Monday, October 14, 2019

CHAPTER 13.1 सोचें तो लीडर की तरह

                 सोचें तो लीडर की तरह

      एक बार फिर खुद को याद दिलाएँ कि जब आप सफलता की सीढ़ी चढ़ते हैं, तो आपके ऊपर वाले आपको नहीं खींचते हैं, बल्कि आपके नीचे वाले आपको उठाते हैं यानी कि वे लोग जो आपके साथी हैं या आपके नीचे काम कर रहे हैं।

        किसी भी बड़ी सफलता को हासिल करने के लिए आपको दूसरों के सहयोग की ज़रूरत होती है। और उस सहयोग को हासिल करने के लिए यह ज़रूरी है कि आपमें लीडर बनने की क्षमता हो। सफलता और लीडर बनने की योग्यता - यानी कि, लोगों से वह काम करवाना जो वे बिना आपकी लीडरशिप के न कर पाएँ - साथ-साथ चलती हैं।

       पहले के अध्यायों में सफलता दिलाने वाले जो सिद्धांत समझाए गए हैं, वे आपकी लीडरशिप क्षमता विकसित करने में बहुमूल्य साबित होंगे। यहाँ पर हम चार ख़ास लीडरशिप सिद्धांतों या नियमों को बताना चाहेंगे जो आपको लीडर बनवा सकते हैं, बिज़नेस में, सामाजिक क्लबों में, घर में, हर जगह।

        यह चार लीडरशिप सिद्धांत या नियम हैं :

     1. जिन्हें आप प्रभावित करना चाहते हैं, उन लोगों के नज़रिए से चीज़ों को देखें।

      2. सोचें : इस समस्या से निबटने का मानवीय तरीक़ा क्या है?

     3. प्रगति के बारे में सोचें, प्रगति के बारे में विश्वास करें और प्रगति के लिए कोशिश करें।

       4. अपने आपसे बात करने के लिए समय निकालें।

        अगर आप इन नियमों का पालन करते हैं तो आप निश्चित रूप से सफल होंगे। रोज़मर्रा के जीवन में इन नियमों का पालन करने से आपको वह रहस्यमयी शक्ति मिल जाती है जिसे लीडरशिप कहा जाता है।

   
          आइए देखते हैं कि ऐसा किस तरह होता है।

         लीडरशिप नियम नंबर 1 : जिन्हें आप प्रभावित करना चाहते हैं, उन लोगों के नज़रिए से चीज़ों को देखें।

        जिन्हें आप प्रभावित करना चाहते हैं, उन लोगों के दृष्टिकोण या नज़रिए से चीज़ों को देखना वह जादुई तरीक़ा है जिससे आप उनसे अपना मनचाहा काम करवा सकते हैं। अगर आप अपने दोस्तों, सहयोगियों, ग्राहकों, कर्मचारियों के नज़रिए से देख सकें, तो आप उनसे जो चाहें, करवा सकते हैं। यह कैसे होता है, इन दो उदाहरणों में देखें।

        टेड बी. एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में टेलीविज़न कॉपीराइटर और डायरेक्टर था। जब एजेंसी को बच्चों के जूते का विज्ञापन लिखवाना था, तो टेड को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि वह जूतों का टीवी विज्ञापन तैयार करे।

         विज्ञापन अभियान के एक महीने बाद यह समझ में आ गया कि विज्ञापन से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ था। जूतों की बिक्री में कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं हुई थी। ज़ाहिर था कि इसका दोष टीवी विज्ञापनों पर मढ़ा जाता, क्योंकि ज़्यादातर शहरों में सिर्फ टीवी पर ही विज्ञापन दिए गए थे।

          टेलीविज़न दर्शकों के सर्वे से पता चला कि लगभग 4 प्रतिशत दर्शकों की राय में यह बेहतरीन विज्ञापन था। इन 4 प्रतिशत दर्शकों का मानना था कि “यह उनके देखे गए सबसे अच्छे विज्ञापनों में से एक था।"

          बाक़ी 96 प्रतिशत या तो इस विज्ञापन के बारे में उदासीन थे, या फिर उन्हें यह विज्ञापन पसंद नहीं आया था। सैकड़ों बातें कही गईं, “यह भी कोई विज्ञापन है? ऐसा लग रहा था जैसे सुबह के 3 बजे न्यू  ऑर्लियन्स बैंड बज रहा हो।" "मेरे बच्चों को आम तौर पर टीवी के विज्ञापन पसंद आते हैं। परंतु जब यह जूते वाला विज्ञापन आता है तो वे बाथरूम चले जाते हैं या फ्रिज खोल लेते हैं।" "मुझे लगता है यह थोड़ा हाई क्लास विज्ञापन है।" "ऐसा लगता है कि कोई व्यक्ति ज्यादा समझदार बनने की कोशिश कर रहा था।"

        जब इन सभी साक्षात्कारों का विश्लेषण किया गया तो एक दिलचस्प बात पता चली। जिन्हें विज्ञापन बेहद पसंद आया था, वे 4 प्रतिशत लोग आय, शिक्षा, रुचियों और क्षमताओं में टेड जैसे ही थे। बाक़ी 96 प्रतिशत उससे भिन्न “सामाजिक-आर्थिक” वर्ग के थे।

        टेड के विज्ञापन, जिनकी लागत लगभग 20000 डॉलर थी, इसलिए असफल हो गए क्योंकि टेड ने सिर्फ अपनी रुचियों के बारे में सोचा था। उसने उसी तरीके से विज्ञापन तैयार किए, जिस तरीके के विज्ञापन वह खुद देखना चाहता था। उसने उस तरीके के विज्ञापन तैयार नहीं किए, जिस तरीके के विज्ञापन बहसंख्यक जनता देखना चाहती है। उसने ऐसे विज्ञापन तैयार किए जो उसे व्यक्तिगत रूप से अच्छे लगते थे, ऐसे नहीं जो ज़्यादातर लोगों को अच्छे लगते हों।

        अगर टेड ने दूसरों के नज़रिए को समझने की कोशिश की होती, अगर उसने आम जनता की मानसिकता को जानने की कोशिश की होती ता परिणाम कुछ और ही होता। उसे खुद से दो सवाल पूछना चाहिए थे, "अगर मैं किसी बच्चे का पिता होता, तो किस तरह का उच्च-शिक्षित और बुद्धिमान युवता। कर मैं अपने बच्चे के लिए यह जूते खरीदता?" “अगर मैं बच्चा होता, तो किस तरह के विज्ञापन को देखकर में अपन कहता कि मुझे यही जूते चाहिए?"

       जोन रिटेलिंग में असफल क्यों हुई? जोन 24 साल की आकर्षक,उच्च-क्षित और बुद्धिमान युवती है। कॉलेज से निकलते ही जोन ने एक डिपार्टमेंट स्टोर में असिस्टेंट बायर की नौकरी कर ली।रेडीमेट कपड़ों के इस दीपरमेन्ट स्टोर में कम कीमत से लेकर मध्यम क़ीमत का सामान मिलता था। जोन की सिफ़ारिशी चिटिठयों में उसकी बहुत तारीफ़ की गई न म महत्वाकांक्षा है. प्रतिभा है. उत्साह है," एक पत्र में लिखा था। "वह निश्चित रूप से काफ़ी सफल होगी।" 

        परंतु जोन "काफ़ी" सफल नहीं हुई। जोन केवल 8 महीने ही वहाँ काम कर पाई और फिर उसने रिटेलिंग छोड़कर दूसरी नौकरी कर ली।

       मैं उसके बॉस को अच्छी तरह जानता था और मैंने उनसे पूछा कि इसका कारण क्या था।

       "जोन बहुत ही बढ़िया लड़की है और उसमें बहुत से अच्छे गुण हैं," उसने कहा। "परंतु उसमें एक बहुत बड़ी कमी भी है।"

       "वह क्या ?" मैंने पूछा।

        "जोन ऐसा सामान खरीदती थी जो उसे पसंद था, परंतु हमारे ज़्यादातर ग्राहकों को पसंद नहीं था। वह अपने पसंद की स्टाइल, कलर, मटेरियल और कीमत वाला सामान चुनती थी। वह हमारे ग्राहकों के नज़रिए से नहीं सोचती थी। एक बार जब मैंने उससे कहा कि शायद यह सामान हमारे लिए ठीक नहीं होगा, तो वह कहने लगी, “नहीं, जनता को यह बहुत पसंद आएगा। मुझे तो यह बहुत पसंद है। मुझे लगता है कि यह खूब बिकेगा।"

        "जोन एक समृद्ध परिवार में पली-बढ़ी थी। उसे बचपन से क्वालिटी की कद्र करना सिखाया गया था। कीमत का उसके लिए कोई खास महत्व नहीं था। जोन गरीब या मध्यवर्गीय लोगों के हिसाब से नहीं सोच पाती थी, जिनके लिए कपड़े ख़रीदते समय कीमत भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए जो माल जोन ने खरीदा, उसे जनता ने पसंद नहीं किया।

         असली बात यह है : दूसरे लोगों से अपना मनचाहा काम करवाने के लिए आपको उनके नज़रिए से देखना पड़ेगा। जब आप उनके नज़रिए से देखते हैं, तो आप यह समझ जाएँगे कि किस तरह उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। मेरे बहुत ही सफल सेल्समैन मित्र ने मुझे बताया कि वह प्रस्तुति देने से पहले काफ़ी समय तक यह सोचता है कि ग्राहक उसकी प्रस्तुति को किस तरह से लेंगे, उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी। अपने श्रोताओं का नज़रिया समझने वाला वक्ता ज़्यादा रोचक, ज़्यादा प्रभावशाली सिद्ध होगा। अपने कर्मचारियों का नज़रिया समझने वाला बॉस अपने सुपरवाइज़रों से ज़्यादा अच्छी तरह काम करवा लेगा।

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Wednesday, October 9, 2019

CHAPTER 12.3 लक्ष्य बनाएँ ,सफल बने

         किसी भी लक्ष्य को हासिल करने में क़दम-दर-कदम चलने के तरीके की ज़रूरत होती है। जूनियर एक्जीक्यूटिव के लिए हर काम चाहे वह कितना भी छोटा नज़र आता हो, आगे बढ़ने का एक मौक़ा देता है। एक समय में एक ग्राहक को सामान बेचकर ही सेल्समैन मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी उठाने क़ाबिल समझा जाता है।

       धर्मोपदेशक के लिए हर प्रवचन, प्रोफेसर के लिए हर लेक्चर, वैज्ञानिक के लिए हर प्रयोग, बिज़नेसमैन के लिए हर मीटिंग महान लक्ष्य की तरफ़ एक कदम आगे बढ़ाने का अवसर है।

       कई बार ऐसा लगता है जैसे कोई अचानक सफल हो गया है। परंतु अगर आप ऐसे लोगों के इतिहास को देखें जो अचानक चोटी पर पहुँचते दिखे हों, तो आप पाएँगे कि उन्होंने पहले काफ़ी ज़मीनी तैयारी की थी। और जो तथाकथित “सफल लोग" अपनी प्रसिद्धि को जल्दी ही गँवा देते हैं वे दरअसल ऐसे नक़ली लोग होते हैं जिनकी नींव कमज़ोर होती है।

         जिस तरह कोई सुंदर इमारत पत्थर के टुकड़ों से बनती है, उसी तरह सफल ज़िंदगी हमारे छोटे-छोटे कामों से ही बनती है।

        यह करें : चाहे आपको अपना अगला काम कितना ही महत्वहीन लगे, परंतु चूंकि यह सही दिशा में एक क़दम है, इसलिए इस काम को पूरा करके अपने अंतिम लक्ष्य की तरफ़ बढ़े चलें। इस प्रश्न को याद कर लें और अपने हर काम के मूल्यांकन में इसकी मदद लें, “क्या यह मुझे वहाँ ले जाएगा जहाँ मैं पहुँचना चाहता हूँ ?" अगर जवाब 'ना' में है, तो पीछे हट जाएँ; अगर जवाब 'हाँ' में है, तो बेधड़क आगे बढ़ जाएँ।

         यह स्पष्ट है। हम सफलता की कोई बड़ी छलाँग नहीं लगाते। हम वहाँ एक समय में एक-एक क़दम बढ़ाकर पहुंचते हैं। सफल उपलब्धि के लिए मासिक कोटा निर्धारित करना एक उत्तम नीति है।

       अपना मूल्यांकन स्वयं करें। यह तय करें कि अपने आपको ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए आपको क्या करना चाहिए। नीचे दिए गए फॉर्म का प्रयोग मार्गदर्शक के रूप में करें। हर महत्वपूर्ण शीर्षक के अंतर्गत वह काम लिख लें जो आप अगले 30 दिनों में करना चाहते हों। फिर जब 30 दिन का समय खत्म हो जाए, तो अपनी प्रगति की जाँच करें और एक नया 30 दिवसीय लक्ष्य बना डालें। हमेशा 'छोटे-छोटे काम करते रहें ताकि आप बड़े काम करने के लिए तैयार रहें।

30 दिवसीय सुधार मार्गदर्शिका

अभी और __ के बीच में यह करूँगा

A. इन आदतों को छोडूंगा : (सुझाव)

     1. काम टालना।

     2. नकारात्मक भाषा।

    
     3. एक दिन में एक घंटे से ज्यादा टीवी देखना।

     4. गपशप।

B. इन आदतों को डालूँगा : (सुझाव)

     1. अपने हुलिए का हर सुबह कड़ा मूल्यांकन करें।

     2. रात को सोते समय अगले दिन की योजना बनाएँ।

     3. हर संभव मौके पर लोगों की तारीफ़ करें।

C. इन तरीकों से अपने बॉस की नज़रों में अपना मूल्य बढ़ाएँ: (सुझाव)

     1. अपने अधीनस्थों को विकसित करने में सहयोग दें।

      2. अपनी कंपनी के बारे में, इसके काम के बारे में और इसके ग्राहकों के बारे में ज़्यादा जानें।

    3. अपनी कंपनी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए तीन स्पष्ट सुझाव

D. अपने घर पर में अपना मूल्य इस तरह बढ़ाऊँगा : (सुझाव)

1. अपनी पत्नी के छोटे-छोटे कामों की तारीफ करूँगा, जिन्हें मैं अब तक अनदेखा किया करता था।

      2. सप्ताह में एक बार, अपने पूरे परिवार के लिए कुछ ख़ास करूंगा।

     3. अपने परिवार को हर दिन एक घंटे का अविभाजित समय दूंगा।

E. इन तरीकों से अपने दिमाग को पैना करूँगा : (सुझाव)
  

     1. अपने क्षेत्र की व्यावसायिक पत्रिकाओं को पढ़ने में हर हफ्ते दो घंटे का समय दूंगा।

     2. आत्म-सुधार की एक पुस्तक पढूंगा।

     3. चार नए दोस्त बनाऊँगा।

     4. चुपचाप एकांत में बैठकर 30 मिनट रोज़ चिंतन करूँगा।

       अगली बार जब आप किसी सभ्य व्यक्ति, संस्कारवान व्यक्ति, अच्छे वक्ता, आकर्षक तरीके से तैयार व्यक्ति, प्रभावी व्यक्ति को देखें तो खुद को याद दिलाएँ कि वह इस तरह से पैदा नहीं हुआ था। उसने इस तरह बनने के लिए हर दिन कोशिश की होगी, लगातार कोशिश की होगी। नई अच्छी आदतें डालना और पुरानी बुरी आदतों को छोड़ना हर दिन की इसी कोशिश का हिस्सा है।

       अभी हाल अपनी 30 दिवसीय सुधार मार्गदर्शिका तैयार करें।

       अक्सर, जब मैं लक्ष्य निर्धारित करने की बात करता हूँ तो कोई न कोई इस तरह की बात कहता है, “मैं जानता हूँ कि लक्ष्य की तरफ़ कामक करनामहत्वपूर्ण है, परंतु अक्सर ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जिनसे मेरी योजना गड़बड़ा जाती है।”

       यह सच है कि कई बार ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जो आपके लक्ष्य की राह में बाधा खड़ी कर देती हैं। जैसे आपके परिवार में कोई गंभीरबीमा या मृत्यु हो जाए, आप जिस नौकरी की कोशिश कर रहे हों वह पद ही समाप्त हो जाए, या आपके साथ कोई दुर्घटना हो जाए।

       तो हम इस विचार को अपने दिमाग में गहरे बैठा लें : वैकल्पिक रास्ते तैयार रखें। अगर आप किसी सड़क पर जा रहे हों, और आपको बीच में 'रास्ता बंद है' का बोर्ड दिखाई देता है, तो आप वहीं पर डेरा नहीं डाल देते, न ही आप घर वापस लौट जाते हैं। वह रास्ता बंद है, इसका मतलब सिर्फ इतना सा है कि आप उस रास्ते से अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते। आपको अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किसी दूसरे रास्ते से जाना होगा।

        यह देखें कि सेना के अधिकारी किस तरह योजना बनाते हैं। जब वे अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए मास्टर प्लान बनाते हैं, तो वे वैकल्पिक योजनाएँ भी बनाते हैं। अगर कोई अप्रत्याशित घटना हो जाती है जिससे प्लान ए सफल नहीं हो सकता, तो वे प्लान बी पर काम करने लगते हैं। आप हवाई जहाज़ में तब भी आराम से बैठे रहते हैं जब कि वह हवाई अड्डा पास हो जहाँ आपको उतरना है लेकिन वहाँ हवाई जहाज़ उतारना फ़िलहाल संभव नहीं है। आप घबराते नहीं हैं क्योंकि आप जानते हैं कि हवाई जहाज़ चलाने वाले के पास उतरने की वैकल्पिक जगह है और पर्याप्त रिज़र्व ईंधन है।

       वह व्यक्ति दुर्लभ ही होगा जिसने बहुत बड़ी सफलता पाई हो और अपने जीवन में उसने कभी वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल न किया हो -ऐ ऐसेबहुत से लोग हैं जिन्होंने वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करके सफलता पाई है।

       जब आप वैकल्पिक रास्ते पर चलते हैं, तो आप अपने लक्ष्य नहीं बदलते। आप सिर्फ अपने रास्ते बदलते हैं।

आपने कई लोगों को यह कहते सुना होगा, “काश मैंने वह स्टॉक उस समय ख़रीदा होता। आज मेरे पास ढेर सारा पैसा होता।"

       आम तौर पर, लोग स्टॉक या बॉन्ड या रियल एस्टेट या किसी दूसरे किस्म की जायदाद में निवेश करने के बारे में सोचते हैं। परंतु सबसे बड़ा और सबसे लाभदायक निवेश खुद में निवेश करना होता है, ऐसी चीजें खरीदना जिनसे आपकी मानसिक योग्यता और शक्ति बढे।

       प्रगतिशील कंपनियाँ जानती हैं कि आज से पाँच साल बाद वे कितनी मज़बूत होंगी यह उन आने वाले पाँच सालों में तय नहीं होगा, बल्कि अभी तय होगा और इस बात से तय होगा कि वे इस साल उस।

योजना में कितना निवेश कर रही हैं। लाभ केवल एक ही स्त्रोत से आते हैं : निवेश।

        यह हम सबके लिए एक सबक़ है। लाभ के लिए, आगे आने वाले सालों में “औसत" आमदनी से ज्यादा हासिल करने के लिए हमें खुद में निवेश करना चाहिए। हमें अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निवेश करना चाहिए।

      यहाँ दो दृढ़ आत्म-निवेश तकनीकें दी जा रही हैं जो आपके भविष्य को सुधारने में आपके बहुत काम आएँगी :

      1. शिक्षा में निवेश करें। खुद में निवेश करते समय सच्ची शिक्षा में निवेश करना सबसे अच्छा निवेश होता है। परंतु इससे पहले हम यह सुनिश्चित कर लें कि वास्तव में शिक्षा से हमारा आशय क्या है। कई लोगों की नज़र में शिक्षा का मतलब स्कूल या कॉलेज में बिताए गए साल, हासिल की गई डिग्रियाँ, प्रमाणपत्र या डिप्लोमा होते हैं। परंतु शिक्षा के संबंध में मात्रा या संख्या की इस शैली से ज़रूरी नहीं है कि आप सफल व्यक्ति बन जाएँ। जनरल इलेक्ट्रिक के चेयरमैन रॉल्फ जे. कॉर्डिनर ने शिक्षा के बारे में चोटी के बिज़नेस मैनेजमेंट के दृष्टिकोण को इन शब्दों में व्यक्त किया : “हमारे दो सबसे बेहतरीन प्रेसिडेंट मिस्टर विल्सन और मिस्टर कॉफिन कभी कॉलेज में नहीं पढ़े। हालाँकि हमारे कई वर्तमान अफ़सर पीएच. डी. हैं, परंतु 41 में से 12 के पास कोई कॉलेज डिग्री नहीं है। हम योग्यता में विश्वास करते हैं, डिप्लोमा में नहीं।" डिप्लोमा या डिग्री से आपको नौकरी ढूँढ़ने में मदद तो मिल सकती है परंतु उस नौकरी मेंआपकी प्रगति की कोई गारंटी नहीं मिल सकती। "बिज़नेस में महत्व योग्यता का होता है, डिप्लोमा का नहीं।"

       कई और लोगों के लिए शिक्षा का मतलब ढेर सारी जानकारी होता है जिसे दिमाग में भरा जाता है। परंतु यह तथ्यों को सोखने वाली शिक्षा की शैली आपको वहाँ नहीं ले जाएगी जहाँ आप पहुंचना चाहते हैं। हम गोदाम में भरी जानकारी के लिए पुस्तकों, फ़ाइलों और मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं। अगर हम उतना ही कर सकते हैं, जितना कि कोई मशीन, तो हमारा अस्तित्व सचमुच ख़तरे में है।

         आपको जिस सच्ची शिक्षा में निवेश करना चाहिए, वह है आपके दिमाग को विकसित करने वाली शिक्षा। कोई व्यक्ति कितना सुशिक्षित है, यह इस बात से पता चलता है कि उसका दिमाग कितनी अच्छी तरह विकसित है- संक्षेप में, वह कितनी अच्छी तरह सोचता है।

          जो भी चीज़ सोचने की योग्यता को सुधारती है, शिक्षा है। और आप कई तरीकों से शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। परंतु ज़्यादातर लोगों के लिए शिक्षा के सर्वाधिक प्रभावी स्त्रोत करीबी कॉलेज और यूनिवर्सिटी होते हैं। शिक्षा उनका बिज़नेस है।

        अगर आप काफ़ी समय से कॉलेज में न घुसे हों, तो आपको वहाँ जाने पर हैरानी होगी। आपको यह जानकर खशी होगी कि अब वहाँ बहुत सारे कोर्स मौजूद हैं। आपको यह जानकर भी खशी होगी कि आप नौकरी के बाद भी कॉलेज जा सकते हैं। और वहाँ पर जो विद्यार्थी आते हैं, वे मंदबुद्धि नहीं होते, बल्कि कई तो सचमुच प्रतिभाशाली व्यक्ति होते हैं, जिनमें से कई बहुत ज़िम्मेदारी के पदों पर काम करते हैं। मैंने हाल ही में 25 लोगों की एक ईवनिंग क्लास ली थी, जिसमें एक विद्यार्थी 12 स्टोर्स की रिटेल चेन का मालिक था, नेशनल फूड चेन के दो ख़रीदार थे, चार ग्रेजुएट इंजीनियर थे, एक एयर फ़ोर्स कर्नल था, और कई अच्छे स्टेटस के लोग थे।

        आजकल कई लोग शाम के कॉलेजों में पढ़कर अपनी डिग्रियाँ हासिल करते हैं, परंतु डिग्री, जो आख़िर केवल एक काग़ज़ का टुकड़ा है, उनकी मुख्य प्रेरणा नहीं है। वे कॉलेज इसलिए जाते हैं, ताकि वे अपने दिमाग का विकास कर सकें, क्योंकि उनका भविष्य इसी से सुधरेगा। वही सच्चा निवेश है जो आपके भविष्य को सुधारने में किया जाता है।

       और इस बारे में कोई ग़लतफ़हमी न पालें। शिक्षा एक असली सौदा है। 75 से 150 डॉलर के निवेश से आप एक साल तक हर सप्ताह एक रात कॉलेज जा सकते हैं। अपनी सालाना आमदनी के हिसाब से इसका प्रतिशत निकालें और खुद से पूछे, "क्या मेरा भविष्य इस काबिल भी नहीं है कि मैं इसके लिए यह छोटा सा निवेश कर सकूँ ?"

       क्यों न इस निवेश को करने का फ़ैसला अभी हाल कर लें। कॉलेज में फ़ोन करें : जिंदगी भर हर सप्ताह एक रात। यह आपको प्रगतिशील, युवा, चौकस बनाए रखेगा। यह आपको आपकी रुचियों के क्षेत्रों से जोड़े रखेगा। और यह आपको ऐसे लोगों से भी जोड़े रखेगा जो आप ही की तरह सफलता के रास्ते पर चल रहे हैं।

        2. विचारदाताओं में निवेश करें। शिक्षा आपके मस्तिष्क को ढालने में मदद करती है। नई परिस्थितियों का सामना करने का प्रशिक्षण देती है और समस्याएँ सुलझाने में आपकी मदद करती है। विचारदाता यानी जो विचार देता है, वह भी इससे मिलता-जुलता काम करता है। विचारदाता आपके मस्तिष्क का पोषण करते हैं, आपको सोचने के लिए रचनात्मक सामग्री देते हैं।

       सर्वश्रेष्ठ विचारदाता कौन हैं ? वैसे तो कई हैं, परंतु अच्छी गुणवत्ता की सामग्री की सतत आपूर्ति के लिए आप ऐसा करें : हर महीने एक प्रेरणादायक पुस्तक खरीदने का संकल्प करें और दो विचारप्रधान पत्रिकाओं के ग्राहक बन जाएँ। इस तरह बहुत ही कम पैसे और समय में, आप सर्वश्रेष्ठ चिंतकों और विचारकों के संपर्क में आ जाएँगे।

       एक दिन लंच पर मैंने एक व्यक्ति को यह कहते सुना, “परंतु इसकी कीमत 20 डॉलर प्रति वर्ष है। मैं वॉल स्ट्रीट जरनल पढ़ने की इतनी कीमत नहीं दे सकता।" उसके साथी ने, जो सफलता के लक्ष्य का पीछा कर रहा था, जवाब दिया, “मैंने पाया है कि मैं वॉल स्ट्रीट जरनल न पढ़ने की कीमत नहीं चुका सकता।"

         तो, आप सफल लोगों से सीखें। अपने आपमें निवेश करें।

आइए काम में जुटें

अब एक बार सारांश में यह देखें कि हम इन सफलता के सिद्धांतों को किस तरह काम में ला सकते हैं :

1. पहले इस बात की साफ़ तस्वीर बना लें कि आप कहाँ पहुँचना चाहते हैं। आज से दस साल बाद आप कैसे होना चाहेंगे, इस बात की कल्पना कर लें।

2. अपने 10 साल के प्लान को लिख लें। आपका जीवन इतना महत्वपूर्ण है कि इसे किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। आप अपने काम-धंधे, अपने घर और अपने सामाजिक खंडों में जो हासिल करना चाहते हों, उसे काग़ज़ पर लिख लें।

3. अपनी इच्छाओं के आगे समर्पण कर दें। ज्यादा ऊर्जा हासिल करने के लिए लक्ष्य निर्धारित करें। काम करने के लिए लक्ष्य तय करें। लक्ष्य तय करें और जीने का असली आनंद लें।

4. अपने प्रमुख लक्ष्य को ऑटोमेटिक पायलट बनने दें। जब आपका लक्ष्य आप पर हावी हो जाएगा, तो आप पाएँगे कि आप अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सही फैसले कर रहे हैं।

5. अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए एक बार में एक क़दम बढ़ाएँ। आप जो भी काम करें, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न दिखे, उसे अपने लक्ष्य की तरफ़ एक क़दम मानें।

6. 30 दिनों के लक्ष्य बनाते रहें। दिन-प्रतिदिन के प्रयास का परिणाम अच्छा होता है।

7. वैकल्पिक रास्ते तय करें। वैकल्पिक रास्ते का मतलब सिर्फ दूसरा रास्ता चुनना होता है। इसका यह मतलब नहीं होता कि आपने अपने लक्ष्य को बदला है, आपने तो सिर्फ अपना रास्ता बदला है।

8. अपने आपमें निवेश करें। ऐसी चीजें खरीदें जिनसे आपकी मानसिक योग्यता और शक्ति बढ़े। शिक्षा में निवेश करें। विचारशील सामग्री में निवेश करें।

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CHAPTER 12.2 लक्ष्य बनाएं, सफल बने, इक्छा के सामने समर्पण करने का कोई उम्र नही होती।

और इच्छा के सामने समर्पण करने की कोई उम्र नहीं होती।

     ज़्यादातर सचमुच सफल लोग सप्ताह में 40 घंटे से भी ज्यादा समय तक काम करते हैं। परंतु आपने कभी नहीं सुना होगा कि उन्होंने ज़्यादा काम की शिकायत की हो। सफल लोगों का ध्यान लक्ष्य पर लगा होता है और इसी से उन्हें ऊर्जा मिलती है।

      इससे हमें यह शिक्षा मिलती है : जब आप एक इच्छित लक्ष्य बना लेते हैं और उस लक्ष्य की तरफ़ बढ़ने का संकल्प करते हैं तो आपकी ऊर्जा बढ़कर कई गुना हो जाती है। कई लोग, करोड़ों लोग, अपना लक्ष्य बनाकर और उस लक्ष्य को हासिल करने में जीजान से जुटकर नई ऊर्जा हासिल कर सकते हैं। लक्ष्यों से बोरियत दूर होती है। लक्ष्यों से कई लंबी बीमारियाँ भी दूर हो जाती हैं।

      हम लक्ष्यों की शक्ति में थोड़ा गहराई तक जाएँ। जब आप अपनी इच्छाओं के आगे समर्पण करते हैं, जब आप अपने दिमाग पर लक्ष्य को हावी हो जाने देते हैं, तो आप में शारीरिक शक्ति, ऊर्जा और उत्साह का संचार होता है जिसके सहारे आप उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।
परंतु आपको कुछ और भी मिलता है जो उतना ही बहुमूल्य है। आपको “स्वचालित या ऑटोमैटिक योजना" मिलती है जो आपको सीधे लक्ष्य तक ले जाती है।

      गहराई से तय किए गए लक्ष्य के साथ सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि यह आपको अपने तक पहुँचने की राह पर बनाए रखता है। इसमें कोई रहस्य नहीं है। दरअसल होता यह है। जब आप अपने लक्ष्य के आगे समर्पण कर देते हैं, तो लक्ष्य आपके अवचेतन मस्तिष्क में जाकर बैठ जाता है। आपका अवचेतन मस्तिष्क हमेशा संतुलन में रहता है। हो सकता है कि आपका चेतन मस्तिष्क संतुलन में न हो। आपका चेतन
मस्तिष्क तभी संतुलन में रहता है जब यह वही करता है जो आपका अवचेतन मस्तिष्क सोच रहा है। अवचेतन मस्तिष्क के पूरे सहयोग के बिना कोई भी व्यक्ति झिझकेगा, दुविधा में होगा, अनिर्णय की स्थिति में होगा। अब जबकिआपका लक्ष्य आपके अवचेतन मस्तिष्क में गहरे बैठ गया है तो आप अपने आप सही तरीके से काम करने लगते हैं। चेतन मस्तिष्क अब स्पष्ट, सीधा चिंतन कर सकता है।

      मैं आपको दो काल्पनिक व्यक्तियों का उदाहरण देकर इस बात को समझाना चाहता हूँ। शायद इनमें आपको अपने आस-पास के कई लोगों की झलक दिखाई दे। हम इन्हें टॉम और जैक का नाम देंगे। यह दोनों बाक़ी सभी बातों में लगभग समान हैं, दोनों में एक ही चीज़ का अंतर है। टॉम का एक निश्चित लक्ष्य है। जैक का नहीं है। टॉम जानता है कि वह क्या बनना चाहता है। वह दस साल बाद खुद को कॉरपोरेशन के वाइस प्रेसिडेंट की कुर्सी पर बैठा देख रहा है।

         चूंकि टॉम ने अपने लक्ष्य के आगे समर्पण कर दिया है, इसलिए उसके अवचेतन मस्तिष्क से उसका लक्ष्य उसे संकेत करता है, “यह करो", या “यह मत करो, इससे तुम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाओगे।" लक्ष्य लगातार बोलता रहता है, “मैं ही वह इमेज हूँ जिसे तुम्हें हक़ीक़त बनाना है। तुम्हें मुझे हक़ीक़त बनाने के लिए यह करना चाहिए।"

         टॉम के पास लक्ष्य था, इसलिए वह इधर-उधर की बातों में नहीं उलझा। लक्ष्य ने उसे सारे कामों में सही रास्ता दिखाया। जब टॉम कोर्ड सूट ख़रीदता था, तो उसका लक्ष्य उसे बताता था कि उसे कौन सा सूट चुनना चाहिए। लक्ष्य ही टॉम को बताता था कि उसे अगली नौकरी किस तरह की चुनना चाहिए, बिज़नेस मीटिंग में क्या कहना चाहिए, विवाद की स्थिति में क्या करना चाहिए, क्या पढ़ना चाहिए और किस तरह के सिद्धांतों पर चलना चाहिए। अगर टॉम अपने लक्ष्य से ज़रा सा भी इधर-उधर भटकता था तो उसके अवचेतन मस्तिष्क में फ़िट स्वचालित यंत्र सक्रिय हो जाता था और उसे चेतावनी दे देता था कि वह भटक गया है और उसे बताता था कि सही राह पर आने के लिए उसे क्या कदम उठाने होंगे।

          टॉम के लक्ष्य ने उसे अपनी नौकरी के वातावरण के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया था।

       दूसरी तरफ़, जैक के पास कोई लक्ष्य नहीं था, इसलिए उसके पास मार्गदर्शन देने वाले स्वचालित यंत्र का अभाव था। वह जल्दी ही दुविधा में पड़ जाता था। उसके काम बिना नीतियों के होते थे। वह हिचकता था, कभी इधर कभी उधर जाता था, यह सोचता था कि उसे इस हालत में क्या करना चाहिए। चूंकि उसके पास लक्ष्य को हासिल करने की लगन नहीं थी, इसलिए जैक औसत ज़िंदगी की आसान राह पर लड़खड़ाता हुआ चल रहा था।

         क्या मैं आपसे ऊपर लिखे खंड को दुबारा पढ़ने का आग्रह कर सकता हूँ? ऐसा अभी करें। इस अवधारणा को अपने दिमाग में बैठ जाने दें। बेहद सफल लोगों के जीवन का अध्ययन करें। यह देखें कि उन सभी ने अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण कर दिया था। देखें कि किस तरह किसी बेहद सफल व्यक्ति की ज़िंदगी उसके लक्ष्य के चारों तरफ़ घूमती है।

        लक्ष्य के सामने समर्पण करें। सचमुच समर्पण करें। उसे अपने दिमाग पर हावी हो जाने दें और तब लक्ष्य आपको वह स्वचालित मार्गदर्शन प्रदान करेगा जो आपको लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक होगा। 

       हम लोगों के साथ अक्सर होता है कि किसी शनिवार की सुबह जब हम सोकर उठते हैं तो हमारे पास कोई योजना नहीं होती, हम नहीं जानते कि हमें उस दिन क्या करना है। इस तरह के दिनों में हम लगभग कुछ हासिल नहीं कर पाते। हम दिन को यूँ ही गुज़ार देते हैं, और जब दिन ख़त्म हो जाता है तो खुश होते हैं। परंतु जब हम किसी दिन को योजना के साथ शुरू करते हैं, तो हमारे काम फटाफट हो जाते हैं।

      यह आम अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक़ सिखाता है : किसी काम में सफलता हासिल करने के लिए, हमें उस काम की योजना बनाना चाहिए।

       द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले वैज्ञानिकों को परमाणु की प्रबल शक्ति का आभास था। परंतु वे यह नहीं जानते थे कि परमाणु को किस तरह विखंडित किया जाए ताकि इसकी प्रबल शक्ति का विस्फोट हो। जब अमेरिका युद्ध में उतरा, तो भविष्यदर्शी वैज्ञानिकों ने परमाणु बम का
संभावित शक्ति को देखा। तत्काल एक योजना बनी जिसका सिर्फ एक लक्ष्य था: परमाणु बम बनाना। बाक़ी सब इतिहास है। कुछ ही सालों में लगन और मेहनत रंग लाई। परमाणु बम गिराए गए और युद्ध ख़त्म हो गया। परंतु अगर लक्ष्य हासिल करने की योजना नहीं बनी होती तो परमाणु को विखंडित करने की प्रक्रिया शायद इतनी जल्दी नहीं हो पाती। शायद इसमें एक दशक या इससे भी ज़्यादा का विलंब हुआ होता।

       अगर आपको काम करना है, तो उसके लक्ष्य बना लें।

       हमारे उत्पादन का भट्टा ही बैठ जाएगा, अगर हम उत्पादन के टारगेट न बनाएँ। सभी कंपनियों के अफ़सर टारगेट डेट और उत्पादन की संख्या का लक्ष्य बनाते हैं। सेल्समैन तभी ज्यादा सामान बेच पाते हैं जब उन्हें निश्चित संख्या में माल बेचने का लक्ष्य दिया जाता है। प्रोफ़ेसर जानते हैं कि विद्यार्थी तभी अपने टर्म पेपर लिख पाते हैं जब उसके लिए डेडलाइन तय कर दी जाती है।

       तो अगर आप सफलता की तरफ़ आगे बढ़ना चाहते हैं तो लक्ष्य तय करें : डेडलाइन बनाएँ, किस तारीख़ तक आप लक्ष्य हासिल करेंगे यह तय करें। अपने आप यह तय करें कि आप इतने समय में इतना हासिल करेंगे। आप केवल उतना ही हासिल कर सकते हैं, जितना हासिल करने की आपने योजना बनाई है।

        ट्यूलेन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के डॉक्टर जॉर्ज ई. बर्क मानवीय दीर्घजीविता के विशेषज्ञ हैं। उनके अनुसार कई चीज़ों से यह तय होता है कि आप कितने समय तक जिएँगे : वज़न, आनुवंशिकता, खान-पान, मानसिक तनाव, व्यक्तिगत आदतें। परंतु डॉ. बर्क कहते हैं, “जल्दी मरने का सबसे आसान तरीका है रिटायर हो जाना और कुछ न करना। हर इंसान को जिंदा रहने के लिए जीवन में रुचि लेना चाहिए।"

         हममें से हर एक के पास विकल्प है। रिटायरमेंट हमारे लिए शुरुआत भी हो सकता है और अंत भी। “कुछ मत करो, बस खाओ, सोओ और दिन काटो" का रवैया रिटायरमेंट का “खुद को तेज़ी से ज़हर दे दो” वाला रास्ता है। जो लोग रिटायरमेंट को सक्रिय जीवन का अंत मानते हैं, उनमें से ज्यादातर लोगों के जीवन का अंत भी इसके तत्काल बाद हो जाता है। चूँकि अब जीवन का कोई लक्ष्य नहीं बचा है, जीने का कोई कारण नहीं बचा है, इसलिए ज़िंदगी खत्म हो जाती है।

          दूसरी तरफ़ रिटायर होने काबुद्धिमत्तापूर्ण रवैया है, "मैं अब नए सिरे से शुरुआत करूँगा।" मेरे बहुत अच्छे दोस्त ल्यू गॉर्डन ने रिटायर होने के इसी तरीके को चुना। ल्यू कुछ साल पहले अटलांटा के सबसे बड़े बैंक के वाइस प्रेसिडेंट के रूप में रिटायर हुए थे। परंतु उन्होंने अपने रिटायरमेंट के दिन को अपनी नई जिंदगी की शुरुआत माना था। उन्होंने खुद को बिज़नेस सलाहकार के रूप में स्थापित किया। और उनकी प्रगति आश्चर्यजनक है।

         अब वे साठ से सत्तर के बीच हैं, वे ढेर सारे ग्राहकों को सेवाएँ देते हैं और वक्ता के रूप में उनकी देश भर में माँग है। उनकी एक योजना ‘पी सिग्मा एप्सीलॉन' नामक संस्था बनाने की थी जो प्रोफेशनल सेल्समैन और सेल्स एक्जीक्यूटिब्ज़ की संस्था हो। हर बार जब मैं देखता हूँ ल्यू की उम्र मुझे पहले से कम दिखती है। अभी भी अपनी आत्मा में वे 30 साल के जवान हैं। मैं ऐसे बहुत कम लोगों को जानता हूँ जो इतनी उम्र में जीवन से सुख की इतनी फ़सल काट रहे हैं जितना कि यह वरिष्ठ नागरिक, जिसने रिटायरमेंट को जीवन का अंत नहीं माना।

         और ल्यू गॉर्डन की तरह के लोग बोरिंग बुड्ढे नहीं होते हैं, जो सिर्फ अपने दुःखों की दास्तान ही सुनाते रहें।

        लक्ष्य, प्रबल लक्ष्य, किसी व्यक्ति को जिंदा रख सकते हैं, चाहे उसकी शारीरिक स्थिति कैसी भी हो। मिसेज़ डी. मेरे कॉलेज के एक मित्र की माँ थीं। उन्हें तभी कैंसर हो गया था जब उनका पुत्र केवल दो साल का था। इतना ही नहीं, बीमारी का पता चलने से तीन महीने पहले ही उनके पति की मृत्यु हो गई थी। उनके डॉक्टरों ने उन्हें कोई दिलासा नहीं दिया। परंतु मिसेज़ डी. ने हार नहीं मानी। उनका संकल्प था कि वे अपने दो साल के बच्चे को सफलतापूर्वक कॉलेज की पढ़ाई पूरी करवाएँगी। अपने पति द्वारा छोड़ी गई छोटी सी किराने की दुकान चलाकर उन्होंने पढाई के लिए। पैसे जुटाना शुरू किए। उनके बहुत से ऑपरेशन हुए। हर बार डॉक्टर यहा कहते थे, “बस कुछ महीने और।"

        कैंसर तो कभी खत्म नहीं हुआ। परंत "कुछ महीने" खिंचते चले गए। और 20 साल बन गए। उन्होंने अपने बच्चे को सफलतापूर्वक कॉलेज की पढ़ाई खत्म करते और डिग्री लेते देखा। इसके छह हफ्ते बाद वे चल बसीं।

        लक्ष्य, प्रबल लालसा, में इतनी शक्ति थी कि वे मौत से दो दशक तक लड़ती रहीं।

        लंबे जीवन के लिए लक्ष्यों का प्रयोग करें। दुनिया की कोई भी दवा - और आपका डॉक्टर भी यह मानेगा - जीवन को बढ़ाने में इतनी सक्षम नहीं होती, जितनी कि कुछ करने की इच्छा होती है।

वह व्यक्ति जो अधिकतम सफलता हासिल करने के लिए कृतसंकल्प है, यह सिद्धांत सीख जाता है कि प्रगति एक समय में एक क़दम चलने का नाम है। एक-एक ईंट लगाकर ही घर बनता है। फुटबॉल के खेल में भी एक-एक मैच करके ही विश्वकप जीता जाता है। कोई डिपार्टमेंट स्टोर एक-एक नए ग्राहक से ही बढ़ता है। हर महान सफलता छोटी-छोटी सफलताओं की श्रृंखला होती है।

        एरिक सेवारीड जाने-माने लेखक हैं। उन्होंने रीडर्स डाइजेस्ट (अप्रैल 1957) में लिखा है कि उन्होंने जो सबसे बढ़िया सलाह सीखी है, वह है “अगले मील" का सिद्धांत। यहाँ पर उनके लेख का कुछ हिस्सा दिया जा "द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, मुझे और कई दूसरे लोगों को क्षतिग्रस्त हवाई जहाज़ से पैराशूट से छलाँग लगाकर बर्मा-भारत की सीमा के पहाड़ी जंगलों में कूदना पड़ा। इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी कि अगले कुछ सप्ताहों तक हमारे बचाव के लिए कोई टीम वहाँ पहुँचती। और तब हमने भारत की तरफ़ एक दर्दनाक, लंबी यात्रा शुरू की। हमें 140 मील का फ़ासला तय करना था। बीच में पहाड़ थे, अगस्त की गर्मी थी और मानसून की बारिश थी।

       "सफर के पहले ही घंटे में मेरे जूते में एक कील एक फुट गहरी धंस गई। शाम तक मेरे दोनों पैरों में सिक्कों के आकार के छाले हो गए। क्या मैं 140 मील तक लड़खड़ाते हुए चल सकता था? क्या दूसरे लोग इतनी दूर चल पाएँगे, जबकि उनमें से कई की हालत तो मुझसे भी बदतर थी? हम लोगों को यह विश्वास था कि हम ऐसा नहीं कर सकते। परंतु हम अगली चोटी तक तो पहँच ही सकते थे, हम रात गुज़ारने के लिए अगले गाँव तक तो पहुँच ही सकते थे। और हमारा लक्ष्य एक दिन में बस इतना ही करना तो था...।

      “जब मैंने नौकरी छोडी और ढाई लाख शब्दों की एक पुस्तक लिखने का फैसला किया तो मैंने पूरी योजना के बारे में एक साथ नहीं सोचा। अगर मैंने ऐसा किया होता तो मैं वह महत्वाकांक्षी पुस्तक कभी पूरी नहीं कर पाया होता। मैंने केवल अगले पैरेग्राफ़ के बारे में विचार किया, अगले पेज के बारे में नहीं, और अगले अध्याय के बारे में तो बिलकुल भी नहीं। इस तरह, पिछले छह महीनों से मैंने कुछ नहीं किया, केवल एक पैरेग्राफ़ के बाद दूसरा पैरेग्राफ़ लिखता रहा और पुस्तक 'अपने आप तैयार' हो गई।

       “वर्षों पहले. मैंने हर रोज़ लिखने और ब्रॉडकास्टिंग का काम अपने हाथ में लिया जो आज 2000 पांडुलिपियों से ज़्यादा हो चुका है। अगर तब किसी ने मुझसे एक साथ '2000 पांडुलिपियों को लिखने' का कॉन्ट्रैक्ट साइन कराया होता, तो मैं इतने बड़े काम को करने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर देता। परंतु मुझे सिर्फ एक पांडुलिपि लिखने के लिए कहा गया, इसके बाद फिर एक, और मैंने हमेशा यही किया है।"

        “अगले मील" का सिद्धांत एरिक सेवारीड के लिए काम कर गया और यह आपके लिए भी काम करेगा।

       क़दम-दर-क़दम का तरीक़ा किसी भी लक्ष्य को हासिल करने का इकलौता बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़ा है। धूम्रपान छोड़ने का सर्वश्रेष्ठ फ़ॉर्मूला जिसने मेरे कई दोस्तों की सिगरेट छुड़वा दी है, वह अगले घंटे का फ़ॉर्मूला है। अंतिम लक्ष्य तक पहली ही बार में पहुंचने के बजाय यानी कभी धूम्रपान न करने का संकल्प ले लेना उतना कारगर नहीं होता, जितना कि अगले घंटे सिगरेट न पीने का संकल्प। जब घंटा ख़त्म होता है, तो धूम्रपान करने वाला अपने संकल्प को एक और घंटे के लिए बढ़ा देता है। फिर, जब इच्छा कम होती जाती है, तो इस समय को दो घंटे रखा जा सकता है, और इसके बाद एक दिन। अंततः लक्ष्य हासिल हो जाता है। वह व्यक्ति जो एकदम इस आदत को छोड़ना चाहता है वह इसलिए असफल होता है। क्योंकि इसमें असहनीय मनोवैज्ञानिक वेदना होती है। सिगरेट के बिना एक  घंटे रहना आसान है। सिगरेट के बिना जिंदगी भर रहना कठिन है।

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Tuesday, October 8, 2019

CHAPTER 12.1 लक्ष्य बनाएँ, सफल बनें,

                 लक्ष्य बनाएँ, सफल बनें

इंसान ने जितनी भी तरक़्क़ी की है, लक्ष्य बनाकर की है। हमारे जितने भी आविष्कार हुए हैं, चाहे वे चिकित्सा के क्षेत्र में हों, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में हों, या किसी और क्षेत्र में हों, वे सभी इसी कारण संभव हुए हैं क्योंकि उन्हें हासिल करने का लक्ष्य बनाया गया था। बिज़नेस में सफलता भी अक्सर इसीलिए मिलती है क्योंकि उसे हासिल करने का टारगेट बनाया गया था। उपग्रह धरती के चारों तरफ़ अपने आप चक्कर नहीं लगा रहे हैं, बल्कि इसलिए चक्कर लगा रहे हैं क्योंकि वैज्ञानिकों ने
"अंतरिक्ष को जीतने" का लक्ष्य बनाया था।

        लक्ष्य का मतलब है उद्देश्य। लक्ष्य सपने से ज्यादा होता है, क्योंकि लक्ष्य का मतलब है सपने पर काम करना। लक्ष्य इससे ज़्यादा स्पष्ट होता है, “काश! मैं यह कर सकता!” लक्ष्य बहुत ही स्पष्ट होता है, “मैं इसकी तरफ़ बढ़ रहा हूँ।"

         जब तक लक्ष्य नहीं बनाया जाता, तब तक कुछ भी हासिल नहीं होता, तब तक उसकी तरफ़ क़दम नहीं बढ़ाए जा सकते। लक्ष्यों के बिना व्यक्ति जीवन में इधर-उधर भटकता रहता है। वह लड़खड़ाता रहता है और कभी यह नहीं जान पाता कि वह कहाँ जा रहा है, इसलिए वह कहीं भी नहीं पहुंच पाता।

         लक्ष्य सफलता के लिए उसी तरह ज़रूरी है, जिस तरह जीवन के लिए हवा ज़रूरी है। कोई भी बिना लक्ष्य के सफल नहीं हुआ। कोई भी बिना हवा के जीवित नहीं रहा। इसलिए आप अच्छी तरह अपने लक्ष्य को तय कर लें कि आप कहाँ पहुँचना चाहते हैं।

        डेव मॅहोने कभी एडवर्टाइजिंग एजेंसी में 25 डॉलर प्रति सप्ताह की नौकरी किया करते थे, 27 वर्ष की उम्र में वे एजेंसी के वाइस प्रेसिडेंट बन गए और 33 वर्ष की उम्र में वे गुड हयूमर कंपनी के प्रेसिडेंट बन गए। लक्ष्यों के बारे में उनका कहना था, “महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि आप कल क्या थे, या आप आज क्या हैं, बल्कि महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आप कल कहाँ पहुँचना चाहते हैं।"

        महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि आप कल क्या थे, या आप आज क्या हैं, बल्कि महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आप कल कहाँ पहुँचना चाहते हैं।

         अच्छी कंपनियां अगले 10 से 15 साल के लक्ष्य बनाकर चलती हैं। सफल बिज़नेसमैन को खद से यह सवाल पछना ही पड़ता है. “आज से दस साल बाद हम अपनी कंपनी को कहाँ देखना चाहते हैं ?" फिर वे उसके हिसाब से अपनी योजना बनाते हैं। नई मशीनें लगाई जाती हैं ताकि उत्पादन की क्षमता बढ़ सके, आज की ज़रूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि आज से 5 या 10 साल बाद की ज़रूरत के हिसाब से। ऐसे उत्पादों को विकसित करने के लिए शोध किया जाता है जो दस साल से पहले बाज़ार में नहीं उतर पाएँगे।

         आधुनिक कंपनियाँ भविष्य को क़िस्मत के भरोसे नहीं छोड़तीं। क्या आपको ऐसा करना चाहिए?

         हममें से हर व्यक्ति सफल कंपनियों से यह महत्वपूर्ण सबक़ सीख सकता है। हमें कम से कम 10 साल बाद तक की योजना बना लेनी चाहिए। आप दस साल बाद अपनी जो इमेज बनाना चाहते हैं, आपको सबसे पहले तो अभी वह इमेज सोच लेनी चाहिए। यह एक बेहद महत्वपूर्ण विचार है। कोई कंपनी जो अच्छी तरह भविष्य की योजना नहीं बनाती, वह यूँ ही चलती रहेगी (यह बीच में दीवालिया भी हो सकती है)। इसी तरह जो व्यक्ति लंबे लक्ष्य तय नहीं कर पाता, वह भी ज़िंदगी की भूलभुलैया में यूँ ही भटकता रहेगा। बिना लक्ष्यों के हमारा विकास नहीं होता।

       मैं आपको एक उदाहरण बताना चाहता हूँ कि लंबी दूरी के लक्ष्य से सफलता किस तरह मिलती है। अभी पिछले हफ्ते एक युवक (मैं उसे एफ़. बी. कहना चाहूँगा) अपने करियर की समस्या लेकर मेरे पास आया। एफ़. बी. सभ्य और समझदार दिख रहा था। वह कुँवारा था और उसने चार साल पहले ही अपना कॉलेज पूरा किया था।

          हमने उसके काम-काज, शिक्षा, उसकी योग्यताओं और उसकी सामान्य पृष्ठभूमि के बारे में चर्चा की। फिर मैंने उससे कहा, "आप मुझसे नौकरी बदलने के बारे में सलाह लेने आए हैं। आप किस तरह की नौकरी चाहते हैं ?"

          उसने कहा, “यही तो मैं आपसे पूछने आया हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं क्या करना चाहता हूँ।"

         उसकी समस्या बहुत ही आम समस्या है। परंतु मैंने महसूस किया कि इस व्यक्ति की मदद करने का यह तरीक़ा नहीं है कि मैं इसे कई संभावित नियोक्ताओं से मिलवा दूं। करियर चुनने में गलती करके उससे सीखना कोई अच्छा तरीक़ा नहीं है। चूंकि करियर की संभावनाएँ दर्जनों होती हैं, इसलिए सही नौकरी मिलने के अवसर भी दर्जनों में से एक होते हैं। मैं जानता था कि मुझे एफ़. बी. को यह एहसास कराना होगा कि किसी जगह अपना करियर बनाने से पहले उसे पहले यह जानना पड़ेगा कि उसकी मनचाही जगह कौन सी है।

       इसलिए मैंने कहा, “अब आप एक अलग नज़रिए से अपने करियर प्लान को देखें। क्या आप मुझे बताएँगे कि आज से दस साल बाद आप अपनी कैसी इमेज देखना चाहते हैं?"

       एफ़. बी. ने काफ़ी सोच-विचारकर कहा, “मैं समझता हूँ कि मैं वही चाहता हूँ जो हर व्यक्ति चाहता है : एक अच्छी सी नौकरी जिसमें अच्छी तनख्वाह मिलती हो और एक अच्छा सा घर। सच कहूँ, तो मैंने इसके बारे में ज़्यादा नहीं सोचा।"

        मैंने उसे आश्वस्त किया कि यह बिलकुल स्वाभाविक है। फिर मैंने उसे बताया कि करियर चुनने की उसकी शैली वैसी ही थी जैसे हम किसी एयरलाइन टिकट काउंटर पर जाएँ और कहें, “मुझे एक टिकट दे दीजिए।" टिकट बेचने वाले आपकी कोई मदद नहीं कर सकते जब तक कि आप उन्हें यह न बताएँ कि आप कहाँ जाना चाहते हैं। इसलिए मैंने कहा, “और मैं तब तक नौकरी ढूँढ़ने में आपकी मदद नहीं कर सकता जब तक कि आप मुझे यह न बता दें कि आप कहाँ पहुँचना चाहते हैं। आप और सिर्फ आप ही मुझे यह बता सकते हैं कि आपका लक्ष्य क्या है।"

        इससे एफ़. बी. सोचने पर मजबूर हो गया। अगले दो हफ्तों तक हमने अलग-अलग नौकरियों के अच्छे-बुरे पहलुओं पर विचार करने के बजाय लक्ष्य निर्धारित करने के बारे में विचार किया। एफ़. बी. ने करियर प्लानिंग का सबसे महत्वपूर्ण सबक सीख लिया : शुरू करने से पहले जान लें, आप कहाँ जाना चाहते हैं।

         सफल कंपनियों की तरह, आगे की योजना बनाएँ। एक तरह से आप भी किसी कंपनी की तरह हैं। आपकी योग्यताएँ, आपकी प्रतिभा, आपकी दक्षताएँ आपके “उत्पाद" हैं। आप अपने उत्पादों को विकसित करना चाहते हैं, ताकि आपको उनकी अधिकतम क़ीमत मिल सके। भविष्य की योजना बनाने से ऐसा करना संभव है।

       यहाँ दो क़दम सुझाए जा रहे हैं जो आपकी मदद करेंगे :

       पहले तो अपने भविष्य को तीन खंडों में बाँट दें : काम-धंधा, घर, और समाज। अपने जीवन को खंडों में बाँट देने से आप दुविधा में नहीं पड़ेंगे, आप आंतरिक संघर्ष की समस्या से बच सकेंगे और आप अपने भविष्य की पूरी तस्वीर देख सकेंगे।

       दूसरी बात, अपने आपसे इन सवालों के स्पष्ट, सुनिश्चित जवाब पूछे। मैं अपने जीवन में क्या हासिल करना चाहता हूँ? मैं क्या बनना चाहता हूँ? और किस चीज़ से मुझे संतुष्टि मिलेगी?

     मदद के लिए नीचे दी हुई प्लानिंग गाइड का प्रयोग करें।

आज से 10 साल बाद की मेरी इमेज : 10 साल की प्लानिंग गाइड

A. काम-धंधे का खंड : आज से 10 साल बाद :

     1. मैं कितनी आमदनी हासिल करना चाहता हूँ?

      2. मैं अपने पास कितनी ज़िम्मेदारी चाहता हूँ?

      3. मैं कितनी सत्ता, कितना अधिकार चाहता हूँ?

      4. अपने काम-धंधे से मैं कितनी प्रतिष्ठा चाहता हूँ?

B. घर का खंड : आज से 10 साल बाद :

      1. मैं अपने परिवार को किस तरह का जीवनस्तर देना चाहता हूँ ?

      2. मैं किस तरह के घर में रहना चाहता हूँ ?

      3. मैं किस तरह से छुट्टियाँ बिताना चाहता हूँ?

      4. अपने बच्चों के शुरुआती वयस्क सालों में मैं उनकी कितनी आर्थिक मदद करना चाहता हूँ?

C. सामाजिक खंड : आज से 10 साल बाद :

     1. मेरे पास किस तरह के दोस्त होने चाहिए?

      2. मैं किन सामाजिक समूहों से जुड़ना चाहता हूँ ?

      3. मैं किन संस्थाओं का लीडर बनना चाहता हूँ?

      4. मैं किन सामाजिक समस्याओं को दूर करने की पहल करना चाहता हूँ?

          कुछ साल पहले मेरे पुत्र ने जोर देकर कहा कि मैं उसके साथ मिलकर उसके कुत्ते के पिल्ले के लिए एक डॉगहाउस बनवाऊँ। मेरा पुत्र पीनट नाम के इस पिल्ले से बहुत प्रेम करता था और उसे इस पर नाज़ था। पुत्र का उत्साह देखकर मैं उसके लगातार आग्रह को ठुकरा नहीं
पाया। और इस तरह हम दोनों पीनट का घर बनाने में जुट गए। कारपेन्टरी की हम दोनों की समझ कुल मिलाकर ज़ीरो थी और जो घर बना, वह इस बात का सबूत था।

          कुछ समय बाद मेरा एक अच्छा दोस्त आया और हमारे उस डॉगहाउस को देखने के बाद उसने पूछा, “तुम लोगों ने पेड़ पर यह क्या लटका रखा है? कहीं, यह डॉगहाउस तो नहीं है?" मैंने हाँ में जवाब दिया। फिर उसने हमारी कुछ ग़लतियों की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित किया और अपनी पूरी बात को सारांश में इस तरह कहा, “तुम लोगों ने कोई योजना नहीं बनाई। आजकल कोई बिना ब्लूप्रिंट के डॉगहाउस नहीं बनाता।"

        और कृपया, जब भी आप अपने भविष्य की कल्पना करें, तो बड़ी कल्पना करने से न घबराएँ। आजकल लोगों को उनके सपनों के आकार के हिसाब से तौला जाता है। कोई भी व्यक्ति जितना हासिल करना चाहता है, उससे ज़्यादा हासिल नहीं कर पाता। इसलिए हमेशा अपने भविष्य के सपनों को बड़ा रखें।

        नीचे एक व्यक्ति के जीवन की योजना शब्दशः बताई गई है। इसे पढ़ें। किस तरह उसने अपने भावी "घर" का लक्ष्य बनाया है, यह देखें। जब उसने यह लिखा होगा, तब निश्चित रूप से वह अपने भविष्य के घर को देख रहा होगा।

        “मेरे घर का लक्ष्य गाँव में होगा। घर ‘सदर्न मैनॅर' स्टाइल का होगा, दोमंज़िला, सफ़ेद कॉलम इत्यादि। चारों तरफ़ फ्रेंसिंग होगी और शायद वहाँ पर फ़िशपॉन्ड भी होगा क्योंकि मेरी पत्नी और मुझे मछली पकड़ने का शौक़ है। हम अपने डॉबरमॅन के लिए जो घर बनाएँगे, वह घर के पिछवाड़े बनाएँगे। मैं हमेशा से चाहता हूँ कि मेरे घर में एक लंबा-सा ड्राइववे हो जिसके दोनों तरफ़ पेड़ लगे हों।

         “परंतु मैं जानता हूँ कि मकान और घर में अंतर होता है। ज़रूरी नहीं है कि हर मकान घर भी हो। मैं अपने मकान को घर बनाने की पूरी कोशिश करूँगा, यह ध्यान रखूगा कि यह खाने और सोने की जगह से ज़्यादा कुछ बने। हम अपनी योजना बनाते समय ईश्वर को भी नहीं भूले हैं। हम चर्च की गतिविधियों में एक निश्चित राशि दान में देंगे।

          “आज से दस साल बाद मैं अपने परिवार को दुनिया की सैर पर ले जाना चाहूँगा। इसके पहले कि हमारा परिवार शादी-ब्याह के कारण तितर-बितर हो जाए, मैं ऐसा करना चाहता हूँ। अगर हमारे पास एक साथ पूरी दुनिया की सैर पर जाने का समय नहीं होगा तो हम इसे चार-पाँच अलग-अलग छुट्टियों में बाँट लेंगे और हर साल दुनिया के एक हिस्से की यात्रा करेंगे। स्वाभाविक रूप से मेरे “घर के खंड" की ये सारी योजनाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मेरे “काम-धंधे के खंड"। में मझे कैसी सफलता मिलती है, इसलिए अगर मैं यह सब हासिल करना चाहता हूँ तो मुझे सफल होना ही पड़ेगा।"

       यह योजना पाँच साल पहले लिखी गई थी। तब उस व्यक्ति के पास दो छोटे स्टोर्स थे। आज वह पाँच स्टोर्स का मालिक है। और उसने देहात में 17 एकड़ ज़मीन भी ख़रीद ली है, जहाँ वह अपना घर बनाने जा रहा है। वह अपने लक्ष्य की तरफ़ लगातार बढ़ रहा है।

       आपके जीवन के तीनों खंड आपस में जुड़े हुए हैं। हर एक की सफलता किसी न किसी हद तक दूसरे पर निर्भर करती है। परंतु जो खंड बाक़ी सभी खंडों पर सबसे ज़्यादा प्रभाव डालता है, वह है आपका काम-धंधे वाला खंड। हज़ारों साल पहले जिस गुफामानव का घरेलू जीवन सबसे सुखद होता था और जिसे सर्वाधिक सामाजिक सम्मान मिलता था, वह शिकारी के रूप में सबसे सफल हुआ करता था। सामान्य तौर पर, यही बात आज भी सही है। हम अपने परिवारों को जो जीवनस्तर देते हैं और हमें जो सामाजिक सम्मान मिलता है वह काफ़ी हद तक काम-धंधे के खंड में हमारी सफलता के कारण मिलता है।

           कुछ समय पहले 'मैकिन्सी फ़ाउंडेशन फ़ॉर मैनेजमेंट रिसर्च' ने व्यापक सर्वेक्षण करवाया, ताकि यह जाना जा सके कि एक्जीक्यूटिव बनने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी गुण कौन सा है। बिज़नेस, सरकार, विज्ञान और धर्म के लीडर्स से सवाल पूछे गए। हर बार, अलग-अलग तरीकों से इन शोधकर्ताओं को एक ही जवाब मिला : एक्जीक्यूटिव की सबसे महत्वपूर्ण योग्यता उसकी आगे बढ़ने की प्रबल इच्छा होती है।

        जॉन वानामेकर की सलाह याद रखें, “कोई व्यक्ति जब तक अपने काम में अपने आपको झोंक नहीं देता, तब तक वह महान काम नहीं कर पाता।"

         अगर इसका सही दोहन किया जाए, तो प्रबल इच्छा में अनंत शक्ति है। इच्छा का अनुसरण करने की असफलता, वह न करना जो आप करना चाहते हैं, औसत दर्जे की ज़िंदगी या असफलता का रास्ता है।

       मुझे एक कॉलेज के अख़बार के बेहद प्रतिभाशाली युवा लेखक के साथ हुई चर्चा याद आती है। इस युवक में प्रतिभा थी। अगर किसी व्यक्ति में पत्रकारिता के करियर में सफल होने का माद्दा था, तो वह यही व्यक्ति था। उसके ग्रैजुएशन के कुछ समय पहले मैंने उससे पूछा, “डैन, तम अब क्या करोगे, पत्रकारिता के करियर में जाओगे?" डैन ने मेरी तरफ देखा और कहा, “अरे, नहीं। मुझे लिखना और रिपोर्टिंग करना बहुत पसंद है और मुझे कॉलेज के अख़बार में काम करने में बहुत मज़ा भी आता है। परंतु पत्रकारों की कमाई थोड़ी सी होती है और मैं भूखे नहीं मरना चाहता।"

        इसके बाद मैं पाँच साल तक डैन से नहीं मिला। फिर एक शाम को वह मुझे न्यू ऑर्लियन्स में मिला। डैन किसी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में असिस्टेंट पर्सनेल डायरेक्टर के रूप में काम कर रहा था। और उसने मझे जल्दी ही बता दिया कि वह अपने काम से संतुष्ट नहीं है, “मेरी तनख्वाह तो अच्छी है। मेरी कंपनी भी अच्छी है और जहाँ तक जॉब सिक्युरिटी का सवाल है वह मेरे पास है। परंतु इस काम में मेरा दिल नहीं लगता। अब मैं सोचता हूँ कि काश कॉलेज के बाद मैंने किसी प्रकाशक के यहाँ या किसी अख़बार में काम किया होता।"

         डैन के रवैए से बोरियत और अरुचि साफ़ झलक रही थी। वह हर चीज़ में बुराई देख रहा था। जब तक वह अपनी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता में नहीं जाएगा, उसे उसकी मनचाही सफलता हासिल नहीं हो पाएगी। सफलता में पूरे मन से प्रयास की ज़रूरत होती है और आप किसी काम में पूरा मन तभी लगा सकते हैं जब आप उसे पसंद करते हों।

    
          अगर डैन ने अपना मनपसंद काम किया होता, तो वह आज अख़बार की दुनिया में काफ़ी ऊपर होता। और लंबे समय में उसे आज से ज़्यादा पैसा और मानसिक संतोष मिल रहा होता।

अपने नापसंदगी के काम को छोड़कर अपना मनपसंद काम करना वैसा ही है जैसे 10 साल पुरानी कार में 500 हॉर्सपॉवर की मोटर लगा दी जाए।

         हम सभी में इच्छाएँ होती हैं। हम सभी सपने देखते हैं कि हम सचमुच क्या करना चाहते हैं। परंतु हममें से बहुत कम लोग ही वास्तव में अपनी इच्छाओं का कहना मानते हैं। इसके बजाय, हम अपनी इच्छाओं का गला घोंट देते हैं। सफलता की हत्या करने के लिए हम पाँच तरह के हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। इन हथियारों को नष्ट कर दें, क्योंकि ये हथियार खतरनाक हैं।

       1. खुद को नाक़ाबिल समझना। आपने दर्जनों लोगों को यह कहते सुना होगा, “मैं डॉक्टर (या एक्जीक्यूटिव या कमर्शियल आर्टिस्ट या बिज़नेसमैन) बनना चाहता हूँ, परंतु मैं ऐसा नहीं कर सकता।” “मुझमें इतनी प्रतिभा नहीं है।” “अगर मैंने कोशिश की तो मैं सफल नहीं हो
पाऊँगा।" "मेरे पास शिक्षा और/या अनुभव की कमी है।” कई युवक-युवतियाँ अयोग्यता की छुरी से अपनी इच्छा को मार डालते हैं।

       2. सुरक्षा की बीमारी। जो लोग कहते हैं, “मैं जहाँ हूँ वहीं सुरक्षित हूँ", वे अपने सपनों की हत्या करने में सुरक्षा के हथियार का इस्तेमाल करते हैं।

      3. प्रतियोगिता। “इस क्षेत्र में पहले से ही बहुत सारे लोग हैं," “यहाँ तो लोग एक के ऊपर एक खड़े हुए हैं," जैसे विचार भी इच्छा को तत्काल मार डालते हैं।

      4. माता-पिता के आदेश। मैंने सैकड़ों बच्चों को अपना करियर चुनते समय यह कहते सुना है, “मेरा मन तो दूसरा करियर चुनने का था, परंतु मेरे माता-पिता ने मुझसे यह करियर चुनने के लिए कहा, इसलिए मैंने इसे ही चुन लिया।" ज़्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को जान-बूझकर यह आदेश नहीं देते कि उन्हें क्या करना चाहिए। हर बुद्धिमान माता-पिता अपने बच्चों को ज़िंदगी में सफल देखना चाहते हैं। अगर बच्चा शांति से यह समझाए कि वह दूसरा करियर क्यों चुनना चाहता है, तो माता-पिता उसकी बात सुनेंगे और कोई तनाव पैदा नहीं होगा। क्योंकि बच्चे के करियर के बारे में माता-पिता और बच्चे दोनों का लक्ष्य एक ही है: सफलता।

         5. पारिवारिक ज़िम्मेदारी। “अगर मैंने पाँच साल पहले नौकरी बदली होती, तो अच्छा रहता परंतु अब मेरे पास परिवार है और इसलिए मैं अब कुछ नहीं कर सकता।" यह नज़रिया भी आपकी इच्छाओं की हत्या करने का हथियार है।

        इन हत्या के हथियारों को फेंक दें। याद रखें, पूरी शक्ति हासिल करने का इकलौता तरीक़ा, पूरी ताक़त से लक्ष्य की तरफ़ बढ़े चलने का एकमात्र उपाय यही है कि आप जो करना चाहते हैं, वही करें। इच्छा के सामने समर्पण कर दें और बदले में आपको ऊर्जा, उत्साह, मानसिक स्फूर्ति और बेहतर सेहत भी मिलेगी।

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Monday, October 7, 2019

CHAPTER 11.3 हार को जीत में कैसे बदलें?

      परंतु ऑरविल हबार्ड ने अपनी पराजयों का अध्ययन किया। उन्होंने इसे अपनी राजनीतिक शिक्षा का हिस्सा माना। और आज वे स्थानीय सरकार के सबसे मॅझे हुए, सबसे अपराजेय राजनेताओं में से एक हैं।

     क़िस्मत को दोष देने के बजाय, अपनी असफलताओं का विश्लेषण करें। अगर आप हार जाते हैं, तो सीखें। ज्यादातर लोग जिंदगी में अपनी असफलताओं का विश्लेषण करते समय “बदकिस्मती", "दर्भाग्य" "क़िस्मत' या "तक़दीर" को दोष देते हैं। यह लोग बच्चों की तरह अपरिपक्व होते हैं और सहानुभूति की तलाश करते हैं। और चूँकि उन्हें अपनी ग़लती का एहसास ही नहीं होता, इसलिए वे ज़्यादा बड़े, ज्यादा मज़बूत और ज़्यादा आत्म-निर्भर होने के अवसर देखने में असफल रहते हैं।

          किस्मत को दोष देना बंद कर दें। क़िस्मत को दोष देने से कोई व्यक्ति वहाँ नहीं पहुंचा जहाँ वह पहुँचना चाहता था।

         मेरा एक दोस्त साहित्यिक सलाहकार, लेखक और आलोचक है। उसने मुझसे हाल ही में एक सफल लेखक के गुणों के बारे में चर्चा की।

         “बहुत से भावी लेखक," उसने बताया, "लिखने के बारे में गंभीर नहीं रहते। वे कुछ समय तक कोशिश करते हैं, परंतु जब उन्हें पता चलता है कि इसमें मेहनत करनी पड़ती है, असली काम करना पड़ता है, तो वे लिखना छोड़ देते हैं। मैं इन लोगों को नहीं झेल पाता क्योंकि ये लोग किसी शॉर्टकट की तलाश में रहते हैं, जबकि ऐसा कोई शॉर्टकट होता ही नहीं है।

         "परंतु,” उसने आगे कहा, "मैं यह नहीं कहना चाहता कि केवल लगन ही पर्याप्त होती है। वास्तव में केवल लगन काफ़ी नहीं होती।'

         “अभी हाल में एक ऐसे व्यक्ति से मिला जिसने 62 कहानियाँ लिखी हैं, परंतु उनमें से एक भी नहीं छपी। स्पष्ट रूप से, वह लेखक बनने के अपने लक्ष्य के प्रति लगनशील है। परंतु इस व्यक्ति के साथ समस्या यह है कि वह हर कहानी एक ही तरह से लिखता है। उसने अपनी कहानियों के लिए एक फ़ॉर्मूला बना लिया है। वह अपनी सामग्री के साथ कोई प्रयोग नहीं करता- उसके प्लॉट और पात्र, यहाँ तक कि उसकी शैली भी नहीं बदलती। मैं अब इस लेखक को यह सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ कि वह नई शैलियों और नई तकनीकों को सीखे। उसमें प्रतिभा है और अगर वह कुछ प्रयोगशीलता सीख ले, तो मुझे विश्वास है कि लेखक के रूप में वह सफल हो सकता है। परंतु जब तक वह ऐसा नहीं करता, तब तक उसे एक के बाद एक रिजेक्शन स्लिप मिलती रहेगी।"

        के साहित्यिक सलाहकार की सलाह अच्छी थी। हममें लगन होना चाहिए, परंतु लगन सफलता के तत्वों में से सिर्फ एक तत्व है। हम कोशिश कर सकते हैं. बार-बार लगातार कोशिश कर सकते हैं और इसके बावजूद हम असफल हो सकते हैं जब तक कि हममें लगन और
प्रयोगशीलता का तालमेल न हो।

         एडीसन के बारे में कहा जाता है कि वे अमेरिका के सर्वाधिक लगनशील वैज्ञानिकों में से एक थे। यह बताया गया है कि बिजली के बल्ब की खोज से पहले उन्होंने हज़ारों प्रयोग किए। परंतु यह ध्यान दें : एडीसन में लगन के साथ ही प्रयोगशीलता भी थी। वे बिजली के बल्ब को विकसित करने के अपने लक्ष्य में जुटे रहे। परंतु उन्होंने लगन के साथ प्रयोगशीलता को भी मिला दिया।

         एक ही दिशा में लगन से जुटे रहना सफलता की गारंटी नहीं है। परंतु लगन और प्रयोगशीलता के समन्वय से सफलता की गारंटी मिल जाती है।

         मैंने हाल ही में तेल खोजने की प्रक्रिया के बारे में एक लेख पढ़ा। इसमें लिखा गया था कि तेल का कुँआ खोदने से पहले तेल कंपनियाँ चट्टानों का सर्वे करती हैं। परंतु उनके वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद भी आठ में से सात कुँए सूखे निकलते हैं। तेल कंपनियाँ अपनी तेल की खोज में तो लगनशील रहती हैं, परंतु वे एक ही कुँए को मूर्खतापूर्ण गहराई तक खोदने में नहीं जुटी रहतीं। इसके बजाय जब कॉमन सेन्स से वे यह जान लेती हैं कि पुराने कुँए से तेल नहीं निकलेगा, तो वे एक नए कुँए को खोदने का प्रयोग करने लगती हैं।

         कई महत्वाकांक्षी लोग जीवन में प्रशंसनीय लगनशीलता और महत्वाकांक्षा के साथ जिंदगी भर जुटे रहते हैं, परंतु वे कभी इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि उनमें प्रयोगशीलता नहीं होती, वे नई शैलियों का प्रयोग नहीं कर पाते। अपने लक्ष्य को बनाए रखें। इसे एक इंच भी इधर-उधर न हिलाएँ। परंतु अपने सिर को किसी दीवार से भी न फोड़ें। अगर आपको परिणाम नहीं मिलते हैं, तो किसी दूसरे तरीके का इस्तेमाल करें।


        जिन लोगों में बुलडॉग जैसी लगनशीलता होती है, जो एक बार किसी चीज़ को पकड़ लेने पर उसे नहीं छोड़ते हैं, उनमें सफलता का एक मूलभूत तत्व होता है। यहाँ दो सुझाव दिए जा रहे हैं जिनसे आप प्रयोगशीलता सीख सकते हैं, और लगनशीलता के साथ इसके समन्वय के बाद आप आसानी से सफल हो सकते हैं।


        1. खुद को बताएँ, “कोई तरीका है।" विचारों में चुंबकीय शक्ति होती है। जैसे ही आप खुद को बताते हैं, "मैं हार गया हूँ। मैं इस समस्या से नहीं जीत सकता," आप नकारात्मक विचारों को आकर्षित करते हैं, और इनमें से प्रत्येक विचार आपको यह विश्वास दिलाता है कि आप सही हैं, कि आप वास्तव में हार चुके हैं।

        इसके बजाय यह विश्वास करें, “इस समस्या को सुलझाने का कोई तो रास्ता होगा।" और तत्काल आपके दिमाग में सकारात्मक विचार आने लगेंगे, जिससे आपको समस्या सुलझाने में मदद मिलेगी।

       "कोई न कोई तरीक़ा तो है" यह सोचना, यह विश्वास करना सचमुच महत्वपूर्ण है।

        विवाह परामर्शदाता भी विवाह को नहीं बचा सकते जब तक कि एक या दोनों जीवनसाथी यह न सोचें कि एक बार फिर साथ रहना संभव है। मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि कोई शराबी तब तक शराबी ही बना रहेगा जब तक कि उसे यह यक़ीन न हो जाए कि वह शराब की आदत को छोड़ सकता है।

       इस साल हज़ारों नई कंपनियाँ बनेंगी। पाँच साल बाद इनमें से बहुत कम कंपनियाँ ही बची रह पाएँगी। असफल होने वाली ज़्यादातर कंपनियाँ यही कहेंगी, “प्रतियोगिता बहुत ज़्यादा थी। हमारे पास छोड़ देने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं था।" असली समस्या यह है कि जब ज्यादातर लोगों के सामने मुश्किलें या बाधाएँ आती हैं, तो वे केवल पराजय के बारे में ही सोचते हैं और इसी कारण वे हार जाते हैं।


         जब आप मानते हैं कि कोई न कोई तरीक़ा तो होगा, तो आप अपने आप नकारात्मक ऊर्जा (चलिए, हम छोड़ देते हैं, हम हार मान लेते हैं) को सकारात्मक ऊर्जा (हमें आगे बढ़ना चाहिए, हमें जुटे रहना चाहिए) में बदल लेते हैं।

        कोई भी समस्या या मुश्किल तभी तक पहाड़ जैसी लगेगी, जब आप इसे पहाड़ जैसा समझेंगे। अगर आप मानते हैं कि यह नहीं सुलझ सकती, तो यह सचमुच नहीं सुलझेगी। यह विश्वास रखें कि यह सुलझ सकती है और इसके बाद आपके मन में इसके समाधान अपने आप आने लगेंगे। यह असंभव है, ऐसा कभी न तो सोचें, न ही कहें।

       2. पीछे हटें, और फिर से शुरू करें। अक्सर हम इतने लंबे समय तक किसी समस्या के इतने क़रीब रहते हैं कि हम नए समाधान या नई शैलियों को नहीं देख पाते।

         मेरे एक इंजीनियर दोस्त को एक नई एल्युमीनियम इमारत की डिज़ाइन बनाने का काम मिला। इस तरह की कोई चीज़ या इससे मिलती-जुलती कोई चीज़ या उसकी डिज़ाइन अब तक किसी ने नहीं बनाई थी। मैं इस दोस्त से कुछ दिन पहले मिला और मैंने उससे पूछा कि उसकी नई बिल्डिंग का क्या हाल है।

        "बहुत अच्छा नहीं," उसने जवाब दिया। "मुझे लगता है कि मैंने इन गर्मियों में अपने बगीचे में पर्याप्त समय नहीं दिया है। जब मैं लंबे समय तक डिज़ाइनिंग की कठिन समस्याओं में उलझा रहता हूँ, तो मुझे इससे बाहर निकलने की ज़रूरत होती है, क्योंकि बाहर निकलने के बाद ही मेरे मन में नए विचार आते हैं।"

         "आपको यह जानकर आश्चर्य होगा," उसने आगे कहा, "कई इंजीनियरिंग के विचार तो मेरे मन में तब आते हैं जब मैं पेड़ के करीब बैठकर घास पर पानी डाल रहा होता हूँ।"

        राष्ट्रपति आइज़नहॉवर से एक बार किसी पत्रकार वार्ता में पूछा गया कि वे इतनी छुट्टियाँ क्यों मनाते हैं। उनका जवाब उन लोगों के बहुत काम का है जो अपनी रचनात्मक योग्यता बढ़ाना चाहते हैं। आइज़नहॉवर ने कहा, "मैं नहीं मानता कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह जनरल मोटर चला रहा हो या देश, अपनी मेज़ पर बैठकर या ढेर सारे कागज़ों के बीच मुँह छिपाकर अपने काम को अच्छी तरह से कर सकता है। वास्तव में प्रेसिडेंट को अपना दिमाग़ फ़ालतू की चीज़ों से मुक्त रखना चाहिए। उसे मूलभूत सिद्धांतों और मुख्य मुद्दों पर अपना खुद का चिंतन करते रहना चाहिए... ताकि वह स्पष्ट सोच सके और बेहतर निर्णय ले सके।"

           मेरा एक भूतपूर्व बिज़नेस सहयोगी अपनी पत्नी के साथ हर महीने 72 घंटे की छुट्टियाँ मनाने शहर से बाहर जाता है। उसका मानना है कि इस तरह पीछे हटने और नए सिरे से शुरू करने से उसकी मानसिक क्षमता बढ़ जाती है और वह अपने ग्राहकों को अधिक लाभ पहुंचा पाता है। 

          जब आपकी राह में बाधा आए, तो पूरे प्रोजेक्ट को कूड़ेदान में न डाल दें। इसके बजाय, पीछे हटें, मानसिक रूप से खुद को तरोताज़ा कर लें। संगीत सुनें या टहलें या झपकी ले लें। इसके बाद जब आप उस समस्या का सामना करेंगे तो आपके कुछ सोचने से पहले ही आपके सामने इसका समाधान अपने आप आ जाएगा।

        बड़ी परिस्थितियों में भी अच्छे पहलू को देखना लाभदायक होता है। एक युवक ने मुझे बताया कि जब उसकी नौकरी छूटी तो उसने अच्छे पहलू को देखने पर ध्यान केंद्रित किया। उसने बताया, “मैं एक बड़ी क्रेडिट रिपोर्टिंग कंपनी के लिए काम कर रहा था। एक दिन मुझे नौकरी से हटाए जाने का नोटिस थमा दिया गया। मंदी का दौर चल रहा था और कंपनी उन कर्मचारियों को हटा रही थी, जो उसके लिए 'कम महत्वपूर्ण' थे।

          "नौकरी में मुझे तनख्वाह तो बहुत ज्यादा नहीं मिलती थी, परंतु फिर भी मेरे हिसाब से यह अच्छी थी। मुझे कई घंटे तक तो बहुत बुरा लगता रहा, परंतु फिर मैंने यह फैसला किया कि मैं इस बारे में सकारात्मक तरीके से सोचूंगा। दरअसल मुझे यह नौकरी ख़ास पसंद नहीं थी और अगर मैं यहीं बना रहता, तो मैं ज़्यादा तरक्क़ी नहीं कर सकता था। अब मैं कोई ऐसी नौकरी ढूँढ़ सकता जो मुझे पसंद हो। जल्दी ही मुझे मेरी मनचाही नौकरी मिल गई, और अच्छी बात तो यह थी कि यहाँ मेरी तनख्वाह भी ज्यादा थी। क्रेडिट कंपनी से निकाला जाना मेरे लिए बहुत अच्छा साबित हुआ।"

       याद रखें, आप किसी भी परिस्थिति में वही देखते हैं, जो आप देखना चाहते हैं। अच्छे पहलू को देखें और हार को जीत में बदल लें। अगर आप स्पष्ट दृष्टि विकसित कर लेते हैं, तो सारी चीजें आपके लिए अच्छा काम करेंगी।

                      संक्षेप में

सफलता और असफलता में फ़र्क इस बात का होता है कि असफलता, बाधा, निराशाजनक स्थितियों और हतोत्साहित करने वाली बातों के प्रतिआपका रवैया क्या है।

        हार को जीत में बदलने के लिए यह पाँच सिद्धांत काम में लाएँ:

1. असफलता का अध्ययन करें, ताकि आप सफलता की राह पर आगे बढ़ सकें। जब आप हारें, तो उस हार से सबक सीखें और फिर अगली बार जीतने की तैयारी करें।

2. अपने खुद के रचनात्मक आलोचक बनने का साहस रखें। अपनी गलतियाँ और कमज़ोरियाँ खोजें और फिर उन्हें सुधारें। इससे आप प्रोफ़ेशनल बन जाएँगे।

3. क़िस्मत को दोष देना बंद कर दें। हर असफलता का विश्लेषण करें। यह पता लगाएँ कि गलती कहाँ हुई थी। याद रखें, तक़दीर को दोष देने से कोई व्यक्ति वहाँ नहीं पहुंचा, जहाँ वह पहुँचना चाहता था।

4. लगनशीलता के साथ प्रयोगशीलता का समन्वय कर लें। अपने लक्ष्य को बनाए रखें, परंतु पत्थर की दीवार से अपना सिर न टकराते रहें। नई शैलियों का प्रयोग करें। प्रयोगशील बनें।

5. याद रखें, हर स्थिति का एक अच्छा पहलू होता है। इसे खोजें, अच्छे पहलू को देखें और आप एक बार फिर उत्साह से भर जाएँगे।

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Saturday, October 5, 2019

CHAPTER 11.2 हर को जीत में कैसे बदले?

        फिर मैंने अपने विद्यार्थी से कहा, “तुम्हारी ज्यादातर बातें सही हैं। ऐसे कई बेहद सफल लोग हैं जिनके पास कॉलेज की कोई डिग्री नहीं है,या जिन्होंने इस डिग्री का नाम तक नहीं सुना है। और यह तुम्हारे लिए भी संभव है कि तुम बिना डिग्री के जीवन में सफल हो जाओ। पूरे जीवन के हिसाब से देखा जाए, तो तुम्हारे फेल होने का तुम्हारे जीवन की सफलता या असफलता से कोई सीधा संबंध नहीं है। परंतु फेल होने के प्रति तुम्हारे रवैए से बहुत फ़र्क पड़ सकता है।"

“वह कैसे?" उसने पूछा।

        मैंने जवाब दिया, "बाहर की दुनिया में भी लोग आपको उसी तरह नंबर देते हैं, जैसे हम लोग देते हैं। वहाँ भी इसी बात का महत्व होता है। कि आप अपने काम को कितनी अच्छी तरह करते हैं। बाहर की दुनिया में भी कोई आपको घटिया काम करने के लिए प्रमोशन नहीं देगा, न ही आपकी तनख्वाह बढ़ाएगा।"

        मैं एक बार फिर रुका ताकि उसे पूरी बात समझ में आ जाए।

      फिर मैंने कहा, "क्या मैं तुम्हें एक सुझाव दूं? अभी तुम बहुत निराश हो। मैं समझ सकता हूँ कि तुम्हें कैसा लग रहा होगा। और अगर इस बात पर तुम उत्तेजित हुए हो, तो मैंने उसका बिलकुल भी बुरा नहीं माना है। मैं चाहता हूँ तुम इस अनुभव को सकारात्मक तरीके से लो। यह तुम्हें एक बहुत महत्वपूर्ण सबक़ सिखा सकता है : अगर आप अच्छा काम नहीं करेंगे, तो आप वहाँ नहीं पहुँच पाएँगे, जहाँ आप पहुँचना चाहते हैं। इस सबक़ को सीख लो और आज से पाँच साल बाद जाकर तुम्हें यह एहसास होगा कि यह तुम्हारे द्वारा सीखी गई जीवन की सबसे बहुमूल्य शिक्षाओं में से एक है।"

      मैं यह जानकर खुश हुआ कि कुछ ही दिनों बाद उस विद्यार्थी ने एक बार फिर कॉलेज में एडमीशन ले लिया। इस बार वह बहुत ही अच्छे नंबरों से पास हुआ। इसके बाद, वह ख़ास तौर पर मुझसे मिलने आया और उसने मुझे बताया कि हमारी पहले वाली मुलाक़ात ने उस पर गहरा असर डाला था और उसने उस चर्चा से बहुत कुछ सीखा था।

“आपके कोर्स में फेल हो जाने से मैंने बहुत कुछ सीखा,” उसने कहा।“यह अजीब लगेगा, प्रोफ़ेसर, परंतु अब मैं खुश हूँ कि मैं पहली बार में पास नहीं हुआ।"

       हम हार को जीत में बदल सकते हैं। सबक सीखो, उसे अपने जीवन में उतारो, पराजय की तरफ़ पीछे मुड़कर देखो और मुस्कराओ।

       फ़िल्मों के शौकीन लोग महान अभिनेता बैरीमोर को कभी नहीं भूल पाएँगे। 1936 में बैरीमोर के नितंब में फ्रैक्चर हो गया। यह फ्रैक्चर कभी ठीक नहीं हो पाया। कई लोगों को लगा कि मिस्टर बैरीमोर की ज़िंदगी ख़त्म हो गई। परंतु नहीं, मिस्टर बैरीमोर को ऐसा नहीं लगा। उन्होंने इस बाधा को दूर करके अपने अभिनय की सफलता से भी बड़ी सफलता का रास्ता बना लिया। अगले 18 सालों तक दर्द के बावजूद उन्होंने व्हील चेयर पर बैठे-बैठे दर्जनों सफल भूमिकाओं में अभिनय किया।

       15 मार्च, 1945 को डब्ल्यू. कॉल्विन विलियम्स फ़्रांस में एक टैंक के पीछे चल रहे थे। टैंक एक बारूदी सुरंग से टकराया, उसमें विस्फोट हुआ और इससे मिस्टर विलियम्स हमेशा के लिए अंधे हो गए।

       परंतु यह दुर्घटना मिस्टर विलियम्स को पादरी और सलाहकार बनने के अपने लक्ष्य का पीछा करने से नहीं रोक पाई। जब उन्होंने कॉलेज से ग्रैजुएशन कर लिया (और वह भी ऑनर्स के साथ), तो विलियम्स ने कहा कि उनके विचार से उनका अंधापन “उनके चुने गए करियर में एक वरदान साबित होगा। मैं कभी बाहरी चीज़ों को देखकर निर्णय नहीं लँगा। इसलिए मैं हमेशा व्यक्ति को दूसरा मौक़ा दूंगा। मेरे अंधेपन से मुझे यह लाभ भी होगा कि कोई व्यक्ति कैसा भी दिखे, मैं सबके साथ एक जैसा व्यवहार करूँगा। में इस तरह का इंसान बनना चाहता हूँ जिसके पास कोई भी आ सके और बेझिझक आकर अपने दिल की बात कह सके।" 

       क्या यह एक शानदार उदाहरण नहीं है कि किस तरह एक कर, कटु हार को जीत में बदला जा सकता है?

       हार केवल एक मानसिक स्थिति है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

       मेरा एक दोस्त स्टॉक मार्केट में सफल और प्रसिद्ध निवेशक है। वह अपने निवेश के हर निर्णय को अपने अतीत के अनुभवों के आधार पर लेता है। एक बार उसने मुझे बताया, “जब मैंने 15 साल पहले निवेश करना शुरू किया तो मेरे हाथ कई बार जले। ज़्यादातर शुरुआती लोगों
की तरह, मैं भी फटाफट अमीर बनना चाहता था। परंतु इसके बजाय मैं जल्दी ही दीवालिया हो गया। परंतु इसके बावजूद मैंने हार नहीं मानी। मुझे अर्थव्यवस्था की मूलभूत शक्ति का ज्ञान था ओर मैं यह जानता था कि लंबे समय में अच्छी तरह चुने गए शेयरों में निवेश करना समझदारीपूर्ण होता है।

          "तो मैंने अपने शुरुआती बुरे निवेशों को अपनी शिक्षा की कीमत मान लिया।" वह हँसते हुए कहता है।

       दूसरी तरफ़, मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो एक-दो मूर्खतापूर्ण निवेश करने के बाद 'शेयर-विरोधी' बन जाते हैं। अपनी गलतियों का विश्लेषण करने के बजाय और एक अच्छी संस्था से जुड़ने के बजाय, वे इस ग़लत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शेयर मार्केट में पैसे लगाने का मतलब है जुआ खेलना, एक ऐसा जुआ, जिसमें देर-सबेर हर व्यक्ति हारता है।

        हर असफलता से कुछ न कुछ बचाने का फैसला करें। अगली बार जब नौकरी या घर में कोई गड़बड़ हो, तो शांत हो जाएँ और यह पता लगाएँ कि गड़बड़ कहाँ शुरू हुई थी। इससे आप उसी ग़लती को दुबारा करने से बच सकते हैं।

        अगर हम कुछ सीखें, तो असफल होना भी फायदेमंद साबित हो सकता है।

        हम इंसान भी अजीब होते हैं। अपनी सफलताओं का श्रेय तो हम पूरा लेना चाहते हैं। जब हम जीतते हैं, तो हम पूरी दुनिया को इस बारे में बताना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है कि हम लोगों के मुँह से यह सुनना चाहें, “यही वह व्यक्ति है जिसने इतना बड़ा काम किया।”

        परंतु अपनी असफलता का श्रेय व्यक्ति तत्काल किसी दूसरे के मत्थे मढ़ देता है। जब सामान नहीं बिकता, तो सेल्समैन ग्राहकों को दोष देते हैं। अफ़सरों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे गलत काम होने पर कर्मचारियों या दूसरे अफ़सरों को दोष दें। घरेलू लड़ाइयों और समस्याओं के लिए पति अपनी पत्नियों को दोष देते हैं और पत्नियाँ अपने पतियों को।

        यह तो सच है कि इस जटिल संसार में दूसरे लोग हमें धक्का मारकर गिरा सकते हैं परंतु यह भी सच है कि ज्यादातर हम खुद ही अपने आपको गिराते हैं। हम अपनी व्यक्तिगत कमियों व ग़लतियों के कारण हारते हैं।

        सफलता के लिए खुद को इस तरह तैयार करें। अपने आपको याद दिलाएँ कि आप आदर्श और पूर्ण मनुष्य बनना चाहते हैं, जितना बनना इंसान के लिए संभव है। अपने आपको एक टेस्ट ट्यूब में रखकर निष्पक्ष दृष्टि से खुद का और अपनी स्थिति का मूल्यांकन करें। यह देखें कि क्या आपमें ऐसी कोई कमज़ोरी है जिसके बारे में आप जानते न हों। अगर आपमें ऐसी कमज़ोरी है, तो उसे सुधारने के लिए कदम उठाएँ। कई लोग खुद को देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे सुधार की संभावना देखने में असफल हो जाते हैं।

          महान मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा स्टार, रिसे स्टीवन्स ने रीडर्स डाइजेस्ट (जुलाई 1955) में कहा कि उसे सबसे अच्छी सलाह अपने जीवन के सबसे दुःखद क्षण में मिली।

        अपने करियर की शुरुआत में, मिस स्टीवन्स मेट्रोपॉलिटन ऑपेरा “ऑडीशन्स ऑफ़ द एयर" में असफल हो गईं। हारने के बाद मिस स्टीवन्स कड़वाहट से भरी हुई थीं। “मैं यह सुनना चाहती थी," उसने कहा, “कि मेरी आवाज़ वास्तव में दूसरी लड़की से सचमुच बेहतर थी, कि निर्णायकों का फ़ैसला ग़लत था, कि मैं इसलिए नहीं जीत पाई, क्योंकि मेरे पास सही जुगाड़ नहीं थीं।"

         परंतु मिस स्टीवन्स की टीचर ने उसे कोई झूठी सांत्वना नहीं दी। इसके बजाय उन्होंने मिस स्टीवन्स से कहा, "देखो बेटा, अपनी गलतियों का सामना करने की हिम्मत जुटाओ।"

         "हालाँकि मैं आत्म-दया के शब्द सुनना चाहती थी," मिस स्टीवन्स ने कहा, “परंतु अपनी टीचर के शब्द बार-बार मेरे कानों में गूंजते रहे। उस रात उन शब्दों ने मुझे जगा दिया। मैं तब तक नहीं सो पाई जब तक कि मैंने अपनी कमियों का सामना नहीं कर लिया। अँधेरे में लेटे-लेटे मैंने खुद से पूछा, 'मैं क्यों असफल हुई ?' 'मैं अगली बार किस तरह जीत सकती हूँ?' और मैंने माना कि मेरी आवाज़ की रेंज सचमुच उतनी अच्छी नहीं है जितनी कि होनी चाहिए, कि मुझे और भाषाएँ सीखनी चाहिए, कि मुझे और ज़्यादा भूमिकाएँ सीखनी चाहिए।"

        मिस स्टीवन्स ने आगे बताया कि किस तरह अपनी कमियों का सामना करने से उसे न सिर्फ स्टेज पर सफलता मिली, बल्कि अपनी ग़लतियों को मानने से उसके ज्यादा दोस्त भी बने और वह ज़्यादा लोकप्रिय भी हुई।

      खुद का अच्छा आलोचक होना अच्छी बात है, बशर्ते कि आलोचना रचनात्मक हो। इससे आपको व्यक्तिगत शक्ति और योग्यता बढ़ाने में मदद मिलती है, जो सफलता के लिए बहुत ज़रूरी है। दूसरों को दोष देना विध्वंसात्मक है। सामने वाले की ग़लती “साबित" करने से आपको कुछ भी हासिल नहीं होता।

      रचनात्मक रूप से खुद की आलोचना करें। अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने में न हिचकिचाएँ। सच्चे प्रोफेशनल बनें। वे अपनी ग़लतियों और कमजोरियों को ढूँढ़ते हैं, फिर उन्हें दूर करते हैं। इसी कारण वे सफल प्रोफेशनल बनते हैं।

       परंतु अपनी ग़लतियाँ सिर्फ इसलिए न ढूँढें ताकि आप खुद के सामने यह बहाना बना सकें, “यह एक और कारण है जिससे मैं असफल होता हूँ।"

        इसके बजाय अपनी ग़लतियों को इस तरह से देखें, “यह एक और तरीका है जिससे मैं जीत सकता हूँ।"

        महान अल्बर्ट हबार्ड ने एक बार कहा था, “असफल व्यक्ति वह होता है जिसने बड़ी ग़लतियाँ की तो हैं, परंतु जो अपने अनुभव से कुछ नहीं सीख पाया।"

      अक्सर हम अपनी असफलता के लिए क़िस्मत को दोष देते हैं। हम कहते हैं, "अरे, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है," और फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं। परंतु ज़रा रुकें और सोचें। गेंद की उछाल की भी कोई न कोई वजह होती है। गेंद बिना कारण के यूँ ही किसी दिशा
में नहीं उछलती। गेंद का उछाल तीन कारणों से निर्धारित होता है : एक तो गेंद, फिर जिस तरीके से इसे फेंका जाता है, और तीसरे जिस सतह से यह टकराती है। निश्चित भौतिक नियम गेंद की उछाल का कारण तय करते हैं, इसका क़िस्मत से कोई लेना-देना नहीं होता।

         मान लें कि सी.ए.ए. एक रिपोर्ट जारी करे और कहे, "हमें खेद है। कि हवाई जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो गया, परंतु हम क्या करें, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है।"

       आप कहेंगे कि अब सी.ए.ए. को बदल देना चाहिए। या अगर कोई डॉक्टर किसी रिश्तेदार से कहे, "मुझे खेद है कि मैं उसे बचा नहीं पाया। मैं नहीं जानता कि ऐसा कैसे हुआ। यह तो किस्मत की बात थी।"

       जब आप या आपका कोई दूसरा रिश्तेदार बीमार होगा, तो आप उस डॉक्टर के पास नहीं जाएंगे।

        गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है' वाली शैली हमें कुछ नहीं सिखाती। जब हम अगली बार उसी तरह की परिस्थिति का सामना करते हैं। तो हम वही ग़लती करने से सिर्फ इसलिए नहीं बच पाते, क्योंकि हमने अपनी पिछली ग़लती से सबक़ नहीं सीखा था। वह फुटबॉल कोच जो शनिवार का मैच हार जाने के बाद अपनी टीम से कहता है, “चिंता मत करो, गेंद तो इसी तरह से टप्पे खाती है" अपनी टीम की ग़लतियाँ ढूँढ़ने में मदद नहीं कर रहा है, जिससे अगले शनिवार को होने वाले मैच में उन ग़लतियों को सुधारा जा सके।

       डियरबॉर्न, मिशीगन के मेयर ऑरविल हबार्ड 17 सालों से लगातार मेयर हैं और देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नगरीय प्रशासकों में से एक हैं।

        डियरबॉर्न के मेयर बनने के दस साल पहले मिस्टर हबार्ड भी "बदकिस्मती” का बहाना बना सकते थे और राजनीति छोड़ सकते थे।

लगातार विजेता बनने के पहले, ऑरविल हबार्ड तीन बार "बदकिस्मत" रहे थे क्योंकि उन्हें मेयर पद के लिए नामांकित ही नहीं किया गया था। तीन बार उन्होंने स्टेट सीनेटर के लिए नामांकन हासिल करने की कोशिश की थी, परंतु वे असफल हुए। एक बार तो वे काँग्रेस के लिए नामांकन की दौड़ से ही बाहर हो गए थे।

परंतु ऑरविल हबार्ड ने अपनी पराजयों का अध्ययन किया। उन्होंने

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CHAPTER 11.1 हार को जीत में कैसे बदलें?

              हार को जीत में कैसे बदलें?


        सामाजिक कार्यकर्ता और दूसरे लोग जो गरीब इलाक़ों या झुग्गी- ला बस्तियों में काम करते हैं, उनका कहना है कि इन दयनीय लोगोंकी  उम्र, धार्मिक आस्था, शिक्षा और पृष्ठभूमियाँ अलग-अलग होती हैं। इनमें से कई नागरिक आश्चर्यजनक रूप से युवा होते हैं। कई बूढ़े होते हैं। कुछ कॉलेज ग्रैजुएट होते हैं, कुछ बिलकुल अशिक्षित होते हैं। कई शादी-शुदा होते हैं, कई कुंवारे होते हैं। परंतु गरीबी के दलदल में रहने वाले सभी असफल लोगों में एक बात समान होती है : हर व्यक्ति हारा हुआ है, पिटा हुआ है, चोट खाया हुआ है। हर एक ने जीवन में ऐसी
समस्याओं को झेला है जिनके आगे वह घुटने टेक चुका है। वह आपको उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के बारे में बताने के लिए उत्सुक है, व्यग्र है जो उसकी जिंदगी का वॉटरलू साबित हुई।

        मानवीय अनुभव की ये दास्तानें “मेरी पत्नी मेरा घर छोड़कर भाग गई।" से लेकर “मैंने अपना सब कुछ गँवा दिया था और मेरे पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं बची थी" से लेकर “मैंने दो-एक काम ऐसे किए जिससे मेरा सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया और मैं यहाँ चला आया।"

         जब हम स्किड रो यानी असफलता के दलदल से ऊपर चलकर मिस्टर और मिसेज़ औसत व्यक्ति के इलाके में पहुंचते हैं, तो हम जीवनस्तर में स्पष्ट अंतर देख सकते हैं। परंतु हम एक बार फिर यह देखते हैं कि मिस्टर औसत व्यक्ति भी अपनी औसत परिस्थितियों के लिए मूलतः वही कारण बताते हैं जो मिस्टर असफल ने बताए थे। अंदर से, मिस्टर औसत व्यक्ति हारा हुआ महसूस करते हैं। जिन परिस्थितियों से वे चोट खाए हैं, उनके घाव अब भी नहीं भरे हैं। अब वे अति सावधान हो गए हैं। अब वे रुक-रुककर चलते हैं, सीना तानकर नहीं चलते।
विजयी सेनापति की तरह सिर उठाकर नहीं चलते, बल्कि हारे हुए असंतुष्ट सिपाही की तरह सिर झुकाकर चलते हैं। वे हारा हुआ महसूस करते हैं परंतु वे अपनी औसत ज़िंदगी की सज़ा काटने की कोशिश करते हैं जिसके लिए वे अपनी “तक़दीर" को दोष देते हैं।

        इस व्यक्ति ने भी हार के सामने समर्पण कर दिया है, परंतु इसने यह समर्पण तार्किक रूप से, अच्छे ढंग से, सामाजिक रूप से “स्वीकृत" तरीके से किया है।

        अब जब हम सफलता की कम भीड़ वाली दुनिया में ऊपर चढ़ते हैं,तो हम देखते हैं कि यहाँ भी हर तरह की पृष्ठभूमि से आए लोग मौजूद हैं। कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिज़ हों या प्रसिद्ध मंत्री या सरकारी अधिकारी, हर क्षेत्र के चोटी के लोगों को देखने पर हम पाते हैं कि ये लोग ग़रीब घरों, अमीर घरों, बिखरे हुए परिवारों, मज़दूर परिवारों, खेतिहर घरों, और झोपड़ियों से यानी हर पृष्ठभूमि से आए हैं। समाज का नेतृत्व करने वाले ये लोग हर उस कठिन परिस्थिति को झेल चुके हैं जिसकी कल्पना हम कर सकते हैं।

        हर मामले में मिस्टर असफल, मिस्टर औसत और मिस्टर सफल में समानता हो सकती है- उम्र, बुद्धि, पृष्ठभूमि, राष्ट्रीयता या कोई और चीज़ जो आपके दिमाग में आए। इन सभी बातों में इन लोगों में कोई अंतर नहीं होता। परंतु इनमें एक बड़ा फ़र्क होता है। उन लोगों का हार के बारे में नज़रिया अलग-अलग होता है।

        जब मिस्टर असफल गिर जाते हैं, तो वे दुबारा नहीं उठ पाते। वे वहीं पड़े रहते हैं; कराहते हुए, अपनी चोट को सहलाते हुए। मिस्टर औसत अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं और रेंगने लगते हैं और जब वे थोड़ी दूर पहुँच जाते हैं तो फिर उठकर दूसरी दिशा में दौड़ लगा देते हैं ताकि वे दुबारा न गिरें।

        परंतु मिस्टर सफल जब गिरते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भिन्न होती है। वे तत्काल उठ खड़े होते हैं, सबक़ सीखते हैं, गिरने की बात भूल जाते

हैं और ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगते हैं।

       मेरा एक करीबी दोस्त बहुत ही सफल मैनेजमेंट सलाहकार है। जब आप उसके ऑफिस में कदम रखते हैं तो आपको सचमुच ऐसा लगता है जैसे आप किसी पॉश इलाके में आ गए हैं। फ़र्नीचर इतना शानदार होता है, गलीचे इतने आलीशान, ग्राहक इतने महत्वपूर्ण और माहौल इतना व्यस्त कि आप पहली ही नज़र में यह अनुमान लगा सकते हैं कि उसकी कंपनी बहुत सफल और समृद्ध होगी।

        कोई आलोचक यह कह सकता है, “इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति आसानी से बना सकता है।" परंतु आलोचक ग़लत है। इस तरह का माहौल 'चालाक' व्यक्ति ने नहीं बनाया। यह माहौल किसी प्रतिभाशाली या अमीर या खुशकिस्मत व्यक्ति ने भी नहीं बनाया। यह माहौल सिर्फ़ (सिर्फ़ शब्द के प्रयोग में मुझे संकोच होता है क्योंकि सिर्फ का मतलब आपको बहुत थोड़ा लग सकता है) एक लगनशील व्यक्ति ने बनाया, जिसने कभी यह नहीं सोचा कि वह हार गया है।

        इस समृद्ध और प्रतिष्ठित कंपनी के पीछे उस व्यक्ति की कहानी है जिसने ऊपर आने के लिए संघर्ष किया : बिज़नेस के शुरुआती छह महीनों में ही उसने अपनी 10 साल की बचत गँवा दी। वह कई महीनों तक अपने ऑफ़िस में ही रहा क्योंकि उसके पास किराए के घर के लिए पैसे नहीं थे। उसने कई "अच्छी” नौकरियों का प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि वह चाहता था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करे। जितनी बार उसके संभावित ग्राहकों ने उसे 'हाँ' कहा, उससे सौ गुना ज़्यादा लोगों ने 'ना' कहा।

        सफल होने के लिए उसने सात साल कड़ी मेहनत की, परंतु मैंने इस दौरान एक बार भी उसके मुँह से शिकायत नहीं सुनी। वह कहता था, “डेव, मैं सीख रहा हूँ। इस बिज़नेस में काफ़ी प्रतियोगिता है और चूंकि यह अप्रत्यक्ष बिज़नेस है इसलिए इसे बेचना मुश्किल है। परंतु मैं अब सीख रहा हूँ।"

      और उसने इसे सीख ही लिया।
  

      एक बार मैंने अपने दोस्त से कहा कि इस अनुभव से उसकी काफ़ी ऊर्जा बाहर निकल जाती होगी। परंतु उसका जवाब था, "नहीं, यह मेरे अंदर से कुछ निकाल नहीं रहा है, बल्कि मेरे अंदर कुछ भर रहा है।"

        हू इज़ हू इन अमेरिका में लोगों की जीवनियाँ पढ़ें और आप पाएँगे कि जो लोग बहुत सफल हुए हैं, उन्हें कई बार असफलता झेलनी पड़ी है। सफल लोगों के इस अभिजात्य समूह ने विरोध सहन किया, लोगों के ताने सहे, राह में बाधाएँ और तकलीफें झेली, असफलताओं का दौर झेला, व्यक्तिगत दुर्भाग्य सहा।

        महान लोगों की जीवनियाँ पढ़ें, और आप यहाँ भी पाएंगे कि ये सभी लोग किसी न किसी मोड़ पर अपनी असफलताओं के सामने घुटने टेक सकते थे।

        या इसके बजाय ऐसा करें। अपनी कंपनी के प्रेसिडेंट की पृष्ठभूमि जानें या अपने शहर के मेयर की या किसी ऐसे व्यक्ति को चुन लें जिसे आप सचमुच सफल मानते हों। जब आप गहराई में जाएँगे, तो आप पाएँगे कि इस व्यक्ति ने बहुत बड़ी, असली बाधाएँ पार की हैं और तब जाकर वह सफल हुआ है।

         विना विरोध, मुश्किलों और असफलताओं के बड़ी सफलता हासिल करना संभव नहीं है। परंतु यह संभव है कि आप इन असफलताओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा बना लें। आइए देखें कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है।

       मैंने व्यावसायिक एयरलाइनों के आँकड़े देखे जिनके मुताबिक़ लगभग 10 बिलियन मील की उड़ान में केवल एक दुर्घटना होती है। हवाई यात्रा आजकल बहुत ज़्यादा सुरक्षित है। दुर्भाग्य से, इसके बावजूद हवाई दुर्घटनाएँ होती हैं। परंतु जब कोई दुर्घटना होती है, तो 'सिविल एरोनॉटिक्स एडमिनिस्ट्रेशन' (सी.ए.ए.) तत्काल जाँच शुरू कर देता है कि दुर्घटना का कारण क्या था। मीलों दूर तक फैले मलबे को इकट्ठा किया जाता है। विशेषज्ञों का समूह यह विचार करता है कि क्या हुआ होगा जिस वजह से यह दुर्घटना हुई। गवाह और ज़िंदा बचे लोगों से बातचीत की जाती है। जाँच कई हफ्ते, कई महीने तक चलती है जब तक कि इस सवाल का जवाब न मिल जाए, “यह दुर्घटना क्यों हुई?"

         एक बार सी.ए.ए. को जवाब मिल जाता है, तो तत्काल ऐसे कदम उठाए जाते हैं कि फिर कभी इस तरह की दुर्घटना न होने पाए। अगर दुर्घटना किसी तकनीकी खराबी के कारण हुई थी, तो उसी तरह के दूसरे जहाज़ों में उस तकनीकी दोष को दूर किया जाता है। अगर कोई यंत्र दोषपूर्ण होता है, तो उसमें सुधार किया जाता है। आधुनिक हवाई जहाज़ में हज़ारों सुरक्षा यंत्र सी.ए.ए. की इसी तरह की जाँचों के परिणामस्वरूप तैयार हुए हैं।

       सी.ए.ए. के अध्ययन से हवाई यात्राएं पहले से ज्यादा सुरक्षित होती जाती हैं। असफलताओं से सीखने की प्रेरणा इसी को कहते हैं।

        डॉक्टर्स भी असफलताओं के सहारे बेहतर स्वास्थ्य और लंबे जीवन को सुनिश्चित करते हैं। अक्सर जब कोई मरीज़ किसी अनजान कारण से मरता है तो डॉक्टर यह जानने के लिए पोस्टमॉर्टम करते हैं कि उसकी मौत का कारण क्या था। इस तरह वे मानव शरीर की कार्यप्रणाली के बारे में ज्यादा जान पाते हैं और कई दूसरे लोगों की ज़िंदगियाँ बचा पाते हैं।

           मेरा एक दोस्त सेल्स एक्जीक्यूटिव है जो हर महीने अपने सेल्समैनों को यह बताने के लिए एक मीटिंग करता है कि वे कोई महत्वपूर्ण बिक्री क्यों नहीं कर पाए। ग्राहक और सेल्समैन के बीच की पूरी वार्ता का विश्लेषण किया जाता है और यह सीखा जाता है कि किस तरह भविष्य में ऐसी गलतियां न की जाएँ जिनसे असफलता मिली।

          यही सफल फुटबॉल कोच भी करते हैं, जो जितने मैच हारते हैं. उससे कहीं ज्यादा मैच जीतते हैं। वे भी अपनी टीम के साथ हर मैच का विश्लषण करते हैं और खिलाड़ियों को उनकी गलतियाँ बताते हैं। कई कोच तो हर मैच की वीडियो फिल्म भी बनवाते हैं ताकि टीम अपनी आँखों के सामने अपनी गलत चालों को देख सकें। इसका उद्देश्य है। टीम अगला मैच बेहतर खेले।

          सी.ए.ए. के अधिकारी, सफल सेल्स एक्जीक्यूटिब्ज़, डॉक्टर, फुटबॉल कोच और हर क्षेत्र के प्रोफेशनल्स सफलता के इस सिद्धांत का अनुसरण करते हैं : हर असफलता से कुछ न कुछ बचा लो।

          जब हम असफल होते हैं तो हम भावनात्मक रूप से इतने दःखी और विचलित हो जाते हैं कि हम उससे सबक सीखना भूल जाते हैं।

        प्रोफ़ेसर जानते हैं कि फेल होने के बाद विद्यार्थी की प्रतिक्रिया से ही सफलता की उसकी संभावना पता चलती है। जब मैं डेट्रॉयट में 'वेन स्टेट यूनिवर्सिटी' में प्रोफेसर था, तो मैंने एक सीनियर विद्यार्थी को फेल कर दिया था। मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था। इससे विद्यार्थी को गहरा धक्का लगा। उसने ग्रैजुएशन के बाद की योजनाएँ बना ली थीं और इस कारण उसकी हँसी उड़ना तय थी। उसके पास दो विकल्प थे: या तो वह एक साल और पढ़कर परीक्षा पास करे या फिर वह बिना डिग्री लिए कॉलेज छोड़कर चला जाए।

        मुझे आशा थी कि अपनी असफलता पर विद्यार्थी निराश होगा. शायद वह उत्तेजित भी हो। जब मैंने उसे यह समझाया कि वह असफल क्यों हुआ था, तो उसने यह माना कि उसने इस बार ठीक से पढ़ाई नहीं की थी।

       “परंतु,” उसने कहा, “मेरा पिछला रिकॉर्ड तो ठीक-ठाक है। आपने उसे ध्यान में क्यों नहीं रखा?"

        मैंने उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि हम हर साल का अलग-अलग मूल्यांकन करते हैं। मैंने यह भी जोड़ा कि कठोर शैक्षणिक नियमों के चलते नंबर तभी बढ़ाए जा सकते हैं जब जाँचने वाले प्रोफ़ेसर ने कोई गलती की हो।

        जब विद्यार्थी को यह पता चला कि उसके नंबर बढ़ने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, तो वह काफ़ी गुस्सा हो गया। उसने कहा, "प्रोफेसर, मैं आपको इस शहर के 50 लोगों के नाम गिना सकता हूँ जो बेहद सफल हैं पर वे कभी कॉलेज नहीं गए, न ही उनके पास कोई डिग्री है। ग्रैजुएशन की डिग्री का महत्व ही क्या है? परीक्षा में थोड़े खराब नंबर मिलने के कारण क्या मुझे मेरी डिग्री नहीं मिलेगी?

        "भगवान का शुक्र है," उसने आगे कहा, "बाहर की दुनिया में लोग आप जैसे प्रोफ़ेसरों की तरह नहीं सोचते।"

        इस टिप्पणी के बाद मैं 45 सेकंड तक रुका। (मैंने यह सीखा है कि जब आपकी आलोचना हो, तो वाकयुद्ध से बचने का एक अच्छा तरीका जवाब देने में देरी करना है।)

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