहा, “लेखन रचनात्मक कार्य है। इसके लिए आपको प्रेरणा मिलनी चाहिए। आपका मूड होना चाहिए।"

       यह सच है कि लेखन रचनात्मक होता है, परंतु मैं आपको एक सफल लेखक की बात बताना चाहता हूँ जिसने कहा था कि यही वह "राज़" की बात है जिसके कारण वह इतना सफल लेखन कर पाया।

“मैं 'दिमाग को मजबूर करने वाली' तकनीक का इस्तेमाल करता हूँ। मेरे पास हर काम की डेडलाइन मौजूद होती है और मैं प्रेरणा के आसमान से उतरने का इंतज़ार नहीं कर सकता। मैं मूड के सही होने का इंतज़ार भी नहीं कर सकता। मुझे मूड बनाना पड़ता है। यह रहा मेरा तरीक़ा। मैं अपनी टेबल-कुर्सी पर बैठ जाता हूँ। फिर मैं अपनी पेंसिल उठाकर लिखने बैठ जाता हूँ। जो भी मन में आता है, मैं लिखने लगता हूँ। मैं हाथ चलाता हूँ और कुछ समय बाद मुझे पता ही नहीं चलता कि कब मेरा मस्तिष्क सही दिशा में चला जाता है और मुझे प्रेरणा मिल जाती है और मेरा सचमुच ही लिखने का मूड बन जाता है।"

        “कई बार, जब मैं नहीं लिख रहा होता हूँ तब भी मेरे दिमाग में अचानक ज़ोरदार विचार आ जाते हैं, परंतु ऐसे विचार मेरे लिए बोनस की तरह हैं। ज्यादातर अच्छे विचार मेरे दिमाग़ में तभी आते हैं जब मैं काम करने बैठ जाता हूँ।"

       कर्म होने के पहले कर्म करना पड़ता है। यह प्रकृति का नियम है। कोई भी चीज़ अपने आप शुरू नहीं होती, वे यंत्र भी नहीं जिनका आप रोज़ाना इस्तेमाल करते हैं।

       आपके घर में ऑटोमेटिक एयरकंडीशनर होगा, परंतु आपको अपना मनचाहा तापमान तो चुनना ही पड़ता है (कर्म करना पड़ता है)। आपकी कार अपने आप गियर बदल लेती है, परंतु उससे पहले आपको सही लीवर दबाना पड़ता है। यही सिद्धांत दिमाग के कर्म के बारे में भी सही है। आपको अपने दिमाग को सही गियर में लाना होगा, तभी यह आपके लिए सही काम करेगा।

        एक युवा सेल्स-मैनेजर ने बताया कि वह किस तरह अपने सेल्समैनों को “मशीनी तरीके" से दिन शुरू करने का प्रशिक्षण देता है।

        "हर सेल्समैन जानता है कि घर-घर जाकर सामान बेचने वाले सेल्समैनों को कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हर सेल्समैन को सुबह की पहली बिक्री से डर लगता है। वह जानता है कि उसका दिन भारी गुज़रेगा, इसलिए वह पहले घर का दरवाज़ा खटखटाने से बचता रहता है। वह दो कप कॉफ़ी ज़्यादा पीता है, वह अड़ोस-पड़ोस में फ़ालतू घूमता रहता है और दर्जनों बेकार काम करता है सिर्फ इसलिए कि वह पहले घर का दरवाज़ा खटखटाने से बच सके।

        “मैं हर नए व्यक्ति को इस तरह सिखाता हूँ। मैं उसे बताता हूँ कि शुरू करने का एक ही तरीक़ा होता है और वह है शुरू करना। काम को टालो मत। उसके बारे में ज्यादा सोचो मत। बस शुरू कर दो। अपनी गाड़ी खड़ी करो। अपना सैंपल केस निकालो। दरवाज़े तक जाओ। घंटी बजाओ। मुस्कराओ। 'गुड मॉर्निंग' कहो। और अपनी बात मशीनी तरीके से ग्राहक के सामने रखो और इसके बारे में न तो ज़्यादा चिंता करो, न ही सोचो। इस तरह दिन शुरू करने से आपकी हिचक दूर हो जाती है। दूसर-तीसरे घर के दरवाजे के सामने पहुँचते-पहँचते आपका दिमाग पेना हो जाएगा और आपकी प्रस्तुतियाँ अपने आप प्रभावी हो जाएंगी।"

         एक व्यक्ति ने कहा था कि जिंदगी की सबसे बड़ी समस्या गर्म बिस्तर से निकलकर ठंडे कमरे में आना थी। और उसकी बात में दम था। आप जितनी देर तक बिस्तर पर पड़े रहेंगे और सोचते रहेंगे कि बाहर निकलना कितना कष्टदायक है, ऐसा करना आपके लिए उतना ही मुश्किल होता जाएगा। इस तरह की सीधी-सादी सी बात में भी, जिसमें आपको अपनी चादर हटाकर अपने पैरों को फ़र्श पर रखना है, आपको डर लगता है।

       संदेश स्पष्ट है। जो लोग दुनिया में कुछ कर गुज़रते हैं वे इस बात का इंतज़ार नहीं करते कि कब उनका मूड सही होगा; बल्कि वे मूड को सही करने की सामर्थ्य रखते हैं।

Share:

Recommended Business Books

Buy Books

Featured Post

CHAPTER 13.6 सोचें तो लीडर की तरह

      साम्यवाद के कूटनीतिक रूप से चतुर कई लीडर्स - लेनिन, स्तालिन और कई अन्य - भी काफ़ी समय तक जेल में रहे, ताकि बिना किसी बाहरी चिंता क...